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संयम स्वर्ण महोत्सव

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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

    श्री वीर जिन-स्तवन

    तव गुण-गण की फैल रही है विमल कीर्ति वह त्रिभुवन में। तभी हो रहे शोभित ऐसे वीर देव बुध जन-जन में ॥ कुन्द पुष्प की शुक्ल कान्ति-सम कान्तिधाम शशि हो भाता। घिरा हुआ हो जिससे उडुदल गीत-गगन में हो गाता ॥१॥ सत युग में था कलियुग में भी तव शासन जयवन्त रहा। भव्यजनों के भव का नाशक मम भव का भी अन्त रहा ॥ दोष चाबु को निरस्त करते पर मत खण्डन करते हैं। निज-प्रतिभा से अतः गणी ये जिनमत मण्डन करते हैं ॥२॥ प्रत्यक्षादिक से ना बाधित अनेकान्त मत तव भाता। स्याद्-वाद सब वाद-विवादों का नाशक मुनिवर! साता ॥ प्रत्यक्षादिक से हैं बाधित स्यावाद से दूर रहे। एकान्ती मत इसीलिए सब दोष धूल से पूर रहे ॥३॥ दुष्ट दुराशय धारक जन से पूजित जिनवर रहे कदा। किन्तु सुजन से सुरासुरों से पूजित वंदित रहे सदा ॥ तीन लोक के चराचरों के परमोत्तम हितकारक हैं। पूर्ण ज्ञान से भासमान शिव को पाया अघहारक हैं ॥४॥ समवसरण थित भव्यजनों को रुचते मन को लोभ रहे। सामुद्रिक औ आत्मिक गुण से हे प्रभुवर अति शोभ रहे ॥ चमचम चमके निजी कान्ति से ललित मनोहर उस शशि को। जीत लिया तब काय कान्ति ने प्रणाम मम हो जिन ऋषि को ॥५॥ मुमुक्षु-जन के मनवांछित फलदायक! नायक! जिन तुम हो। तत्त्व-प्ररूपक तव आगम तो श्रेष्ठ रहा अति उत्तम हो ॥ बाहर-भीतर श्री से युत हो माया को नि:शेष किया। श्रेष्ठ श्रेष्ठतम कठिन कठिनतम यम-दम का उपदेश दिया ॥६॥ मोह-शमन के पथ के रक्षक अदया तज कर सदय हुए। किया जगत में गमन अबाधित सभय सभीजन, अभय हुए ॥ ऐसा लगते तब, गज जैसा मद-धारा, मद बरसाता। बाधक गिरि की गिरा कटिनियाँ अरुक अनाहत बस जाता ॥७॥ एकान्ती मत-मतान्तरों में वचन यदपि श्रुति-मधुर सभी। किन्तु मिले ना सुगुण कभी भी नहीं सकल-गुण प्रचुर कभी॥ तव मत समन्तभद्र देव है सकल गुणों से पूरण है। विविध नयों की भक्ति-भूख को शीघ्र जगाता चूरण है ॥८॥ (दोहा) नीर-निधी से धीर हो वीर बने गंभीर। पूर्ण तैर कर पा लिया भवसागर का तीर ॥१॥ अधीर हूँ मुझ धीर दो सहन करूँ सब पीर। चीर-चीर कर चिर लखें अन्तर की तस्वीर ॥२॥
  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

