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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 193 - अन्तिम समय की जागृति

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    पत्र क्रमांक-१९३

    ०३-०५-२०१८

    ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    महासमाधि में लीन, मृत्युंजयी, महातपस्वी दादागुरु क्षपकराज परमपूज्य ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में महाभाव से समर्पित नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु...। हे गुरुवर! इस जीवन की अन्तिम परीक्षा में आपने जिस साहस और वीरता का परिचय दिया है। वह एक आदर्श बन गया है। अन्तिम श्वांस में भी आप अपने निर्यापकाचार्य की परीक्षा में शत प्रतिशत अंकों से पास होते रहे। इस सम्बन्ध में हमने खोजबीन की तो मुझे जो परिणाम मिला वह आपको बताकर प्रसन्नता महसूस कर रहा हूँ। नसीराबाद के रतनलाल जी पाटनी ने २४-१०-२०१५ भीलवाड़ा में बताया-

     

    परीक्षा देने में हर क्षण सावधान

    “समाधि से कुछ दिन पूर्व आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज कई बार मुझे गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के पास भेजते थे और कहते थे जाकर यह प्रश्न पूछना। तो मैं जाता धीरे से ज्ञानसागर जी महाराज को नमोऽस्तु करता तो महाराज कोई जवाब नहीं देते और न ही आँख खोलकर देखते। तो मैं लौटकर आचार्य महाराज को कहता वे आँख नहीं खोल रहे हैं शायद सो रहे हैं। तो आचार्य महाराज कहते जाकर सीधे प्रश्न पूछना। मैं, फिर गया और मैंने कहा-महाराज आचार्य महाराज ने यह प्रश्न पूछा है, तो ज्ञानसागर जी महाराज आँख खोलकर धीरे से मुस्कुरा देते फिर धीरे से बोलते आचार्य महाराज जानते सब हैं, वे तो मेरी परीक्षा कर रहे हैं, जाओ उनको कह देना कि भगवती आराधना देखें इस-इस नम्बर की गाथा देख लेवें, समाधान मिल जायेगा। आचार्य महाराज ग्रन्थ उठाकर देखते तो उन्हें समाधान मिल जाता। तब आचार्य श्री मुझे कहते-‘गुरुदेव ज्ञानसागर जी मुनिमहाराज कितने अधिक सावधान हैं, कितना अगाध ज्ञान है, कितना अधिक क्षयोपशम है । उनको आज भी पूरा आगम स्मरण में है।''

     

    डॉक्टरों की परीक्षा में मिले चमत्कारिक अंक

    ‘‘२७ मई को गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज बहुत अधिक कमजोर हो गए थे। तब उनकी स्थिति चिकित्सकों को दिखाने के लिए आचार्य महाराज ने संकेत किया। तो नसीराबाद के डॉ. ने अजमेर के मेडिकल कॉलेज से विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलवाया। तब उन डॉक्टरों ने उनकी जाँच की, जाँच करने पर पाया कि न तो ज्ञानसागर जी की नाड़ी चल रही है, न ही ब्लडप्रेशर पकड़ में आ रहा है। तब डॉक्टरों ने कहा-इनकी आँखें तो झपकाओ तभी पता चलेगा ये जीवित है या नहीं। तब आचार्य विद्यासागर जी ने गुरु महाराज के कान में कहा- आप अपनी चेतनता का परिचय दें एवं डॉक्टरों को आशीर्वाद के रूप में आँखों को झपकाएँ।' तब गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने आँखें खोलीं और बंद कर ली। यह देखकर डॉक्टर बोले-मेडिकल चिकित्सा की भाषा में तो शरीर मृत हो चुका है, किन्तु आध्यात्मिक शक्तियों के कारण श्वांसें चल रहीं हैं और ये जीवित हैं। बड़े आश्चर्यचकित होते हुए वे डॉक्टर गुरु महाराज को प्रणाम करके चले गए। इसी प्रकार पीसांगन के नेमीचंद जी पहाड़िया ने मुझे मार्च १९९५ में नोट कराया था, वह संस्मरण आपको बताने की तीव्र उत्कण्ठा हो रही है-

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    आगमानुकूल समाधि देख कुन्दकुन्दाचार्य पर विश्वास हुआ

