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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 176 - विचित्र गुरुदक्षिणा-मुनि श्री विद्यासागर जी आचार्य बने

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    पत्र क्रमांक-१७६

    ०८-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    पंचाचार्य युक्त चारित्रविभूषण चारित्र चक्रवर्ती ज्ञानमूर्ति परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पवित्र पावन पूज्य श्री चरणों की त्रिकाल त्रिभक्तियुक्त नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु.. हे गुरुवर! नसीराबाद में धर्म प्रभावना के विभिन्न आयामों के चलते एक विशेष आयाम चातुर्मास का मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का केशलोंच (दीक्षोपरान्त सत्रहवाँ केशलोंच) रहा। इस तरह १९७२ नसीराबाद चातुर्मास सानंद सम्पन्न हुआ।

     

    हे तात! यह आपका अंतिम चातुर्मास था, इसके बाद सारे बंधनों को तोड़ जर्जर पिंजड़े से चेतन पक्षी उड़ गया था किन्तु उड़ने से पूर्व उस चेतन पक्षी ने अनन्त की सैर बताने वाली उपकारी संस्कृति की रक्षार्थ चिन्ता की और अपने कुल वंशज को जवाबदारी सौंपना चाही, तो जिस तरह आपने जवाबदारी ग्रहण करने में निरीहता और निर्लोभता दिखाई थी। उसी प्रकार आपके कुल संस्कारों के प्रभाव से आपका वंशज भी निरीह-निर्लोभ भाव वाला होने से, साधना की हट करता रहा। इस सम्बन्ध में स्वयं साक्षी रहे। दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने एवं अनेक लोगों ने अपने-अपने नजरिये से जो देखा और अनुभूत किया वह मुझे लिख भेजा। उनमें से कुछ बानगियाँ पेश कर रहा हूँ। ०८-११-२०१५ भीलवाड़ा में बताया, सुनकर हृदय अपने गुरु पर गौरवान्वित हो उठा। वह मैं आपको अपनी खुशी के लिए बता रहा हूँ

     

    मुनि श्री विद्यासागर जी ने की साधना की हठ

    ‘‘नसीराबाद ०४ नवम्बर कार्तिक वदी चतुर्दशी को पूरे संघ ने वार्षिक प्रतिक्रमण किया तथा ०५ नवम्बर अमावस्या के दिन संघ सान्निध्य में भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव मनाया गया। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को पूरे संघ ने उपवास रखकर चातुर्मास निष्ठापन की भक्तियों का पाठ किया और सामूहिक चातुर्मासिक प्रतिक्रमण किया और फिर संघ का पिच्छिका परिवर्तन का कार्यक्रम भी हुआ। आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने अपनी पुरानी पिच्छी गम्भीरमल जी सेठी को प्रदान की और मुनि श्री विद्यासागर जी की पुरानी पिच्छी सुमेरचंद जी जैन नसीराबाद वालों को प्रदान की तथा संघस्थ क्षुल्लक, ऐलक की भी पुरानी पिच्छिकाएँ भक्त श्रावकों को प्रदान की।

     

    कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा २० नवम्बर को प्रात:कालीन प्रतिक्रमण के पश्चात् संघ के समक्ष आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज गम्भीर भाव से अपने भाव प्रकट करते हुए बोले-‘अब मेरी काया दिनों। दिन जीर्ण-शीर्ण हो रही है। अब मैं संघ का दायित्व अर्थात् आचार्य पद छोड़ना चाहता हूँ और नियम सल्लेखना ग्रहण करना चाहता हूँ। अतः मैं मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज से संघ का भार आचार्यपद ग्रहण करने के लिए कहता हूँ, वे स्वीकार करें।'

     

    तब मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने बड़ी विनय-भक्ति से उत्तर दिया-‘गुरुदेव मुझे मुनिपद में ही साधना करते रहने के लिए आज्ञा प्रदान करेंगे तो आपकी मेरे ऊपर महती कृपा होगी और यह आचार्य पद आप मुनि श्री विवेकसागर जी महाराज को प्रदान करें अथवा क्षुल्लक विनयसागर जी महाराज को जो यहाँ बैठे हैं, इनको मुनि दीक्षा देकर इन्हें आचार्यपद प्रदान करें तो बहुत अच्छा होगा। मैं इनके अनुशासन में रहूँगा।' तब गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज बोले-‘मैंने आपको इतना पढ़ाया-लिखाया योग्य बनाया तो आपको गुरु दक्षिणा भी तो देना चाहिए ना।' तब मुनि विद्यासागर जी मौन रह गए।

     

