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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - २३ स्वावलम्बी विद्याधर

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    ३४-१२-२०१५

    शाहपुरा (राजः)

     

    भवसागर की नौका, गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु… हे स्वावलम्बी गुरुवर! विद्याधर लोक व्यवहार में स्वावलम्बी बनने के लिए सतत् पुरुषार्थ करता रहता था और महापुरुषों के आदर्शों को स्वीकार करता था। इस सम्बन्ध में विद्याधर के अग्रज भाई ने बताया-

     

    स्वावलम्बी विद्याधर

    “जब विद्याधर सातवीं कक्षा में पढ़ता था तब विद्याधर ने तकली एवं चरखा चलाना सीखा था और मित्रों के साथ सुती धागा बनाता था। उसी धागे से कपड़ा बनाना भी सीखा। उस कपड़े से टोपी, चड्डी एवं टॉवल बनाता था और उसी का उपयोग करता था। पिताजी को भी टोपी बनाकर दी थी। तब पिताजी ने कहा-इतनी मेहनत क्यों करता है बेटा? तब विद्याधर बोला-यह तो स्वाभिमान की बात है जब अन्ना और देश के महापुरुष भी बनाते हैं तो हमें बनाने में क्या शर्म? स्वावलम्बी तो बनना ही चाहिए। विद्याधर की बात सुनकर माता-पिता दोनों ही बड़े प्रसन्न हुए।”

     

    इस प्रकार विद्याधर बचपन से ही स्वावलम्बी जीवन जिया करता था और पूर्णतः स्वावलम्बी बनने के लिए आपश्री के पास आये। जिसे आपने मुनि बनाया और आचार्य बनाकर पूर्णतः स्वावलम्बी बनाया था। यहाँ तक कि आपने अपनी पराधीनता से भी उसे मुक्त कर दिया था। धन्य हैं गुरुवर !  द्वय गुरुवरों के चरणों में नमोस्तु करता हुआ भावना भाता हूँ, आप जैसा स्वाभिमानी बनूं...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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    आज जब मै पूज्यवर गुरुदेव के स्वावलम्बन एवम आत्मनिर्भरता के चिंतन पर आधारित हथकरघा पर विचार करता हूँ तब लगता है कि  हथकरघा के बारे में इतना सब कुछ तो वे बचपन से जानते समझते थे जितना हम आज भी नही जान पाते

    मेरा सभी से आग्रह अनुरोध निवेदन है कि एक बार इस ग्रन्थ का स्वाध्याय अवश्य करे

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