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    संस्तुति 3 - भक्ति-महिमा

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    संस्तुति 3 - भक्ति-महिमा  विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. भक्ति गंगा की लहर हृदय के भीतर से प्रवाहित होना चाहिए और पहुँचना चाहिए वहाँ जहाँ निस्सीमता हो ।
    2. जब तक भक्ति की धारा बाहर की ओर प्रवाहित रहेगी तब तक भगवान् अलग रहेंगे और भक्त अलग रहेगा।
    3. भक्ति का असली रूप पहचान लो, तभी मंजिल तक पहुँचोगे अन्यथा संसार की मरुभूमि में ही भटकते रह जाओगे।
    4. स्तुति में तन्मयता आने पर अतिशय स्वयमेव प्रगट हो जाते हैं।
    5. लोग अतिशय को महत्व देते हैं पर अतिशय तो अब भक्तों का है भगवान् का नहीं। भगवान् के अतिशय तो उनके जीवन काल में ही पूरे हो चुके अतः अब अतिशय का होना हमारी विशुद्धता का परिणाम है। सत्य ही है जहाँ हमारा मन भक्ति से भर उठता है वहीं से अतिशय प्रकट होने लगते हैं।
    6. भक्ति करने से जब बाहरी बन्धन ताले-कड़ियाँ टूट सकती हैं तो क्या भीतरी कर्म बन्धन नहीं टूटेंगे?
    7. णमोकार मंत्र का माहात्म्य अद्भुत है जिसके श्रवण मात्र से पशु-पक्षियों ने भी सद्गति प्राप्त की।
    8. पूजा-भक्ति का माहात्म्य अद्भुत है बंधुओ! एक तिर्यच पर्याय में जन्म लेने वाला क्षुद्र मेंढ़क भी मरकर स्वर्ग के अपार वैभव को क्षणभर में पा लेता है।
    9. भक्त को भगवान् से कुछ याचना नहीं करनी चाहिए। अरे! जिस भक्ति के बल से मुक्ति का साम्राज्य मिल सकता है उससे संसार की तुच्छ सामग्री मांगकर भक्ति को क्यों दूषित करते हो?
    10. भगवान, भगवान ही है दाता नहीं और भक्त, भक्त ही है भिखारी नहीं।
    11. कोई भी भक्त, भगवान् से यह प्रार्थना नहीं करता कि हे! भगवन् आप मेरे मस्तिष्क में विराजमान रहिये बल्कि यही प्रार्थना करता है कि आप मेरे हृदय में विराजमान रहिये। मेरा हृदय आपके चरणों में रहे और आपके चरण मेरे हृदय में सदा-सदा बने रहें।
    12. चाहे आचार्य समंतभद्र ही या आचार्य मानतुंग अथवा आचार्य वादिराज, सभी ने भक्ति का माहात्म्य दिखाया। संकट की उन विषम घड़ियों में जब कोई सहारा नहीं था तब भगवान् की पवित्र भक्ति के बल पर ही धर्म की प्रतिष्ठा कायम की। विद्वेषी राजा और प्रजा को अपनी वीतरागता से प्रभावित कर धर्मानुयायी बनाया।
    13. जब कभी भी धर्म पर, धर्मात्मा पर संकट आये उपसर्ग हुए तब भगवान् की भक्ति के प्रभाव से ही देवों द्वारा अतिशय, चमत्कार हुए, उपसर्ग टले और धर्म की जय-जयकार हुई।
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