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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • कर्म से बड़ा कर्ता

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    कर्म से बड़ा कर्ता कि कर्ता से बड़ा कर्म? कौन किससे बड़ा? इस द्विविधा में पड़े पथिक को एक नई दिशा कैसे दें? कैसे पथिक को अपनी आत्म शान्ति का परिचय करायें, यह कार्य कराने वाले बिरले ही होते हैं। पर कर्तव्य मार्ग पर चलने वाले के सामने कर्म हमेशा छोटे होते हैं। वह कैसे? आप स्वयं पढ़ें गुरुदेव का यह प्रसग।

     

    प्रसंग : 9 जनवरी 1998, शुक्रवार प्रातःकाल विहार चल रहा था। पोखरनी ग्राम में आहार होना था, जो 13-14 किमी. था। आचार्यश्री तेजी से चल रहे थे। कच्चा रास्ता था। मुनिश्री पवित्र सागरजी ने देखा कि आचार्यश्री आ गए हैं, उनको रास्ता दे दिया, एक तरफ एक मिनट के लिए रुक गए। आचार्यश्री बोले- 'चलो रुक क्यों गए?" मुनिश्री बोले- 'महाराज रात्रि में पेट में बहुत दर्द था। तेजी से चला नहीं जा रहा है। हम आराम से आ रहे हैं।'

     

    आचार्यश्री ने कहा- 'चलो दर्द के बारे में अधिक सोचो मत, जितना अधिक सोचोगे उतना ही दर्द होता है।' मुनिश्री बोले- 'दर्द था इसलिए तो बोला है।' आचार्यश्री बोले- 'हमसे बड़ा दर्द नहीं हो सकता है।' मुनिश्री बोले- 'महाराज! कर्म हमसे बड़ा होता है।' आचार्यश्री ने कहा- 'सबसे बड़ी भूल है तुम्हारी, तुमने जो सोचा है, गलत सोचा है, अरे! कर्ता से बड़ा कर्म नहीं होता है।

     

    कर्ता के सामने कर्म को कमजोर होना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो कर्म से मुक्ति कोई पा ही नहीं सकता था। सभी संसार में रहते। इसलिए कर्म बड़ा नहीं, कर्ता बड़ा है। तुम अभी कर्ता हो, कर्म का अच्छे से सामना करो। पीछे क्यों हटते हो?" और हाथ पकड़कर साथ में चलने लगे। बड़ा कौन है? कर्म कि कर्ता, इसको समझना है। पर कभीकभी हम मोह के बस हो जो छोटा है, उसको बड़ा मान बैठते हैं। मगर जो वास्तव में बड़ा है, उसको भूल जाते हैं। कर्ता कर्म से बड़ा होता है। कर्ता जब अपने शरीरादि के मोह से युक्त होता है तो अपने कर्ता स्वभाव, अपनी आत्मशक्ति को भूल जाता है। कर्म को बड़ा मान बैठता है, इसी तथ्य को पूज्य गुरुदेव ने विहार करते हुए समझाया था।

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