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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • संतों की वाणी का महत्व

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    दूसरों में अनुशासन को लाने के लिये पहले स्वयं अनुशासित होना अनिवार्य है। कभी-कभी बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी अपने क्षेत्र में अनुशासन नहीं बना पाते वहीं जो स्वयं अनुशासन के मार्ग पर चलते हैं उनसे मार्गदर्शन लेकर के सभी स्वयं ही अनुशासित हो जाते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग पूज्य आचार्यश्री का है।

     

    4 अप्रैल 2001, बुधवार बहोरीबंद में शाम को कटनी जिला के कलेक्टर शहजाद खान एवं एस.पी. अशोक अवस्थी 6 तारीख को मुख्यमंत्री आ रहे हैं, यह सूचना लेकर आए थे। चर्चा चली। आचार्यश्रीजी ने दोनों लोगों से कहा 'आप लोगों को गरीब जनता में शराब आदि व्यसनों से बचाने के लिए निर्देशन मार्गदर्शन करना चाहिए।' एस.पी. जी बोले 'महाराज आज की जनता पुलिस की भी बात नहीं मानती।'

     

    आचार्यश्रीजी बोले- 'हाँ, यह बात तो सही है, हम जब छोटे थे। दक्षिण भारत में तो पुलिस वाले जैसे ही दिखते थे तो हम घर में छुप जाते थे। साइकिल पर दो व्यक्ति बैठे होते थे तो उतरकर भाग जाते थे। या घर में घुस जाते थे। इतना डरते थे, लेकिन आज की जनता तो पुलिस को डराती है। उसी के ऊपर प्रहार करती है। बड़ी दुर्दशा है आज।'

     

    एस.पी.- 'महाराज! आज की जनता को हम लोग नहीं सुधार सकते। आप जैसे महान व्यक्ति (महात्मा) ही अपने उपदेश आदि से सुधार सकते हैं।' आचार्यश्री- 'भैया आज की जनता तो हमारी बात भी नहीं मानती, पुलिस के डंडे से बात मानती है।' एस.पी.- 'नहीं महाराज व्यक्तियों की बुद्धि सुधारने में आप लोगों की वाणी बड़ा काम करती है। 'आचार्यश्री- 'हाँ! यह बात सही है। व्यक्ति की बुद्धि को सुधारने में संतों की वाणी बहुत काम करती है, लेकिन इसके लिये सबसे पहले स्वयं सुधरना पड़ता है। शराब-सिगरेट पीने वाला दूसरों से यह व्यसन नहीं छुड़ा सकता। अनुशासनहीन व्यक्ति दूसरों को अनुशासित नहीं रख सकता।' दोनों अधिकारियों ने पुनः नमस्कार किया। बोले- 'आपसे चर्चा करके बहुत अच्छा लगा। आप सदा हम सभी के प्रति ऐसा ही आशीवाद भाव बनाए रखें।'

     

    संत चरण में आय के, सम्यक पथ को पाय |

    मन खुशियों से भर उठे, सदाचारी हो जाय ||

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