    अध्याय 5 - समवसरण

    तीर्थंकरों को केवल ज्ञान होते ही उनके सातिशय पुण्य से समवसरण की रचना होती है। ऐसे समवसरण की विशेषताओं का वर्णन इस अध्याय में है। 1. समवसरण क्या है ? तीर्थंकरों के धर्मोपदेश देने की सभा का नाम समवसरण है। 2. समवसरण की विशेषताएँ बताइए? तीर्थंकरों को केवल ज्ञान उत्पन्न होने के बाद सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विशेष रत्न एवं मणियों से समवसरण की रचना करता है। यह समवसरण भूतल से 5000 धनुष ऊपर आकाश के अधर में बारह योजन विस्तृत एक गोलाकार इन्द्र नीलमणि की शिला होती है। इस शिला पर समवसरण की रचना बनाई जाती है। (1धनुष = 4 हाथ अर्थात् 6 फीट) अत: यह समवसरण 30,000 फीट ऊपर रहता है। (ति.प.4/724-725) चारों दिशाओं में 20000-20000 सीढ़ियाँ होती हैं, इन सीढ़ियों से बिना परिश्रम के चढ़ जाते हैं। जैसे—आज लिफ्ट से ऊपर चढ़ जाते हैं एवं एसकेलेटर में मात्र खड़े हो जाते हैं और सीढ़ियाँ चलती रहती हैं। प्रत्येक दिशा में सीढ़ियों से लगा एक मार्ग होता है, जो समवसरण के केन्द्र में स्थित गंधकुटी के प्रथम पीठ तक जाता है। समवसरण में आठ भूमियाँ होती हैं- 1. चैत्य प्रासाद भूमि, 2. जल खातिका भूमि, 3. लतावन भूमि, 4. उपवन भूमि, 5. ध्वज भूमि, 6. कल्पवृक्ष भूमि, 7. भवन भूमि, 8. श्रीमण्डप भूमि एवं इसके आगे स्फटिक मणिमय वेदी है। इस वेदी के आगे एक के ऊपर एक क्रमश: तीन पीठ होती हैं। प्रथम पीठ, द्वितीय पीठ, तृतीय पीठ के ऊपर ही गंधकुटी होती है। इस गंधकुटी में स्थित सिंहासन में रचे हुए कमल से 4 अङ्गल ऊपर तीर्थंकर अष्ट प्रातिहार्यों के साथ आकाश में विराजमान रहते हैं। समवसरण के बाहरी भाग में मार्ग के दोनों तरफ दो-दो नाट्यशालायें अर्थात् कुल 16 नाट्यशालाएँ होती हैं, जिनमें 32-32 देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं। इन द्वारों के भीतर प्रविष्ट होने पर कुछ आगे चारों दिशाओं में चार मान स्तम्भ होते हैं, जिन्हें देखने से मानी व्यक्तियों का मान गलित हो जाता है। श्री मण्डप भूमि में स्फटिक मणिमय '16 दीवारों' से विभाजित बारह कोठे होते हैं जिनमें बारह सभाएँ होती हैं। तीर्थंकर की दाई ओर से क्रमश: 1. गणधर एवं समस्त मुनि, 2. कल्पवासी देवियाँ, 3. आर्यिकाएँ एवं श्राविकाएँ, 4. ज्योतिषी देवियाँ 5. व्यन्तर देवियाँ, 6. भवनवासी देवियाँ, 7. भवनवासी देव, 8. व्यन्तर देव, 9. ज्योतिषी देव, 10. कल्पवासी देव, 11. चक्रवर्ती एवं मनुष्य, 12. पशु-पक्षी बैठते हैं। (ति.प.4/866-872) योजनों विस्तार वाले समवसरण में प्रवेश करने व निकलने में मात्र अन्तर्मुहूर्त का ही समय लगता है। समवसरण में मात्र संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव ही आते हैं। समवसरण में तीन लोक के जीव आते हैं,क्योंकि अधोलोक से भवनवासी और व्यन्तर देव भी वहाँ आते हैं। समवसरण में तीर्थंकर के महात्म्य से आतंक, रोग, मरण, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी नहीं लगती है एवं हमेशा बैर रखने वाले सर्प नेवला, मृग-मृगेन्द्र भी एक साथ बैठते हैं और तीर्थंकर का उपदेश सुनते हैं। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इससे सम्बन्धित एक दोहा लिखा है:- पानी भरते देव हैं, वैभव होता दास। मृग-मृगेन्द्र मिल बैठते, देख दया का वास। (सर्वोदय शतक, 29) 3. समवसरण व्रत के कितने उपवास होते हैं एवं कब से प्रारम्भ होते हैं? एक वर्ष पर्यन्त प्रत्येक चतुर्दशी को एक उपवास करें। इस प्रकार 24 उपवास करें। यह व्रत किसी भी चतुर्दशी से प्रारम्भ कर सकते है तथा "ओं ह्रीं जगदापद्विनाशाये सकलगुड करडय श्रीसर्वज्ञाय अर्हत्परमेष्टिने नम:" इस मन्त्र का त्रिकाल जाप करें।
  3. जानिए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के त्याग के बारे में वास्तव में इस पंचम काल में चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी के बाद पूर्णतया आगम अनुरूप चर्या देखना है तो वो है आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज उनके त्याग तपस्या चर्या इस प्रकार है - आजीवन चीनी का त्याग | आजीवन नमक का त्याग | आजीवन चटाई का त्याग | आजीवन हरी का त्याग | आजीवन दही का त्याग | सूखे मेवा (dry fruits) का त्याग | आजीवन तेल का त्याग | सभी प्रकार के भौतिक साधनो का त्याग | थूकने का त्याग | एक करवट में शयन | पूरे भारत में सबसे ज्यादा दीक्षा देने वाले | पूरे भारत में एक मात्र ऐसा संघ जो बाल ब्रह्मचारी है | पुरे भारत में एक ऐसे आचार्य जिनका लगभग पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है | शहर से दूर खुले मैदानों में नदी के किनारो पर या पहाड़ो पर अपनी साधना करना | अनियत विहारी यानि बिना बताये विहार करना | प्रचार प्रसार से दूर- मुनि दीक्षाएं, पीछी परिवर्तन इसका उदाहरण | आचार्य देशभूषण जी महराज जब ब्रह्मचारी व्रत के लिए स्वीकृति नहीं मिली तो गुरुवर ने व्रत के लिए 3 दिवस निर्जला उपवास किआ और स्वीकृति लेकर माने | ब्रह्मचारी अवस्था में भी परिवार जनो से चर्चा करके अपने गुरु से स्वीकृति लेते थे और परिजनों को पहले अपने गुरु के पास स्वीकृति लेने भेजते थे | आचार्य भगवंत सम दूसरा कोई संत नज़र नहीं आता जो न केवल मानव समाज के उत्थान के लिए इतने दूर की सोचते है वरन मूक प्राणियों के लिए भी उनके करुण ह्रदय में उतना ही स्थान है | शरीर का तेज ऐसा जिसके आगे सूरज का तेज भी फिका और कान्ति में चाँद भी फीका है | ऐसे हम सबके भगवन चलते फिरते साक्षात् तीर्थंकर सम संत I
  4. "एक साधक ने अपने लक्ष्य के अनुकूल पुरुषार्थ कर प्राप्त की कालजयी सफलता।" उन महान साधक की साधना से जुड़े विस्मयकारी प्रसंगों को, जिनसे जिनशासन हुआ गौरवान्वित, उन प्रसंगों को ही इस लेख का विषय बनाया जा रहा है। गुरुवाणी के साथ-साथ विषय की पूर्णता हेतु अन्य स्रोतों से भी विषय वस्तु को ग्रहण किया गया है। आगामी 25 नवम्बर 18 को हैं आचार्य पदारोहण दिवस आचार्य श्री ज्ञानसागर द्वारा मुनिश्री विद्यासागर को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा एवं संस्कार २२ नवम्बर १९७२, माघ शीर्ष कृष्ण द्वितीया, नसीराबाद, राजस्थान आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज का सन् १९७२ में नसीराबाद में चातुर्मास चल रहा था। चातुर्मास के पूर्व जब वह अजमेर में विराजमान थे, तभी से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। चातुर्मास समाप्ति की ओर था। आचार्य महाराज शारीरिक रूप से काफी अस्वस्थ एवं क्षीण हो चुके थे। साइटिका का दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दर्द की भयंकर पीड़ा के कारण आचार्य महाराज चलने-फिरने में असमर्थ होते जा रहे थे। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज का विस्मयकारी निर्णय ऐसी शारीरिक प्रतिकूलता की स्थिति में ज्ञानमूर्ति आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने सल्लेखना व्रत ग्रहण करने का निर्णय लिया। समाधि हेतु आचार्य पद का परित्याग तथा किसी अन्य आचार्य के सान्निध्य में जाने का आगम में विधान है। आचार्य महाराज के लिए इस भयंकर शारीरिक पीड़ा की स्थिति में किसी अन्य आचार्य के पास जाकर समाधि लेना भी संभव नहीं था। अत: उन्होंने स्वयं आचार्य पद का त्याग करके अपने सुयोग्य शिष्य मुनि श्री विद्यासागरजी महाराज को आचार्य पद पर आसीन करने का मानस बनाया। चातुर्मास निष्ठापन के दूसरे ही दिन आचार्य ज्ञानसागरजी ने संघ के समक्ष अपनी इस भावना को रखा। यह बात सुनकर संघ में सभी लोग सन्तुष्ट थे, सिर्फ मुनि श्री विद्यासागरजी को छोड़कर। मुनि श्री विद्यासागरजी की अस्वीकृति जब आचार्य महाराज ने मुनि विद्यासागरजी से आचार्यपद ग्रहण करने हेतु कहा, तब मुनिश्री बोले- "गुरुदेव! आप मुझे मुनि पद में ही साधना करने देंगे तो मुझ पर आपकी महती कृपा होगी।", मुनि विवेकसागरजी महाराज को आचार्य पद देगे तो अच्छा होगा (उस समय विवेकसागरजी महाराज वहाँ पर नहीं थे, उनका चातुर्मास कुचामन सिटी में था) अथवा क्षुल्लक श्री विजयसागरजी महाराज को मुनि दीक्षा देकर उन्हें आचार्यपद दे दीजिए। पद त्याग नहीं तो समाधि कैसे... जब मुनि श्री विद्यासागरजी ने मुनि पद पर रहते हुए अपनी साधना करने की भावना एवं आचार्य पद के प्रति अपनी निरीहता प्रकट कर दी तो आचार्य महाराज के सामने यह समस्या खड़ी हो गई कि अब मैं समाधि के लिए कहाँ जाऊँ...? मुनि श्री विद्यासागर जी ने दी गुरुदक्षिणा अनेक मूर्धन्य विद्वान ज्ञानार्जन एवं दर्शनार्थ उनके पास आते रहते थे। एक दिन आचार्य महाराज ने छगनलाल पाटनी, अजमेर वालों से कहा-"छगन जी! मेरी समाधि बिगड़ जाएगी।" पाटनी जी - "महाराज! ऐसा क्यों ?" ज्ञानसागरजी महाराज - "मुनि विद्यासागर आचार्य पद लेने से इंकार कर रहा है।" पाटनी जी - "आचार्य पद उनको लेना पड़ेगा। वो इंकार नहीं कर सकते।" महाराज - "वो तो साफ इनकार कर रहा है।" तब फिर छगनलाल पाटनी, ताराचंद जी गंगवाल व माधोलाल जी गदिया बीरवाले जहाँ मुनि विद्यासागरजी महाराज नसिया में ऊपर सामायिक कर रहे थे, वहाँ पहुँच गये। छगनलालजी ने महाराज से निवेदन किया - "महाराज श्री! क्या गुरु की समाधि बिगाड़नी है जो कि आप आचार्य पद नहीं ले रहे हैं।" मुनि विद्यासागरजी बोले - "मैं परिग्रह में नहीं फँसना चाहता, यह मेरे ऊपर बहुत भारी बोझ आ जाएगा।" उसी समय शान्तिलाल पाटनी, नसीराबाद वाले भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने मुनि श्री विद्यासागर जी से कहा -"आपको यह पद स्वीकार करने में क्या तकलीफ है ?" तब मुनि श्री बोले -"मुझे विनाशीक पद नहीं चाहिये अविनाशी पद चाहिये |" छगनलाल पाटनी पुनः बोले - "आप गुरु को गुरु दक्षिणा में क्या दोगे ? क्योंकि आपके पास और कोई परिग्रह है ही नहीं, जो आप अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में दे सको।" महाराजश्री कुछ देर मौन रहकर बोले - "चलो, गुरु की समाधि तो बिगड़ने नहीं दूँगा, चाहे मेरे ऊपर कितनी भी विपत्तियाँ आवें उनको मैं सहर्ष सह लूगा।" फिर मुनिश्री विद्यासागर जी ने आचार्य महाराज के पास आकर निवेदन किया, "हे गुरुदेव! मेरे लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।" आचार्य महाराज ने उन्हें अपने कर्तव्य, गुरु सेवा और आगम की आज्ञा का स्मरण कराया और कहा कि - "गुरु दक्षिणा तो आपको देनी ही होगी।" इतना सुनते ही मुनिश्री अपने भावों को रोक न सके और एक बालक की भाँति विचलित हो उठे। शिष्य पर गुरु संग्रह, अनुग्रह आदि के माध्यम से कई प्रकार के उपकार करते हैं, पर शिष्य का गुरु पर क्या उपकार है ? गुरु के अनुकूल वृत्ति करके गुरु पर शिष्य उपकार कर सकता है। ऐसा विचार कर मुनि श्री विद्यासागर गुरु चरणों में नतमस्तक हो गए। तब इच्छा नहीं होते हुए भी दस दिनों के लम्बे अंतराल के पश्चात् उनको अपने ही दीक्षा-शिक्षा गुरु महाराज को आचार्य पद ग्रहण करने की "मौन स्वीकृति देकर गुरु दक्षिणा समर्पित करनी ही पड़ी।" मौन स्वीकृति मिलने पर आचार्य महाराज अत्यन्त आह्वादित हुए और उन्होंने तत्काल ही मुहूर्त देखने का संकेत किया। आचार्य पदारोहण मुहूर्त निर्धारण उसी समय वहाँ अन्य संघस्थ एक क्षुल्लक पद्मसागरजी महाराज विराजमान थे, जो ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। उनसे आचार्य पद का मुहूर्त निकलवाया। क्षुल्लक जी मुहूर्त देखकर बोले - "मैंने मेरी जिंदगी में ऐसा बढ़िया मुहूर्त नहीं देखा, जो आचार्य पद दीक्षा लेने वाले के लिए और देने वाले के लिए निकला हो। बहुत ही उत्तम मुहूर्त है।" वह दिन था मगसिर कृष्ण दोज, वीर निर्वाण संवत् २४९९, विक्रम संवत् २०२९, दिनांक २२ नवम्बर १९७२, स्थान-श्री दिगम्बर जैन नसिया जी मंदिर, नसीराबाद, जिलाअजमेर, समय- प्रात: काल लगभग ९ बजे का। