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संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

    कीर्ति स्तम्भ बनाएं हम - Awshesh Jain

    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Awshesh Jain
  3. ज्ञान सदृश, आस्था भी भीती से सो, कंपती नहीं | हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। सके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  4. कब और क्यों, जहाँ से निकला सो, स्मृति में लाओ | हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। सके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  5. ज्ञान प्राण है, संयत हो त्राण है, अन्यथा श्वान| हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  6. गुरु मार्ग में, पीछे की वायु सम, हमें चलाते। हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  7. मेरे गुरुवर धरा पर हैं आए,सभी जीवों का उद्धार करने। मोक्ष पथ पर स्वयं चल रहे हैं, और सब को भी चला रहे हैं। जैसा गुरु ने कहा है दिखाया, संघ को देखो गुरुकुल बनाया। कम समय के लिए गुरु को पाया, फिर भी गुरु को सदा साथ पाया ।। ऐसा हम भी समर्पण को चाहें, गुरु आज्ञा में जीवन बिताना। कितनी सुन्दर है गुरुवर की सूरत, मेरे गुरुवर हैं ममता की मूरत।। आँखों में इनके करुणा झलकती, सभी जीवों में दिन रैन बरसती ॥ हम भी करुणा दया धर्म पालें, मैत्री के फूल हम भी लगा लें। हर समय का सदुपयोग करते, शास्त्र जीवन को सदा रचते।। प्रतिभामंडल गुरु ने दिया है, सबको कर्तव्य बतला दिया है। साथ मिलकर कदम सब बढ़ाएँ और, प्रतिभामय भारत बनाएँ। (तर्ज-इतनी शक्ति हमें)
  8. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: व्रती डॉ. मोनिका सुहास शहा
  9. भरा घट भी, खाली सा जल में सो, हवा से बचों। हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  10. इंदौर को प्रतिभास्थली की सौगात ----- आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का वरदानी आशीष ----- दिगम्बराचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महामुनिराज के वरदानी शुभाशीष से आर्यिका रत्न श्री 105 आदर्शमती माताजी ससंघ की मंगल सन्निधि में प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ में छात्राओं को कक्षा चौथी, पांचवी,छटवीं में प्रवेश प्रारम्भ किया जा रहा है।पपौरा में विराजमान आचार्य श्री जी का शुभाशीष प्राप्त होते ही इंदौर को प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ की सौगात मिल गई है। उच्चतम मानकों पर संस्कारित शिक्षा,कौशल दक्षता प्रदान करने वाले प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ में प्रवेश पाने की इच्छुक छात्राओ के अभिभावक आवेदन पत्र जैन कॉलोनी से प्राप्त कर सकते है ।। निवेदक-दयोदय चेरिटेबल फाउंडेशन ट्रस्ट इंदौर
  11. जुड़ो ना जोड़ो, जोड़ा छोड़ो जोड़ो तो, बेजोड़ जोड़ो। हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  12. संयम स्वर्ण महोत्सव समापन समारोह 17 जुलाई 2018 कार्यक्रम प्रात 7-30 बजे से 9-30 बजे मंगलाचरण कु. कन्नगी द्वारा चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन भैयाजी एवं दीदीजी द्वारा श्रीफल अर्पण प्रतिभास्थली की छात्राओं द्वारा प्रस्तुति पुस्तक विमोचन 1 मूकमाटी-सचित्र 2 अंतर्यात्री संस्कृति शासक 3 भारत में भाषा का मसला- विश्लेषण और समाधान- ब्र. विजयलक्ष्मी दीदी 4 विद्याभारत -कलेंडर पाद प्रक्षालन संगीतमय पूजन- प्रतिभास्थली की छात्राओं और बहनों द्वारा गुरूदेव के आशीर्वचन दोपहर 2-30 बजे से 4 बजे मंगलाचरण चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन नेपथ्य के नायकों का सम्मान *वर्ष 2018 के हमारे 9 नक्षत्र (नायक)
  13. संयम स्वर्ण महोत्सव

