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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ५ मुनि विद्यासागर ने बनाया विद्याधर

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    ११-११-२०१५

    भीलवाड़ा (राजः)

     

    सार्थक संज्ञा के धनी दादा गुरु ज्ञानसागरजी महाराज के पावन श्री चरणों में त्रिकाल त्रिकरण से त्रिभक्ति पूर्वक नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु…

    हे विशुद्धदृष्टि गुरुवर! जब पहली बार विद्याधर जी आपके पास गए थे जब आपने उनसे पूछा था कि कौन हो और कहाँ से आये हो? क्या नाम है तुम्हारा? आपको इन प्रश्नों का जवाब विद्याधर ब्रह्मचारी जी ने दिया और आप संतुष्ट हो गए। पर मेरे मन में इस नाम को लेकर जिज्ञासा बनी रही। काफी खोजबीन की किन्तु सही समाधान सदलगा से आये विद्याधर के बड़े भाई जी से चर्चा करने पर ही मिला।उन्होंने बताया कि इन्हें विद्याधर के नाम से क्यों पुकारा गया। यूँ तो संसार में हर जातक का कोई न कोई नाम रख दिया जाता है, परन्तु विद्याधर नामकरण के पीछे एक रहस्य का खुलासा अग्रज भाई महावीर ने इस प्रकार किया-

     

    मुनि विद्यासागर ने बनाया विद्याधर

    ‘विद्याधर विशेष पुण्यवान् और तेजस्वी था उसको ज्ञान का संस्कार पूर्व से ही था। मेरी अक्का (माँ) श्रीमन्तीजी कई बार बताती थी कि ‘‘जब विद्याधर मेरे पेट में था तब मुझे साधु-संतों के दर्शन करने की इच्छा होती थी। तब मैं या तो आस-पास कोई मुनिराज होते तो उनके दर्शन करने जाती थी या फिर अमावस्या के दिन अक्किवाट ग्राम जाती थी और वहाँ मुनिराज विद्यासागरजी की समाधि पर पूजा-आराधना करती थी। तभी मुझे संतोष मिलता था। विद्याधर का जन्म होने के बाद तुम्हारे अन्ना (पिताजी) ने विचार किया कि अक्किवाट के महामुनि विद्यासागरजी महाराज की समाधि स्थल पर वंदना दर्शन पूजन के प्रतिफल स्वरूप हमें यह बालक प्राप्त हुआ है अत: इसको हम विद्याधर नाम से पुकारेंगे जिससे मुनिराज की स्मृति बनी रहे और अच्छे संस्कार आएँ। इस तरह विद्याधर नामकरण हुआ।' अक्किवाट सांगली (महाराष्ट्र) सदलगा से २० कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ पर अकबर के समकालीन महामुनिराज विद्यासागरजी की समाधि स्थली बनी हुई है। वो मुनिराज उच्चकोटि के साधक तपस्वी थे जिनको ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त थी। उनकी चर्चा बेलगाँव जिले में फैली हुई है। जैन-अजैन सभी लोग उनकी समाधि स्थल पर पूजा-अर्चना करने आते हैं। जब तक अन्नाजी (पिताजी) और अक्का (माँ) घर पर थी तब तक हम लोग सपरिवार अमावस्या के दूसरे दिन बैलगाड़ी में समाधि पर जाते थे और दर्शन पूजन करते थे।’’

     

    बस इसी समाधिस्थल के दर्शन और महामुनि की पूजन से माँ श्रीमन्तीजी को तृप्ति मिलती थी। इसलिए उन्होंने अपनी चतुर्थ संतान को जन्म दिया तो उसका नाम विद्याधर रख दिया। ऐसा लगा मानो वे विद्यासागर ही विद्याधर बनकर आये किन्तु आपने तो उन्हें पुनः विद्यासागर के रूप में ही घड़ दिया। पुण्य योग से सोने में सुहागा का संयोग बन पड़ा। ऐसे ही संयोग की प्रतीक्षा में...

     

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    चरण चंचरीक

    शिष्यानुशिष्य

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