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का आचार्यपद से अंतिम प्रवचन जैसे कोई श्रावक (पिता) जब तक अपनी योग्य कन्या का विवाह समय पर नहीं कर देता तब तक उसे चैन नहीं रहता। उसी प्रकार आचार्य श्री ज्ञानसागरजी को पद देने से पूर्व तक चैन नहीं रहा, अत: उन्होंने उचित समय पर कन्यादान के समान अपने पद का दान किया और सब कुछ त्याग कर, समाधि जो मुख्य लक्ष्य था, उसकी ओर बढ़ गए। विशाल जनसमूह इस विस्मयकारी उत्सव को देखने के लिए उपस्थित था। आचार्य आसन पर आचार्य श्री ज्ञानसागरजी विराजमान हैं। उनके पास ही मुनि आसन पर श्रमण विद्यासागरजी विराजमान हैं। उस दिन मुनि श्री विद्यासागर जी ने उपवास किया था। आचार्य पद से आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने अंतिम उपदेश दिया, उन्होंने बहुत ही मार्मिक शब्दों में कहा - "यह नश्वर शरीर धीरे-धीरे गिरता जा रहा है और मैं अब इस पद का मोह छोड़ कर आत्म-कल्याण में पूर्णरूपेण लगना चाहता हूँ। जैनागम के अनुसार यह करना अत्यन्त आवश्यक और उचित भी है।" आचार्य पद त्याग प्रवचन के पश्चात् जैसे ही मुहूर्त का समय हुआ, वैसे ही आचार्य श्री ज्ञानसागरजी अपने आचार्य आसन से उठे और मुनि आसन पर विराजमान मुनि श्री विद्यासागर को उठाकर अपने आचार्य आसन पर बिठाया। वे स्वयं मुनि आसन पर विराजमान हो गए। तत्पश्चात् उन्होंने आगमानुसार भक्तिपाठ आदि करते हुए, मुनि श्री विद्यासागर जी के ऊपर आचार्य पद के संस्कार किए। संस्कार करने के बाद आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपनी आचार्य पिच्छी मुनि श्री विद्यासागर जी को प्रदान की। स्वयं अपने मुनि आसन से नीचे उतरे और नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर को त्रयभक्ति पूर्वक नमोस्तु किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अत्यन्त विनम्र भाव से नग्रीभूत होकर मुनि श्री ज्ञानसागर जी को प्रति नमोस्तु निवेदित किया। उसी समय मुनिश्री ज्ञानसागर जी ने नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की तीन प्रदक्षिणा लगाई। यह दृश्य देखने लायक था। उसके बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी का आचार्य पद से प्रथम प्रवचन हुआ उन्होंने एकत्व विभक्त के ऊपर बहुत अच्छा प्रवचन दिया। आचार्य आसन पर किया प्रतिष्ठित आचार्य पद प्राप्त करने के पश्चात् आचार्य विद्यासागरजी अपने पूर्व स्थान पर बैठने लगे, तो मुनि श्री ज्ञानसागरजी आचार्य आसन की ओर संकेत करते हुए बोले "विद्यासागरजी ! क्या आचार्य आसन रिक्त रहेगा ? मैं अपना पद परित्याग कर चुका हूँ, आप यथास्थान बैठिएगा।" इस प्रकार उन्होंने विद्यासागरजी को आचार्य आसन पर बैठाया और स्वयं विद्यासागरजी के स्थान पर जाकर बैठ गए। ....और वे गदगद हो गए मुनि आसन पर बैठकर आचार्य महाराज (मुनिश्री ज्ञानसागर जी) गदगद हो गए। उनके चेहरे पर मुस्कान थी, क्योंकि वे आत्मसंस्कार के साथ सल्लेखना काल को स्वीकार कर रहे थे। उसके लिए वे निश्चिन्त हो गए थे। उन्हें हँसते हुए देख हम भी कुछ सोचकर हँसने लगे, तब गुरु महाराज ने मुझसे पूछा-"आप क्यों हँस रहे हैं ?" हमने कहा "जैसे आपने हँसते-हँसते आचार्य पद का त्याग किया है, वैसे ही मैं भी एक दिन हँसते हॅसते इस आचार्य पद का त्याग करूंगा, और ऐसे ही विकल्प रहित, उत्साह पूर्वक जीवन का उपसंहार करूंगा, यह विचार कर हँस रहा हूँ।" नवोदित आचार्य को बनाया अपना नियपिकाचार्य आचार्य श्री विद्यासागर जी गंभीर मुद्रा में आचार्य आसन में विराजमान थे। उनके हृदय में तरंगित भावनाओं को अभिव्यक्त करना कल्पनातिरेक होगा। कुछ क्षण पश्चात् मुनि श्री ज्ञानसागर जी उठे और आचार्य श्री विद्यासागरजी को नमन करते हुए बोले- "हे आचार्यश्री! मैं आपके आचार्यत्व में सल्लेखना लेना चाहता हूँ मुझे समाधिमरण की अनुमति प्रदान कीजिए।" मैं आपको निर्यापकाचार्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। आप मुझे अपना क्षपक बना लीजिए। मुनि श्री ज्ञानसागर जी द्वारा समाधिमरण की भावना व्यक्त करने पर उपस्थित विद्वानों, श्रेष्ठी, साधकों एवं श्रावकों की आँखें अश्रुपूरित हो उठीं। गुरु की वाणी सुनकर आचार्य श्री विद्यासागरजी विस्मित थे, उनका हृदय करुणा से विगलित हो उठा। इस तरह २२ नवम्बर, १९७२ को नसीराबाद स्थित सेठ जी की नसिया में प्रात:काल ९ बजे बड़ी शालीनता और विनम्रता से गुरु ने शिष्य को आचार्य पद प्रदान किया। ८२ वर्षीय गुरुदेव आचार्य ज्ञानसागर ने २६ वर्षीय अपने सुयोग्य शिष्य को आचार्य पद एवं निर्यापकाचार्य का दायित्व सौंपा ॥ यह सब देखकर जन समूह स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी उस दिन से लेकर फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक अर्थात् चार माह तक मात्र दूध, गेहूँ और जल ये तीन चीजें ही आहार में ग्रहण करते थे। कथनी-करनी में एकरूपता कार्यक्रम समापन के पश्चात् सर सेठ भागचंद्र जी सोनी, अजमेर (राजस्थान) ने लौटते समय आचार्य ज्ञानसागरजी से अजमेर पधारने की प्रार्थना की, तो गुरुवर मुस्कराने लगे। उनकी भक्ति और भोलेपन पर। और बोले - "भागचंद्रजी ! आप किससे अनुरोध कर रहे हैं। मैं अब संघ में मुनि हूँ, आचार्य नहीं। आप आचार्य विद्यासागरजी से चर्चा कीजिए।" मान मर्दन का अनूठा उदाहरण आचार्य पदारोहण देखने के बाद छगनलाल पाटनी जब अजमेर आए, तब अजमेर नसिया में विराजमान आर्यिका श्री विशुद्धमति माता जी ने श्रावक श्रेष्ठी पाटनी जी से आचार्य पद त्याग का आँखों देखा प्रसंग सुना। तब माता जी बोलीं - "ऐसा रिकॉर्ड हजारों वर्षों में नहीं मिलता, जो अपने शिष्य को आचार्य बनाकर स्वयं शिष्य बन जाए। इतना मान मर्दन करना बहुत ही कठिन है, जो कि अपने शिष्य को नमस्कार करे। धन्य हैं महाराज ज्ञानसागरजी।" दायित्व सौंपने की अनूठी कला काल का क्रम कभी रुकता नहीं। वह निरंतर प्रवाहमान है। चतुर्दशी का पावन पर्व आया। पूरे संघ ने उपवास के साथ पाक्षिक प्रतिक्रमण किया। प्रतिक्रमण के बाद आचार्य भक्ति करके नवोदित आचार्य की चरण वंदना की गई। यह दृश्य आश्चर्यकारी होने के साथ ही आनन्ददायक भी था। क्षपक मुनि श्री ज्ञानसागरजी ने अपने स्थान से उठकर आचार्य श्री विद्यासागरजी के चरणों में अपना मस्तक रख दिया। दोनों हाथों से नियपिकाचार्य जी के दोनों चरण कमलों को तीन बार स्पर्श किया और नवोदित आचार्य के चरण स्पर्श से पवित्रित अपने दोनों हाथों को प्रत्येक बार अपने सिर पर लगाते रहे। फिर आचार्य गुरुदेव के सामने नीचे धरती पर बैठकर गवासन की मुद्रा में प्रायश्चित हेतु प्रार्थना की। संस्कृत भाषा में ही प्राय: गुरु शिष्य की बातें होती थीं। वह बोले - "भी गुरुदेव! अस्मिन् पक्षे मम अष्टाविंशति - मूलगुणेषु.मा प्रायश्चितं दत्त्वा शुद्धि कुरुकुरु।" इस प्रकार प्रायश्चित का निवेदन करते हुए उन्होंने निर्यापकाचार्य श्री विद्यासागरजी के दोनों हाथ पकड़कर अपने सिर पर रख लिये, आचार्य विद्यासागर मौन मध्यस्थ बने रहे। संघस्थ साधु मुनि श्री विवेकसागरजी महाराज कुचामन सिटी, राजस्थान से चातुर्मास वर्षायोग सम्पन्न करके विहार करते हुए अपने दीक्षा गुरु क्षपक श्री ज्ञानसागरजी एवं नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के दर्शनार्थ नसीराबाद, अजमेर, राजस्थान पधारे थे। वह भी अपने स्थान से उठकर खड़े हुए और दोनों गुरुओं के श्रीचरणों में बैठकर विनयपूर्वक नमोऽस्तु निवेदन किया। उन्होंने भी अपने दीक्षा गुरु ज्ञानसागरजी का अनुकरण करते हुए पहले आचार्य विद्यासागरजी का चरणवंदन किया। पश्चात् स्वगुरु ज्ञानसागरजी के चरणों का वंदन किया। फिर हिन्दी भाषा में ही अपने गुरु से प्रायश्चित का निवेदन किया कि दीक्षा के बाद से अब तक जो भी अट्ठाईस मूलगुणों में दोष लगे हों, आप प्रायश्चित देकर मुझे शुद्ध करने की कृपा करें। तब क्षपक श्री ज्ञानसागरजी ने अपने ही द्वारा दीक्षित शिष्य मुनि विवेकसागरजी से कहा - "मैंने भी आपके सामने ही इन्हीं आचार्य महाराज से प्रायश्चित देने हेतु प्रार्थना की है। अब आप भी इन्हीं से निवेदन कीजिये।" तब श्री विवेकसागरजी महाराज ने नवोदित आचार्य महाराज से विनयपूर्वक निवेदन किया कि मुझे भी प्रायश्चित प्रदान करने की अनुकम्पा करें। ऐसा निवेदन करने पर आचार्य श्री ने पहले क्षपक श्री ज्ञानसागरजी को पाक्षिक प्रतिक्रमण के प्रायश्चित के रूप में ११ मालाएँ जपने का और श्री विवेकसागरजी को पाँच उपवास और ५१ मालाएँ जपने का प्रायश्चित सबके सामने दिया। फिर संघ के ऐलक जी, क्षुल्लक जी आदि अन्य त्यागीगण ने भी पाक्षिक प्रायश्चित नवोदित आचार्य महाराज से ग्रहण किया। सबको सात सात मालाएँ जपने का प्रायश्चित मिला। उपसंहार गुरु जी के बारे में सुनाना औपचारिकता जैसा लगता है। गुरु के बारे में कहना है तो उसका कोई अंत है ही नहीं। वह अनंत को कहना है। उनके विषय में कैसे स्तुति मैं कर सकता हूँ परन्तु कहने से आस्था बलवती हो जाती है। चाँद को देखूँ परिवार से घिरा सूर्य संत सा। रात को चाँद अकेला नहीं रहता, तारामंडल उसके चारों ओर बिखरा हुआ रहता है। ताराओं में चंद्रमा को ताराचंद भी कहते हैं। किन्तु दिन में जब सूर्य को देखते हैं तो वह किसी से भी नहीं घिरा रहता है। सूर्य के सिवाय और कोई परिग्रह से, परिवार से रहित नजर नहीं आता। इसी तरह गुरुजी को मैं सूर्य की तरह मानता हूँ, पर आपको चंद्रमा पसंद है इसलिए गुरुजी को चंद्रमा कहता हूँ। यदि सूर्य धरती को न तपाये अपने तेज से, तो वर्षा प्रारंभ नहीं होती। सूर्य नारायण की बदौलत हम सब आज खा-पी रहे हैं। सूर्य की तरह गुरुजी ने यदि हमको न तपाया होता, तो आज तक हम ठण्डे पड़ जाते। मन का काम नहीं करना। मन से काम करोगे, तो उनको और हमको भी समझ पाओगे। आज के दिन एक उच्च साधक ने अपने जीवन की अंतिम दशा में अपनी यात्रा को पूर्ण करने के लिए पूर्व भूमिका बनाई। "मैं आज के इस दिवस को आचार्य पद त्याग के रूप में स्वीकार करता हूँ, ग्रहण के रूप में नहीं।" आचार्य पद कार्य करने की अपेक्षा से महत्वपूर्ण होता है, आसन पर बैठने की अपेक्षा से नहीं। "गुरु महाराज ने आज आचार्यपद त्याग किया था, यह महत्वपूर्ण है। पद ग्रहण करना महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि ग्रहण करना हमारा स्वभाव नहीं त्याग करना हमारा स्वभाव है।" आचार्य पदारोहण दिवस पर आचार्य श्री के प्रवचन - मेरा लक्ष्य तो मेरे गुरु का अनुकरण करना है। ये तो सब व्यवहार के पद हैं। गुरु और शिष्य आगे पीछे दोनों में अंतर कहाँ
  5. परम पूज्य आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज जी के परम शिष्य मुनिश्री नियम सागर जी महाराज जी के दीक्षा दिवस के अवसर पर मुनिश्री के चरणों में शत् शत् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु?????????? एवं आप सभी को इस पावन दिन कि बधाईयाँ और शुभकामनाएं ?????
  6. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: व्रती डॉ. मोनिका सुहास शहा
  7. संयम स्वर्ण महोत्सव

