Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - १२ आचार्य श्री शान्तिसागर जी की कथा ने बनाया कथानायक

       (0 reviews)

    १८-११-२०१५

    भीलवाड़ा (राजः)

     

    जिनवाणी के मौन साधक महान् तत्त्ववेत्ता गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में तत्त्वजिज्ञासु का नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु…

    हे जिनवच भाषक गुरुवर! यद्यपि विद्याधर पूर्व संस्कारों के प्रभाव से अलौकिक क्रियाकर्म में नियोजित था, किन्तु नियति ने नौ वर्ष की उम्र में ऐसा मणिकांचन संयोग मिलाया कि विद्याधर का मन लौकिक पढाई से उचट गया और वह आत्म कल्याण की बातें सोचने लगा। उस संयोग के बारे में बड़े भाई महावीर जी ने बताया-

     

    आचार्य श्री शान्तिसागर जी की कथा ने बनाया कथानायक

    "शेडवाल (जिला-बेलगाँव) में परमपूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज का चातुर्मास चल रहा था तब हम लोग अक्का-अन्ना (माता-पिता) के साथ उनके दर्शनार्थ गए थे उस वक्त विद्याधर नौ वर्ष का था। संघस्थ मुनिराज वर्धमानसागर जी (आचार्य शान्तिसागर जी महाराज के गृहस्थ अवस्था के बड़े भाई) का केशलोंच चल रहा था और चारित्र चक्रवर्ती महाराज प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन के मध्य उन्होंने दो कहानियाँ सुनाईं ।

     

    Antaryatri mahapurush pdf01_Page_044.jpg

     

    प्रथम कहानी - एक बाप-बेटे चोर थे। चोर पिता ने बेटे को दिगम्बर मुनि के प्रवचन सुनने को मना किया, किन्तु चोरी कर भागते समय पैर में काँटा लगा और उसी समय एक मुनि महाराज के प्रवचन के शब्द कानों में पड़े "सत्यमेव जयते" सत्यवान की जीत होती है, इसलिए सदा सत्य बोलना चाहिए। दूसरे दिन उस चोर ने सत्य बोलते हुए राजा के महल में चोरी कर ली, किन्तु उसे किसी ने भी चोर नहीं माना। उसके दूसरे दिन राज्यसभा में जाकर उसने सारा रहस्य खोल दिया और दिगम्बर मुनि के ऊपर विश्वास करते हुए कि दिगम्बर मुनि सत्य बोलते हैं और उन मुनि के पास पहुँच गया एवं सच्ची राह पर चल पड़ा।

     

    दूसरी कहानी - एक गड़रिया था उसने एक ब्राह्मण व्यक्ति को नदी में डुबकी लगाकर भगवान् को नमस्कार करते हुए देखा। उसने उससे पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं? तो उसने कहा कि मुझे पानी के तल में भगवान् दिखते हैं। गड़रिये ने भी बड़ी श्रद्धा-भक्ति के साथ उसके जैसा ही किया। किसी देवता ने उसकी श्रद्धा भक्ति को देखकर उसे दर्शन दिए।

     

    इन कहानियों से यह शिक्षा मिलती है कि हमें भगवान् पर, गुरु पर सच्ची श्रद्धा-भक्ति रखनी चाहिए और गुरु की शिक्षा को अपने जीवन में उतारना चाहिए। इसी से ही अपना आत्मकल्याण हो सकता है। प्रवचन के उपरान्त हम लोग घर वापस आ गए। तब विद्याधर ने मुझसे कहा था कि ‘जीवन जीने के लिए गृहस्थाश्रम में कुछ भी सार नहीं है। वह महाराज के प्रवचन सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ और तभी से उसमें परिवर्तन आने लगा था |” इस तरह विद्याधर की होनहारता का परिचय मिल जाता है कि उसने प्रवचन में छिपे अन्तस्तत्त्व को पहचान लिया और लक्ष्य निर्धारित कर लिया, तभी से आया विद्याधर के जीवन में नया मोड़। उस गूढदृष्टि को नमन करता हुआ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

     Share


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×
×
  • Create New...