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  • धर्म संस्कृति 3 - शास्ता/शासन

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    धर्म संस्कृति 3 - शास्ता/शासन विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. "तीर्थ करोति इति तीर्थंकर" जो तीर्थ का प्रवर्तन करने वाले होते हैं, वे तीर्थंकर कहलाते हैं।
    2. जिनके माध्यम से सारा का सारा संसार तिर जाता है, उसे तीर्थंकर कहते हैं।
    3. महावीर भगवान् उस जन्म को इष्ट बुद्धि से नहीं देखा करते थे। आप लोगों को जो पसंद आ रहा है स्वयं सोचिये क्या वह महावीर को पसंद था।
    4. महावीर ने किसी बात पर अपने जीवन को बाँधा नहीं था। महावीर का जीवन तटस्थ नहीं किन्तु आत्मस्थ था, स्वस्थ था। तटों को बाँधने वाले महावीर नहीं थे तट अवश्य उन महावीर प्रभु को चाहते थे।
    5. दुनिया की ओर मत देखो, अपने आपको देखो। भगवान् महावीर ने कभी दुनिया की ओर दृष्टिपात नहीं किया, यदि किया है तो दुनिया के पास जो गुण हैं उन्हें लेने का प्रयास किया। महावीर में अपने को देखो, अपने 'मैं' को देखो महावीर में।
    6. हमारे सामने केवल 'मैं' ही रह जाये तो उसमें से अनेक महावीर फूट सकते हैं, अनेक राम अवतरित हो सकते हैं। अनेक पाण्डव उस ‘मैं' की गहराई से जन्म ले सकते हैं।
    7. जिस व्यक्ति के जीवन में शासन के प्रति प्रेम नहीं अर्थात् जिन शासन के प्रति गौरव नहीं, उसके जीवन में प्रभावना होना तीन काल में भी संभव नहीं।
    8. जैनशासन में किसी व्यक्ति विशेष की पूजा नहीं है क्योंकि यहाँ पर नाम की नहीं गुणों की पूजा होती है।
    9. जैनशासन में जो पंथ चलते हैं वे सागार और अनगार के हैं। अविरत सम्यग्दृष्टि का कोई पंथ नहीं होता वह तो उन दोनों पंथों का उपासक मात्र है।
    10. जिन भगवान् की उपासना करने वाले जैन माने जाते हैं यानि हमारे साथ ऐसे भगवान् का नाम जुड़ा हुआ है जो राग-द्वेष, विषय-कषाय और आरंभ परिग्रह से रहित हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हम जैन हैं तो जैनों जैसा कार्य भी होना चाहिए। जिनोपदिष्ट सिद्धान्तों का अनुकरण भी करना चाहिए।
    11. सपूत 'कुल का दीपक' माना गया है। देश की, वंश की, धर्म की परम्परा में जो चार चाँद लगा देता है वही सपूत है। हम अपने आपसे पूछ लें कि हम अरहंत भगवान् के पूत हैं, सपूत हैं या ....। कहने की आवश्यकता नहीं हमारी जीवन चर्या ही हमारा आचरण बता देगी।
    12. देशना आदेश नहीं परामर्श है, आज्ञा नहीं राय है मात्र सलाह है।
    13. सत् सन्तों का लक्षण आगम की आज्ञा पालने में है। पूत का लक्षण पालने में नहीं गुरु की आज्ञा पालने (मानने) में है।
    14. महापुरुषों ने अनुभवों के आधार पर जैसा प्रतिपादन किया है हमें वैसा ही अपना जीवन बनाना चाहिए।
    15. हमारे पास क्या है ? केवल छोड़ने के लिये राग-द्वेष, विषय-कषायों के अलावा और कुछ भी तो नहीं है। आपको हम किन वस्तुओं को दिखाकर खुश कर सकते हैं भगवन् ? आप हमारी वस्तुओं से खुश भी नहीं होंगे....लेकिन उन वस्तुओं के त्याग से अवश्य खुश होंगे।
    16. अहिंसा आदि व्रत संकल्पों को साकार रूप देने से ही हम भगवान् महावीर के सिद्धान्त तथा पथ को अक्षुण्ण बनाये रख सकते हैं।
