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  • साधना 6 - आत्म पुरुषार्थ

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    साधना 6 - आत्म पुरुषार्थ विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. स्व की ओर मुड़ना ही सही पुरुषार्थ है।
    2. पर को नियन्त्रित करने की मन की इच्छा गलत है बल्कि स्वयं को नियन्त्रित करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है।
    3. पहले विश्व को भूलो और आत्मा को जानो। जब आत्मा को जान जाओगे तो विश्व स्वयं प्रगट हो जायेगा।
    4. सही रूप की प्राप्ति किसी को तब तक नहीं होती जब तक अपने स्वरूप की पहचान नहीं होती।
    5. शरीर के प्रति वैराग्य और जगत् के प्रति संवेग ये दोनों ही बातें आत्मकल्याण के लिये अनिवार्य हैं।
    6. आत्मबोध के होने पर संयम कभी बोझ नहीं लग सकता। जो उसे बोझ रूप महसूस करते हैं, उन्होंने अभी आत्मज वैभव को सही-सही नहीं समझा।
    7. वीतरागता को थोपा नहीं जाता, उसे तो अपने अन्दर जाग्रत किया जा सकता है।
    8. दुनिया से क्या बचना ? कितना बचना ? क्या क्या बचा पाओगे ? अत: स्वयं को राग-द्वेष से बचाना ही परम पुरुषार्थ है।
    9. अपने आपको जानो, अपने को पहचानो, अपनी सुरक्षा करो क्योंकि अपने में ही सब कुछ है।
    10. मुक्ति के पथ पर भागो नहीं, ठहरो, स्थिर हो जाओ क्योंकि भागने में आकुलता है और ठहरने में आनंद। ठहरना ही वास्तव में विश्राम है।
    11. अपनी आत्मा स्वयं आपको देखनी होगी। गुरु भी आत्मा को नहीं दिखा सकेगे, सिर्फ आत्मा की बात बता सकेंगे। आत्मा दिखाने की वस्तु नहीं है, देखने की वस्तु है।
    12. तू तटस्थ होकर देख, देखना-जानना स्वभाव है तेरा लेकिन चलाकर नहीं। चलाकर देखना राग का प्रतीक है। जो हो रहा है उस होते हुए को देखिये जानिये मगर बिगड़िये नहीं।
    13. मिट्टी से बाँधे गये बाँध की तरह संसारी प्राणी का कमजोर उपयोग कर्मोदय के तीव्र प्रवाह में शीघ्र ही ढह जाता है।
    14. पानी की तेज धार जैसे बड़े-बड़े पाषाण खण्डों को भी बहा ले जाती है ठीक इसी तरह मोह भी एक प्रबल धारा के समान है जिसमें बड़े-बड़े साधक भी बह जाते हैं। जिसका जीवन साफ -सुथरा है वही इस धारा को पार कर सकता है।
    15. ७० कि. मी. स्पीड वाली गाड़ी को जैसे ब्रेक लगाकर १ कि.मी. प्रति घंटे की स्पीड से कर सकते हैं ठीक इसी तरह७० कोड़ाकोडी स्थिति वाले मिथ्यात्व को आत्मोन्मुखी स्वपुरुषार्थ के बल पर अन्त: कोड़ा-कोडी कर सकते हैं।
    16. ज्ञान को यदि परिपूर्ण और पुष्ट बनाना चाहते हो तो आइये परिषह और तपों से गुजरिये। तप की आराधना के बिना आत्मोत्थान संभव नहीं है।
    17. संयम की ढाल को अपने हाथ में लेकर ज्ञान की तलवार चलाने से अनंतकालीन कर्मों की फौज, जो कि भीतर साम्राज्य किये बैठी है छिन्न-भिन्न हो जाती है।