    दोपहर में अजमेर से छगनलाल जी पाटनी, कजोड़ीमल जी अजमेरा, कैलाशचंद जी पाटनी, निहालचंद जी बड़जात्या, पं. विद्याकुमार जी सेठी दर्शन करने आए। दर्शन करने के बाद गुरुवर ने उनसे कहा-'अब मेरी स्थिति जर्जर हो रही है और मुनि विद्यासागर जी मेरी बात नहीं मान रहे हैं, आचार्य पद के योग्य इनसे अच्छा और कौन हो सकता है किन्तु वे तो निरीह, लोकेषणा से दूर साधना में लीन हैं, आचार्य पद का रंचमात्र मोह नहीं है। अब मैं क्या करूं? मेरी समाधि कैसे होगी?' तब छगनलाल जी पाटनी बोले-आप विकल्प न करें और वे सभी लोग मुनि विद्यासागर जी महाराज के पास गए। रतनलाल पाटनी नसीराबाद वाले उन्हें ऊपर मन्दिरजी में ले गए। तब पीछे-पीछे मैं भी पहुँच गया। मन में जिज्ञासा थी देखें मुनि विद्यासागर जी क्या कहते हैं, मानते हैं या नहीं? वे सभी मुनि श्री के पास में जाकर बैठ गए।

     

    नमोऽस्तु कर बड़े विनय से छगनलाल जी बोले-महाराज! आप क्या अपने गुरु की समाधि नहीं कराना चाहते? क्या आप उन्हें निर्विकल्प नहीं कराना चाहते? तो मुनि विद्यासागर जी बोले-‘क्यों नहीं, बहुत अच्छे से समाधि कराऊँगा। गुरु के चरणों में पूर्णतः समर्पित हूँ किन्तु हम आचार्यपद नहीं लेंगे। हम अपने आत्मकल्याण के लिए आए हैं, परिग्रह बढ़ाने के लिए नहीं, आचार्य पद नहीं लेंगे।' तब छगनलाल जी बोले-गुरुजी अपना पद किसे देवें? तो विद्यासागर जी बोले- मैं इसके योग्य नहीं हूँ।' तब पाटनी जी ने कहा-महाराज! अपनी योग्यता खुद को पता नहीं चलती। वो तो गुरु जानते हैं, क्या आप गुरु से भी बड़े हैं। आप विकल्प छोड़ो और गुरु जी जैसा कहें वैसा मानना चाहिए। तब मुनि श्री बोले-‘गुरु महाराज की हर बात स्वीकार है किन्तु पद स्वीकार नहीं है। तो छगनलाल जी बोले-यदि गुरु की समाधि कराना चाहते हो, तो वे जैसा कह रहे हैं, वैसा मान जाना चाहिए। वरना उन्हें विकल्प बना रहेगा और उनकी समाधि बिगड़ जायेगी। आपकी योग्यता को तो वे समझ चुके हैं। अतः वे जैसा कहें वैसा करना चाहिए, मना मत करना किसी भी आज्ञा के लिए। तब मुनि श्री विद्यासागर जी मौन रह गए। छगनलाल जी पाटनी आदि नमोऽस्तु कर नीचे गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के पास पहुँचे और गुरुदेव से कहा-महाराज आप विकल्प न करें, आप मुहूर्त निकालें । तब गुरुदेव ने कहा-२२ नवम्बर को मार्गशीर्ष वदी द्वितीया बुधवार को सिद्धियोग है और प्रात:काल में लाभ-अमृत का चौघड़िया रहेगा। अच्छा है इस दिन यह शुभकार्य हो जाये।' तब छगनलाल जी पाटनी आदि नमोऽस्तु कर बाहर आये और नसीराबाद के प्रमुख लोगों से चर्चा कर चले गए।

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    विचित्र गुरुदक्षिणा : शिष्य को अपना गुरु बनाया