    एकता

    एकता विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/aekta/
  14. राग की भूमिका में भी दृष्टि वीतरागता से ऊपर रखी जा सकती है। रागी को जिस पदार्थ पर राग झलकता है। वीतरागी वहीं वीतरागता का दर्शन करता है। राग और वीतराग पदार्थ पर नहीं हमारी दृष्टि पर जन्म लेते हैं। यदि हमारी दृष्टि में वीतरागता है तो हम राग में वीतरागता देखेंगे, अन्यथा वीतरागता में भी राग ही नजर आयेगा। अत: हमको प्रतिपल राग से हटकर वीतराग बनने की साधना करना चाहिए और यही जीवन का सार होना चाहिए। वीतरागता के प्रति गौरव होना भी राग को छोड़ने की भूमिका है। हमने अभी तक राग को वीतरागता से भी अधिक मूल्यवान समझा है। इसलिए हम राग को उपेक्षित नहीं कर पा रहे हैं। जिस राग को हम छोड़ना नहीं चाहते वह राग हमको पसंद तक नहीं करता। हमने राग को पसंद किया है राग ने हमको नहीं। इसलिए अब हमको समझना है कि महत्वपूर्ण चीज वीतरागता है, राग नहीं और उस वीतरागता की उपासना प्रारंभ करना है। वीतरागता की उपासना करना ही वीतरागता के प्रति गौरव होना है। दृष्टि का महत्व देखिए कि जिस चीज से हम अपनी भोजन सामग्री बनाते है वही चीज हमारे लिए प्रभु भजन का विषय बन जाती है। जिस जल को हम पीते हैं तो वह भोग्य सामग्री कहलाती है लेकिन जब हम उसी जल से भगवान् की पूजा करते हैं तो वही जल हमारे लिए भजन की, भक्ति की चीज बन जाती है। जिस चंदन को हम गर्मी मिटाने के लिए शरीर पर लेप करते हैं या सूंघते हैं तो वह शारीरिक सुख का कारण बनता है लेकिन उसी चंदन से जब हम भगवान् की पूजा करते हैं तो शरीर नहीं संसार ताप मिटाने की भावना करते हैं। इसी प्रकार अष्ट मंगल द्रव्य की तमाम सामग्री को समझना चाहिए। वही वस्तु घर में कलह का, झगड़े का कारण बनती है और वही मंदिर में पूजा भक्ति, भजन वंदना का कारण बनती है। हमारी पूजा का उद्देश्य वीतरागता को प्राप्त करना होना चाहिए क्योंकि हमारे उपास्य वीतरागी हैं। यदि हमारी जिन्दगी का लक्ष्य राग को घटाना बन जाये तो हम कम समय में भी अधिक काम कर सकते हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वीतरागी बनने की साधना करें और यदि हम वीतरागी नहीं बन सकते तो वीतरागी के पास जाना चाहिए। यदि हम इतना भी करते हैं तो एक दिन अवश्य वीतरागी बन जायेंगे, फिर हमारे लिए कुछ करना नहीं पड़ेगा। क्योंकि राग समाप्त करने के बाद अत्याधिक पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  15. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: व्रती डॉ. मोनिका सुहास शहा
  16. धार्मिकदूष्टि से, वैज्ञानिक द्रष्टि से जल छानकर पीना चाहिए। अत: हृस अध्याय में जल छानने की विधि का वर्णन है। 1. जल क्यों छाना जाता है ? जल में जो अनेक सूक्ष्म (त्रस) जीव रहते हैं, उनकी रक्षा के लिए जल को छाना जाता है। बिना छने जल का प्रयोग करने से उसमें रहने वाले जीवों का अवसान (मरण) होता है एवं जीव पेट में जाकर रोग भी उत्पन्न करते हैं। इससे छने पानी का प्रयोग करना चाहिए। 2. पानी स्वयं जीव है, तो छानने से जीव कैसे बचेंगे ? पानी छानने से त्रस जीवों की रक्षा होती है। जलकायिक की नहीं। 3. एक बूंद जल में जैनधर्म के अनुसार कितने जीव हैं ? एक बूंद जल में जैनधर्म के अनुसार संख्यात त्रस जीव एवं असंख्यात जलकायिक जीव हैं, जो कबूतर के बराबर होकर उड़ें तो पूरा जम्बूद्वीप भर जाएगा | 4. वैज्ञानिक कैप्टन स्ववोर्सवी के अनुसार एक बूंद जल में कितने जीव हैं ? वैज्ञानिक कैप्टन स्ववोर्सवी के अनुसार 36,450 त्रस जीव हैं। 