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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 183 वर्ष १९७३ ने सुबकते हुए लिखा स्वर्णिम इतिहास

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    पत्र क्रमांक-१८३

    १७-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    अंतरंग सत्ता की गुफा के अविराम यात्री, चारित्र चक्रवर्ती, दादागुरु के चरणों में त्रिकाल नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु...

     

    हे गुरुवर! आप जब अनन्त की यात्रा पर निष्क्रमण कर गए तब आपके पदचिह्नों पर चलते हुए मेरे गुरु गाँव-गाँव, नगर-नगर आपके द्वारा दी गई श्रमण संस्कृति की ध्वजा को फहराते हुए स्व-पर कल्याण करते हुए बढ़ते रहे। सन् १९७३ से आपकी स्मृति के सहारे वे आज तक चलते जा रहे हैं और मोक्ष मंजिल की दूरियों को कम करते जा रहे हैं। वर्ष १९७३ में १ जून तक आपका और आगे मेरे गुरु का जो कुछ खोज-बीनकर लेखा-जोखा तैयार किया वह आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ-

     

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    इस तरह वर्ष १९७३ से आपके प्रिय आचार्य मेरे गुरुवर आपको हृदय में विराजमान कर आपसे निर्देशन पाते हुए आज तक मोक्षमार्ग में प्रवर्तन कर रहे हैं। सर्वज्ञदेव, जिनागम और दादा गुरु आपकी आज्ञाओं से बंधकर मेरे गुरु निर्बन्ध स्वतन्त्र विचरण कर रहे हैं।

     

    वह प्रसंगवशात सदा यही कहते हैं-गुरु कृपा सदा साथ है, गुरु की छाया बनी हुई है। सब कार्य गुरुदेव की कृपा से हो रहे हैं मैं कुछ नहीं करता। गुरु महाराज कहते थे-‘संघ को गुरुकुल बनाना।'

     

    इस प्रकार उनकी हर श्वांस में आपके नाम का संगीत बजता रहता है। और वे आनंदित हो सभी को अनुभूति का रसास्वादन कराते चले जा रहे हैं।

    आपका शिष्यानुशिष्य


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