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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • सम्यक दर्शन में आठ अंग - निशंकित अंग

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    सम्यक दर्शन में आठ अंग - निशंकित अंग विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

    1. जैसा देव, शास्त्र, गुरु का स्वरूप आगम में कहा गया है वैसा ही है, अन्य भी नहीं है और अन्य प्रकार भी नहीं है, ऐसा श्रद्धान रखना निशंकित अंग है।
    2. जिनेन्द्र भगवान के वचनों पर शंका न रखना (करना) निशंकित अंग है।
    3. तलवार की धार पर लोहे में पानी की बूंद अकम्प रहती है, इसी प्रकार नि:शंकित अंग वाले का सम्यक दर्शन संशय रहित अकंप होता है।
    4. निशंकित अंग वाले की पहले की अपेक्षा दृष्टि बलवती बनी रहती है।
    5. बार-बार उपयोग करने से तलवार की धार में कमी आ जाती है, लेकिन सम्यक दर्शन रूपी दृष्टि बार-बार श्रद्धान से बलवती होनी चाहिए।
    6. जिसका जो स्वरूप आगम में कहा है-उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए वरन् बड़ों की आसादना हो जावेगी और ऐसा होना व्यवहार-कुशलता नहीं मानी जाती।
    7. मिथ्यात्व के ऊपर भी हेय रूप श्रद्धान रखो कि ये संसार का कारण है ऐसा नि:शंक होकर श्रद्धान रखो।
    8. नि:शंकित अंग में अंजनचोर प्रसिद्ध है जिसने जिनदत सेठ पर श्रद्धा रखकर णमोकार मंत्र का उच्चारण करते हुए सींके को काट दिया और आकाशगामिनी विद्या सिद्ध कर ली।

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