    दर दर भटकने की -

  8. अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर की दार्शनिक पीठिका पर अनेक जैनाचायों ने समय-समय पर जीवन विज्ञान से सम्बन्धित अनेकविध काव्य, कलाविधाओं से संपोषित साहित्य रचकर भारतीय संस्कृति की विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दी है। प्रेरणा - मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी ससंग प्रसतुति- क्षुल्लक धैर्यसागर उसी परम्परा में २०वीं-२१वीं शताब्दी के साहित्य जगत में एक नये उदीयमान नक्षत्र के रूप में जाने-पहचाने जाने वाले शब्दों के शिल्पकार, अपराजेय साधक, तपस्या की कसौटी, आदर्श योगी, ध्यानध्याता-ध्येय के पर्याय, कुशल काव्य शिल्पी, प्रवचन प्रभाकर, अनुपम मेधावी, नवनवोन्मेषी प्रतिभा के धनी, सिद्धांतागम के पारगामी, वाग्मी, ज्ञानसागर के विद्याहंस, प्रभु महावीर के प्रतिबिंब, महाकवि, दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागरजी की आध्यात्मिक छवि के कालजयी दर्शन, दर्शक को आनंद से भर देता है। सम्प्रदाय मुक्त भक्त हो या दर्शक, पाठक हो या विचारक, अबाल-वृद्ध, नर-नारी उनके बहुमुखी चुम्बकीय व्यक्तित्व-कृतित्व को आदर्श मानकर उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारकर अपने आपको धन्य मानते हैं। माता-पिता की द्वितीय सन्तान किन्तु अद्वितीय कन्नड़ भाषी बालक विद्याधर की होनहार छवि को देख पिताजी ने कन्नड़ भाषा के विद्यालय में पढ़ाया। हिन्दीअंग्रेजी भी सीखी, आत्मा के दिव्य आध्यात्मिक संस्कारवयवृद्धि के साथ-साथ स्वयं जागृत होने लगे। ९ वर्ष की उम्र में जैनाचार्य शान्तिसागर जी के कथात्मक प्रवचनों से वैराग्य का बीजारोपण हुआ और धर्म-अध्यात्म में रुचि बढ़ती गई तथा २० वर्ष की उम्र में घर-परिवार के परित्याग का कठिन असिधारा व्रत ले निकल पड़े शाश्वत सत्य का अनुसन्धान करने के लिए। १९९९, गोम्मटगिरी, इन्दौर राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले के उपनगर मदनगंज-किशनगढ़ में सन् १९६७ मई/जून माह में नियति ने भ्रमणशील पगथाम लिए और पुरुषार्थी युवा ब्रह्मचारी गौरवणीं ज्ञानपिपासु विद्याधर अष्टगे को मिला दिया ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण महाकवि ज्ञानसागर जी महामुनिराज से। गुरुभक्ति-समर्पण से गुरुकृपा का प्रसाद पाकर ३0 जून १९६८ को अजमेर में सर्व पराधीनता को छोड़ दिगम्बर मुनि बनकर शाश्वत सत्य की अनुभूति में तपस्यारत हो गए। जो धरती/काष्ठ के फलक पर आकाश को ओढ़ते हैं। यथाजात बालकवत् निर्विकरी, अनियत विहारी, अयाचक वृत्ति के धनी, भक्तों के द्वारा दिन में एक बार दिया गया बिना नमक-मीठे के, बिना हरी वस्तु के, बिना फलमेवे के सात्विक आहार दान ही लेते हैं, वो भी मात्र ज्ञानध्यान-तप-आराधना के उद्देश्य से। अहिंसा धर्म की रक्षार्थ अहर्निश सजग, करुण हृदयी मुनिवर श्री जी संयम उपकरण के रूप में सदा कोमल मयूर पिच्छी साथ रखते हैं, जिससे अपनी क्रियाओं में मृदु परिमार्जन करके जीवदया पालन से सह-अस्तित्व का आदर्श उपस्थित कर रहे हैं एवं शुचिता हेतु नारियल के कमण्डल के जल का उपयोग करते हैं, इसके अतिरिक्त तृणमात्र परिग्रह भी नहीं रखते। आपकी स्वावलम्बी, निर्मोही,समता ,सरलता सहिष्णुता की पराकाष्ठा के जीवन्त दर्शन प्रत्येक दो माह में दाढ़ी-मूछ-सिर के केशों को हाथों से घास-फ्रेंस के समान उखाड़कर अलग करते हुए होते हैं। आप अस्नानव्रत संकल्पी होने के बावजूद, ब्रह्मचर्य की तपस्या से आपने तन-मनवचन सदा पवित्र-सुगन्धित दैदीप्यमान रहते हैं। १९९९, गोम्मटगिरी इन्दौर-श्रीमान् अटल बिहारी बाजपेयी पूर्व प्रधानमंत्री, भारत सरकार एवं सांसद (वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष) सुमित्रा महाजन आपकी साधना-ज्ञान-ध्यान-चिन्तन गुरु के द्वारा दिए गए नाम-पद के सार्थक संज्ञा के पर्याय बन गए हैं। अलौकिक कृतित्व :- ऐसे दिव्य आचार-विचार-मधुर व्यवहार से आचार्य शिरोमणि की जीवन रूपी किताब का हर पन्ना स्वर्णिम भावों एवं शब्दों से भरा हुआ है, जिसे कभी भी कहीं भी कितना ही पढ़ो व्यक्ति थकता नहीं, उनको पढ़ने वाला यही कहते पाया जाता है कि आचार्य श्री जी के दिव्य दर्शन करते वक्त नजर हटती नहीं-उठने का मन नहीं करता, ऐसा लगता है मानो प्रभु महावीर जीवन्त हो उठे हों। यही कारण है कि आपके दिव्य तेजोमय आभा मण्डल के प्रभाव से उच्च शिक्षित युवा-युवतियाँ जवानी की दहलीज पर आपश्री के चरणों में सर्वस्व समर्पण कर बैठे। जिनमें भारत के १० राज्यों के युवक-युवतियों को १२० दिगम्बर मुनि, १७२ आर्यिकाएँ (साध्वियाँ), ६४ क्षुल्लक (साधक), ३ क्षुल्लिका (साध्वियाँ), ५६ ऐलक (साधक) की दीक्षा देकर मानव जन्म की सार्थक साधना करा रहे हैं। इनके अतिरिक्त आपके निर्देशन में सहस्त्रार्ध बाल ब्रह्मचारी भाई-बहन साधना के क्रमिक सोपानों पर साधना को साध रहे हैं एवं आपश्री के नियपिकाचार्यत्व में ३0 से अधिक साधकों ने जीवन की संध्या बेला में आगमयुक्त विधि से सल्लेखना पूर्वक समाधि धारण कर जीवन के उद्देश्य को सार्थक किया है। महापुरुष का सार्वभौमिक कृतित्व :- ज्ञान-ध्यान-तप के यज्ञ में आपने स्वयं को ऐसा आहूत किया कि अल्पकाल में ही प्राकृत-संस्कृत-अपभ्रंशहिन्दी-अंग्रेजी-मराठी-बंगाली-कन्नड़ भाषा के मर्मज्ञ साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध हो गए। (I)आपने प्राचीन जैनाचायों के २५ प्राकृत-संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी भाषा में पद्यानुवाद कर पाठक को सरसता प्रदान की है १.समयसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद २.प्रवचनसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ३.नियमसार (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ४.पञ्चास्तिकाय (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामीकृत) पद्यानुवाद ५.अष्टप्पाहुड(प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामी कृत) पद्यानुवाद ६.बारसाणुवेक्खा (प्राकृत आ.कुन्दकुन्दस्वामी कृत) पद्यानुवाद ७.समयसार कलश (संस्कृत, अमृतचंदाचार्यकृत) पद्यानुवाद ८.इष्टोपदेश प्र.(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) बसंततिलका पद्यानुवाद ९.इष्टोपदेश द्वि.(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत)ज्ञानोदय पद्यानुवाद १o.समाधिशतक (संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) पद्यानुवाद ११.नव भक्तियाँ(संस्कृत,आ. पूज्यपादकृत) पद्यानुवाद १२.स्वयंभूस्त्रोत(संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १३.रत्नकरण्डक श्रावकाचार (संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १४.आप्त मीमांसा(संस्कृत,आ. समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १५.आप्तपरीक्षा (संस्कृत,आ.समन्तभद्रकृत) पद्यानुवाद १६.द्रव्यसंग्रह प्र.(प्राकृत,आ.नेमिचन्द्र कृत) बसंततिलका पद्यानुवाद १७.द्रव्यसंग्रह द्वि.(प्राकृत, आ.नेमिचन्द्रकृत) ज्ञानोदय पद्यानुवाद १८.गोम्मटेश अष्टक(प्राकृत,आ.नेमिचन्द्रकृत) पद्यानुवाद १९.योगसार (अपभ्रंश,आ.योगेन्द्रदेवकृत) पद्यानुवाद २0.समणीसुत (प्राकृत,संस्कृत,जिनेन्द्रवर्णीद्वारा संकलित) पद्यानुवाद २१.कल्याणमन्दिर स्तोत्र (संस्कृत,आ.कुमुदचन्द्रकृत) पद्यानुवाद २२.एकीभाव स्तोत्र (संस्कृत,आ.वादीराज कृत) पद्यानुवाद २३.जिनेन्द्र स्तुति (संस्कृत,पात्र केसरी कृत) पद्यानुवाद २४.आत्मानुशासन (संस्कृत, आ.गुणभद्रकृत) पद्यानुवाद २५.स्वरूप सम्बोधन (संस्कृत,आ. अकलंक कृत) पद्यानुवाद (II)आपने राष्ट्रभाषा हिन्दी में प्रेरणादायक युगप्रवर्तक महाकाव्य 'मूकमाटी' का सर्जन कर साहित्य जगत् में चमत्कार कर दिया है। जिसे साहित्यकार 'फ्यूचर पोयट्री' एवं श्रेष्ठ दिग्दर्शक के रूप में मानते हैं। विद्वानों का मानना है कि भवानी प्रसाद मिश्र को सपाटबयानी, अज्ञेय का शब्द विन्यास, निराला की छान्दसिक छटा, पन्त का प्रकृति व्यवहार, महादेवी की मसृष्ण गीतात्मकता, नागार्जुन का लोक स्पन्दन, केदारनाथ अग्रवाल की बतकही वृत्ति, मुक्तिबोध की फैंटेसी संरचना और धूमिल की तुक संगति आधुनिक काव्य में एक साथ देखनी हो तो वह'मूकमाटी' में देखी जा सकती है। ५ नवंबर, २oo३ अमरकंटक-माननीय भैरोसिंह शेखावत, उपराष्ट्रपति, भारत सरकार १४/१o/२o१६, भोपाल-श्रीमान् नरेन्द्र मोदी जी, वर्तमान प्रधानमंत्री, भारत सरकार सम्प्रति साहित्य जगत् 'मूकमाटी' महाकाव्य को नये युग का महाकाव्य के रूप में समादृत करता है। यही कारण है कि 'मूकमाटी' महाकाव्य के दो अंग्रेजी रूपान्तरण, दो मराठी रूपान्तरण, एक कन्नड़, एक बंगला, एक गुजराती रूपान्तरण हो चुका है एवं उर्दू व जापानी भाषा में अनुवाद का कार्य चल रहा है। प्राकृत महाकाव्य पर अनेकों स्वतन्त्र आलोचनात्मक ग्रन्थों के अतिरिक्त ४ डी.लिट्, २२ पी.एच. डी., ७ एम.