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    सत्यधर्म

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    सत्यधर्म विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार.

     

    1. झूठ नहीं बोलने का नाम सत्य है न कि सत्य बोलने का नाम सत्य है।
    2. आप असत्य बोलें या न बोलें जब तक सत्य का संकल्प नहीं लेते तब तक वह असत्य की कोटि में ही आता है।
    3. सत्य को प्राप्त करने के लिए चारों कषायों के ऊपर नियंत्रण रखना आवश्यक है।
    4. असत्य से बचने के लिए प्रमाद से भी बचना चाहिए। और बोलना जहाँ से प्रारम्भ होता है वहाँ पर निश्चित रूप से प्रमाद है।
    5. धर्मात्मा जब भीतर के परम आनंद को जानता है, उस समय वह सत्य का सही-सही पालन करता है। सत्य का पालन बाहर देखते हुए नहीं होता।
    6. ध्यान रखो दुनिया को देखने से सत्य सिद्ध नहीं होगा। सत्य का रक्षण नहीं कर सकेंगे, किन्तु परिणामों को देखने से ही सत्य का संरक्षण हो सकता है अन्यथा नहीं।
    7. कोई क्या कहेगा? इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए। यदि सोच लें तो सत्य का पालन नहीं हो सकता।
    8. जो रागद्वेष के कारण मौन धारण कर लेते हैं, वह मौन नहीं माना जायेगा। हाँ यदि प्रायश्चित के रूप में मौन धारण कर लेते हैं तो वह मौन माना जाता है।
    9. भीतर की अभिव्यक्ति को रोकने के लिए मौन धारण करने के लिए बहुत सशक्त व्यक्ति की आवश्यकता होती है।
    10. कर्मों के उदय का प्रतिकार न करने की जो इच्छा/साधना होती है उसका नाम सत्य है।
    11. निमित्त के ऊपर टूटने वाला सत्य का पालन नहीं कर सकता। निमित्त की ओर दृष्टि रखी नहीं कि सत्य कथचित् गायब हो गया।
    12. सत्य के लिए बहुत कठिनाई के साथ साधना करनी पड़ती है। सत्य के लिए सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है। मार्दव निजी (स्व की) चीज है। मान पर है, यह दूसरे को (पड़ोसी को) देखकर खड़ा होता है।
    13. निरभिमानता आत्मा का स्वभाव है। मान तो आत्मा को तोलने वाला तराजू है।
    14. धर्म अभ्यन्तर में उतरता है, तब आर्जवता ऋजुता का पालन होता है।

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