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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 185 - क्षपक गुरुराज के दर्शन को हुआ संत समागम

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    पत्र क्रमांक-१८५

    २०-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    जैनदर्शन के दार्शनिक, आत्मतत्त्व के द्रष्टा, शुद्धात्मानुभव के भावक, परमाराध्य क्षपक गुरु महाराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में समर्पित भाव से नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु... हे गुरुवर ! एक ज्ञानी का अन्तिम समय कैसा होता है? इसको देखने के लिए सच्चे साधकों की जिज्ञासा होती है और हुआ भी ऐसा। आपने जब नियम सल्लेखना धारण की और जीवन पर्यन्त के लिए अन्न का त्याग किया। आपकी तपस्या साधना के शिखर सोपानों पर चढ़ने लगी। तब समाचारों ने दूर-दूर तक बुद्धिजीवियों के मन में दर्शन की ललक पैदा की। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने २६-११-२०१५ भीलवाड़ा में बताया-

     

    क्षपक गुरुराज के दर्शन को हुआ संत समागम

    ‘जनवरी १९७३ में पूज्य मुनि श्री विवेकसागर जी महाराज कुछ दिन दीक्षा गुरु क्षपकराज ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्य करके नसीराबाद से विहार कर गए, उनके साथ में क्षुल्लक सुखसागर जी एवं क्षुल्लक विनयसागर जी भी विहार कर गए। उसके बाद अनेक मुनिसंघ साधुवृन्द क्षपक मुनिराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज के दर्शनार्थ पधारे। परमपूज्य आचार्यकल्प श्रुतसागर जी मुनिराज ससंघ पधारे। दोनों संघों में नमोऽस्तु प्रतिनमोऽस्तु हुआ। उस समय क्षपकराज ज्ञानसागर जी गुरुदेव की विनय-भक्ति-वात्सल्य देखते ही बनता था। आगन्तुक साधुवृन्दों से रत्नत्रय की कुशलक्षेम पूछना और तत्त्वचर्चा करना ये उनके उपयोग की शुद्ध दशा का प्रतीक है। परमपूज्य सिद्धान्तवारिधि आचार्यकल्प श्री जी (कलकत्ता वाले) एवं परमपूज्य मुनि श्री अजितसागर जी आदि साधु सल्लेखना धारक क्षपक मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्य में संलग्न हो गए। कुछ दिन वैयावृत्य का लाभ लेकर विहार कर गए।

     

    लगभग मार्च-अप्रैल माह में दक्षिण भारतीय परमपूज्य मुनि श्री पद्मसागर जी महाराज, परमपूज्य मुनि श्री पार्श्वसागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री दयासागर जी महाराज आदि ससंघ क्षपक गुरु महाराज ज्ञानसागर जी की वंदनार्थ, वैयावृत्यार्थ पधारे। वे भी कुछ दिन सेवा करके विहार करने लगे तब संघस्थ मुनिराज श्री पार्श्वसागर जी महाराज बोले-मेरी भावना है कि क्षपक मुनिराज की वैयावृत्य कर आत्म संस्कार पाऊँ, यदि आपकी आज्ञा हो तो । तब अग्रज मुनि पद्मसागर जी महाराज बोले- यहाँ रुकने के लिए निर्यापकाचार्य महाराज से अनुमति लीजिए। तब मुनिराज पार्श्वसागर जी महाराज ने निर्यापकाचार्य परमपूज्य श्री विद्यासागर जी महाराज से निवेदन किया कि मैं क्षपक गुरुराज की सेवा करके अपनी आत्मकल्याण की भावना भाना चाहता हूँ, मुझे आज्ञा प्रदान करें। मैं संघ के नियमों के अनुसार रहूँगा। तब आचार्य महाराज श्री विद्यासागर जी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अनुमति प्रदान कर दी और मुनि श्री पद्मसागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री दयासागर जी महाराज विहार कर गए। कुछ दिन बाद परमपूज्य आचार्यरत्न भारत गौरव मुनि श्री देशभूषण जी महाराज के शिष्य क्षुल्लक श्री बाहुबलीसागर जी एवं क्षुल्लक चन्द्रभूषण जी आदि त्यागीगण दर्शनार्थ पधारे और १-२ दिन वैयावृत्य करके विहार कर गए।

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    इस तरह आप जीवन के अन्तिम समय तक ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहे। आपके पास जो भी आया वह कुछ न कुछ दिशाबोध पाकर गया। आपके जीवन का एक-एक क्षण स्व-पर हित में गुजरा है, यह आपकी प्रवृत्ति में लोगों ने देखा है। ऐसे जिनवाणी के सारस्वत पूत के चरणों में त्रिकाल वंदन करता हुआ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     


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