फिल के शोधप्रबन्ध तथा २ एम. एड. और ६ एम.ए. के लघु शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके/रहे हैं। इस कालजयी कृति पर अब तक भारत के विख्यात ३०० से अधिक समालोचकों ने आलोडन-विलोडन किया है तथा उस अपूर्व साहित्यिक सम्पदा को प्रसिद्ध विद्वान डॉ. प्रभाकर माचवे एवं आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के सम्पादकत्व में 'मूकमाटी मीमांसा' नामक ग्रन्थ के रूप में पृथक्पृथक् तीन खण्डों में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन ने प्रकाशित किए हैं। (III)आपने नीति-धर्म-दर्शन-अध्यात्म विषयों पर संस्कृत भाषा में ७ शतकों और हिन्दी भाषा में १२ शतकों का सर्जन किया है, जो पृथक्-पृथक् एवं संयुक्त रूप से प्रकाशित हुए हैं संस्कृत शतकम्- १.श्रमण शतकम् २.निरंजन शतकम् ३.भावना शतकम् ४.परीषहजय शतकम् ५.सुनीति शतकम् ६.चैतन्य चन्द्रोदय शतकम् ७.धीवरोदय शतकम् ९.पूर्णीदय शतक ८.सूर्योदय शतक ९.सर्वोदय शतक १०.जिनस्तुति शतक हिन्दी शतक- १.निजानुभव शतक २.मुक्तक शतक ३.श्रमण शतक ४.निरंजन शतक ५.भावना शतक ६.परीषहजय शतक ७.सुनीति शतक ९.दोहदोहन शतक १०.पूर्णोदय शतक ११.सूर्योदय शतक १२.सर्वोदय शतक १३.जिन्स्तुति शतक (IV)आपके शताधिक अमृत प्रवचनों के ५० संग्रह ग्रन्थ भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं एवं त्रिसहस्राधिक प्रवचनावली अप्रकाशित हैं। (V)आपके द्वारा विरचित हिन्दी भाषा में लघु कविताओं के चार संग्रह ग्रन्थ-"नर्मदा का नरम ककर, तोता क्यों रोता, डूबोमत लगाओ डुबकी, चेतना के गहराव में" ये प्रकाशित कृतियाँ साहित्य जगत् में काव्य सुषमा को विस्तारित कर रही हैं। (VI)आपने संस्कृत, हिन्दी के अतिरिक्त कन्नड़, बंगला, अंग्रेजी, प्राकृत भाषा में भी काव्य रचनाओं का सर्जन किया है। साथ ही 'आचार्य शान्तिसागर जी, आचार्यजी' की परिचयात्मक स्तुतियों की रचना एवं संस्कृत, हिन्दी में शारदा स्तुति की रचना की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जी मोदी, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री श्रीमान् शिवराज सिंह जी चौहान एवं रक्षामंत्री श्रीमान् मनोहर पर्रीकर (VII)आपने जापानी छन्द की छायानुसार सहस्राधिक हाईकू (क्षणिकाओं) का सर्जन कर साहित्य क्षेत्र में अपनी अनोखी प्रतिभा के प्रातिभ से परिचय कराया है। राष्ट्रीय विचार सम्प्रेरक और सम्पोषक के रूप में प्रसिद्ध आचार्य श्री जी ने अपने विचारों से, भारती संस्कृति के गौरव को बढ़ाया है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, गुजरात आदि प्रदेशों की लगभग ५० हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर राष्ट्रीयता एवं मानवता की पहरेदारी में कदमदर-कदम आदर्श पदचिहों को स्थापित किया है। आपकी अनेकान्ती स्याद्वादमयी वाणी सम्प्रेरित करती है-(क) भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति लागू हो। (ख) अंग्रेजी नहीं भारतीय भाषा में हो व्यवहार। (ग) छात्र-छात्राओं की शिक्षा पृथक्पृथक् हो। (घ) विदेशी गुलामी का प्रतीक 'इण्डिया' नहीं, हमें गौरव का प्रतीक ' भारत' नाम देश का चाहिए। (ड) नौकरी नहीं व्यवसाय करो। (च) चिकित्सा : व्यवसाय नहीं सेवा है। (छ) स्वरोजगार को सम्वद्धित करो। (ज) बैंकों के भ्रमजाल से बचो और बचाओ। (झ) खेतीबाड़ी सर्वश्रेष्ठ। (ज) हथकरघा स्वावलम्बी बनने का सोपान। (ट) भारत की मर्यादा साड़ी। (ठ) गौशालाएँ जीवित कारखाना। (ड) माँस निर्यात देश पर कलंक। (ढ़) शत-प्रतिशत मतदान हो। (ण) भारतीय प्रतिभाओं का निर्यात रोका जाए, आदि। उपरोक्त ज्वलन्त प्रासंगिक विषयों पर जब आपकी दिव्य ओजस्वी वाणी प्रवचन सभा में शंखनाद करती है तब सहस्रों श्रोतागण करतल ध्वनि के साथ विस्तृत पाण्डाल को जयकारों से गुंजायमान कर पूर्ण समर्थन कर परिवर्तन चाहते हैं। अहिंसा के पुजारी आचार्य श्री का दयालु हृदय तब सिसक-सिसक उठा जब उन्होंने देखा कृषि प्रधान अहिंसक देश में गौवंश आदि पशुधन को नष्ट कर माँस निर्यात किया जा रहा है तब उन्होंने हिंसा के ताण्डव के बीच अहिंसा का शंखनाद किया गोदाम नहीं-गौधाम चाहिए। भारत अमर बने- अहिंसा नाम चाहिए। घी-दूध-मावा निर्यात करो। राष्ट्र की पहचान बने ऐसा काम चाहिए। जो हिंसा का विधान करे, वह सच्चा संविधान सार नहीं। जो गौवंश काट माँस निर्यात करे, वह सच्ची सरकार नहीं। (१)अहिंसा के विचारों को साकार रूप देने के लिए आपने प्रेरणा दी-आशीवाद प्रदान किया। फलस्वरूप भारत के पाँच राज्यों में ७२ गौशालाएँ संचालित हुई जिनमें अद्यावधि एक लाख से अधिक गौवंश को कत्लखानों में कटने से बचाया गया। (२)प्रदूषण के युग में बीमारियों का अम्बार और व्यावसायिक चिकित्सा के विकृत स्वरूप के कारण गरीब मध्यम वर्ग चिकित्सा से वंचित रहने लगा तो इस अव्यावहारिक परिस्थिति से आहत-दयाद्र आचार्य श्री की पावन प्रेरणा से सागर (म.प्र.) में ‘‘ भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ चिकित्सालय' की स्थापना हुई। प्रतिभास्थली, जबलपुर (३)सुशासन-प्रशासन के लिए सर्वोदयी राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत आचार्य श्री जी की लोकमंगल दायी प्रेरणा से पिसनहारी मढ़ियाजी जबलपुर एवं दिल्ली में ‘प्रशासनिक प्रशिक्षण केन्द्र" की स्थापना हुई। हथकरधा (४)बालिका शिक्षा ने जोर पकड़ा किन्तु व्यावसायिक संस्कार विहीन शिक्षण ने युवतियों को दिग्भ्रमित कर कुल-परिवार-समाज-संस्कृति के संस्कारों से रहित सा कर दिया। ऐसी दु:खदायी परिस्थिति को देख आचार्य श्री जी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से देश-समाज के समक्ष आधुनिक एवं संस्कारित शिक्षा के तीन आदर्श विद्यालय स्थापित किए गए-'प्रतिभा स्थली', जबलपुर (म.प्र.), डोंगरगढ़ (छ.ग.), रामटेक (महाराष्ट्र)। इसके अतिरिक्त जगह-जगह छात्रावास स्थापित किए गए जिनमें (५)गरीब एवं विधवाओं की तंगस्थिति देख करुणाशील आचार्य श्री जी की सुप्रेरणा से जबलपुर (म.प्र.) में लघु उद्योग 'पूरी मैत्री'संचालित किया गया। (६)विदेशी कम्पनियों के मकड़जाल ने स्वदेशी उद्योगों को समाप्त किया, फलितार्थ करोड़ों लोग बेरोजगार हुए और उनके समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हुआ। देश का जीवन विपत्तीग्रस्त अशांत, दु:खी देख, आचार्य श्री जी द्रवीभूत हो उठे और गाँधी जी के द्वारा सुझाये गये स्वदेशी अहिंसक आजीविका 'हथकरघा' की प्रेरणा दी जिससे समाज ने महाकवि पं. भूरामल समाजिक सहकार न्यास हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्र की अनेकों स्थानों पर शाखाएँ अशोकनगर, भोपाल आदि प्रमुख हैं तथा आचार्य ज्ञानविद्या लोक कल्याण हथकरघा केन्द्र मुंगावली के अन्तर्गतः मुंगावली, गुना, आरोन आदि स्थानों पर हथकरघा शाखाएँ खोली गई। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुरजी दमोह (म.प्र.) में बड़े बाबा का निर्माणाधीन विशाल भव्य मन्दिर 1.आचार्यश्री जी की दूरदर्शिता ने जैन संस्कृति को हजारों-हजार साल के लिए जीवित बनाए रखने हेतु प्राचीन मन्दिरों की पाषाण निर्मित शैली को ही अपनाने की बात कही। आचार्य भगवन् के ऐतिहासिक सांस्कृतिक चिंतन से प्रभावित होकर उनकी प्रेरणा से अनेक स्थानों की समाजों ने पाषाण से भव्य विशाल जिनालयों के निर्माण हेतु आचार्यश्री जी के ही पावन सान्निध्य में शिलान्यास किए १.गोपालगंज, जिला-सागर (म.प्र.) २.सिलवानी, जिला-रायसेन (म.प्र.) ३.टड़ा, जिला-सागर (म.प्र.) नवनिर्मित सर्वोदय तीर्थक्षेत्र, अमरकंटक (म.प्र.) ४.नेमावर, जिला–देवास (म.प्र.) ५.हबीबगंज, भोपाल (म.प्र.) ६.तेंदूखेड़ा,जिला-दमोह (म.प्र.) ७.देवरी कलौं, जिला-सागर (म.प्र.) ८.रामटेक, जिला-नागपुर (महा.) ९.इतवारी,नागपुर (महा.) १०.विदिशा (म.प्र.) ११.नक्षत्र नगर, जबलपुर (म.प्र.) १२.डिंडोरी (म.प्र.) नवनिर्मित सर्वोदय तीर्थक्षेत्र, अमरकंटक (म.प्र.) 2.इसके अतिरिक्त आवश्यकतानुसार समय की माँग को देखते हुए कई नए तीर्थों की परिकल्पना को आचार्यश्री जी ने मूर्तस्वरूप प्रदान करने हेतु प्रेरणा एवं आशीर्वाद प्रदान किया। फलस्वरूप नए तीर्थों का जन्म हुआ १.सर्वोदय तीर्थ, अमरकंटक, जिला-शहडोल (म.प्र.) २.भाग्योदय तीर्थ, सागर (म.प्र.) ३.दयोदय तीर्थ, जबलपुर (म.प्र.) ४.सिद्धक्षेत्र सिद्धोदय, नेमावर, जिला-देवास (म.प्र.) ५.अतिशय क्षेत्रचन्द्रगिरि, डोगरगढ़ (छ.ग.) 3.आचार्य भगवन् ने जिन तीर्थों पर चातुर्मास, ग्रीष्मकालीन या शीतकालीन प्रवास किया। वहाँ पर जीर्णशीर्ण मन्दिरों का जीणों द्वार कराया १.अतिशय तीर्थक्षेत्र कोनी जी, जिला-जबलपुर (म.प्र.) २.सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर,जिला-दमोह (म.प्र.) ३.अतिशय तीर्थक्षेत्र बीना जी बारहा, सागर (म.प्र.) ४.अतिशय तीर्थक्षेत्र पटनागंज, रहली, सागर (म.प्र.) आपकी दिव्य दया के अनेकों सत्कार्य समाज में प्रतिफलित हो रहे है।
  9. संयम स्वर्ण महोत्सव

