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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 175 - आचार्य गुरुवर ने सिखायी क्षुल्लक दीक्षा देना

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    पत्र क्रमांक-१७५

    ०७-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    आचार्यत्व के धनी परमपूज्य आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महामुनिराज के पावन चरणों में कोटिशः नमोऽस्तु करता हूँ...

    हे गुरुवर! ब्रह्मचारी दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) के दीक्षा के निवेदन पर विचारकर आपने २० अक्टूबर १९७२ आश्विन शुक्ला त्रयोदशी के दिन क्षुल्लक दीक्षा देने का मुहूर्त निकाला। समाचार चारों तरफ फैल गए। दीक्षार्थी की बिन्दौरी निकाली गई। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने बताया-

     

    आचार्य गुरुवर ने सिखायी क्षुल्लक दीक्षा देना

    ‘‘दीक्षा से पूर्व रात्रि में बिन्दौरी निकली और एक दिन पूर्व ही प्रात: पं. चंपालाल जी ने गणधर वलय विधान की पूजा करवायी। दीक्षा के दिन सुबह ८ बजे कार्यक्रम शुरु हुआ। सर्वप्रथम मंच पर केशलोंच किए। केशलोंच मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने किए थे। फिर गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने संस्कार किए। मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को वे क्रमशः बताते जा रहे थे। पिच्छी-कमण्डलु देने के बाद गुरुदेव ने नामकरण किया बोले-इन्हें गृहस्थावस्था के नाम से नहीं क्षुल्लक स्वरूपानंदसागर नाम से पुकारा जायेगा।

     

    इस तरह आपने मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज की योग्यताओं को देखकर शुरु से ही उन्हें आगम के आलोक में दीक्षा देना सिखाया। सन् १९६९ में मुनि और ऐलक दीक्षा देना सिखाया एवं १९६९ के चातुर्मास में सल्लेखना-समाधि करना सिखाया। सन् १९७० में क्षुल्लक दीक्षा देना सिखाया। १९७२ में पुनः क्षुल्लक दीक्षा देना सिखाया। इस दीक्षा से सम्बन्धित समाचार कैलाशचंद जी पाटनी ने 'जैन गजट' २६ अक्टूबर १९७२ गुरुवार में प्रकाशित कराया-

     

    नसीराबाद में क्षुल्लक दीक्षा समारोह

    ‘‘दिनांक २० अक्टूबर १९७२ को नसीराबाद में आचार्य श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज द्वारा ब्र. श्री स्वरूपानंद जी (पूर्वनाम श्री दीपचंद जी जैन) को विशाल जन समूह के बीच क्षुल्लक दीक्षा दी गयी। इस अवसर पर आस-पास के सभी क्षेत्रों से हजारों नर-नारी आये थे।

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    प्रातः नसियाँ जी से श्री जिनेन्द्र भगवान की सवारी निकाली व दीक्षार्थी एवं उनके माता-पिता का हाथी पर जुलूस निकला, जो कि दीक्षास्थल पर समाप्त हुआ। दीक्षा के पूर्व ब्र. स्वरूपानंद जी ने आचार्य श्री से दीक्षा देने के लिए विनती कर सभी प्राणियों से क्षमायाचना की। आपने इस अवसर पर कहा कि मानव का सर्वोत्कृष्ट विकास संयम धारण करने से ही सम्भव है और इसलिए जैनधर्म में संयम और त्याग की प्रधानता बताई। इस अवसर पर स्थानीय समाज ने आचार्य श्री के महान् त्याग-तपस्या एवं ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें चारित्रचक्रवर्ती की पदवी से जयजयकारों के नारों के मध्य अलंकृत किया। जैन समाज के शिरोमणि श्रीमान् सेठ सर भागचंद जी सा. सोनी ने अपने मार्मिक भाषण में कहा कि आचार्यश्री जहाँ तप व आत्मचिंतन में लीन रहते हैं। वहाँ इस वृद्धावस्था में भी नियमित रूप से संघ के सभी त्यागियों को ज्ञानार्जन कराते रहते हैं। आपने इस संदर्भ में भगवान महावीर के २५००वें निर्वाण महोत्सव का उल्लेख करते हुए समाज से अपील की कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को नित्य ही पैसा इस महान् कार्य के लिए निकालना चाहिए। जिससे समाज भगवान महावीर के वैशिष्ट्य के अनुरूप महोत्सव मना सके।

     

    दीक्षा समाप्ति के पूर्व बाल ब्रह्मचारी युवा मुनिराज १०८ श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने आशीर्वादात्मक प्रवचन में अहिंसा व अपरिग्रहवाद की महत्ता पर प्रकाश डाला। आपने कहा-'हमारा चारित्र और दैनिक क्रियाएँ भी अहिंसात्मक होनी चाहिए। ताकि हम वास्तव में धर्म व देश रक्षक बनने के अधिकारी हों। आज जो देश में समाजवाद का नारा बुलंद हो रहा है। वह जैन धर्म का अपरिग्रहवाद है। जिसका सबको पालन करना चाहिए। दीक्षा के अवसर पर समाज द्वारा समाजसेवी श्री सुमेरचंद जी जैन को समाजरत्न की पट्टी से अलंकृत किया गया।'

     

    इस तरह आपके चरित्र एवं तप, त्याग, ज्ञानसाधना देखते हुए समाज ने भक्तिवशात् आपको चारित्रचक्रवर्ती पद से नवाजते हुए आनंद की अनुभूति की । ऐसे चारित्र चक्रवर्ती गुरुवर श्री के पवित्र चरणाचरण को त्रिकाल नमन वंदन अभिनंदन करता हुआ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य


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