    २२ नवम्बर बुधवार सन् १९७२ प्रात:काल आचार्य गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज नसीराबाद के सेठी जी की नसियाँ जी में ऊपर बने बरामदे में शान्तिनाथ भगवान के मन्दिर के बाहर प्रवेशद्वार के पास तखत के ऊपर सिंहासन पर विराजमान हुए और जिन-जिन को पता चल गया था, ऐसे अजमेर, ब्यावर, किशनगढ़ के गुरुभक्त एवं नसीराबाद की समस्त समाज उपस्थित हो गई थी। उसी समय गुरु महाराज ने रतनलाल पाटनी को कहा-समस्त संघ को बुला लाओ। रतनलाल पाटनी के समाचार पाकर मुनि विद्यासागर जी, ऐलक सन्मतिसागर जी, क्षुल्लक सुखसागर जी, क्षुल्लक विनयसागर जी, क्षुल्लक स्वरूपानंद सागर जी एवं दूसरे संघ के क्षुल्लक पद्मसागर जी और क्षुल्लक आदिसागर जी सभी पहुँचे और यथायोग्य स्थान पर बैठ गए। नसियाँ जी का बरामदा एवं बाहर की छत खचाखच भर गयी। तब आचार्य गुरुदेव ने समाज की ओर देखकर कहा-‘बन्धुओ ! मेरे ऊपर जो दायित्व था वह हमने निभाया, अब समय के अनुसार शरीर ने चेता दिया है इसलिए संघ की जवाबदारी मैं अपने सुयोग्यतम शिष्य को संघ की सहमति से एवं अजमेर जिले की समाज से सहमति लेकर अपने आचार्य पद को मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को सौंपना चाह रहा हूँ क्या आप सभी की सहमति है?' तब सम्पूर्ण समाज ने दोनों हाथ ऊपर करके गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज का जयकारा लगा दिया।

     

    फिर गुरुदेव मुनि श्री विद्यासागर जी की ओर देखकर बोले-‘महाराज! इस उच्चासन पर विराजमान होईये (हाथ का इशारा  किया)।' तब मुनि श्री विद्यासागर जी बोले-‘गुरुदेव मुझे आत्मसाधना करने दीजिए।' तो गुरुदेव ज्ञानसागर जी बोले-‘आत्मसाधना करते हुए अन्य आत्मसाधकों को मोक्षमार्ग में लगायें और संघ को गुरुकुल बनायें।' तब मुनि श्री विद्यासागर जी मौन रहे। पुनः गुरुवर बोले- क्या मुझे गुरुदक्षिणा नहीं दोगे?' तब मुनिवर विद्यासागर जी बोले- इसके अलावा आप जो कुछ भी बोलेंगे सभी कुछ करूंगा।' तब गुरुवर बोले-‘मुझे निर्विकल्प करो और इस सिंहासन पर बैठ जाओ। यही मेरी गुरुदक्षिणा है।' तब भी मुनि श्री नहीं उठे, तो गुरुदेव ने दो-तीन बार कहा-‘क्या मुझे गुरुदक्षिणा नहीं दोगे?' तब मुनिवर श्री विद्यासागर जी संकुचित भाव से बिना इच्छा के अनमने मन से ऐसे उठे जैसे बहुत भारी हों और बहुत धीरे से सिंहासन पर विराजमान हो गए और जैसे ही मुनिवर विराजित हुए तत्काल गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने आचार्य पदारोहण के संस्कार किए, नवीन पिच्छी भेंट की, समाज प्रमुख ने पुरानी पिच्छी की बोली लगायी।

     

    जिसे श्रीमान् भंवरलाल जी सोनी नसीराबाद ने ली। पिच्छी देने के बाद गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने स्वयं जयकारा लगाया-बोलो गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज की... जय । जनता ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जयकारा गुंजायमान कर दिया। फिर जनता ने गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज की जय-जयकार की। हम सभी और समस्त भक्तों की आँखों से आँसू बह रहे थे।" इसी प्रकार नसीराबाद के आपके अनन्य भक्त जो सदा आपकी सेवा में लगे रहे श्रीमान् रतनलाल पाटनी ने २०१५ भीलवाड़ा चातुर्मास में जो बताया, उसे उनकर तो एक बार हमारी भी सासें रुक गयीं थीं, वह कुलबुलाहटी अनुभव आपको सुना रहा हूँ जिसे सुनकर वे दिन स्मरण में आएँगे और एक बार आपकी भी सासें थम जाएँगी-

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    जिम्मेदारी रहित साधना का आनन्द ही अलग है।

    जब आचार्य ज्ञानसागर जी गुरु महाराज का स्वास्थ्य अत्यधिक कमजोर हो गया तो उन्होंने अपना आचार्यपद विद्यासागर जी को ग्रहण करने के लिए कई बार मनाया। जब वे नहीं माने तो एक दिन हमने भी मुनि विद्यासागर जी को निवेदन किया-महाराज जी ! आपको प्राणों से प्रिय अपने गुरु की बात मानना चाहिए। मेरी बात सुनकर बड़े गम्भीर होकर बोले-‘बिना जिम्मेदारी के साधना करने में आनन्द अलग ही आता है और मैं तो अभी बहुत छोटा हूँ।' अंततोगत्वा वे नहीं माने।

     

