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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 173 - विनयसम्पन्नता

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    पत्र क्रमांक-१७३

    ०५-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    विनम्रता के प्रतीक दादागुरु परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में त्रिकाल नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु...

    हे गुरुवर! आपने नसीराबाद चातुर्मास में एक दिन विनय सम्पन्नता के बारे में समझाते हुए अपने गुरु वीरसागर जी महाराज का संस्मरण सुनाते हुए जब आपकी आँखें भर आयीं थीं तब का वह संस्मरण श्री दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने सुनाया वह मैं आपको बता रहा हूँ-

     

    विणयं मोक्खारं

    ‘नसीराबाद चातुर्मास में दसलक्षण पर्व के छठे दिन गुरुदेव ने तत्त्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय के चौबीसवें सूत्र पर व्याख्यान करते हुए सन् १९५१ का एक प्रसंग सुनाया- ‘‘विनयसम्पन्नता बहुत अच्छा तत्त्व है, इससे तीर्थंकर प्रकृति का आस्रव तो होता ही है, साथ ही यह मोक्ष का द्वार कहा गया है। ८ शुद्धियों में विनय शुद्धि को रखा गया है क्योंकि अंतरंग तप होने से इससे अत्यधिक कर्म निर्जरा होती है। और सूत्रकार ने ज्ञान विनय को आगे रखा है क्योंकि ज्ञान से ही दर्शन, चारित्र और उपचार विनय हो सकती है। इसलिए ज्ञान की महिमा अपरंपार है। ज्ञान विनय में किसी प्रकार की कमी नहीं होना चाहिए। ज्ञान के क्षेत्र में उम्र का छोटा-बड़ा होना कोई महत्त्व नहीं रखता। यदि उम्र में छोटा व्यक्ति भी उत्कृष्ट ज्ञान रखता है तब भी वह ज्ञान विनय करने योग्य है। एक बार सन् १९५१ में फुलेरा में आचार्य वीरसागर जी महाराज ससंघ चातुर्मास कर रहे थे। संघ में ब्रह्मचारी भूरामल छाबड़ा भी थे। तब एक दिन पूज्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज जंगल जाने के लिए खड़े हुए और कमण्डल देखने लगे। कोई कमण्डल में जल भरने के लिए ले गया था तो महाराज खड़े-खड़े प्रतीक्षा करने लगे। भूरामल ने देखा तो वह शीघ्र जाकर दो कमण्डलु उठाकर ले आए। एक आचार्य श्री का और एक दूसरे मुनिराज का और लाकर पूज्य आचार्य श्री को एवं मुनिराज को प्रदान किया। ब्रह्मचारी भूरामल को कमण्डलु लाते देख आचार्य वीरसागर महाराज बोले-‘ब्रह्मचारी जी आप यह काम मत किया करें। कमण्डलु लाना आपको शोभा नहीं देता है क्योंकि आप शिक्षा गुरु हैं। आप संघ में धर्मशास्त्र पढ़ाते हैं। इसलिए आप कमण्डलु लेकर आये तो हमको अच्छा नहीं लगा। भविष्य में कभी ऐसा मत करना।''

     

    ऐसा बताते हुए गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज की आँखें डबडबा आयीं, बोले-‘आचार्य गुरुदेव वीरसागर जी महाराज की विनय सम्पन्नता देखते ही बनती थी। इस तरह अपने गुरु के प्रति आपकी विनय देख संघस्थ साधु बड़े ही आह्लादित हुए। ऐसे गुरुशिष्य के चरणों में नमन करता हुआ भावना भाता हूँ कि मुझे भी ऐसी दृष्टि मिले। मैं भी विनयशीलता के दोषों को दूर रख सकूँ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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