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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ५४ अकलंक-निकलंक को आदर्श मानकर लिखा पत्र

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    २००२-२०१६

    कामलिया (बासवाड़ा राजः)

    देहातीत ऐश्वर्य को प्राप्त करने के पुरुषार्थो गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में कोटि-कोटि वन्दन....

    हे गुरुदेव! ब्रह्मचारी विद्याधर जी ने कितने और पत्र लिखे ज्ञात नहीं किन्तु अग्रज भाई महावीर जी ने बताया कि कई पत्र नष्ट हो चुके हैं। एक और अन्तर्देशीय पत्र २१-११-१९६७ को सदलगा के मित्र मारुति को लिखा। जिसको मारुति जी ने अपने संग्रह में सम्हालकर रखा, इस पत्र की कॉपी महावीर जी ने प्राप्त कर हिन्दी अनुवाद करके मुझे दी, उसको आपको प्रेषित कर रहा हूँ जिसे पढ़कर गदगद् हो उठेंगे आप, ब्रह्मचारी विद्याधर के उच्च विचारों को देखकर

     

    अकलंक-निकलंक को आदर्श मानकर लिखा पत्र

    श्री

    वीतरागाय नमः

    दिनाँक-२१-११-६७

    किशनगढ़

    प्रिय मित्र मारुति भरमा मडीवाल यहाँ से १०८ ज्ञानसागर महाराज जी का अनेक आशीर्वाद और विद्याधर का सप्रेम वंदन!...

    आपका पत्र पहुँच गया इसलिए मेरे मन में प्रतिक्षण आपके बारे में बहुत हर्ष हो गया है, लेकिन यह संयोग कब होगा पता नहीं? जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी तुम संसार त्यागकर यहाँ आ जाओ क्योंकि अब आगे तुम्हें ज्ञान हो गया, तुम संसार में नहीं फँसे हो। ऐसे ज्ञान से सहित होकर निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा मिलना असंभव है, इस भेष से जो मिलता है वह अपन दोनों मिलकर ले लेंगे और धर्म की प्रभावना करेंगे। अपन जितनी कोशिश करेंगे, उतनी मंजिल पास होगी।  

     

    जिस प्रकार अकलंक-निकलंक दोनों ही ने धर्म का बोध पाकर सब जीवों के लिए इस संसार की निःसारता के बारे में बता दिया, उसी प्रकार की भावना को रखकर अपन दोनों यथाख्यात चारित्र को प्राप्त करेंगे। इन जैसा महाराज का जैसे उत्कृष्ट चारित्र है और किसी का नहीं। मैंने लगभग डेढ़ माह से शक्कर और नमक दोनों का त्याग किया है। मेरा दिन-प्रतिदिन वैराग्य बढ़ता जा रहा है, इसमें तुम भी यहाँ आकर मेरे साथ ‘रत्नकरण्डकश्रावकाचार' की कारिका याद करके वैराग्य भावना को और ज्यादा बढ़ाओ। ये मेरी विनती है। मेरे और तुम्हारे सम्बन्ध बहुत दूर से-सदियों से चले आये हैं ऐसा मुझे लगता है। तुम मुझे भेजकर खुद संसार में फँसे हुए हो, यानि डेढ़ वर्ष हो गया, मुझे भेजकर अभी तक तुम क्या कर रहे हो? बस करो, अब छोड़ दो और आत्मकल्याण में लीन हो जाओ और ये विचार तिलतुषमात्र भी नहीं करना। मेरा ये कहना भले ही तुम्हें अभी। बुरा लग जाये, लेकिन इसका फल यहाँ आने के बाद तुम्हें पता चलेगा।

     

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    हे मारुति! संसार में कोई अर्थ नहीं है, मेरा सौभाग्य है कि मैं तुम्हें समझा रहा हूँ। ये इस भाग्य की चर्चा उसी प्रकार आनंद देगी जैसे पहले कलबसदि (जैन मंदिर) में आनंद आता था। ये सौभाग्य मुझे कब। मिलेगा ये ही सोचते हुए तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। यहाँ पर आकर आप अपना और दूसरों का कल्याण करें, कृपा करके दूसरों को-घर में किसी को मत बताना, अभी बहुत समय है दीक्षा में उसी समय बताना लेकिन मैंने तुम्हें पहले-अभी बता दिया है।

    -विद्याधर ब्रह्मचारी

     

    इस तरह ब्रह्मचारी विद्याधर जी ने अपने मित्र मारुति को आध्यात्मिक पत्र लिखकर संसार की निस्सारता का और मनुष्य जन्म की दुर्लभता का बोध कराया। आत्मीयता से भरा यह पत्र पढ़कर धर्मोत्साह प्रगट होता है। इस पत्र से ब्रह्मचारी विद्याधर जी की अलौकिक उपकारता झाँक रही है। साथ ही विद्याधर का शास्त्रीय ज्ञान भी अपनी साक्षी दे रहा है। इस पत्र से यह भी स्पष्ट होता है कि ब्रह्मचारी विद्याधर जी मात्र अपना कल्याण ही नहीं वरन् औरों का भी कल्याण करना चाहते हैं। उनकी यह विशाल दृष्टि महापुरुषत्व को सिद्ध करती है। हे गुरुवर ! उपरोक्त पत्र पढ़कर हम सभी शिष्यानुशिष्य गौरवान्वित हैं, अपने ऐसे कल्याणकारी गुरु एवं उनके निर्माता गुरु को पाकर। गुरुद्वय के चरणों में नमोस्तु करता हुआ...।

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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