    अजमेर, किशनगढ़ के लोगों ने भी उन्हें समझाया पर वे नहीं माने तो नहीं माने। उनका कहना भी हम सभी को वाजिब लग रहा था क्योंकि उम्र छोटी थी किन्तु गुरुवर से बड़ा ज्ञानी अनुभवी कौन हो सकता है। इसलिए गुरुदेव की बात किसी को भी नागबार नहीं लग रही थी। गुरुदेव ने २२ नवम्बर को आचार्यपद छोड़ने की तिथि घोषित कर दी। उस दिन नसीराबाद, अजमेर, किशनगढ़ आदि की समाज उपस्थित हो गई। सभी को मालूम था कि मुनि विद्यासागर जी पूरी तरह से आचार्यपद लेने से नट गए हैं। अब क्या होगा? आचार्यपद किसे दिया जायेगा। सम्भवतः आचार्यपद कोई नहीं लेगा और गुरुदेव उसे त्याग कर देंगे, संघ का आचार्य कोई नहीं रहेगा। तब गुरुदेव के जाने के बाद संघ के साधु किसी अन्य आचार्य संघ में चले जायेंगे। इस तरह लोग कयास लगा रहे थे। सभी की सांसे रुकी हुई थी।

     

    गुरुदेव संघ सहित नसियाँ के ऊपर बरामदे में विराजमान हैं, उसी समय गुरुदेव ने आचार्यपद के निर्वहन करने की अपनी लाचारी बताई और मुनि विद्यासागर जी से दक्षिणा माँगी और कहा-'इस सिंहासन पर बैठ जाओ। पर मुनि विद्यासागर जी अपनी हठ में थे वे नहीं उठे। गुरुदेव ने २-३ बार समझाते हुए बोला-तब अनमने मन से मुनि विद्यासागर जी ऊँचे आसन पर बैठ गए। सारी जनता की सांस में सांस आयी और गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने नीचे बैठकर नमोऽस्तु किया। तो सभी की आँखें छलछला उठीं। तब गुरु-शिष्य के घनघोर जयकारे हुए। इसी प्रसंग में नसीराबाद के शान्तिलाल जी पाटनी ने लिखकर भेजा जिसमें आपके लाड़ले, मेरे गुरुवर की जन्म-जन्मांतरों की तड़फड़ाहट की आहट महसूस होती है

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    विनाशी नहीं अविनाशी पद चाहिए

    “मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज आचार्यपद लेने के लिए तैयार नहीं हुए। कईयों ने समझाया पर वे नहीं माने तो नहीं माने। मैंने भी एक दिन अवसर पाकर समझाने की कोशिश की-आपको यह पद स्वीकार करने में क्या तकलीफ है। गुरुदेव ने तो वृद्धावस्था में पद का भार स्वीकार किया और आप जवान होकर के इस भार को उठाने में डर रहे। अतः आपको गुरुहित में यह पद स्वीकार कर लेना चाहिए, ऐसी मेरी विनती है। तो उन्होंने मुझे लाजवाब जवाब दिया। जिसे सुनकर मैं मौन हो गया। वे बोले-‘शान्तिलाल जी मुझे विनाशीक पद नहीं चाहिए, अविनाशी पद चाहिए।'

     

    इसी प्रकार इस प्रसंग की साक्षी बनीं आपकी अनन्य भक्त दिल्ली निवासी श्रीमती कनक जी, जो प्रतिवर्ष सपरिवार दर्शन करने आतीं। उन्होंने जब मुझे बताया तो सुनते हुए हृदय कण्ठ तक भर आया, हुलक सी उठी बरबस ही नयनसागर के किनारों पर मोती चमक उठे, उन्हें आपके श्री चरणों में अर्पित करता हुआ लिख रहा हूँ

     

    गुरुदक्षिणा ले गुरु ने किया आत्मसमर्पण

    २२ नवम्बर १९७२ का वह मंगल दिवस आज भी स्पष्ट पत्थर की लकीर की तरह मेरे मानस पटल पर अंकित है। जब मेरी इन आँखों में वह अभूतपूर्व ऐतिहासिक करिश्मा मानखण्डन का देखा था। खचाखच भीड़ के समक्ष पूरा आचार्यसंघ मंच पर विराजमान था। तब गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज बोले-‘विद्यासागर जी आप हमारी जर्जर काया को देख रहे हो ना... । अब और अधिक यह मेरा साथ नहीं दे पायेगी। मुझसे जितना बन पड़ा उतना हमने अपना कार्य किया। जिनवाणी की सेवा जो बन पड़ी वह की दिगम्बर श्रमण संस्कृति की सेवा जितनी बन सकी उतनी की अब तुम्हारी बारी है। अब आपको इस संस्कृति की रक्षा, सम्बर्द्धन के दायित्व को संवहन करना है। क्या तुम मुझे गुरुदक्षिणा नहीं दोगे?' तब मुनि विद्यासागर जी बोले-‘गुरु महाराज! आपकी हर आज्ञा मानने को तैयार हूँ, आप जो भी नियम संकल्प कराना चाहें वह मैं जीवन पर्यन्त करने के लिए तैयार हूँ।' तब गुरुदेव ज्ञानसागर जी बोले-'गुरुदक्षिणा में आज्ञा पालन का संकल्प करोगे ना!' तो मुनि श्री विद्यासागर जी ने हाँ में सिर हिला दिया। तो गुरुवर ज्ञानसागर जी (हाथ का इशारा करते हुए) बोले-'इस आसन पर बैठ जाओ।'

