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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 172 - शेर तो हमेशा शेर रहता है

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    पत्र क्रमांक-१७२

    ०४-०४-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

     

    प्रासंगिकता को अपूर्व मौलिक और नवीनता प्रदायक परमपूज्य गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी दादा महाराज के परित्राता चरणों में त्रिकाल प्रणति निवेदित करता हूँ...  हे गुरुवर! इक्ष्वाकु धर्म राज्य के सच्चे तेजधर और वंशधर मेरे गुरुवर को आपने जो संस्कार दिए, वे चार वर्ष में ही फल-फूलकर भारतीय संस्कृति को संरक्षण प्रदान करने लगे। इस सम्बन्ध में मुझे नसीराबाद के रतनलाल जी पाटनी ने २३-१०-२०१५ भीलवाड़ा में बताया-

     

    शेर तो हमेशा शेर रहता है

    ‘नसीराबाद चातुर्मास के मध्य ‘धर्मयुग' पत्रिका के सम्पादक यशपाल जैन के सुपुत्र एक जर्मन स्कॉलर्स को साथ लेकर गुरु महाराज के दर्शन करने आए। उन्होंने आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज एवं मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज से जैनधर्म सम्बन्धी गूढतम प्रश्न पूछे। दोनों महाराजों ने बड़े ही सरल तरीके से जवाब दिए। मुनि श्री विद्यासागर जी तो बीच-बीच में अंग्रेजी बोलकर जवाब देते थे। उसकी शंकाओं का समाधान होने से वह जर्मन का व्यक्ति बड़ा प्रभावित हुआ। हम लोग भी ये चर्चा सुन रहे थे। चर्चा तो समझ में नहीं आती थी किन्तु उनकी चर्चा से वातावरण आनंदपूर्ण बन गया था। तब दूसरे दिन वह जर्मन का व्यक्ति मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज की ओर इशारा करके बोला-हम इनको जर्मनी ले जायेगा। तब आचार्य विद्यासागर जी बोले-‘रास्ता कहाँ से मिलेगा। तो वह व्यक्ति बोला-यहाँ से पाकिस्तान, अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुँच सकते हैं लेकिन आपको चारों तरफ से कवर करके चलेंगे। तब मुनि विद्यासागर जी बोले-‘शेर तो शेर ही रहता है, उसे किसी प्रकार का बंधन स्वीकार नहीं होता।' यह सुनकर हम सभी लोगों ने तालियाँ बजा दीं।"

     

    इस तरह आपके लाड़ले शिष्य मेरे गुरुवर आज तक बहादुरी के साथ दिगम्बरत्व की निर्भीक सिंहवृत्ति-चर्या का पालन करते हुए भारतीय संस्कृति की ध्वजा को फहरा रहे हैं। मेरे गुरु यह सब आपकी ही कृपा का फल मानते हैं। ऐसे गुरु-शिष्य के चरणों में समर्पित...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य


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