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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 100 वैयावृत्यनिपुण मुनि श्री विद्यासागर

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    पत्र क्रमांक-१00

    ०८-०१-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

     

    दीर्घतपस्वी भवनाशक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों की भावार्चना करता हुआ... हे गुरुवर! आपकी संगति से मेरे गुरु में नित गुणात्मक परिवर्तन लोगों ने महसूस किया था। जब आप १९६८ का चातुर्मास करके सोनी नसियाँ से केसरगंज गए और शीतकाल में लगभग दो माह का प्रवास किया तब के दो संस्मरण केसरगंज (अजमेर) के श्रीमान् कन्हैयालाल जी जैन ने मुझे २०१७ किशनगढ़ में सुनाये। वह मैं आपको बता रहा हूँ-

     

    वैयावृत्यनिपुण मुनि श्री विद्यासागर

     

    ‘‘सन् १९६८ दिसम्बर एवं जनवरी १९६९ के शीतकालीन प्रवास केसरगंज में रहा तब गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी का स्वास्थ्य बिगड़ा तब मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज को छोड़कर एक पल भी नहीं रहते थे और सुबह-दोपहर-शाम उनकी वैयावृत्य किया करते थे और हम लोगों को भी बताते थे कि वैयावृत्य ऐसे करो। सुबह धूप में बैठाते और तेल मालिश करते । रात्रि में आवश्यक वैयावृत्य करते थे। रात्रि होने के पूर्व कक्ष में अपनी पिच्छी से पाटा बुहारते फिर सलीके से पियाँर (चारा) को बिछाते फिर गुरु जी को उस पर लिटाते थे। उनकी वैयावृत्य से मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज का स्वास्थ्य धीरे-धीरे ठीक हो गया। हम लोग आपस में चर्चा करते थे कि देखो अपन लोगों को भी अपने दादा एवं पिता की सेवा ऐसे ही करना चाहिए।" इस तरह मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के गुणों से दर्शक प्रभावित होते थे। जन्म-जन्म के संस्कारों से संस्कारित आत्मा मुनि श्री विद्यासागर जी के रूप में सब को प्रभावित कर रही थी। केसरगंज प्रवास का एक और संस्मरण कन्हैयालाल जी केसरगंज वालों ने सुनाया, वह मैं आपको बता रहा हूँ-

     

    जिसको छोड़ दिया उसे फिर क्यों पकड़ना

     

    मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज मन्दिर जी में ऊपर पार्श्वनाथ भगवान की वेदी वाले हॉल में बैठे स्वाध्याय कर रहे थे। मैं उनके दर्शन करने आया। तो संघस्थ एक क्षुल्लक जी हॉल के बाहर चबूतरे पर बैठे थे। मैं दर्शन करके अन्दर चला गया, भगवान के दर्शन कर और मुनि श्री विद्यासागर जी के दर्शन कर माला फेरने लगा। एक-दो छोटे बच्चे आये तो क्षुल्लक जी ने उनसे पूछा-तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारे पापा का नाम क्या है? तुम कितने भाई हो? भाई का नाम क्या है? तुम्हारा भाई क्यों नहीं आया? तुम्हारे मामा कहाँ रहते हैं? तुम्हारे कितने मामा हैं? तुम्हारे मामा की किस चीज की दुकान है? तुम्हारे पापा की किस चीज की दुकान है? यह सब पूछ रहे थे। बच्चों के जाने के बाद मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज उठकर बाहर आए और क्षुल्लक जी को बड़े प्यार से समझाने लगे-महाराज! ये क्या कर रहे हो आप? आत्म कल्याण के लिए घरबार छोड़कर आए फिर उसी संसार को पकड़ रहे हो। जिसके लिए संसार छोड़ा था वह कार्य करना चाहिए। स्वाध्याय करो, आत्मध्यान करो, जाप करो । संसार की बातें करने से क्या होगा? कौन आ रहा है? कौन जा रहा है? इन बातों से क्या लेना देना? जिसको छोड़ दिया उसे फिर क्यों पकड़ना? तब क्षुल्लक जी महाराज उठकर अन्दर चले गए। इस तरह मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का दृढ़ वैराग्य था। यह आपने देख लिया, जान लिया था। तभी आपने उन्हें दिगम्बर मुनिरूपी असिधारा व्रत प्रदान किया। ऐसे तपस्वी चरणों की वन्दना करता हुआ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

     


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