    २८ मई को समाचार मिला कि सल्लेखनाधारी ज्ञानसागर जी महाराज ने आजीवन जल का त्याग कर दिया है। तब मैं २९ मई को उनके दर्शन करने नसीराबाद गया। शाम का वक्त था आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज उनको सिर के पास बैठकर झुककर कुछ सुना रहे थे। क्षुल्लक जी एवं ऐलक जी पैर के तलुओं की वैयावृत्य कर रहे थे। तब बीच-बीच में विद्यासागर जी पूछते थे, आप सचेत तो हैं । तो ज्ञानसागर जी महाराज धीरे से हुंकार करके स्वीकृति देते। फिर भी विद्यासागर जी संतुष्ट नहीं होते तो उनके उपयोग की जागृति की परीक्षा लेने के लिए समयसार, भक्तामर स्तोत्र, समाधितंत्र, इष्टोपदेश आदि सुनाते और चलाकर गलत उच्चारण कर देते यह देखने के लिए कि गुरुजी गलती पकड़ते हैं या नहीं इससे उनकी जागृति का पता चल जायेगा। तब ज्ञानसागर जी महाराज तत्काल हूँ करके टोक देते। इस तरह ज्ञानसागर जी महाराज की मनोदशा उनका ज्ञानोपयोग और उनकी स्थिरता का पता चल जाता था। यह सब हमने देखा और आज तक याद है। आगमानुकूल समाधि देख आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी की बात पर विश्वास हो गया कि पंचमकाल के अन्तिम समय तक भावलिंगी रत्नत्रयधारी मुनि होंगे।"

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    अन्तिम समय की जागृति

    इसी प्रकार नसीराबाद के शान्तिलाल जी पाटनी ने लिखकर भेजा वह आपको बता रहा हूँ ‘‘गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज की समाधि के अन्तिम दिन १५-२० मिनिट पहले की बात है। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने उनके कान में सम्बोधन किया और पूछा-‘सब ठीक है न।' तब क्षपकराज ज्ञानसागर जी महाराज बहुत धीरे से बोले-‘शरीर में वेदना है किन्तु उपयोग में सावधान हूँ।' यह सुनकर विद्यासागर जी प्रसन्न हो गए। फिर मैंने उनके कान में कहा-आप क्या स्मरण कर रहे हैं? तो गुरुदेव बोले-'अरिहंत-सिद्ध स्मरण कर रहा हूँ। तो मैंने कहा-यह पुद्गल की भाषा वर्गणा है इससे क्या होगा? तो गुरुदेव बोले-‘पंच परमेष्ठियों का स्मरण करने वाला पंच परमेष्ठियों में गर्भित हो जायेगा।' यह सुनकर आचार्य श्री विद्यासागर जी और हम बड़े प्रसन्न हुए। इस तरह अन्तिम समय तक वे पूर्णतः जागृत बने रहे। तभी अजमेर से भागचंद जी सोनी सपत्नीक दर्शन करने आये। तो आचार्य विद्यासागर जी ने गुरुदेव के कान में कहा- आपके दर्शन करने के लिए अजमेर से सेठ-सेठानी जी आये हैं। तो ज्ञानसागर जी महाराज कुछ नहीं बोले-तब आचार्य श्री ने कहा- आप आँख खोलकर आशीर्वाद देवें ।' तो गुरुवर ने आँख खोली और बंद कर ली। उनकी जागृति को देख सेठ साहब को भी अजूबा हुआ और खुशी हुई। सेठ साहब दर्शन करके चले गए। १० मिनिट बाद गुरुदेव की स्थिति नाजुक हुई। तब आचार्य विद्यासागर जी ने उन्हें पद्मासन से बैठाया और कान में णमोकार मंत्र सुनाने लगे। णमोकार मंत्र सुनते-सुनते वह अन्तर्यात्री अमरयात्रा पर निकल गया।' इसी प्रकार नसीराबाद के नेमीचंद जी बड़जात्या कार्यालय अधीक्षक सहकारी विभाग अजमेर ने भी २०१५ भीलवाड़ा में अपनी अनुभूतियों से परिचय कराया, वह संस्मरण भी आपको बता रहा हूँ-

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    सच्चे शिष्य के सच्चे शिष्य : गुरुवर ज्ञानसागर जी