    17. साधु का रास्ता तो मनन और चिन्तन का रास्ता है। उसकी यात्रा अपरिचित वस्तु से परिचय प्राप्त करने का उत्कृष्ट प्रयास है।
    18. जिस दिन आत्मदर्शन की खोज में निकलोगे उस दिन सभी पोथियाँ बन्द हो जायेंगी। फिर दृष्टा बन जाओगे, वैज्ञानिक नहीं।
    19. जिसे दर्शन का सार मिल गया उसे देखना मात्र नहीं है अपितु अनुभव में लाना चाहिए और बाह्य प्रदर्शनों के चक्करों से स्वयं को पृथक् रखना चाहिए ।
    20. लक्ष्य बनाओ भार उतारने का और यह तभी हो सकता है जब याद रखोगे-तेरा सो एक, जो तेरा है सो वह एक आत्म तत्व है।
    21. केन्द्र तक पहुँचने के लिये परिधि का त्याग परमावश्यक है। प्राय: करके परिधि में जो घूमता है उसे केन्द्रबिन्दु प्राप्त नहीं हो पाता। आनंद, केन्द्र में है परिधि में नहीं।
    22. बाहरी चमक-दमक के कारण ही भीतरी आभा का परिचय नहीं हो पा रहा है। ध्यान रखिये वह आत्म आभा भौतिक साधनों की पकड़ से परे है। उसका मात्र संवेदन किया जा सकता है।
    23. यह मुनि का पद, मुनि की मुद्रा अपने आपमें सर्वोत्कृष्ट है। इससे बढ़कर कोई पद नहीं है, अत: इस पद के साथ दीनता और विद्रूपता नहीं आनी चाहिए।
    24. दिगम्बर मुनि मुद्रा ही एक ऐसी मुद्रा रह गयी है इस संसार में जिसके पीछे रोटी है और बाकी जितने भी हैं वे सब रोटी के पीछे हैं।
    25. अकेले दिगम्बरत्व और पिच्छिका-कमण्डलु लेने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, जितना यह सत्य है उससे भी बड़ा सत्य यह है कि इसके बिना भी कभी मुक्ति नहीं हो सकती।
    26. मात्र साहित्य से ही प्रभावना का काम नहीं चलता। यदि हमारे पास क्रिया है, दिगम्बर मुद्रा है तो साक्षात् महावीर भगवान् को हम देख सकते हैं।
    27. विश्व में बहुत सारे मार्ग (परम्पराओं) को बताने वाले साहित्य मात्र हैं किन्तु श्रमण संस्कृति में साहित्य के अनुरूप आदित्य (चर्या) भी है। इस चर्या की वजह से ही यह दिगम्बर परम्परा आज तक जीवित है यह हम सभी के महान् पुण्य एवं सौभाग्य का विषय है।
    28. इस श्रमण चर्या को देखकर ही हम यह अंदाज लगा सकते हैं कि तीर्थकर आदिनाथ और भगवान् महावीर कैसे थे।
    29. दिगम्बरत्व ही एक ऐसा बाँध है जिसे लाँघने का साहस परवादियों में नहीं हो सकता। ज्यों ही यह बाँध टूटेगा त्यों ही धर्म का निर्मल स्वरूप नष्ट हो जायेगा।
    30. दिगम्बरत्व धूप के समान है। उसका उपयोग चाहे जितना करें, मगर उसे बाँधने का प्रयास न करें, वह धूप है बाँधने से बंधेगी नहीं।
    31. दिगम्बर मुनियों की चर्या ऐसी है जिसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। वह अनमोल है। आज भी दिगम्बर संत उसका पालन कर रहे हैं। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने तो इस चर्या (मुद्रा) के लिये महान् से महानतम उपमाएं दी हैं। जैसे कि यही जिनागम है, यही तीर्थ है, यही सर्वस्व है। अत: इस चर्या का कभी भी अनादर नहीं करना चाहिए।
    32. सिर्फ प्रासुक आहार ही नहीं अपितु प्रासुक जमीन की ओर भी श्रावकों का ध्यान जाना चाहिए तभी यह निग्रन्थ चर्या जीवित रह सकेगी।


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