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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 198 - गुरु उपकारों को जीवनभर नहीं भुला पाऊँगा

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    पत्र क्रमांक-१९८

    ०८-०५-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    सदा दीक्षा के भावों की अनुभूति में निमग्न दादागुरु परमपूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में त्रिकाल वंदन करता हूँ... हे गुरुवर! आपके प्रिय आचार्य मेरे गुरुवर के आकर्षक व्यक्तित्व के कारण लोग उनका अधिक से अधिक समागम चाहते थे। यह बात तो आप भी अनुभूत कर चुके होंगे। इसलिए जहाँ भी आप गुरुशिष्य जाते थे तो वहाँ पर किसी न किसी निमित्त के बहाने मनोज्ञ मुनिराज गुरुवर विद्यासागर जी महाराज का समागम प्राप्त कर लेते थे। अपरंच जब किशनगढ़ से लौटकर केसरगंज अजमेर आये तो समाज प्रमुखों ने केसरगंज में चातुर्मास करने हेतु निवेदन किया और ३० जून को पांचवाँ दीक्षादिवस मनाने हेतु निवेदन किया। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया-

     

    गुरु उपकारों को जीवनभर नहीं भुला पाऊँगा

    ‘‘केसरगंज समाज ने दीक्षा महोत्सव आपके सान्निध्य में मनाने हेतु कई बार निवेदन किया, पर आचार्यश्री मौन रहे और ३० जून को आचार्य श्री के सान्निध्य में केसरगंज में दीक्षादिवस मनाया गया। प्रभुदयाल द्वारा रचित आचार्य विद्यासागर पूजा सभी ने मिलकर की और प्रतिष्ठित लोगों ने विनयांजलि अर्पण की, अंत में आचार्यश्री जी ने अपने प्रवचन में गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के उपकारों का बखान करते हुए बोले- ‘मुझ पामर को जैनेन्द्र प्रक्रिया व्याकरण, प्रमेयकमल मार्तण्ड एवं अष्टसहस्री जैसे क्लिष्ट ग्रन्थ पढ़ाये जो कि उनके मुख पर थे। वे कभी ग्रन्थ लेकर नहीं पढ़ाते थे। उन्होंने हमें थोड़े से ही समय में आगम की दृष्टि दी। वे सच्चे मायने में आगमनिष्ठ, चरित्रनिष्ठ, रत्नत्रय धारी श्रमण थे। उनका अधिक समय त्रय गुप्ति अप्रमत्त अवस्था में ही निकलता था। उनके उपकारों को मैं जीवनभर नहीं भुला पाऊँगा। वे हर क्षण मेरे साथ रहते हैं।'

     

    दीक्षादिवस के समाचार ‘जैन गजट' ०५ जुलाई ७३ को प्रकाशित किए गए जिसकी कटिंग प्राचार्य निहालचंद जी बड़जात्या ने मुझे दी थी। जिसमें समाचार इस प्रकार है-

     

    दीक्षा दिवस

    अजमेर-स्थानीय श्री पार्श्वनाथ दि. जैन जैसवाल मन्दिर जी केसरगंज के विशाल भव्य प्रांगण में श्री परमपूज्य १०८ युवा मुनिराज श्री विद्यासागर जी का दीक्षा दिवस ३० जून ७३ को अपूर्व धर्मोत्साह के साथ सम्पन्न हुआ। पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के २७ वर्षीय महान् जीवन की प्रवेश बेला पर २७ युगल श्रावकों द्वारा श्री भगवज्जिनेन्द्रदेव की पूजन की गई। तदुपरांत ३ बजे से सभा की कार्यवाही प्रारम्भ हुई। सर्वप्रथम श्री पं. हेमचन्द्र जी शास्त्री एम.ए. ने मंगलाचरण करते हुए पूज्य महाराज श्री के निःशल्य वीतरागी जीवन की मंगलकामना की। श्री प्रभुदयाल जी जैन द्वारा सरस भजनोपरांत आचार्य श्री की पूर्वावस्था की बहिनद्वय ने स्तुतिगान किया। अनन्तर श्री निहालचन्द्रजी एम.ए. ने आचार्यश्री का संक्षिप्त जीवन परिचय पढ़ा। आचार्य श्री के गृहस्थ जीवन के अग्रज श्री महावीरजी ने सुललित अंग्रेजी में आचार्यश्री का अभिवंदन किया। श्रीमती कनकलता जैन के भजनोपरान्त भा. दि. जैन महासभा के महामंत्री श्री सेठ श्रीपति जी जैन ने अपनी श्रद्धा समर्पित करते हुए रत्नत्रय की समाराधना पर बल दिया।

     

    ‘महाराज जी दीक्षा दे दो, चलूंगी तुम्हारे साथ दो नन्हीं बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत सुमधुर गायन के बाद श्री माणकचंद जी सोगानी विधायक का भाषण हुआ। पश्चात् समाज शिरोमणि श्री सेठ सर भागचंद जी सा. सोनी ने अपनी मार्मिक विनयांजलि समर्पित की। श्री १०५ क्षु. स्वरूपानन्दसागर जी के भाषणोपरान्त परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी का मार्मिक उद्बोधन हुआ। आपने दीक्षा गुरु स्व. आचार्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में शतशः नमन करते हुए उनकी उत्कृष्ट समाधि का भव्य दृश्य प्रस्तुत किया। संघ का विहार ०२-०७-७३ को ब्यावर के लिए हो गया है हजारों भक्त-समुदाय ने अजमेर सीमान्त तक आचार्य श्री का दर्शन लाभ लिया। संघ का चातुर्मास ब्यावर में होने की पूर्ण सम्भावना है।"

     

    इस तरह आपके लाड़ले शिष्य प्रिय आचार्य यथायोग्य प्रभावना करते हुए और सबकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बिना बंधे आपकी आज्ञा से बंधकर अनियत विहार करते थे। ऐसे अनियत विहारी गुरु-शिष्य के चरणों में त्रिकाल वंदन करता हुआ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     


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