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  • साधना 2 - मोक्षमार्ग

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    साधना 2 - मोक्षमार्ग विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. निरीहता और निर्भीकता के बिना हम मोक्षमार्ग पर सही-सही कदम नहीं बढ़ा सकते।
    2. त्यागी जनों की त्यागवृत्ति देखने से रागी जनों की रागवृति में कमी आती है।
    3. बाहर में गुणीजनों को देखकर व अन्दर में आत्मस्वभाव को देखने से चारित्र में निखार आता है।
    4. चाहे श्रावक हो अथवा साधु, वही कार्य करे जो मोक्षमार्ग में शोभा दे।
    5. उलझे हुए साधुओं की अपेक्षा सुलझे हुए श्रावक श्रेष्ठ हैं और उलझे हुए श्रावकों की अपेक्षा सुलझे हुए पशु श्रेष्ठ हैं।
    6. मोक्षमार्ग बहुत सुकुमार है और बहुत कठिन भी। अपने लिये व्रत पालन में कठोर, द्रढ़ होना चाहिए और दूसरों के लिये सुकुमार।
    7. चलना आवश्यक है किन्तु लक्ष्य बनाकर। जब तक लक्ष्य नहीं बनता तब तक चलने को चलना नहीं कहते।
    8. लक्ष्य बनाकर निरन्तर चलने वाली पतली नदी भी जिस प्रकार एक दिन विशाल सागर का रूप धारण कर लेती है। ठीक उसी प्रकार जिसकी द्रष्टि व गति मुक्ति की ओर हो गयी है, वह एक न एक दिन विशाल केवलज्ञान रूप सत्ता को प्राप्त कर मुक्त हो जाता है।
    9. जैसे-जैसे हम राग-द्वेष को कम करते चले जायेंगे वैसे-वैसे अपनी आत्मा के पास पहुँचते जायेंगे।
    10. पसीना बहाने का नाम मोक्षमार्ग नहीं है वहाँ तो समत्व, समता को धारण करना पड़ता है।
    11. अहं बुद्धि-मम बुद्धि-तव मम्-तव मम् आदि विकल्पों से विश्राम लेना ही वास्तविक पुरुषार्थ है मोक्षमार्गी का।
    12. प्रत्येक मोक्षमार्गी के लिये प्रशंसा अथवा निंदा करने वालों के प्रति ‘सद्धर्मवृद्धिरस्तु' कहना चाहिए तभी वह जीवन में कुछ पा सकता है।
    13. मोक्षमार्ग पर चलना बहुत दुर्लभ है। इस मार्ग पर शिथिलता आने में देर नहीं लगती, किन्तु देर है तो एक मात्र इस मार्ग में सफलता पाने में।
    14. अपने में कमी आना (शिथिलता आना) अलग बात है किन्तु मार्ग को ही वैसा प्रतिपादित करना ठीक नहीं। गलत को गलत, कमी को कमी तो स्वीकार करना ही चाहिए। यदि स्वार्थ या कषाय वश उसे ही मार्ग घोषित कर देते हैं तब निश्चित मानिये वह मिथ्यात्वी अनंत संसारी है।
    15. मार्ग पर चलते समय यदि कोई बोलने वाला मिल जाता है तो मार्ग तय करना सरल हो जाता है। गुरु निग्रन्थ साधु हमारे मोक्षमार्ग के बोलने वाले साथी हैं। उनके अनुगामी बनने से हमारा मोक्षमार्ग सरल हो जाता है।
    16. जिसके हृदय में ज्ञान और वैराग्य की किरण जाग जाती है उसके चरणों में धन, सम्पदा, वैभव आदि सारे भोग्य पदार्थ स्वयमेव झुक जाते हैं।
    17. मोह की महिमा का अन्त तब तक नहीं हो सकता जब तक स्वभाव की अनभिज्ञता जीवित रहती है।
    18. मोह के विनाश से ज्ञान का विकास होता है और मोह के विकास से ज्ञान का विनाश।
    19. अकेले वैराग्य से सब कुछ नहीं होता किन्तु वैराग्य के साथ-साथ विवेक और व्यवहार कुशलता भी अनिवार्य है।
    20. अकेले दूसरों का उपदेश सुनकर ही वैराग्य को नहीं सम्हाला जा सकता बल्कि उसे स्थिर रखने के लिये स्व पुरुषार्थ की भी आवश्यकता है।
