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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 95 ब्र. विद्याधर का लक्ष्य : ज्ञानाभ्यास-साधना-सेवा

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    पत्र क्रमांक-९५

    ०३-०१-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    विद्वानानुप्रिय पूज्य गुरूणां गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में त्रिकाल नमस्कार करता हूँ... हे गुरुदेव! मैं आपको सन् १९६९ की बात लिखें उससे पहले मैं, ब्रह्मचारी विद्याधर जी के बारे में कुछ और भी लिखना चाहता हूँ।

     

    ब्र. विद्याधर का लक्ष्य : ज्ञानाभ्यास-साधना-सेवा

     

    जब ब्रह्मचारी विद्याधर जी आपके पास आए और आपकी कसौटी पर खरे उतरे तो आपने उन्हें हिन्दी, संस्कृत सिखाना शुरु किया और कुछ विद्वान् भी पढ़ाने के लिए लगाए थे, तब विद्याधर जी एक क्षण भी अपने समय को लक्ष्य से अलग अन्यत्र नहीं लगाते थे। हमें कई लोगों ने उस समय की बातें बतायीं जिसमें विद्याधर जी की दिनचर्या में स्वाध्याय साधना सेवा के अतिरिक्त कहीं भी किसी अन्य कार्य के लिए समय नहीं होता था। खोजबीन के दौरान मुझे ब्राह्मी-विद्या आश्रम, जबलपुर के पुस्तकालय से ब्र. विद्याधर जी एवं मुनि विद्यासागर जी की कुछ हस्तलिखित पाण्डुलिपियों की छाया प्रति प्राप्त हुई । जिसे देखकर अचम्भित रह गया कि ज्ञान की जिजीविषा लिए जो पल-पल दीपकसम जल रहे थे। अपना हिन्दी का ज्ञान बढ़ाने के लिए एवं शुद्धलेख का अभ्यास करने के लिए प्रमेयरत्नमाला ग्रन्थ की चिन्तामणि हिन्दी व्याख्योपेता नामक टीका अपनी कॉपी में नोट करते थे-

    २४-०४-१९६८ नसीराबाद ८ पृष्ठों का लेखन किया।

     २५-०४-१९६८ नसीराबाद ५ पृष्ठों का लेखन किया।

    २६-०४-१९६८ नसीराबाद ७ पृष्ठों का लेखन किया।

    २७-०४-१९६८ नसीराबाद ५ पृष्ठों का लेखन किया।

    २८-०४-१९६८ नसीराबाद ६ पृष्ठों का लेखन किया।

    २९-०४-१९६८ नसीराबाद ५ पृष्ठों का लेखन किया।

    ३०-०४-१९६८ नसीराबाद ६ पृष्ठों का लेखन किया।

    ०१-०५-१९६८ नसीराबाद ४ पृष्ठों का लेखन किया।

    ०२-०५-१९६८ नसीराबाद ४ पृष्ठों का लेखन किया।

    इस तरह नसीराबाद में ब्रह्मचारी विद्याधर जी ने ५० पृष्ठ लिखे तत्पश्चात् आपने विहार कर दिया तो आप जहाँ भी विहार में रुकते तो वहाँ भी विद्याधर जी अपना लेखन अभ्यास का कार्य शुरु कर देते | ०३-०५-१९६८ को १५ कि.मी. चलकर आप रामसर पहुँचे जहाँ मन्दिर नहीं है किन्तु विश्राम किया। वहाँ पर ब्रह्मचारी जी ने २ पृष्ठों का लेखन किया। ०४-०५-१९६८ को रामसर से मोराझड़ी ६ कि.मी. चलकर पहुँचे, जहाँ पर मन्दिर है, समाज है। वहाँ पर ब्रह्मचारी जी ने ६ पृष्ठों का लेखन कर प्रथम समुद्देश पूर्ण किया। ०५-०५-१९६८ को मोराझड़ी से मण्डावरिया ९ कि.मी. पदयात्रा हुई । जहाँ चैत्यालय है, कुछ जैन घर हैं। वहाँ पर द्वितीय समुद्देश प्रारम्भ किया और ७ पृष्ठों का लेखन किया। ०७-०५-१९६८ को मण्डावरिया में ६ पृष्ठों का लेखन किया। ०८-०५-१९६८ को मण्डावरिया में ९ पृष्ठों का लेखन किया।

     

    १२-०५-१९६८ को दादिया ७ कि.मी. चलकर पहुँचे, जहाँ मन्दिर है, समाज है। वहाँ ४ पृष्ठों का लेखन किया। १३-०५-१९६८ को दादिया में साढ़े पाँच पृष्ठों का लेखन किया। | १७-०५-१९६८ को दादिया में साढ़े दस पृष्ठों का लेखन किया एवं ३० माला णमोकार मंत्र जपा। १८-०५-१९६८ को दादिया में ५ पृष्ठों का लेखन किया एवं ३० माला णमोकार मंत्र जपा। १९-०५-१९६८ को दादिया में ११ पृष्ठों का लेखन किया एवं ३० माला णमोकार मंत्र जपा। २०-०५-१९६८ को भी ३० माला णमोकार मंत्र का जाप किया। ०१-०६-१९६८ को दादिया में ढाई पृष्ठों का लेखन किया। ०४-०६-१९६८ को दादिया में ३ पृष्ठों का लेखन किया। १४-०६-१९६८ को दादिया में एक पंक्ति का लेखन किया। ०१-०९-१९६८ को अजमेर में ६ पंक्तियों का लेखन किया। ०२-०९-१९६८ को अजमेर में १७ पंक्तियों का लेखन किया। इसी तरह संस्कृत सीखते समय अपने समझने के लिए कन्नड़ भाषा में भी लिखते थे।

     

    दादागुरु! आप सोच रहे होंगे कि मैं ये सब क्यों लिख रहा हूँ तो मैं बताना चाहता हूँ कि जन्मजात योगी और ज्ञान को प्रतिपल जीवनाचरण बनाने वाले प्रतिक्षण संचेतन, जागृत, अवबोधित मेरे गुरु की छोटी से छोटी जानकारी हम शिष्यों को ही नहीं वरन् लाखों-लाखों भक्त श्रद्धालु उनकी हर बात को जानना चाहते हैं अत: आपके निमित्त से सभी को यह जानकारी मिल सके इसलिए आपको प्रेषित कर रहा हूँ। आपकी अप्रत्यक्ष सत्संगति प्राप्त होती रहे इस भाव से नमोऽस्तु...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य


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