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    पत्र क्रमांक - १५ बालक विद्याधर ने नेता बनने का भाव किया

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    २१-११-२०१५

    भीलवाड़ा (राजः)

     

    आचार और पुरुषार्थ के आदर्श गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में त्रिकाल नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु…

    हे गुरुवर! 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' इस मुहावरे को आपके लाड़ले शिष्य के व्यक्तित्व में चरितार्थ होते हुए देखा जा सकता है। ब्रह्मचारी विद्याधर में बालक अवस्था से ही सहज स्वाभाविक महापुरुषत्व के लक्षण प्रकट होने लगे थे। इस सम्बन्ध में पूर्व पत्रों से आप जान ही गए हैं, किन्तु विद्याधर की अनेक ऐसी विशेषताएँ हैं जिनके बारे में जानकर मन प्रफुल्लित हो उठता है और लगता है कि आपको बताऊँ। विद्याधर बचपन से ही हर चीज को जानने की जिज्ञासा करता था और जो चीज उसके मन को भा जाती तो उसे प्राप्त करने का भाव करता था। इस सम्बन्ध में विद्याधर की छोटी बहिनों ने एक स्मृति भेजी। जो आपको बता रहा हूँ-

     

    बालक विद्याधर ने नेता बनने का भाव किया

    एक बार माँ पड़ोसी के यहाँ पर गई थी, तब १० वर्षीय बालक विद्याधर भी साथ में था। उनके यहाँ पर बहुत सारे चित्रों के फ्रेम लगे हुए थे। उनको देखकर चतुर विद्याधर अपने हाथों को उठाकर अँगुली का इशारा करते हुए धीरे से माँ से बोला-माँ ये किसके फोटो हैं? तब माँ बोली-बेटा ये महापुरुषों के फोटो हैं। ये गाँधी जी हैं, ये विनोबा जी हैं, ये राष्ट्रपति जी हैं, ये भगवान महावीर स्वामी हैं, ये कृष्ण जी हैं। तभी बालक विद्याधर बोला–ये किसका है? माँ बोली-ये नेहरु जी का है। ये देश के सबसे बड़े नेता हैं। तो विद्याधर बोला–माँ मुझे भी नेहरु बोलना, मैं भी एक दिन ऐसा ही बनूंगा। माँ आश्चर्य से बोली–हाँ! हाँ!! फिर माँ ने घर आकर सबको बताया। इस तरह विद्याधर के बचपन से ही बड़े बनने के भाव होते थे। जब भी आस-पास कोई भी देश का बड़ा नेता या संत व्याख्यान देने आते तो विद्याधर सुनने जाते थे और सुनकर आने के बाद घर पर आकर सारी बात बतलाते-वो कैसे हैं? क्या बोला? आदि।"

     

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    इस तरह आज वो मोक्षमार्ग के बड़े नेता बन गए हैं और उनको सुनने के लिए लाखों लोग आते हैं और देश में चर्चा होती है- आचार्य श्री विद्यासागर जी ने यह कहा। ऐसे शिष्य को पाकर आप कितने आह्लादित हुए थे। आपकी यह अनुभूति आज हम शिष्यों को, ऐसे गुरु को पाकर हो रही है। गुरुद्वय के चरणों में कोटिशः नमन करते हुए....

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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