    अध्याय 3 - सृष्टि का क्रम

    सृष्टि का परिवर्तन अनादिकाल से चला आ रहा है, वह कभी रुकता नहीं है। इसमें परिवर्तन किस प्रकार से होता है। इसका वर्णन इस अध्याय में है। 1. भरत-ऐरावत क्षेत्र में सृष्टि का क्या क्रम चलता है? भरत एवं ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्डों में अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी काल के दो विभाग होते हैं। जिसमें मनुष्यों एवं तिर्यच्चों की आयु, शरीर की ऊँचाई, बुद्धि, वैभव आदि घटते जाते हैं, वह अवसर्पिणी काल कहलाता है एवं जिसमें आयु, शरीर की ऊँचाई, बुद्धि, वैभव आदि बढ़ते जाते हैं वह उत्सर्पिणी काल कहलाता है। 2. एक कल्पकाल कितने वर्षों का होता है? 20 कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। जिसमें 10 कोड़ाकोड़ी सागर का अवसर्पिणी काल एवं 10 कोड़ाकोड़ी सागर का उत्सर्पिणी काल होता है। दोनों मिलाकर एक कल्पकाल कहलाता है। (ति.प.4/319) उदाहरण - यह क्रम ट्रेन के अप, डाउन के समान चलता रहता है। जैसे - ट्रेन बॉम्बे से हावड़ा एवं हावड़ा से बॉम्बे आती-जाती है। 3. अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी के कितने भेद हैं एवं कौन-कौन से हैं? सुषमा–सुषमा काल, सुषमा काल, सुषमा–दुःषमा काल, दुःषमा–सुषमा काल, दुःषमा काल एवं दुःषमा–दुषमा काल। ये छ: भेद अवसर्पिणी काल के हैं। इससे विपरीत उत्सर्पिणी काल के भी छ: भेद हैं। दुषमा-दुःषमा काल, दुःषमा काल, दुःषमा–सुषमा काल, सुषमा–दुःषमा काल, सुषमा काल एवं सुषमा–सुषमा काल। इन्हें दुखमा-सुखमा भी कहते हैं। 4. सुषमा-दु:षमा का क्या अर्थ है? समा काल के विभाग को कहते हैं। सु और दुर उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे के अर्थ में आते हैं। सु और दुर उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने से व्याकरण के नियमानुसारस का ष हो जाता है। अत: सुषमा और दुषमा की सिद्धि होती है। जिनके अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है।(म.पु. 3/19) 5. अवसर्पिणी के प्रथम तीन कालों में एवं उत्सर्पिणी के अन्त के तीन कालों में कौन सी भूमि रहती है एवं उसकी कौन-कौन सी विशेषताएँ हैं? उनमें भोगभूमि रहती है। विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं भोगभूमि के जीवों का आहार तो होता है किन्तु नीहार (मल-मूत्र) नहीं होता। भोग भूमियाँपुरुष 72 कलाओं सहित और स्त्रियाँ 64 गुणों से समन्वित होती है। (वसु,श्रा., 263) यहाँ के मनुष्य अक्षर, गणित, चित्र आदि64 कलाओं में स्वभाव से ही निपुण होते हैं। यहाँ विकलेन्द्रिय एवं असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव नहीं होते हैं। यहाँ दिन-रात का भेद नहीं होता एवं शीत, गर्मी की वेदना भी नहीं है। यहाँ सुन्दर-सुन्दर नदियाँ, कमलों से भरी वापिकाएँ, रत्नों से भरी पृथ्वी एवं कोमल घास होती है। युगल संतान (बेटा-बेटी) का जन्म होता है एवं इनके जन्म होते ही पिता को छींक आने से एवं माँ को जम्भाई आने से मरण हो जाता है। युगल संतान ही पति-पत्नी के रूप में रहते हैं, जिन्हें वे आपस में आर्य और आर्या कहकर पुकारते हैं। मृत्यु के बाद इनका शरीर कपूरवत उड़ जाता है। यहाँ नपुंसक वेद वाले नहीं होते हैं। मात्र स्त्री तथा पुरुष वेद होते हैं। इन्हें भोगोपभोग सामग्री कल्पवृक्षों से ही मिलती है। यहाँ के मनुष्यों में 9000 हाथियों के बराबर बल पाया जाता है। (ति.प., 4/324-381) यहाँ के मनुष्य एवं तिर्यञ्चों का वज़ऋषभनाराचसंहनन एवं समचतुरस्र संस्थान होता है। सुषमा-सुषमा काल की विशेषताएँ इस काल में सुख ही सुख होता है। यह भोगप्रधान काल है, इसे उत्कृष्ट भोगभूमि का काल कहते हैं। इस काल में जन्मे युगल 21 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जिसका क्रम इस प्रकार है। शय्या पर आँगूठा चूसते हुए 3 दिन, उपवेशन (बैठना) 3 दिन, अस्थिर गमन 3 दिन, स्थिर गमन 3 दिन, कलागुण प्राप्ति 3 दिन, तारुण्य 3 दिन और सम्यक्र गुण प्राप्ति की योग्यता 3 दिन। यहाँ के जीव 21 दिन के बाद सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। तीन दिन के बाद चौथे दिन बेर के बराबर आहार लेते हैं । इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 6000 धनुष एवं आयु 3 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 4000 धनुष एवं आयु 2 पल्य रह जाती है। यह काल 4 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है। इसमें शरीर का वर्ण स्वर्ण (रा.वा.3/29/2) के समान होता है। (ति.प.4/324-398) सुषमा काल की विशेषताएँ प्रथम काल की अपेक्षा सुख में हीनता होती जाती है। इसे मध्यम भोगभूमिका काल कहा जाता है। इस काल में जन्मे युगल 35 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे- प्रथम काल में सात प्रकार की वृद्धियों में 3-3 दिन लगते हैं तो यहाँ 5-5 दिन लगते हैं। 3.2 दिन के बाद तीसरे दिन बहेड़ा के बराबर आहार लेते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 4000 धनुष एवं आयु 2 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 2000 धनुष एवं आयु एक पल्य की रह जाती है। यह काल3 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है। इसमें शरीर का वर्ण श्वेत रंग के समान रहता है। (तप4/399-406) सुषमा-दुषमा काल की विशेषताएँ द्वितीय काल की अपेक्षा सुख में हीनता होती जाती है। इसे जघन्य भोगभूमिका काल कहते हैं। इस काल में जन्मे युगल 49 दिनों में पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे -द्वितीयकाल में 7 प्रकार की वृद्धियों में 5-5 दिन लगते हैं तो यहाँ 7-7 दिन लगते हैं। 1 दिन के बाद दूसरे दिन आंवले के बराबर आहार लेते हैं। इस काल में प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 2000 धनुष एवं आयु 1 पल्य की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 500 धनुष (त्रि.सा.783) एवं आयु 1 पूर्व कोटि की रह जाती है। यह काल 2 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है, इसमें शरीर का वर्ण नीले रङ्ग (रा.वा.3/29/2) के समान रहता है। कुछ कम पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर कुलकरों का जन्म प्रारम्भ हो जाता है। वे तब भोगभूमि के समापन से आक्रान्त मनुष्यों को जीवन जीने की कला का उपाय बताते हैं। इन्हें मनु भी कहते हैं। अन्तिम कुलकर से प्रथम तीर्थंकर की उत्पति होती है। (ति.प.4/407-516) दु:षमा-सुषमा की विशेषताएँ यह काल अधिक दु:ख एवं अल्प सुख वाला है तथा इस काल के प्रारम्भ से ही कर्मभूमि प्रारम्भ हो जाती है। कल्पवृक्षों की समाप्ति होने से अब जीवन यापन के लिए षट्कर्म प्रारम्भ हो जाते हैं। असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य ये षट्कर्म हैं। शलाका पुरुषों का जन्म एवं मोक्ष भी इसी काल में होता है। चतुर्थ काल का जन्मा पञ्चम काल में मोक्ष जा सकता है, किन्तु पञ्चम काल का जन्मा पञ्चम काल में मोक्ष नहीं जा सकता। युगल सन्तान के जन्म का नियम नहीं होना एवं माता-पिता के द्वारा बच्चों का पालन किया जाना प्रारम्भ हो जाता है। इस काल के मनुष्य प्रतिदिन (एक बार) आहार करते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 500 धनुष एवं आयु 1 पूर्व कोटि की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 7 हाथ एवं आयु 120 वर्ष की रह जाती है। यह काल 42,000 वर्ष कम 1 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है, इसमें पाँच वर्ण वाले मनुष्य होते हैं। छ: संहनन एवं छ: संस्थान वाले मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं। (त्रि.सा.,783-85) नोट - 84 लाख * 84 लाख * 1 करोड़ वर्ष = एक पूर्व कोटि वर्ष दु:षमा काल की विशेषताएँ यह काल दु:ख वाला है तथा इस काल के मनुष्य मंदबुद्धि वाले होते हैं। इस काल में मनुष्य अनेक बार (न एक इति अनेक अर्थात् दो बार को भी अनेक बार कह सकते हैं) भोजन करते हैं। इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 7 हाथ एवं आयु 120 वर्ष की होती है एवं अन्त में घटते घटते ऊँचाई 3 हाथ या 3.5 हाथ एवं आयु 20 वर्ष की रह जाती है। यह काल 21,000 वर्ष का होता है। इसमें पाँच वर्ण वाले किन्तु कान्ति से हीन युक्त शरीर होते हैं। अन्तिम तीन संहननधारी मनुष्य एवं तिर्यञ्च होते हैं। पाँच सौ वर्ष बाद उपकल्की राजा व हजार वर्ष बाद एक कल्की राजा उत्पन्न होता है। इक्कीसवाँ अन्तिम कल्की राजा जलमंथन, मुनिराज से टैक्स माँगेगा पर मुनि महाराज क्या दें? राजा कहता है प्रथम ग्रास दीजिए, मुनि महाराज दे देते हैं और जिससे पिण्डहरण नामक अन्तराय करके वापस आ जाते हैं। वे अवधिज्ञान से जानलेते हैं कि अब पञ्चम काल का अन्त है। तीन दिन की आयु शेष है। चारों (वीरांगज मुनि, सर्वश्री आर्यिका, अग्निल श्रावक, पंगुश्री श्राविका) सल्लेखना ग्रहण कर लेते हैं। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रात:काल शरीर त्यागकर सौधर्मस्वर्ग में देव होते हैं, मध्याह्न में असुरकुमारदेव धर्म द्रोही कल्की को समाप्त कर देता है और सूर्यास्त के समय अग्नि नष्ट हो जाती है। इस प्रकार पञ्चम काल का अन्त होता है। (ति.