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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 189 - दिगम्बर जैनाचार्य श्री १०८ श्री ज्ञानसागर जी महाराज का संदेश

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    पत्र क्रमांक-१८९

    २६-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    विलक्षण सहजानंद रसिक दादागुरु क्षपकराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन करता हूँ... हे गुरुवर! आप अपनी आत्मसाधना में लीन होने के बावजूद भी अपने दीक्षा गुरु के उपकारों को नहीं भूले और प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी उनकी पुण्यतिथि पर आपने समाज के द्वारा आयोजित महोत्सव में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस सम्बन्ध में कैलाशचंद जी पाटनी अजमेर ने 'जैन गजट' की कटिंग दी, जिसमें ८ मार्च १९७३ को समाचार प्रकाशित हुआ-

     

    पुण्यतिथि

    ‘नसीराबाद-फागुन वदी अमावस (४ मार्च) रविवार को स्वर्गीय आचार्य श्री १०८ शिवसागर जी महाराज की पुण्यतिथि आचार्य श्री १०८ श्री विद्यासागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में मनायी गई। सर्वप्रथम पं. श्री चंपालाल जी ने मंगलाचरण पूर्वक स्वर्गीय आचार्यश्री के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित की। अनंतर ब्र. चिरंजीलाल जी के बाद पूज्य क्षुल्लक १०५ श्री स्वरूपानंदसागर जी ने स्व. आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। वयोवृद्ध ज्ञानमूर्ति पूज्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा कि स्वर्गीय आचार्य श्री ने मुझको अज्ञान व अंधकार से हटाकर ज्ञानरूपी प्रकाश के मार्ग में आरूढ़ किया। अन्त में आचार्य श्री १०८ श्री विद्यासागर जी ने स्व. आचार्यश्री के जीवन पर प्रकाश डाला।' इस तरह आप अन्तरंग साधना के साथ-साथ बहिरंग धर्म प्रभावना के साधनों को भी अन्तिम समय तक अपनाते रहे । सल्लेखना साधना से क्षीणकाय होने के बावजूद भी आप अपने २८ मूलगुणात्मक चर्या का यथासमय पालन करते रहे। आपका अन्तिम केशलोंच नसीराबाद में हुआ। इस सम्बन्धी समाचार ‘जैन गजट' में २९ मार्च ७३ को ताराचंद जी सेठी मंत्री ने प्रकाशित कराये-

     

    क्षपकगुरु का केशलोंच समारोह

    ‘‘नसीराबाद-दिनांक २३-०३-७३ शुक्रवार शुभमिति चैत्र कृष्णा ४ को प्रात:काल वयोवृद्ध बाल ब्रह्मचारी परमपूज्य मुनि श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज का केशलोंच भारी जन समुदाय के मध्य में हुआ। आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी का संघ अभी यहीं पर ही विराजमान रहेगा। दर्शनार्थी दर्शन करके पुण्यलाभ लेवें।' इस तरह आप अपनी चारित्रशुद्धि चर्या में निरत रहते और उपयोगशुद्धि की तो बात ही निराली है। आपके उपयोग में अन्तिम समय तक आगमयुक्त चिंतन-मनन चलता रहा। इस सम्बन्ध में भी कुछ संस्मरण आपको बताना चाहता हूँ। नसीराबाद के शान्तिलाल जी पाटनी ने बताया

     

    सबसे बड़ी निधि : अमृतवचन

    “जब गुरुदेव समाधि साधना में लीन थे तब मार्च से मई तक प्रतिदिन सुबह एक लाईन का समाज के नाम सन्देश देते थे। मैं उस संदेश को बाहर श्यामपट्ट पर लिख देता था। उस संदेश को पढ़ने के लिए सारी समाज आती थी और उससे प्रेरणा पाती थी। मैं प्रतिदिन आचार्य श्री विद्यासागर जी को पहले वह संदेश दिखाता था। तब विद्यासागर जी कहते थे- ‘गुरुदेव कितने ज्ञानी हैं और जो उन्होंने पढ़ा है, उसका अनुभव करके अमृतवचन दे रहे हैं, ये सबसे बड़ी निधि है।”

    इसी प्रकार दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने भीलवाड़ा में बताया-

     

    जिससे शिक्षा मिले वह पठनीय है

    “एक दिन क्षपक गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज के पास क्षुल्लक स्वरूपानंदसागर बैठे थे तब गुरुदेव ने कहा- 'श्रीपाल-मैनासुन्दरी का वर्णन मूल पुराण शास्त्रों में कही नहीं आया है। आदिपुराण, उत्तरपुराण, हरिवंशपुराण, पद्मपुराण उठाकर देख लो।' तब क्षुल्लकजी ने पूछा-गुरुदेव! तब यह कहानी प्रामाणिक है या नहीं। तो गुरुदेव बोले- ‘शोध का विषय है, कथा से शिक्षा तो मिलती है और सिद्धान्त से बाधा भी नहीं आती, अतः पठनीय है।'