    ‘‘आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के बारे में जितना लिखा जाए वह कम है। वे एक दृढ़संकल्पी साधक थे जो एक बार नियम ले लेते थे वह पूरा करते थे। यह हमने नसीराबाद में देखा है। जब उन्होंने सल्लेखना व्रत ले लिया तब कमजोर शरीर के बावजूद भी बिना सहारा लिए खड़े होकर के आहार लेते थे यदि कोई सहारा देता भी तो वे मना कर देते थे। आहारचर्या के लिए शहर में भ्रमण करते वृत्तिपरिसंख्यान व्रत के नियम के अनुकूल विधि न मिलने पर वे उपवास कर लेते थे। आचार्य विद्यासागर जी जो उनके सच्चे शिष्य थे उनको अपना गुरु बनाकर एक सच्चे शिष्य की तरह गुरु आज्ञा का पालन करते थे। आचार्यश्री जो त्याग कराते, जितना त्याग कराते और आहार में जो लेने के लिए कहते, गुरुदेव ज्ञानसागर जी वैसा ही करते, किन्तु आचार्य श्री विद्यासागर जी भी बड़ी सावधानी के साथ सोच-विचार करके फिर निर्णय लेते थे। वे किसी भी वस्तु का त्याग कराने से पहले क्षपक मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज को पूछते थे-‘महाराज! यदि आप त्याग करना चाहें तो कुछ त्याग करायें।' तब गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज सिर हिलाकर स्वीकृति देते। तब आचार्य विद्यासागर जी उनकी स्थिति-परिस्थितियों को देखते हुए खाद्य या पेय वस्तुओं का त्याग करा देते थे। २७ मई १९७३ को श्री भंवरलाल सोनी ने अन्तिम बार जल का आहार दिया था।

     

    समाधि से २ दिन पहले सर सेठ राय बहादुर भागचंद जी सोनी अजमेर अपने साथ डॉ. सूर्य नारायण जी (जवाहरलाल नेहरु राजकीय चिकित्सालय, अजमेर के सेवा निवृत्त मुख्य चिकित्सक) को साथ लाये। डॉक्टर साहब सल्लेखक ज्ञानसागर जी को देखकर बोले-यह एक आश्चर्य है एवं विज्ञान को चुनौती है कि जिनकी नब्ज छूट चुकी है और रक्तचाप अत्यधिक कम है, तब भी वह जीवित है और वे बिना किसी तड़फड़ाहट के प्रशस्तता का अनुभव कर रहा हो। यह सम्भव कैसे? हँसते हुए बोले-यह तो आध्यात्मिक महापुरुषों की तपस्या का प्रभाव है।

     

    गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज बहुत सरल स्वभावी थे। उनके चेहरे पर कभी क्रोध नहीं देखा। वे जब भी किसी को जवाब देते या समाधान करते तब बहुत सहज ढंग से मारवाड़ी भाषा में कहते थे, उनका मुख्य शब्द था ‘भैया'। सल्लेखना के दौरान जब अशक्तता बढ़ गई थी तब वे स्वतः करवट नहीं ले पाते थे। साईटिका के दर्द होने के बावजूद भी वे बिना संक्लेश किए लेटे रहते थे। जब करवट बदलवाते तभी वे करवट बदलते थे।

    इस तरह आपके अन्तिम क्षणों के साक्षी अनेक लोगों ने मुझे अपने-अपने भाव-अनुभूतियाँस्मृतियाँ बतायीं । जो यहाँ पर देना सम्भव नहीं है। हे गुरुवर! आपने जैन दर्शन की असाधारण तपस्या कर यह सिद्ध कर दिया कि सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण आत्महत्या नहीं है, अपितु जब शरीर पूर्णतः चलने में असमर्थता प्रकट कर चुका हो और चिकित्सकों की दृष्टि में चिकित्सा भी असमर्थ हो गयी हो, तब आगम कहता है कि अपने रत्नत्रय की रक्षा करनी चाहिए और मृत्यु के उपस्थित हो जाने पर उत्साह पूर्वक पूर्ण जागृति में सावधानी के साथ सल्लेखना धारण करना चाहिए। जैनाचार्यों ने हिंसा को नकारा है और जैन साधु अहिंसक होता है अतः वह स्वघात कर आगम के विपरीत चलकर रत्नत्रय को नष्ट कैसे कर सकता है? इस प्रसंग में जैनाचार्यों ने कहा ‘प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा।' प्रमाद के योग से हिंसा मानी गयी है और प्रमाद का मतलब है आलस्य, असावधानी, सांसारिक अपेक्षा, अज्ञानता-अविवेक पूर्ण क्रिया। उपरोक्त आगम के आलोक में सल्लेखना समाधि लेने वाले के एक भी कारण नहीं होते एवं बिना किसी दबाव के, स्वेच्छा से सल्लेखना व्रत को धारण करते हैं और धीरे-धीरे क्रमशः आहार-पानी का त्याग करते हैं जिससे प्राणों को धक्का न लगे। इसलिए सल्लेखना आत्महत्या नहीं है।

     

    हे गुरुवर! आपने आगम की विधि अनुसार यह वीर-मरण का वरण कर अपनी आत्मशरण को ग्रहण किया है। ऐसे मृत्युंजयी के चरणों में अपने श्रद्धा-सुमन समर्पित करता हूँ...

     

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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