प.,4/1486-1552) नोट- प्रत्येक कल्की के समय एक अवधिज्ञानी मुनि नियम से होते हैं। दु:षमा-दु:षमा काल की विशेषताएँ यह काल दु:ख ही दु:ख वाला है तथा इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 3 हाथ या 3.5 हाथ एवं आयु 20 वर्ष की होती है एवं अन्त में घटते-घटते ऊँचाई 1 हाथ एवं आयु 15 या 16 वर्ष रह जाती है। यह काल भी 21,000 वर्ष का होता है। इसमें शरीर का रङ्ग धुएँ के समान काला होता है। इस काल के मनुष्यों का आहार बारम्बार कंदमूल फल आदि होता है। सब नग्न और भवनों से रहित होकर वनों में घूमते हैं। इस काल के मनुष्य प्राय: पशुओं जैसा आचरण करने वाले क्रूर, बहरे, अंधे, गूंगे, बन्दर जैसे रूप वाले और कुबड़े बौने शरीर वाले अनेक रोगों से सहित होते हैं। इस काल में जन्म लेने वाले नरक व तिर्यञ्चगति से आते हैं एवं मरण कर वहीं जाते हैं। इस काल के अन्त में संवर्तक (लवा) नाम की वायु, पर्वत, वृक्ष और भूमि आदि को चूर्ण करती हुई दिशाओं के अन्त पर्यन्त भ्रमण करती है, जिससे वहाँ स्थित जीव मूछिंत हो जाते हैं और कुछ मर भी जाते हैं। इससे व्याकुलित मनुष्य और तिर्यञ्च शरण के लिए विजयार्ध पर्वत और गङ्गा-सिंधु की वेदी में स्वयं प्रवेश कर जाते हैं तथा दयावान् विद्याधर और देव,मनुष्य एवं तिर्यञ्चों में से बहुत से जीवों को वहाँ ले जाकर सुरक्षित रख देते हैं। (त्रि सा., 865) इसके पश्चात् क्रमश: 7-7 दिन तक 7 प्रकार की कुवृष्टि होती है। उस समय गंभीर गर्जना से सहित मेघ तुहिन (ओला), क्षार जल,विष, धूम, धूलि, वज़ एवं जलती हुई दुष्प्रेक्ष्य ज्वाला की 7-7 दिन वर्षा होती है अर्थात्कुल 49 दिन तक वर्षा होती है। अवशेष रहे मनुष्य उन वर्षाओं से नष्ट हो जाते हैं। विष एवं अग्नि की वर्षा से दग्ध हुई पृथ्वी 1 योजन तक (मोटाई में) चूर्ण हो जाती है। इस प्रकार 10 कोड़ाकोड़ी सागर का यह अवसर्पिणी काल समाप्त हो जाता है। उसके बाद उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ में सुवृष्टि प्रारम्भ होने से नया युग प्रारम्भ हो जाता है। उत्सर्पिणी के प्रथम काल में मेघों द्वारा क्रमश: जल, दूध, घी, अमृत, रस (त्रि सा. 868) आदि की वर्षा 7-7 दिन होती है। यह भी 49 दिन तक होती है। इस वर्षा से पृथ्वी स्निग्धता, धान्य तथा औषधियों को धारण कर लेती है। बेल,लता, गुल्म और वृक्ष वृद्धि को प्राप्त होते हैं। शीतल गंध को ग्रहण कर वे मनुष्य और तिर्यञ्च गुफाओं से बाहर निकलते हैं। उस समय मनुष्य पशुओं जैसा आचरण करते हुए क्षुधित होकर वृक्षों के फल, मूल व पते आदि को खाते हैं। इस काल में आयु, ऊँचाई, बुद्धि बल आदि क्रमश: बढ़ने लगते हैं। इसका नाम भी दुषमा-दुषमा काल है। (ति.प.4/1588-1575) दु:षमा काल- इस काल में भी क्रमश: आयु, ऊँचाई, बुद्धि आदि बढ़ते रहते हैं। इस काल में 1000 वर्ष शेष रहने पर क्रमशः 14 कुलकर होते हैं, जो कुलानुरूप आचरण और अग्नि आदि से भोजन पकाना आदि सिखाते हैं। (ति.प.4/1588-1590) दु:षमा-सुषमा काल- इस काल में आयु, ऊँचाई, बल आदि में क्रमश: वृद्धि होती हुई अन्तिम कुलकर से प्रथम तीर्थंकर महापद्म (राजा श्रेणिक का जीव) होंगेबाद में 23 तीर्थंकर और होंगे। अन्तिमतीर्थंकर अनन्तवीर्य होंगे जिनकी आयु एक पूर्व कोटि एवं ऊँचाई 500 धनुष होगी। आगे सुषमा-दुषमा चौथाकाल, सुषमा पाँचवाँ काल एवं सुषमा-सुषमा छठा काल होता है। इन तीनों कालों में क्रमश: जघन्य, मध्यम और उत्तम भोगभूमि होगी। इनमें आयु, ऊँचाई क्रमश: बढ़ती रहती है। छठा काल सुषमा-सुषमा समाप्त होने पर एक कल्प काल पूरा होता है। विशेष - कल्पकाल का प्रारम्भ उत्सर्पिणी से होता है एवं समापन अवसर्पिणी में। ऐसे असंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीकाल बीत जाने पर एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है। जिसमें कुछ अनहोनी (विचित्र) घटनाएँ घटती हैं। वर्तमान में हुण्डावसर्पिणी काल चल रहा है, जिसमें कुछ विचित्र घटनाएँ घट रही हैं। जैसे - तृतीय काल सुषमा-दुषमा के कुछ समय शेष रहने पर ही वर्षा होने लगी एवं विकलचतुष्क जीवों की उत्पत्ति होने लगी एवं इसी काल में कल्पवृक्षों का अन्त एवं कर्मभूमि का प्रारम्भ होना। तृतीय काल में प्रथम तीर्थंकर का जन्म एवं निर्वाण होना। भरत चक्रवती की हार होना। भरत चक्रवर्ती द्वारा की गयी ब्राह्मण वंश की उत्पति का होना। नौवें तीर्थंकर से सोलहवें तीर्थंकर पर्यन्त, जिनधर्म का विच्छेद होना। (9वें-10वें तीर्थंकर के बीच में 1/4 पल्य, 10वें-11वें के बीच में 1/2 पल्य, 11वें-12वें के बीच में 3/4 पल्य, 12वें 13वें के बीच में 1 पल्य, 13वें-14वें के बीच में 3/4 पल्य, 14वें-15वें के बीच में 1/2 पल्य एवं 15वें - 16वें के बीच में 1/4 पल्य अर्थात् कुल 4 पल्य तक मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका कोई भी नहीं थे ) विशेष : असंख्यात वर्षों का एक पल्य होता है। तीर्थंकर ऋषभदेव ने तीसरे काल में जन्म लिया और इसी काल में मोक्षगए, 3 तीर्थंकर चक्रवर्तीपद के धारी भी थे एवं त्रिपृष्ठ (प्रथम नारायण) यही जीव तीर्थंकर महावीर हुआ। इस प्रकार 63 शलाका पुरुषों में से 5 शलाका पुरुष कम हुए। अर्थात् दुषमा-सुषमा काल में 58 शलाका पुरुष हुए। 11 रुद्र और 9 कलह प्रिय नारद हुए। तीन तीर्थंकरों पर मुनि अवस्था में उपसर्ग होना। (7वें, 23वें एवं 24वें) कल्की उपकल्कियों का होना। तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चमकाल में धर्म को नाश करने वाले कुदेव और कुलिंगी भी होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, वज्राग्नि आदि का गिरना। तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या के अलावा अन्य स्थानों से होना एवं मोक्ष भी सम्मेदशिखरजी के अलावा अन्य स्थानों से होना। (ति.प.,4/1637-1645) 6. क्या सम्पूर्ण भरत-ऐरावत क्षेत्रों में काल का प्रभाव पड़ता है? नहीं। भरत ऐरावत क्षेत्रों में स्थित 5 5 म्लेच्छ खण्डों में तथा विजयार्ध की विद्याधर श्रेणियों में दुषमा सुषमा काल के आदि से लेकर अन्त पर्यन्त के समान ही हानि-वृद्धि होती है। (ति.प.4/1607) 7. भोगभूमि के अन्त में दण्ड व्यवस्था क्या रहती है ? आदि के पाँच कुलकर अपराधी को ‘हा’ अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया मात्र इतना ही दण्डदेते थे। आगे के पाँच 'हा–मा' अर्थात् हायतुमने यह बुरा किया अब नहींकरना तथा शेषकुलकर 'हा–मा–धिक् अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया अब नहीं करना, धिक्कार है, इस प्रकार का दण्ड देते थे। 8. विदेह क्षेत्र एवं स्वयंभूरमण द्वीप व स्वयंभूरमण समुद्र में काल व्यवस्था कैसी रहती है ? विदेहक्षेत्र में सदैव चतुर्थकाल के प्रारम्भवत् तथा स्वयंभूरमणद्वीप के परभाग में एवं स्वयंभूरमण समुद्र में दुषमा काल सदृश वर्तना होती है। देवगति में निरन्तर प्रथम काल सदृश और नरकगति में निरन्तर छठवें काल सदृश वर्तना होती है (यहाँ अत्यन्तसुख एवं अत्यन्त दु:ख की विवक्षा है आयु आदि की नहीं) (त्रि.सा.884) 9. क्या इतनी विशाल- विशाल अवगाहना होती है, यह तो आश्चर्यकारी लगती है ? वर्तमान में कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिससे ये अवगाहना आश्चर्यकारी नहीं लगती है, बल्कि सही लगती है। कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं द्वारिका के समुद्रतल के अन्दर खोज करने वाले राष्ट्रीय समुद्र विज्ञानसंस्थान के समुद्रपुरातत्व विभाग के द्वारा किए गए उत्खनन की रिपोर्ट के अनुसार समुद्र में डूबे मकानों की ऊँचाई 200 से 600 मीटर है। इनके कमरे के दरवाजे 20 मीटर ऊँचे हैं। विशेष यह अवशेष द्वारिका के अशुभ तैजस पुतले के द्वारा जल जाने के बाद के बचे हुए हैं। यदि दरवाजे 20 मीटर ऊँचे (लगभग 70 फीट) हैं तो इनमें रहने वाले व्यक्ति 50-60 फीट से कम ऊँचे नहीं होंगे,जैन आगम के अनुसार तीर्थंकर नेमिनाथ की अवगाहना 10 धनुष अर्थात् 60 फीट थी। अत: यह सिद्ध होता है कि इतनी अवगाहना होती थी। वर्तमान में जिसे विज्ञान 30 से 50 फीट लम्बा डायनासोर मानता है, वह आज से कई करोड़ वर्ष पूर्व छिपकली का ही रूप है। मास्को में 1993 में एक ग्लेशियर सरका था। उसके अन्दर एक नरकंकाल मिला जो 23 फीट लम्बा था। वैज्ञानिक इसे 2 से 4 लाख वर्ष पूर्व का मानते हैं। यह नरकंकाल श्रीराजमल जी देहली के अनुसार आज भी मास्को के म्यूजियम में रखा हुआ है। बड़ौदा (गुजरात) के म्यूजियम में कई लाख वर्ष पूर्व का छिपकली का अस्थिपंजर रखा है। जो 10–12 फीट लम्बा है। तिब्बत की गुफाओं में कई लाख वर्ष पूर्व के चमड़े के जूते मिले हैं, जिनकी लम्बाई कई फीट है। भारत और मानव संस्कृति (लेखक श्री विशंबरनाथ पांडे, पृष्ठ 112-115) के अनुसार मोहनजोदड़ो हड़प्पा की खुदाई से यह सिद्ध हो गया है कि मानवों के अस्थिपंजर के आधार से पूर्वकाल में मनुष्यों की आयु अधिक व लम्बाई भी अधिक होती थी। फ्लोरिडा में एक दस लाख वर्ष पुराना बिल्ली का धड़ मिला है, जिसमें बिल्ली के दांत 7 इंच लम्बे हैं। अमेरिका में 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व का कॉकरोच का ढाँचा मिला है। ये कॉकरोच चूहे के बराबर बड़े होते थे। रोम के पास कैसल दी गुड़ों में तीन लाख वर्ष पुरानी हाथियों की हड़ी मिली है, इनमें से कुछ हाथी के दाँत 10 फीट लम्बाई के हैं।
  10. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: व्रती डॉ. मोनिका सुहास शहा
  11. संयम स्वर्ण महोत्सव

