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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 179 छह माह पूर्व किया आजन्म अन्न का त्याग

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    पत्र क्रमांक-१७९

    ११-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    मृत्यु के सम्मुख होकर भी अनुद्विग्न अंतश्चेतन प्राणों में निमग्न चारित्र चक्रवर्ती दादागुरु परमपूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में संख्यातीत प्रणाम अर्पित करता हूँ... हे गुरुवर! जब आपने अन्तर्यात्रा में बाधक आचार्यपद का त्याग किया और अन्तिमयात्रा की गाड़ी में विराजमान होने हेतु सल्लेखना व्रतरूपी टिकट ग्रहण की तो समाचार चारों ओर फैल गए। इस सम्बन्ध में श्री दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने २६-११-२०१५ भीलवाड़ा में बताया-

     

    छह माह पूर्व किया आजन्म अन्न का त्याग

    "२२ नवम्बर मगसिर कृष्ण २, वि.सं. २०२९ बुधवार १९७२ को गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज ने आचार्यपद त्याग किया तब नूतन आचार्य श्री विद्यासागर जी से नियम सल्लेखना का व्रत माँगा। तब नूतन आचार्य ने बड़ी गम्भीरता के साथ कहा- ‘बाद में देखेंगे।' फिर २-३ दिन बाद स्थिति-परिस्थिति को समझकर और गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज की भावनाओं को समझकर उन्होंने गुरुदेव को नियम सल्लेखना व्रत दे दिया और जैसे ही दिसम्बर १९७२ के प्रथम सप्ताह में अन्न का यावत् जीवन त्याग किया, तब समाचार द्रुतगति से फैल गए। चारों तरफ से दूर-दूर से भक्तगण आने लगे एवं दिगम्बर मुनि आचार्य वीरसागर जी महाराज से दीक्षित शिष्य प्रकाण्ड विद्वान् तपस्वी वयोवृद्ध मुनि श्री सन्मतिसागर जी महाराज (टोडारायसिंह वाले) एवं उनके शिष्य मुनिराज श्री विमलसागर जी महाराज, क्षपक मुनिराज श्री ज्ञानसागर जी के दर्शनार्थ पधारे, तब नूतन आचार्य एवं क्षपक मुनिराज गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने उनकी विनय-भक्ति की, आपस में नमोऽस्तु प्रतिनमोऽस्तु हुआ। कुछ दिन प्रवास किया और क्षपक मुनिराज गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्य की तथा संघ के समस्त क्रिया-कलापों में सम्मिलित हुए। तत्त्वचर्चा में भी पूर्ण रुचि रखी। फिर एक दिन विनय-भक्तिपूर्वक क्षपक मुनिराज को नमोऽस्तु कर विहार कर गए।''

     

    इस सम्बन्ध में ‘जैन गजट' १४ दिसम्बर १९७२ की दो कटिंग इन्द्रचंद जी पाटनी ने उपलब्ध करायी, जिसमें अभय कुमार जैन एवं ताराचंद सेठी का समाचार इस प्रकार है-

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    वैयावृत्य के लिए मुनिराज पधारे

    "दिनांक ०९-१२-७२ को परमपूज्य मुनिराज श्री १०८ सन्मतिसागर जी तथा विमलसागर जी महाराज ने नसीराबाद की ओर विहार किया। आप परमपूज्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्ति की भावना लेकर आचार्य कल्प श्री १०८ श्रुतसागर जी महाराज की आज्ञानुसार नसीराबाद पधारे हैं। आपको भी भावभीनी विदाई दी गई।''

     

    समाधि की ओर

    "नसीराबाद-परमपूज्य वयोवृद्ध १०८ श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने समाधि में अग्रसर होते हुए ४ प्रकार के आहार में से अन्न का त्याग कर दिया है। आप सदैव आत्मस्वरूप में विचरण करते रहते हैं। आपकी तपस्या को देख करके ऐसा अनुभव होता है कि वास्तविक शुद्धोपयोग की अवस्था यही है। दि. १०-१२-७२ रविवार को वयोवृद्ध मुनि श्री १०८ श्री सन्मतिसागर जी, मुनि श्री १०८ श्री विमलसागर जी महाराज का मंगल पदार्पण शाम को हुआ। जिनका भव्य स्वागत अपार जन समुदाय ने गाजे-बाजे सहित किया। शाम को ४ बजे वयोवृद्ध मुनि श्री १०८ श्री सन्मतिसागर जी ने पूज्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज को समाधि में आरूढ़ होने की प्रवृत्ति को देखकर बहुत हार्दिक प्रशंसा की और कहा कि मैं मेरे शिक्षा गुरु महाराज श्री की सेवा के लिए आया हूँ। बाद में आचार्य श्री १०८ श्री विद्यासागर जी ने उद्बोधन दिया।"

     

    इस तरह हे गुरुवर! आप मृत्यु की आहट सुन उसके स्वागत के लिए तैयार हो गए और अपनी सारी वसीयत अपने अन्तेवासीन् वत्स लाड़ले शिष्य मुनि श्री विद्यासागर जी को सौंप दी। आपके साहसिक पुरुषार्थ को देखने भक्त श्रावक तो ठीक मुनि गण भी अपने आपको धन्य करने के लिए दर्शनार्थ आने लगे। ऐसे साहसिक पुरुषार्थ को मैं भी कर सकें इस हेतु उसे प्रणाम करता हूँ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     


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