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    पत्र क्रमांक - १० विद्याधर के कालखण्ड की शिक्षा व्यवस्था और पिता का कर्तव्य

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    १६-११-२०१५

    भीलवाड़ा (राजः)

     

    सर्वविद्या पारंगत प्रज्ञाचक्षु गुरुवर के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु…

    हे प्रज्ञाश्रमण गुरुवर! आज मैं आपको विद्याधर की प्राथमिक शिक्षा का वर्णन लिख रहा हूँ। आपको यह तो विदित ही है कि वे जन्म से ही होनहार थे और परिवार के उच्च संस्कारों ने उनको और अधिक संवार दिया था। जिस तरह प्रत्येक पिता अपनी संतान के प्रति उसके अबोधकाल में अपने दायित्व का निर्वाहन करते हैं इसी तरह मल्लप्पाजी ने भी किया। इस बात को बड़े भाई महावीर जी से पूछने पर जो ज्ञात हुआ सो उन्हीं के शब्दों में लिख रहा हूँ-

     

    विद्याधर के कालखण्ड की शिक्षा व्यवस्था और पिता का कर्तव्य

    ‘‘जब विद्याधर पाँच वर्ष का हुआ तब अन्नाजी (पिताजी) ने विद्याधर को प्राथमिक विद्यालय में दाखिल कराया था उस विद्यालय का नाम-‘कन्नड़ गन्डु मक्कड़शालेय', सदलगा (कन्नड़ बालक प्राथमिक शाला, सदलगा) था। जो घर से आधा कि.मी. दूर था। प्रारम्भ में अन्नाजी विद्याधर को स्कूल छोड़ने जाते थे और वापस वह मेरे साथ आता था। कुछ समय बाद मेरे साथ ही जाता-आता था। वैसे वह स्कूल जाने में रोया नहीं। यह क्रम पहली से चौथी कक्षा तक चला।

     

    उस समय विद्यालय में पढ़ाई सुबह-शाम दो भागों में हुआ करती थी। सुबह सात बजे विद्यालय जाते और ११ बजे वापस आते थे और पुन: भोजन करके जाते और शाम को पाँच बजे लौटते थे हम लोग अपनी-अपनी कॉपी-किताबें बड़े से कपड़े में लपेटकर ले जाते थे और बैठने के लिए अपनी-अपनी टाटपट्टी भी ले जाते थे।

     

    विद्यालय में प्रतिदिन सुबह ७ बजे से प्रार्थना हुआ करती थी उसमें जो बच्चे उपस्थित होते थे, उन बच्चों को पाँच अंक दिए जाते थे। प्रतिदिन शिक्षक द्वारा दिया गया पाठ याद करके सुनाना होता था, उसके अनुसार भी अंक मिलते थे और शिक्षक वे अंक तुरन्त बच्चों को बता दिया करते थे। शाम को विद्यार्थियों को अपने घर जाने से पहले दिनभर में प्राप्त अपने अंक शिक्षक के पास लिखवाने होते थे। कोई भी बच्चा इस प्रक्रिया में बेईमानी नहीं करता था। सभी ईमानदारी से अपने अंक बताते थे।

     

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    विद्यालय के प्रत्येक कक्षा के विद्यार्थियों को अपनी कक्षा में सफाई करना पड़ती थी। इसके लिए ३-३, ४-४ विद्यार्थियों की टोलियाँ बनी हुई थीं जो बारी-बारी से कक्षा को गोबर से लीपा करती थीं। विद्याधर ने भी अपनी कक्षा की टोली बना रखी थी और इस कार्य में वह कभी भी प्रमाद नहीं करता था। उस समय सभी विद्यार्थी विद्यालय को विद्यामन्दिर मानकर विनय किया करते थे। शिक्षकगण प्रत्येक कक्षा के विद्यार्थियों की टोली को सफाई के अंक देते थे और सप्ताह के अन्त में हर क्रिया के अंकों को जोड़कर परिणाम निकाला जाता था उसी के अनुसार प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान बताया जाता था और उन बच्चों को उसी क्रम से कक्षा में आगे बैठने मिलता था। प्रथम स्थान प्राप्त बच्चे को कक्षा की हाजिरी लगाने को भी मिलती थी। विद्याधर जब भी द्वितीय, तृतीय स्थान पर आता, तब उदास होकर घर आता था। उसकी उदासी देखकर अक्का (माँ) समझ जाती थी, फिर उसे बड़े प्यार से समझाती थी और आगे के लिए सावधान करती थी।

     

    मैं और विद्याधर कन्नड़ माध्यम से पढ़ते थे किन्तु उसी विद्यालय में मराठी माध्यम से भी पढ़ाई होती थी। आगे चलकर छोटे भाई अनन्तनाथ और शान्तिनाथ मराठी माध्यम से पढ़े थे एवं बहिन शान्ता बाई ने कन्नड़ माध्यम से पढ़ाई की तथा बहिन सुवर्णा बाई ने मराठी माध्यम से पढ़ाई की।” इस तरह उस कालखण्ड में शिक्षा की व्यवस्था अनुशासनमय थी और विद्यालयों को ज्ञान मन्दिर का दर्जा था ।आपश्री के चरणों में नमन...

    जिज्ञासु

    शिष्यानुशिष्य

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