    18. आत्म तत्व की उपलब्धि के लिये गहराई में उतरना पड़ता है। जो केवल तट पर ही बैठे रहते हैं उन्हें मात्र लहरें ही हाथ लगती हैं, मोती केवल गहराई में ही मिल पाते हैं।
    19. बहुत हो गया बाहरी परिचय, और कितना? कब तक? अब तो चेतो हे चेतन! और अपने को पहचानों।
    20. चाहे हुए अपेक्षित कार्य के सफल न होने पर हमेशा अशान्ति होती है अत: मात्र अपेक्षा न रखें किन्तु अपेक्षित कार्य सफल हो ऐसा पुरुषार्थ भी करें।
    21. क्षेत्र और वस्तु का सदुपयोग वही कर सकता है जिसका भीतरी पुरुषार्थ चल रहा है।
    22. हम भले ही शुद्ध-शुद्ध की चर्चा करते जायें कि आत्मा शुद्ध है, हम शुद्धाम्नाय वाले हैं किन्तु भगवान कहते हैं कि जिसका आचरण शुद्ध है उसकी आम्नाय शुद्ध है। जिसका आचरण शुद्ध नहीं उसकी आम्नाय भी शुद्ध नहीं।
    23. आम्नाय (परम्परा) आचार और विचार की एकता से ही चलती है।
    24. आत्म विकास के लिये वीतराग स्वसंवेदन की आवश्यकता है। स्वसंवेदन के माध्यम से हम उस तत्व को देख सकते हैं जिसे आज तक नहीं देखा।
    25. जिसके माध्यम से जीवन में क्रान्ति आती है और सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है वह है वीतरागता । उसी वीतरागता की प्राप्ति के लिये यह सारे के सारे प्रयास चल रहे हैं।
    26. सिद्ध-दशा में आत्मा अमूर्त है शुद्ध पारे की तरह उसे हम पकड़ नहीं सकते, किन्तु संसार दशा में कर्म सहित होने पर पारे की भस्म की तरह पकड़ में आ जाती है। यदि इस आत्मा को वीतरागता का योग मिल जाये तो मूर्त से अमूर्त हो सकती है।
    27. आज भविष्य के बारे में चिन्ता है और भूत के साथ उसकी तुलना हो रही है जबकि वर्तमान पुरुषार्थ खोता जा रहा है।
    28. जो व्यक्ति भविष्य की चिन्ता कर रहा है तो निश्चित मानिये वह वर्तमान को ठुकरा रहा है, ध्यान रहे कार्य का होना भविष्य में नहीं वर्तमान में ही संभव है।
    29. कर्म निर्जरा करने वाला साधक महान् है। वह कुछ ही समय में आत्मा को कचन-सा शुद्ध कर देता है।
    30. मुक्ति तो अविपाक निर्जरा का फल है और अविपाक निर्जरा तप के माध्यम से होती है। अत: हम ऐसा तप करें जिससे आत्मा की समस्त वैभाविक कालिमा निकल जाये और एकमात्र शुद्ध स्वर्ण के समान आत्मद्रव्य शेष रह जाये।
    31. मोक्ष पुरुषार्थ किसी वर्ग में सम्मिलित नहीं है इसलिये इसे संस्कृत में अपवर्ग कहते हैं परन्तु धर्म, अर्थ और काम आपस में सम्बद्ध है इसलिये इन्हें त्रिवर्ग कहते हैं। मोक्ष अकेला और ये तीन, फिर भी मोक्ष का सामर्थ्य देखो वह अकेला ही तीनों को समाप्त कर देता है।
    32. जिसे दर्शन का सार मिल गया है उसे अब मात्र देखना भर नहीं है अपितु अनुभव में भी लाना चाहिए। मगर बाहरी प्रदर्शनों के चक्करों से अपने आपको पृथक् रखना चाहिए।
    33. गुणों की अपेक्षा से सिंह बनो, श्वान मत बनो क्योंकि श्वान मात्र प्रहार को पकड़ता है जबकि सिंह प्रहार करने वाले को |


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