     

    यह सुनते ही विद्यासागर जी पलभर के लिए स्तब्ध रह गए। पुनः गुरुदेव ने कहा, तब किंकर्तव्यविमूढ़ हो, अनमने मन से, सकुचाते हुए, ऊँचे आसन पर संकुचित शरीर कर नीचे नयन किये हुए बैठ गए। तालियाँ और जयकारों से आकाश गूंज गया। फिर विधिवत् क्रिया सम्पन्न हुई, तत्पश्चात् गुरुदेव ने नीचे बैठकर नवोदित आचार्य विद्यासागर जी को नमोऽस्तु कर निवेदन किया-'हे गुरुवर! मेरी अवस्था जीर्ण-शीर्ण हो गई है रत्नत्रय पालन में अशक्तता हो रही है अतः मेरे रत्नत्रय और मेरे आत्मधर्म की रक्षार्थ मुझे सल्लेखना व्रत देकर समाधि कराने की कृपा करें। यह मानमर्दन का उत्कृष्ट उदाहरण देख हजारों उपस्थित समाज जनों के हर्षाश्रु बहने लगे।"

     

    इसी प्रसंग में एक और संस्मरण सुना रहा हूँ जो नसीराबाद निवासी सेवा निवृत्त आयकर अधिकारी श्रीमान् ताराचंद जी सेठी ने २०१५ भीलवाड़ा में सुनाया तो सुनते हुए अपने गुरु की निरीहता, निर्लोभता, निरभिमानता को देख एवं आचार्य पद की महानता के समक्ष स्वयं की लघुता प्रकट करते हुए देख मम हृदय अति-अखण्ड-दृढ़ श्रद्धा समर्पण से भर गया। जिसे सुनकर आप भी ऐसे गौरवान्वित होंगे जैसे परमपूज्य श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु स्वामी के गुरु गौरवान्वित हुए थे

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    गुरु ने की बहुत बड़ी कृपा : मुझे साकार करना है।

    ‘समस्त समाज के समक्ष आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज बोले-‘मेरा स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिर रहा है। मुझे समाधि की तैयारी करनी है ऐसी स्थिति में आचार्यपद का भार सम्भालने में मैं अक्षम महसूस कर रहा हूँ, शिष्यों का कर्तव्य होता है कि गुरु को निर्विकल्प बनाकर समाधि में सहयोग करना। मुनि विद्यासागर जी महाराज क्या आप मुझे गुरुदक्षिणा नहीं देंगे?' मुनि श्री विद्यासागर जी ने कहा- आप जो भी आज्ञा देंगे पूरी पालन करूंगा किन्तु आचार्यपद नहीं लूंगा।' तो आचार्य महाराज बोले-“देखो दक्षिणा अपने मन के अनुसार नहीं दी जाती है। गुरु जो माँगे वह दी जाती है, बोलो देवोगे या नहीं?' तो विद्यासागर जी ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया। तब आचार्य महाराज बोले-‘इस आसन पर बैठ जाओ। मुझे निर्विकल्प बना दो यही गुरुदक्षिणा है। फिर भी वे नहीं बैठे तो सभी अजमेर, किशनगढ़, नसीराबाद के प्रमुख लोगों ने खड़े होकर हाथ जोड़कर निवेदन किया-क्या आप गुरुदक्षिणा नहीं देंगे? महाराज! आपके गुरु कह रहे हैं और उनको यही गुरुदक्षिणा चाहिए। आपकी योग्यता के अनुसार कह रहे हैं।

     

