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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 180 आगमनिष्ठ आचार्यश्री

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    पत्र क्रमांक-१८०

    १४-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    आगमोक्त साधक भावलिंगत्वरूप चारित्री परमपूजनीय दादा गुरुवर क्षपक मुनिराज श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु... हे गुरुवर! आप शुद्ध रत्नत्रय के सच्चे साधक थे आपने जैसा आगम में देखा वैसा ही आचरण में उतारा और अपने लाड़ले शिष्य प्रिय आचार्य को भी बताया सिखाया। आप दोनों गुरु-शिष्य की यशाःसुरभि दिग्दिगंत फैल गई, जिस कारण भव्यात्मारूपी भौंरे आप द्वय के चरणों में खिचे चले आते। ऐसा ही एक संस्मरण ब्राह्मी विद्या आश्रम जबलपुर की संचालिका ब्रह्मचारिणी मणिबेन जी ने सुनाया। वह आपको बता रहा हूँ-

     

    गुरु की खोज पूरी हुई

    ‘ग्रीष्म ऋतु में चलते हुए पथिक का तन सूरज की उष्म रश्मियों से तप चुका अचानक घने वृक्ष की छाया दिखी और वह विश्राम हेतु ठहर गया। उस समय की सुखानुभूति का वर्णन करना बड़ा कठिन होता है। ठीक वैसे ही इस स्त्री पर्याय से मुक्ति पाने के लिए मोक्षमार्ग में अग्रसर होने हेतु, मैं सच्चे गुरु की खोज कर रही थी। जिनवाणी का पठन-पाठन अध्ययन के साथ-साथ चिंतन-मनन चलता रहता था। मोक्षमार्ग में वस्त्रधारी गुरु तो हो नहीं सकते, ज्ञान-ध्यान में लीन, तपस्वी, वीतरागी, निस्पृही, निरीहवृत्ति वाले आगमानुसार लक्षण वाले गुरु कब मिलेंगे? यह भावना प्रतिदिन भाती रहती थी। पुण्ययोग से ब्रह्मचारी विकासचंद जी से मिलना हुआ उन्होंने कहा-यहाँ सोनगढ़ में सोला-आना मिथ्यात्व है और सही गुरु की जाँच पड़ताल के लिए नसीराबाद जाओ। वहाँ पर वयोवृद्ध, तपोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध, आगमोक्त गुरु हैं जो कि तरण-तारण हैं। उनके दर्शन करके संसार में ज्यादा गोता नहीं लगाना पड़ेगा। फिर क्या था? अंधा क्या चाहे-दो नेत्र' अतः चल पड़े सच्चे गुरु की खोज में। मेरे साथ में ब्रह्मचारिणी दराखाबेन, फूलवतीबेन, इन्द्राबेन, ब्रह्मचारी विकासचंद जी भी थे। नसीराबाद पहुँचे और जैसे ही युवा आचार्य विद्यासागर जी के दर्शन किए एवं पूज्य ज्ञानसागर जी महाराज जिन्होंने आगमानुसार समाधि ले रखी थी। उनके दर्शन किए। आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रातः से रात्रि तक गुरु सेवा में ऐसे संलग्न थे मानो उन्हें कोई आनंद की प्राप्ति होती हो। उनकी निर्दोष चर्या गुरु-भक्ति-समर्पण-व्यवहार कुशलता देखकर मन प्रफुल्लित हो गया। समय पाकर उनसे तत्त्वचर्चा की तब अज्ञान अंधकार दूर हुआ और मन में आया भ्रम कि पंचमकाल में मुनि नहीं होते, दूर हो गया। सच्चे गुरु की खोज पूर्ण हुई । गुरु चरणों में मस्तक झुक गया। परम उपकारी, करुणामयी, वात्सल्यमूर्ति, अनुशासनप्रिय, कुशलवक्ता, आगम व अध्यात्म के सार को आत्मसात् करने वाले, शुद्धोपयोगी, समाधिसम्राट, भव्यजीवों के आराध्य, माँ के समान आत्मबोध कराने वाले, कर्म-नोकर्म से दृष्टि को हटाने वाले, दूरदृष्टा, निर्मोही जीवन जीने एवं मृत्यु की कला सिखाने वाले गुरु को पाकर हम लोग धन्य हो गए।''

     

    इस प्रकार आप गुरुद्वय के चरणों में जो भी नास्तिक आता, वह आस्तिक बने बिना नहीं रहता। जब आप अनन्त की यात्रा पर निकल गए थे। तब मेरे गुरुदेव आपकी स्मृति के सहारे आपके पगचिह्नों पर चलते हुए किशनगढ़ पहुँचे। तब ब्रह्मचारिणी मणीबेन और दराखाबेन दोनों ही पुनः दर्शन के लिए पधारीं इस सम्बन्ध में उन्होंने बताया-

     

    आगमनिष्ठ आचार्यश्री

    “जब जून माह में आचार्यश्री मदनगंज-किशनगढ़ पहुँचे तो मैं दराखाबेन के साथ पुनः दर्शन के लिए गयी क्योंकि गुरु की खोज तो पूरी हो गई थी किन्तु उन्हें अभी गुरु नहीं बनाया था। इसलिए उनकी शिष्या बनने के लिए पहुँच गए उनके चरणों में और अन्तिम कुछ बातें जो मेरे व्रती बनने में बाधक थीं, उन धारणाओं को आचार्य महाराज के सामने रखा। उन्होंने आगम के आलोक में उन गलत धारणाओं को निरस्त कर दिया। तब मन पूर्णत: संतुष्ट होकर समर्पित हो गया। तब हम दोनों ने दर्शन प्रतिमा का संकल्प लेने के लिए निवेदन किया। तो दूरदर्शी-पारदर्शी गुरुदेव ने कहा- ‘दर्शन प्रतिमा की रक्षा के लिए दूसरी व्रत प्रतिमा भी ले लो।' गुरु की कृपादृष्टि से हम दोनों व्रत प्रतिमा का संकल्प लेकर व्रती बन गए और सही मायने में गुरु की शिष्या बन गए। व्रत लेने से भावों में इतनी विशुद्धि बढ़ी कि २-३ दिन बाद हम दोनों ने आर्यिका बनने के भाव रखे। तब आगमचक्षु आचार्य गुरुदेव ने कहा-'हाँ, हाँ! दीक्षा ले लो लेकिन साथ में नहीं रखेंगे।' यह सुनकर हम दोनों का आत्मबल मजबूत न होने से हमारी भावना कोरी रूप ही रह गई। बार-बार निवेदन किया किन्तु आगमनिष्ठ आचार्यश्री जी ने साथ में रखने से मना कर दिया।"

     

    इस तरह आगमोक्त चर्या करने वाले आप गुरु-शिष्य को आगम के विपरीत कोई कार्य करते नहीं देखा गया और न ही कोई करा पाया। जिनेन्द्र के ऐसे सच्चे प्रतिरूप गुरुद्वय के चरणों में नमोऽस्तु करता हुआ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     


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