    21. वैराग्य की दशा में स्वागत-आभार भी भार सा लगता है।
    22. वैराग्य के क्षेत्र में प्रचार-प्रसार की आवश्यकता नहीं है वह अपने आप ही हो जाता है।
    23. वैराग्य की प्रबलता होने पर भी यदि तदनुकूल स्थान न मिले तो उसे स्थिर रखना दुष्कर है।
    24. आप लोगों को भी वैराग्य होता है किन्तु धर्म से त्याग से, आत्मा से, वैराग्य होता है लेकिन आत्मा में वैराग्य नहीं होता।
    25. अपरिचित व्यक्ति के पास रहने से वैराग्य वृद्धि को प्राप्त होता है किन्तु जैसे-जैसे परिचय बढ़ता जाता है धीरे-धीरे साधना में कमी आती जाती है।
    26. आचरण के अभाव में अकेली दृष्टि का कोई महत्व नहीं, कोई लाभ नहीं।
    27. द्रष्टि में पहले पथ आता है और बाद में पथ पर पग पड़ते हैं।
    28. पथ के अथ पर पग पड़ते ही पथ की इति पर स्पन्दन हो जाता है।
    29. भीतरी आँख जितनी पवित्रता से खुलेगी उतना ही पवित्र पथ देखने में आयेगा। ज्यों ही इसमें दूषण आने लग जायेंगे तो पथ की पवित्रता भी समाप्त हो जायेगी।
    30. आँखों के द्वारा जिसे हम देखते हैं उसकी पूर्ति चरण करते हैं।
    31. मंजिल की प्राप्ति मात्र ध्येय बनाने से नहीं, बल्कि कदमों के बढ़ाने से होती है।
    32. आँखों की पूजा आज तक किसी ने नहीं की, सदा चरणों की पूजा होती है यानि दृष्टि नहीं,आचरण पूज्य होता है।
    33. आस्था के स्थायी होने पर ही ज्ञान व आचरण वृद्धि को प्राप्त होता है।
    34. आस्था से वास्ता होने पर शास्ता स्वयं रास्ता देता है साधक को।
    35. बोलने का ही नहीं बल्कि चुपचाप आचरण का भी प्रभाव पड़ता है।
    36. बोलना, सोचना, चेष्टा करना मोक्षमार्ग में पुरुषार्थ नहीं है। किन्तु एक जगह पर शान्त चित्त से बैठकर आत्म ध्यान करना वास्तविक पुरुषार्थ है।
    37. अध्यात्म और आचरण ही हमारे जीवन का आधार हो।
    38. भवन को छोड़कर वन की ओर जाना पलायन नहीं बल्कि कल्याण की लाइन (मार्ग) है।
    39. प्राथमिक दशा में अनुतीर्ण होकर उच्चता की चर्चा मात्र करना स्वयं को एवं अन्यों को भ्रम उत्पन्न कराना है।
    40. व्रती के लिये व्रत ही धन सम्पदा है उसकी सुरक्षा में वह दिन-रात लगा रहता है।
    41. जो समय काटने में लगा है उसका कर्म नहीं कटता किन्तु जो व्रती हैं, कर्म काटने में लगे हैं उनका समय कब कट जाता है पता भी नहीं चलता।
    42. व्रतियों को व्यक्तियों के नियंत्रण में नहीं किन्तु व्रतों के नियंत्रण में रहना चाहिए।
    43. व्रत संकल्प लेने के पूर्व जितना उत्साह होता है उतना ही उत्साह उसके निर्वाह करने के लिये भी होना चाहिए।
    44. बहुधा व्रत नियमों में शिथिलता आने पर नियम, नियम से खंडित हो जाते हैं।
    45. व्रत रूपी वस्त्रों को साफ-सुधरा करने के लिये प्रतिक्रमण साबुन का काम करता है।
    46. मूलगुणों या उत्तरगुणों का पालन करते समय हमें सर्वप्रथम निर्दोष व्रतों का पालन करना चाहिए। यदि दोष लग रहे हैं, तो क्यों लग रहे हैं? इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा उन कारणों को भी दूर करना चाहिए।