    गुरु महाराज को निर्विकल्प बनाइये महाराज! फिर ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा-'आपने वचन दिया है गुरुदक्षिणा देंगे। मुनि अपने वचनों का पूर्ण पालन करते हैं। अतः इस आसन को ग्रहण करो।' तब सकुचाते हुए विद्यासागर जी उच्च सिंहासन पर विराजमान हुए। गुरु महाराज ने आचार्यपद के संस्कार किए। नई पिच्छी भेंट की और स्वयं नीचे बैठकर उन्हें आचार्य गुरु महाराज मानते हुए तीन बार नमोऽस्तु किया। उस वक्त नूतन आचार्य विद्यासागर जी ने आँखें बंद कर लीं और नीचे सिर किये हुए बैठे रहे। जनता ने जयजयकार कर दी। कुछ दिन बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी से हम युवा लोग बात कर रहे थे उन्होंने हम लोगों की बातों से समझ लिया कि इन लोगों को कार्यक्रम के बारे में पहले से पता था, तो उन्होंने कहा- आप लोगों को ज्ञात था तो पहले से इशारा क्यों नहीं किया।' तब हम लोगों ने कहा-महाराज ! आपने गुरु जी को पद लेने से मना कर दिया था। इसलिए आपको नहीं बताया। तो वे बोले-‘आचार्यपद बहुत महान् होता है और मैं बहुत छोटा हूँ, इस छोटी सी उम्र में, मैं अपने आप को इस पद को ग्रहण करने  में सक्षम नहीं समझता हूँ, किन्तु गुरु ने मुझे इस योग्य समझा यह उनकी बहुत बड़ी कृपा है। अब मुझे उनकी भावनाओं को साकार करना है।''

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    इस तरह हे गुरुवर! आपने ज्ञात इतिहास में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। अपने ही शिष्य को जो उम्र में लगभग ६० वर्ष छोटा है उसको अपना गुरु बना लिया और स्वयं उनके शिष्य बनकर छोटे बन गए और छोटे बनकर उनकी विनय करते, उनकी आज्ञा का पालन करते । धन्य-धन्य! मान-मर्दन, श्रद्धा-भक्ति-समर्पण का यह अनुपम उदाहरण एक आदर्श के रूप में उपस्थित हुआ। इसके आगे दीपचंद जी छाबड़ा ने और भी बताया ‘‘फिर समाज के प्रमुख लोगों ने नूतन आचार्य विद्यासागर जी के पादप्रक्षालन किए और प्रसिद्ध कवि प्रभुदयाल जी जैन अजमेर द्वारा पूजा की गई। जो श्री दि. जैन आगम सेवक मण्डल अजमेर की ‘श्रद्धासुमन' नामक पुस्तक-पुष्प अष्टम में छपी है।'' जो आपके स्मरणार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ

     

    नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की पूजन

    स्थापना

    जितेन्द्रिय परीषहजयी, चरित्रमूर्ति गम्भीर।

    शान्ति पुंज करुणामयी, विनयवन्त अरुधीर ।

    बाल ब्रह्मचारी गुणी, आत्मविजेता वीर।

    विद्या ज्ञान प्रभाव से, हरे जगत की पीर ।।

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्र! अत्र अवतर-अवतर संवौषट्।

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्र! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणम्।

     

    अष्टक (चाल-जोगी रासा)

    कंचनझारी चरण पखारन, नीर भराय मंगाऊँ।

    जन्म जरा मृत दोष निवारन, गुरु पद पूज रचाऊँ ।

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. स्वाहा। 

     

    भाव सहित घिस केसर चन्दन, ले उर हर्ष चढ़ाऊँ।

    शीश नवा कर गुरु पद वन्दन, भव दुःखनाश कराऊँ ॥

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ।।

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं नि. स्वाहा।

     

    हीरा मोती सम मन भाने, अक्षत उज्ज्वल लाऊँ।

    अक्षय पद का भाव जगाने गुरु पद पुंज चढ़ाऊँ ।।

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा।

     

    रंग बिरंगे चम्पा बेला, फूल गुलाब मंगाऊँ।

    संग काम के दुःख बहु झेला, कर पूजन सुख पाऊँ ॥

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा।

     

    नाना विध के भरकर थाली मैं पकवान चढ़ाऊँ।

    रोग क्षुधा को हरने वाली, गुरु पद पूज रचाऊँ ।

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

     

    स्वर्णमयी ये दीपक लेकर, जगमग ज्योति जगाऊँ।

    पावन गुरुवर पद को सेकर, आतम अनुभव पाऊँ ।।

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ।।

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।

     

    महक उठे ये दशों दिशाएँ, दस विधि गन्ध कुटाऊँ।

    अष्ट करम दल संग न आएँ, खेवत दूर भगाऊँ ॥

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।

     

    श्री फल दाड़िम दाख छुआरा, आम नरंगी लाऊँ।

    मोक्ष मिलन का पाऊँ सहारा, गुरु चरणन नित ध्याऊँ ।

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

     