    कषाय का अभाव अपने समय पर होता है

    महावीर जयंती के बाद एक दिन क्षुल्लक स्वरूपानंदसागर ने क्षपकराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज से पूछा- चक्रवर्ती भरत जी को मुनिदीक्षा लेते ही केवलज्ञान हो गया और कामदेव बाहुबली मुनिराज जी को मुनिदीक्षा के १ वर्ष बाद केवलज्ञान हुआ तथा तीर्थंकर मुनिराज श्री ऋषभदेव जी को केवलज्ञान प्राप्त करने में १०00 वर्ष लग गए ऐसा क्यों? तब आगमज्ञाता चिंतनशील गुरुदेव बोले- 'देखो, उनका १००० वर्ष संयम अवस्था में ही तो बीता, उनके कर्मों की स्थिति वैसी ही थी। हम अपनी कषाय को तो मन्द कर सकते हैं लेकिन कषाय का अभाव तो अपने समय पर ही होता है। इसमें क्या-क्यों आदि प्रश्न नहीं चलते । परिणामों की विचित्रता है।''

     

    दिगम्बर जैनाचार्य श्री १०८ श्री ज्ञानसागर जी महाराज का संदेश

    महावीर जयंती के पहले कुछ अजैन प्रबुद्ध लोग गुरुदेव के दर्शन करने आये थे और उन्होंने जैन और हिन्दू धर्म की एकता की बात कही। तब गुरु महाराज ने बहुत सुन्दर अकाट्य चिंतन प्रस्तुत किया, जिसको नसीराबाद के एक विद्वान् नोट कर रहे थे, बाद में वह चिंतन प्रकाशित हुआ था। वह लेख मुनि श्री अभयसागर जी महाराज को प्राप्त हुआ, जो अभी उन्होंने हमें प्रेषित किया-

     

    ‘‘हिंसनं मारणं विनाशनं हिंसा, ताम् दूषयति निराकरोति स हिन्दुः''- इस निरुक्ति के अनुसार जैन लोग भी हिन्दू हैं क्योंकि जैन लोग हिंसा का दृढ़ता से निषेध करते हैं एवं जैन शब्द का अर्थ है “जयति विश्वसनीयो भवति स जिनः, जिन एव जैनः।'' इस तरह जैन शब्द भी हिन्दू के समकक्ष हो जाता है। क्योंकि प्रत्येक प्राणी जिसको अपना विराधक न जानकर समर्थक जानता है, उसी पर विश्वास करता है।

     

    इस तरह ‘हिन्दू, जैन और अहिंसक' ये तीनों शब्द एकार्थक ठहरते हैं और इस प्रकार हिन्दुता प्राणी मात्र के लिए आदरणीय हो जाती है, क्योंकि प्रत्येक प्राणी औरों का न सही किन्तु अपने आप का तो विराधन न चाहकर संरक्षण ही चाहता है, जो कि अन्य के संरक्षण के बिना कभी सम्भव नहीं है। अपना संरक्षण चाहकर भी अन्य का विराधन चाहने में अपने से अतिरिक्त अन्य जो अनेक हैं वह विरोधी होने से स्वयं जीवित कैसे रह सकता है? एवं अपने जीवन के लिए ही दूसरों को जीवित चाहना प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य हो जाता है। तथा-

     

    अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

     

    इस प्रसिद्ध कहावत के अनुसार सबको पारस्परिक प्रेमपूर्वक एकता को प्रोत्साहन देना परमावश्यक हो जाता है अन्यथा किसी का भी किसी तरह निर्वाह नहीं हो सकता।

     

    हाँ, जो ‘वेदों को माने वह हिन्दू' इस प्रकार अर्थ लिया जाता है तो जैन लोग हिन्दू से पृथक् हो रहते हैं क्योंकि वर्तमान में वेदमंत्रों का जो अर्थ किया जा रहा है वह अर्थ जैनों को इष्ट नहीं है। फिर भी व्यावहारिक रहन-सहन और सभ्यता में जैन लोग हिन्दुओं के साथ और अहिंसा को प्रधानता देते हैं। जो अहिंसा पारस्परिक प्रेम के बिना कभी सम्भवनीय नहीं है एवं जैन धर्म सबको परस्पर प्रेमपूर्वक एक दूसरे के दुःख में दुखी और सुख में सुखी होकर रहना सिखलाता है जो कि मनुष्य मात्र के लिए परमावश्यक है।

    मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य अहिंसक भावना के साथ सच्चा हिन्दू बने । इति शुभं भूयात् ।।

     

    इस तरह आप जब अकेले होते तो शुद्धोपयोग में विचरण करते और जब बाहर आते और कोई भव्यात्मा जिज्ञासा रखता तो शुभोपयोगमय परिणति करते। आपकी इन्हीं सब विशेषताओं के बारे में आपके भक्तों ने मुझे बताया। भगवान महावीर के दर्शन में श्रमण की यही दो भूमिकाएँ बतायी गईं हैं। ऐसे श्रमणों के चरणारविन्दों का चंचरीक सदा नतमस्तक होता हुआ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     

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