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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • लिखना नहीं, लखना भी स्वाध्याय है

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    महामनीषियों की बुद्धि पदार्थगत न होकर मूल अर्थ की ओर होती है। वे वस्तु के बिना भी अपने अर्थपूर्ण कार्य को करने की क्षमता रखते हैं। ऐसी दिव्य मनीषा के धनी परम पूज्य आचार्यश्री जी है जिनका यह जीवंत संस्मरण हैं जो परिग्रह को नहीं अपरिग्रहता को सदा अपने भावों में रखते हैं।

     

    शाम का समय था। डॉ. अमरनाथजी (सागरवाले), डॉक्टर श्री अरविंद सिंघई नेत्र चिकित्सक को लेकर आए। आचार्यश्री की आँख दिखाने के लिए कहा है। आचार्यश्री ने कहा- क्या जरूरत है, अच्छे से काम चल रहा है। चश्मा का नंबर वो एक आँख का पौने तीन, दूसरे में ढाई है। ये नंबर जब मैं अजमेर में (ज्ञानसागरजी महाराज के साथ था) उस समय 'आईफ्यू बहुत जोर से आया था। उसी समय से नंबर आ गया था और आज 30-32 साल होने को हैं, आज भी अच्छे से काम चल रहा है।

     

    एक बार तो एक श्रावक चश्मा बनाकर हमारी टेबिल पर रखकर चले गए, लेकिन हमने उसे ग्रहण नहीं किया। आज भी ग्रंथ के छोटे-छोटे शब्दों को पढ़ लेता हूँ कोई तकलीफ नहीं है। हमें चार हाथ से अधिक दूर देखने की जरूरत नहीं है, चार हाथ दूर का भी सब अच्छे से दिखता है। फिर आचार्यश्री ने कहा- हमें चश्मे की जरूरत नहीं, क्योंकि मैं जितना पढ़ना चाहता हूँ उतना अच्छे से पढ़ लेता हूँ। पढ़ने की आकुलता जिनको होती है, वे चश्मा लगाएँ। आखिर पढ़ने की सीमा होना चाहिए? आज ज्यादा पढ़ना और फिर लिखते रहना बहुत हो गया है, और ज्यादा लिखने पढ़ने से चिंतन की प्रक्रिया कम हो जाती है। लिखने से लखना नहीं हो पाता है। लिखने से आरंभ होता है, और लखने से (चिंतन) स्वाध्याय होता है। बगैर चिंतन के लिखने को स्वाध्याय नहीं कहा। चिंतन को अनुप्रेक्षा रूप स्वाध्याय में लिया गया है। यदि पढ़ा नहीं जाता तो सुनने को भी स्वाध्याय कहा है।

     

    सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए देशना लब्धि को कारण कहा है। लेकिन लिखने को सम्यग्दर्शन का कारण नहीं कहा है, उसके लिए आरंभ कहा है। बड़े-बड़े साहित्यकार हैं, जैसे कहते जैनेंद्र हैं, वे लिखते नहीं, लिखाते थे। स्वयं चिंतन करके लिखाते थे। एक पंडित सुखलालजी प्रज्ञाचक्षु थे, उन्होंने बड़ा काम किया- बड़े-बड़े ग्रंथों का संपादन किया, इसी चिंतन के साथ किया है। आज तो लिखने को ही चिंतन माना जा रहा है। सुनने से चिंतन होता है। अच्छे से चिंतन करो और फिर अच्छे से धर्मोपदेश दो। यह भी स्वाध्याय है। इसलिए भैया मैं चश्मे को अपने लिए आवश्यक नहीं समझता। हमारे किसी भी काम में रुकावट नहीं, सब अच्छे से चल रहा है, तो फिर क्यों लगाऊँ।

     

    फिर भी डॉ. अरविंद सिंघई ने ऑखों को देखा। उन्होंने स्वयं कहा महाराज आपका विचार ठीक है, जब आपको अधिक दूर का देखना नहीं, तो चश्मे की आवश्यकता नहीं है। आचार्यश्री ने बताया- मैंने एक आलेख पढ़ा था। अमेरिका के डॉक्टर्स ने लिखा था कि नींबू की एक-दो बूंद आँख में डालने से सब रोग ठीक हो जाते हैं। मोतियाबिंद जैसे रोग भी समाप्त हो जाते हैं। नींबू को स्वर्ण के बराबर कहा है। दोनों पीले हैं, लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से नींबू सोने से ज्यादा कीमती है। स्वर्ण को रखने वाला पगला सकता है, लेकिन नींबू खाने से पागलपन ठीक होता है। इसलिए नींबू के रस को भी हमने समय-समय पर आँख में डाला है, इसलिए आज भी काम अच्छा चल रहा है।

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