    अष्ट दरब का मिश्रण करके, अर्घ बनाय चढ़ाऊँ।

    श्री गुरु चरणन पूजन रचके, पंचम गति पा जाऊँ ॥

    विद्यासागर ज्ञान दिवाकर आचारज अविकारी।

    बालयती वर धर्म उजागर, आतम संग विहारी ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा।

     

    जयमाला

    दोहा

    आभा मुख लख शान्त हो मन ज्यूँ चन्द्र चकोर।

    मगन होय नाचन लगे मेघ देख ज्यूँ मोर ।।

    पाप रहे ना पास में शुद्धातम बन जाय।

    ऐसे गुरु पद पूज के धन्य काय हो जाय ।।

    चौपाई

    जय-जय बालयती अविकारी, यथा जात छवि है मनहारी।

    तव दर्शन वन्दन है सुखकर, तव पद पूजन है मंगलकर ॥

    साढ़ सुदी पंचम तिथि आई, दो हजार पच्चीस के मांई।

    अजयमेर को पावन कीना, अनुपम इक आदर्श है दीना ।।

    विद्याधर से विद्यासागर बने, रूप निर्ग्रन्थ सजाकर।

    जन गण अरु इन्दर भी हरषा, वरषा नीर दुराये कलशा ॥

    ज्ञानमूर्ति गुरु दीक्षा दीनी, ज्ञान सुधा फिर चाव से पीनी।

    राग-द्वेष जिनको नहीं छूते, आतम रंग में डूबे रहते ॥

    जब गुरु सल्लेखन है धारी, सेवा भक्ति कीनी भारी।

    योग्य शिष्य पहचान है कीनी, निज आचारज पदवी दीनी ।।

    जहाँ-जहाँ पर आप है जाते, जिनवाणी अमृत बरसाते।।

    प्रभावशाली है जिन सूरत, सत्य अहिंसा की है मूरत ॥

    जैन अजैन शरण जो आते, आतम हित का पथ बतलाते ।

    ऐसे गुरुवर पृथ्वी तल पर रहें, सदा ज्यों रवि शशि नभ पर ॥

    |घत्ता करुणाधारी जग हितकारी ‘प्रभु' गुण आगर, समताधार।

    हितमित भाषी, ज्ञान प्रकाशी शांत सुधाकर सुख सागर ॥

    ॐ ह्रीं आचार्य श्री १०८ विद्यासागरमुनीन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

    सोरठा

    भक्तिभाव उर लाय, जो पूजे गुरुपद सदा।

    पाप करम नस जाय, निर्मल होता आत्मा ।।

    इत्याशीर्वादः

     

    विनयाञ्जलि

    तर्ज-फूलों का तारों का सब का कहना है... (चित्र-हरे राम हरे कृष्ण)

    भावों के फूलों से पूजा रचना है,

    आज तुम्हारी ही भक्ति करना है,

    स्वामी चरण प्रक्षाल करना है ।

    भावों के फूलों से पूजा करना है...

    भोला भाला धारा है बालक जैसा वेष,

    अन्तर बाहर जिनके परिग्रह का नहीं लेश

    एक रत्नत्रय का गहना पहना है। आज तुम्हारी ...॥१॥

    ये ना भायी दुनिया तुम हो गये उदास,

    निज पर को है जाना आतम में करते वास,

    वरने की ठान लीनी मुक्ति ललना है। आज तुम्हारी ...॥२॥

    तुम हो विद्यासागर गुणमण्डित सुख की राश,

    बनके धर्म दिवाकर पापों का करते नाश,

    ध्येय जिनदेव के ही पथ पे चलना है। आज तुम्हारी...॥३॥

    तुम को हे मुनि कुंजर शत शत करते प्रणाम,

    पग-पग ठोकर खाते ‘प्रभु' गिरतों को लो थाम,

    वाणी सुन आपकी ही भव से तरना है। आज तुम्हारी ...॥४॥

    स्वामी चरण प्रच्छाल करना है,

    भावों के फूलों से पूजा रचना है...