    02-THAL SAJAO -

  12. 6 वें मुनिदीक्षा के पावन दिवस पर सभी (24) मुनिराजों के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन।
  13. संयम स्वर्ण महोत्सव

    आचार्यश्री द्वारा रचित साहित्य

    १. कुन्दकुन्द का कुन्दन (समयसार) ९. सूर्योदय शतक २. निजामृतपान (समयसार कलश) १०. पूर्णोदय शतक ३. अष्टपाहुड ११. सर्वोदय शतक ४. नियमसार १२. जिन्स्तुति शतक ५. बारस अणुवेक्खा १३. विज्जाणुवेक्खा प्राकृत ६. पंचस्तिकाय १४. कन्नड़ कविता ७. इष्टोपदेश (वसंततिलका) १५. बंगला कविता ८. प्रवचनसार २६. अंग्रेजी कविता ९. समाधिसुधा शतक (समाधिशतक) प्रवचन साहित्य १०. नव भक्तियाँ (आचार्य पूज्यपाद कृत) १. प्रवचन पर्व ११. समन्तभद्र की भद्रता (स्वयंभू स्तोत्र) २. प्रवचन पियूष १२. रयणमंजूषा(रत्नकरण्डक श्रावकाचार) ३. प्रवचनामृत १३. आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र) ४. प्रवचन पारिजात १४. द्रव्यसंग्रह (वसंततिलका छंद) ५. प्रवचन पंचामृत १५. गोम्मटेश अष्टक ६. प्रवचन प्रदीप १६. योगसार ७. प्रवचन प्रमेय १७. आप्तपरीक्षा ८. प्रवचनिका १८. जैन गीता (समणसुतं) ९. प्रवचन सुरभि १९. कल्याणमंदिर स्तोत्र १०. तेरा सो एक २०. जिनस्तुति (पात्रकेसरी स्तोत्र) ११. धीवर की धी २१. गुणोदय (आत्मानुशासन) १२. सर्वोदय सार २२. स्वरूप सम्बोधन १३. सीप के मोती २३. इष्टोपदेश (ज्ञानोदय) १४. विद्या वाणी २४. द्रव्यसंग्रह (ज्ञानोदय) १५. अकिचित्कर हिन्दी काव्य १६. चरण आचरण की ओर १. मूकमाटी महाकाव्य १७. कर विवेक से काम २. नर्मदा का नरम ककर १८. धर्म देशना ३. डूबो मत लगाओ डुबकी १९. कुण्डलपुर देशना ४. तोता क्यों रोता ? २०. तपोवन देशना ५. चेतना के गहराव में २१. आदशों के आदर्श संस्कृत रचनायें २२. सिद्धोदय सार १. शारदा स्तुति २३. कौन कहाँ तक साथ देगा २. श्रमण शतकम् २४. समागम ३. निरंजन शतकम् २५. गुरुवाणी ४. भावना शतकम् २६. व्यामोह की पराकाष्ठा ५. परीषहजय शतकम् २७. भक्त का उपसर्ग ६. सुनीति शतकम् २८. आत्मानुभूति ही समयसार ७. चैतन्य चन्द्रोदय २९. मूर्त से अमूर्त की ओर स्तुति सरोज ३०. स्वराज और भारत १. आचार्य शान्तिसागर स्तुति ३१. अहिंसा सूत्र २. आचार्य वीरसागर स्तुति ३२. मेरे सपनों का भारत ३. आचार्य शिवसागर स्तुति ३३. भारत की भाषा राष्ट्र भाषा ही ४. आचार्य ज्ञानसागर स्तुति ३४. जैन दर्शन का हृदय ५. अध्यात्म भक्ति गीत (१० भक्ति गीत) ३५. जयन्ती से परे हिन्दी शतक ३६. सत्य की छाँव में १. निजानुभव शतक ३७. ब्रह्मचर्य चेतन का भोग २. मुक्तक शतक ३८. भोग से योग की ओर ३. श्रमण शतक ३९. आदर्श कौन ......? ४. निरंजन शतक ४o. मर हम....मरहम बनें ५. भावना शतक ४१. मानसिक सफलता ६. परीषहजय शतक ४२. न धर्मो धार्मिकैर्बिना ७. सुनीति शतक ४३. डबडबाती आँखें ८. दोहादोहन शतक (और भी बहुत-सी कृतियाँ हैं जिनके नाम ज्ञात नहीं हो सके हैं।)
  14. From the album: श्रुत पंचमी के लिए श्रुतस्कंध यंत्र

    श्रुत पञ्चमी - जैन पर्व भगवान् महावीर के मुक्त हो जाने के लगभग 600 वर्ष पश्चात् जब श्रुतज्ञान लोप हो गया। तब गिरनार पर्वत की गुफा में निवास करने वाले धरसेनाचार्य महाराज के मन में श्रुत संरक्षण का विचार आया। निमित्तज्ञान से उन्होंने जाना कि मेरी आयु अल्प रह गई है, मेरे बाद इसअंग ज्ञान का लोप हो जायेगा। अत: योग्य शिष्यों को मुझे अंग आदिश्रुत का ज्ञान करा देना चाहिए। ऐसा विचार कर उन्होंने महिमानगरी में अर्हबलि आचार्य के पास पत्र भेजा तब उन्होंने नरवाहन और सुबुद्धि नामक मुनिराज को उनके पास भेजा। परीक्षण के लिये दोनों को दो विद्याएँ सिद्ध करने के लिए दीं। गुरु आज्ञानुसार, गिरनार पर्वत पर भगवान् नेमिनाथ की निर्वाण शिला पर पवित्र मन से विद्या सिद्ध करने बैठ गये और मन्त्र सिद्ध कर लिया। परीक्षा में उत्तीर्ण शिष्यों को सब तरह योग्य पा उन्हें खूब शास्त्राभ्यास कराया तथा ग्रन्थ समाप्ति पर भूत जाति के देवों द्वारा मुनियों की पूजा करने पर नरवाहन मुनि का नाम भूतबलि तथा सुबुद्धि मुनि की अस्त-व्यस्त दंत पक्ति सुव्यवस्थित हो जाने से उनका नाम पुष्पदन्त रखा। कुछ समय पश्चात् उन मुनिराजों ने षट्खण्डागम नामक सिद्धान्त ग्रन्थ को लिपिबद्ध कर ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमी को पूर्ण किया। उस दिन बहुत उत्सव मनाया गया। तभी से प्रतिवर्ष ज्येष्ठ सुदी पञ्चमी को श्रुतपञ्चमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन शास्त्रों की पूजा की जाती है।
  15. View this quiz संयम स्वर्ण महोत्सव प्रश्नोत्तरी दिनांक 22 जून २०१८ संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता क्रमांक 8 अ - कल सुबह 7 बजे तक भाग ले सकते हैं भाग ले प्रतियोगिता में और दावेदार बने आकर्षक उपहार के | Submitter संयम स्वर्ण महोत्सव Type Graded Mode Time 5 minutes Total Questions 5 Category संयम स्वर्ण महोत्सव प्रतियोगिता Submitted 06/16/2018  
  16. राष्ट्रहित चिंतक आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में होगा एक अभूतपूर्व अश्रुतपूर्व कार्यक्रम जरा याद करो कुर्बानी इस कार्यक्रम में अमर बलिदानी शहीद परिवारों के वर्तमान वंशजों को आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में "स्वराज सम्मान" से सम्मानित किया जाएगा इस कार्यक्रम में निम्नलिखित शहीद परिवारों ने शामिल होने की स्वीकृति प्रदान की है - राणा प्रताप रानी लक्ष्मी बाई मंगल पांडे नाना साहिब तात्या टोपे बहादुर शाह जफर भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद सुखदेव राजगुरु अशफाक उल्ला खान सदाशिवराव मलकापुर कर श्रीकृष्ण सरल सुभाष चंद्र बोस के अंगरक्षक कर्नल मोहम्मद निजामुद्दीन इत्यादि 【21 अक्टूबर 1934- नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना सिंगापुर में की थी।】 आजादी मिलने के बाद आजादी के दीवानों का मेला जरा याद करो कुर्बानी 21 अक्टूबर 2018 दिन रविवार दोपहर 1:45 खजुराहो, मध्य प्रदेश | आयोजक - चातुर्मास समिति एवं सकल दिगंबर जैन समाज
  17. संयम स्वर्ण महोत्सव

    अब मैं मम मन्दिर में रहूँगा

    अमिट, अमित अरु अतुल, अतीन्द्रिय, अरहन्त पद को धरूँगा सज, धज निजको दश धर्मों से - सविनय सहजता भजूँगा ।। अब मैं ।। विषय - विषम - विष को जकर उस - समरस पान मैं करूँगा। जनम, मरण अरु जरा जनित दुख - फिर क्यों वृथा मैं सहूँगा? ।। अब मैं । । दुख दात्री है इसीलिए अब - न माया - गणिका रखूँगा।। निसंग बनकर शिवांगना संग - सानन्द चिर मैं रहूँगा ।।अब मैं । । भूला, परमें फूला, झूला - भावी भूल ना करूँगा। निजमें निजका अहो! निरन्तर - निरंजन स्वरूप लखूँगा ।। अब मैं । । समय, समय पर समयसार मय - मम आतम को प्रनमुँगा। साहुकार जब मैं हूँ, फिर क्यों - सेवक का कार्य करूँगा ? ।।अब मैं । । - महाकवि आचार्य विद्यासागर
  18. संयम स्वर्ण महोत्सव

    खजुराहो में समाधि संपन्न 

    समाधि संपन्न खजुराहो, पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ के सानिध्य एवं निर्देशन में दस प्रतिमाधारी जयसुख भाई वसानी (C.A). मुंबई निवासी की सल्लेखना अनंत चौदस 23/9/18 को सानंद संपन्न हुई | वे ७८ वर्ष के थे | विगत २० वर्षों से व्रती जीवन निर्वाह करते हुए 16 जल उपवास व 6 उपवास (अंत समय बेला)| के साथ यह मृत्यु महोत्सव को उत्साह पूर्वक पूर्ण किया |
  19. ????‍??‍???? वात्सल्य अंग का प्रभाव आचार्यश्री खजुराहो, 22 सितम्बर दयोदय महासंघ के लोगों ने हमारे सामने एक चित्र रखा था इस चित्र को देख कर हम तो गदगद हो गए। इस चित्र में एक गैया है उसके बड़े बड़े सींग है यह गाय एक घर के सामने कुछ खाने पीने के लिये सीढियों तक चली गई थी। उसी समय उस घर का एक छोटा सा नादान यथाजत बालक आकर उस गाय के दोनो सींग के बीच मे बिना डरे लेट जाता है और गाय भी उसे वात्सल्य देती है। आप लोग इतनी सहजता से वह चित्र देख लेते तो मालूम पड़ जाता कि गोवत्स क्या होता है आप इस चित्र को देख लीजिये ऐसा ही सौहार्दिक प्रेम वात्सल्य सभी साधर्मियों के प्रति हो जाए तो फिर स्वर्ग धरती पर उतर आ जाए यह वात्सल्य अंग का प्रभाव है प्रस्तुति : राजेश जैन भिलाई www.Vidyasagar.Guru ????‍??‍????
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