    47. संकल्प पूर्वक व्रतों का ग्रहण करना साधना का मूल है और तपस्या से सिद्धि उसकी पश्चातवर्तीदशा। फल-फूल, मूल के बिना नहीं लगते यह ठीक है किन्तु मूल में ही नहीं लगते कभी भूलकर भी।
    48. बंधुओं! जरा ध्यान तो दो! २८ गुण ही मुक्ति के कारण हैं और २८ गुण ही संसार के कारण। मुनि के २८ मूलगुण मुक्ति के कारण हैं और असंयमी अज्ञानी के २८ गुण (पंचेन्द्रिय के विषय २७+१ मन का विषय) ही संसार के कारण हैं।
    49. जिस तरह चश्में को उसके साथ रखे हुए कपड़े के द्वारा हम बार-बार साफ करते हैं ठीक उसी प्रकार अंगीकृत व्रतों को भी भावनाओं के द्वारा परिमार्जित करते रहना चाहिए।
    50. दोषों के शोधन के लिये प्रायश्चित का विधान है प्रायश्चित लेना पड़ता है। व्रत में दोष लग जाने पर व्रत ही छोड़ दें ऐसा भाव कभी नहीं करना चाहिए।
    51. अपराध बोध हो जाना भी अपने आप में एक प्रायश्चित है।
    52. परिणामों को सदा अपने दोषों को छानने में लगाना चाहिए दूसरों के दोषों को देखने में नहीं।
    53. व्रतों के पालने से लाभ होता है जब ऐसी आस्था है, तो उन्हें ग्रहण कर यथाशक्ति निर्दोष पालन करने का ही प्रयास करना चाहिए।
    54. तपस्वी बने बिना यशस्वी बनना संभव नहीं।
    55. चार आना दोष पश्चाताप से नष्ट हो जाता है, चार आना गुरु को बतलाने से, चार आना प्रायश्चित लेने से और शेष बचा हुआ दोष सामायिक में बैठने से समाप्त हो जाता है।
    56. जैसे वृक्ष की जड़ में कीड़ा लग जाने पर उसका सिंचन और संरक्षण कोई मायना नहीं रखता। ठीक इसी प्रकार शल्य (विकल्प) सहित व्रतों का पालन सार्थक नहीं है। अत: शल्य रूपी कीड़े को निकालकर वैराग्यरूपी जल से यदि सिंचन किया जाता है तो जीवन में व्रतरूपी वृक्ष नियम से हरा-भरा होगा।
    57. जिस प्रकार सूर्योदय के पूर्व ही लालिमा युक्त प्रभात बेला आ जाती है। उसी प्रकार हृदय में मुमुक्षुपन की किरण फूटते ही बुभुक्षुपन की सारी ज्वाला शान्त हो जाती है, अंधकार छिन्न-भिन्न हो जाता है। सारा का सारा वैभव साम्राज्य जीर्ण-तृण के समान दिखाई देने लगता है।
    58. जब तक बुद्धि, इन्द्रियों की क्षमता और शरीर ठीक है तभी तक धर्म ध्यान तपस्या आदि कर लेना चाहिए, अन्यथा अन्त में पश्चाताप ही हाथ लगता है। बंधुओ! घर में आग लगने पर कुआँ खुदवाना क्या उचित है?
    59. उपशम यानि कषायों का शमन भाव ही मुमुक्षु के लिये अजेय और अमोघ शस्त्र हैं। इस शस्त्र के द्वारा दुनिया को नहीं अपनी आत्मा को जीतकर कर्मों को परास्त करना है।
    60. संसारी प्राणी को मोक्षमार्ग पर चलने के लिये पर्याय की हेयता बताना जरूरी है क्योंकि उसके बिना उसकी दृष्टि पर्याय से हटकर वैकालिक द्रव्य तक नहीं पहुँचती।
    61. कैसा भी कर्म का उदय आ जाये अनुकूल हो अथवा प्रतिकूल, उसमें भी अन्दर विश्वास तो यह है कि अब नियम से कूल-किनारा मिलेगा। इसी परिणति का नाम श्रामण्य है।
    62. आदेश देना कठिन कार्य है और उसका पालन कराना उससे भी अधिक कठिन। जो आदेश पालन करने की क्षमता और इच्छा रखता है उसे ही आदेश दिया जाता है और इसी माध्यम से आदेश देने वाले के पद की मर्यादा का निर्वाह हो जाता है।

    Edited by संयम स्वर्ण महोत्सव



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