     

    गुरु ने शिष्य-गुरु से की प्रार्थना

    “पूजा के पश्चात् गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज अपने आसन से नीचे तखत पर बैठकर पिच्छी उठाकर नूतन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को तीन बार नमोऽस्तु करके बोले-'भो गुरुदेव! मेरी जर्जर काया मूलगुणों के पालन में अशक्तता प्रकट कर रही है अतः मेरे आत्मधर्म की रक्षार्थ मुझे नियम सल्लेखना व्रत देकर उपकृत करें । मैं आपके निर्यापकाचार्यत्व में समाधि लेना चाहता हूँ।' तब परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अवरुद्ध कंठ से बहुत धीरे बोला-‘देखेंगे।' यह दृश्य देखकर पूरी सभा की पुनः आँखें भर आयीं और सभा विसर्जित हो गई। गुरु-शिष्य की जय-जयकार करते सभी चले गए। आहार का समय हुआ तो नूतन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने संकल्प पूर्वक उपवास रखा और हम लोगों से कहा-आप लोग निकलें।" इस प्रकार आचार्य पदारोहण का समाचार चारों तरफ फैल गया। ‘जैन गजट' में २३ नवम्बर १९७२ गुरुवार के दिन कैलाशचंद्र पाटनी का समाचार प्रकाशित हुआ-

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    मुनि श्री विद्यासागर जी आचार्य बने

    ‘‘नसीराबाद-स्थानीय सेठी जी की नसियाँ के प्रांगण में सैकड़ों नर-नारियों के समक्ष एक भव्य समारोह में आचार्यश्री १०८ श्री ज्ञानसागर जी ने आचार्यपद को त्यागकर अपने पट्टशिष्य बाल ब्रह्मचारी युवा मुनि श्री १०८ विद्यासागर जी को आचार्य पद से विभूषित किया। इस अवसर पर आचार्यपद का त्याग करते हुए। परमपूज्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी ने कहा-“मेरा स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरता जा रहा है और अब मैं इस पद का मोह छोड़कर आत्मकल्याण में पूर्णरूपेण लगना चाहता हूँ।

     

    जैनागम के अनुसार यह करना अत्यन्त आवश्यक और उचित भी है।' धार्मिक क्रियाओं के बाद आचार्यपद पर पदारूढ़ मुनि श्री विद्यासागर जी ने अपने मार्मिक प्रवचन में कहा-'न तो मैं इस पद के योग्य ही हूँ और न मुझको इसकी लालसा थी और न है। यह पद लोकेषणा के लिए नहीं है, इस पद को मात्र कर्म का फल समझकर मैं ग्रहण कर रहा हूँ, न कि किसी ख्याति, लाभ अथवा पूजा के लिए। आपने कहा कि हमारी सद्प्रवृत्ति होनी चाहिए जो कि निवृत्ति के लिए कारण है। मुझे एकत्व-विभक्त्व को प्राप्त करना है। एकत्व की खोज के लिए मैं संघ के साथियों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता हूँ और मुझे आशा है कि संघस्थ त्यागीगण राग-द्वेष से दूर रहकर अपना सारा समय स्वध्याय व आत्मचिंतन में लगायेंगे।' अपने गुरुवर पूज्य श्री ज्ञानसागर जी को लक्ष्यकर आपने कहा कि गुरुवर की दृष्टि चरम सीमा पर पहुँच गई है क्योंकि आपने आचार्यपद को छोड़कर आत्मकल्याण में मन को पूर्णरूपेण लगा लिया है। हमें भी स्थायी सुख की खोज के लिए आपके मार्ग पर चलना चाहिए।'

     

    इसके पूर्व संघस्थ सभी त्यागियों ने अपनी-अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परमपूज्य गुरुवर श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज की महानता व मानमर्दन की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा नवदीक्षित आचार्य में विश्वास व्यक्त करते हुए उनके पदचिह्नों पर चलने का संकल्प व्यक्त किया। इस तरह हे गुरुवर! आपकी दूरदृष्टि ने परमपूज्य आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी, परमपूज्य आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी, परमपूज्य आचार्य श्री वट्टकेर स्वामी आदि को पुनः जीवित कर दिया।

     

    इसमें कोई सन्देह नहीं कि आप ज्योतिष शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र के अच्छे अध्येता रहे इस कारण आपके प्रज्ञा चक्षुओं ने वर्तमान के पन्नों को पढ़ लिया था और तब आपके श्रीमुख से निकला था-संघ को गुरुकुल बनाना।' आपके इन वचनों को सुनकर संघ और समाज सभी आश्चर्यचकित हुए थे कि यह कैसी अभिलाषा, यह कैसी प्रेरणा, यह कैसी जिम्मेदारी? कोई भी नहीं समझ पाया किन्तु आज आपके प्रिय आचार्य परमपूज्यनीय मेरे गुरुवर ने संघ को चलता-फिरता गुरुकुल बनाकर आपश्री के मुख से निकली भविष्यवाणी को सत्य कर दिखाया, या यूँ कहा जाये आपके आशीर्वाद से यह कार्य सम्पन्न हुआ तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे अनेकरूपधारी महागुरु के चरणों में त्रिकाल त्रिकरण युक्त त्रिभक्तिपूर्वक नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु...

     

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     


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