5. जल छानने की विधि क्या है ? कुएँ में बालटी या कोई भी बरतन जोर से नहीं पटकते हुए पानी खीचें। वह बालटी फूटी भी न हो, और पानी गिरे भी नहीं। बालटी ऊपर लाने के बाद एक सूती छन्ने से छानना, वह छन्ना इतना मोटा हो कि उसमें से सूर्य की किरणें आर-पार न हो सकें। छन्ना इतना बड़ा हो कि जिस बरतन में पानी छाना जा रहा है,उसके मुख से बड़ा हो। इतनी सावधानी अवश्य रहे कि अनछना एक भी बूंद जल जमीन पर न गिरे। पानी छानने के बाद जिवानी को छने जल से धोकर ही, जहाँ की जिवानी हो उसी जगह डालना चाहिए। जिवानी ऊपर से नहीं फेंकना चाहिए, बल्कि बालटी में नीचे कड़ा होना चाहिए। जिससे जल की सतह पर जाकर जिवानी पहुँचे। अत: कड़े वाली बालटी का प्रयोग करना चाहिए। 6. जेट, हैंडपप आदि से पानी आने में घर्षण से जीव मर जाते हैं। फिर पानी छानने से क्या लाभ है ? जेट, हैंडपंप से पानी आता है तो घर्षण से जीव मर तो जाते हैं किन्तु बिना छने जल में प्रतिसमय जीव उत्पन्न होते रहते हैं। अत: पानी छानना चाहिए। 7. हैंडपंप की जिवानी कहाँ डालना चाहिए ? हैंडपंप में जिवानी तो जा नहीं सकती। घर में टंकी, हौज आदि में जल हो तो उसमें डाल सकते हैं। जब तक उसमें जल रहेगा, तब तक जीव सुरक्षित रहेंगे। यह विधि ठीक नहीं है फिर भी जितनी रक्षा हो सके उतनी करें, जिससे पानी छानने के संस्कार बने रहेंगे। 8. छने जल की मर्यादा कितनी है ? एक मुहूर्त अर्थात् 48 मिनट। इसके बाद उसमें पुनः त्रस जीवों की उत्पत्ति होने लगती है। अत: पुनः छानना चाहिए। 9. छने जल को लौंग, सौंफ आदि से प्रासुक किया जाता है तो उसकी मर्यादा कितनी है ? छने जल को लौंग, सौंफ आदि से प्रासुक किया जाता है तो उसकी मर्यादा छः घंटे हो जाती है, किन्तु छ: घंटे के बाद वह अमर्यादित हो जाता है। अर्थात् उसमें त्रस जीवों की उत्पत्ति प्रारम्भ हो जाती है। 10. उबले (Boiled) जल की मर्यादा कितनी है ? 24 घंटे। इसके बाद वह अमर्यादित हो जाता है। इसे दुबारा गर्म भी नहीं करना चाहिए। 11. नल में कपड़े की थैली दिन भर लगी रहती है, क्या यह उचित है ? नहीं। थैली नल में लगी-लगी ही सूख जाती है तो उसमें रहने वाले जीव मर जाते हैं। 12. वर्षा का जल क्या शुद्ध है ? वर्षा का जल अन्तर्मुहूर्त तक तो शुद्ध है, उसमें जीव नहीं रहते हैं। अन्तर्मुहूर्त के बाद उसमें जीव उत्पन्न हो जाते हैं। 13. जैनधर्म के अलावा और कहीं भी पानी छानने के बारे में कहा है ? हाँ। मनुस्मृति में लिखा है - अपनी दृष्टि से धरती को अच्छी तरह देखकर पैर रखे तथा जल को वस्त्र से छानकर पीना चाहिए। यथा- दृष्टि पूतं न्यसेत् पादं, वस्त्र पूर्त जलम् पिबेत्। 14. पानी छानने के बारे में आज विज्ञान क्या कहता है ? पानी को छानकर फिर उबालकर (Boiled)ही पीना चाहिए। 15. छना पानी पीने से क्या लाभ हैं ? छना पानी पीने से मुख्य लाभ हैं - अहिंसा धर्म का पालन होता है। अनेक प्रकार की बीमारियों से स्वत: बच जाते हैं। 16. गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज के शब्दों में अनछना जल पीने से क्या होता है ? जिस प्रकार स्टोव में बिना छना तेल डालते हैं तो वह भभकता है, जिससे उसमें पिन करना पड़ती है। उसी प्रकार पेट में बिना छना जल डालते हैं तो उसमें पिन करना पड़ती है अर्थात् इंजेक्शन लगवाना पड़ता है, क्योंकि बीमार पड़ जाते हैं। 17. भगवान् महावीर जैनी किसे कह गए ? महावीर कह गए सभी से जैनी वह कहलाएगा। दिन में भोजन, छान के पानी, नित्य जिनालय जाएगा।
  17. संयम स्वर्ण महोत्सव

    श्री वीर जिन-स्तवन

    तव गुण-गण की फैल रही है विमल कीर्ति वह त्रिभुवन में। तभी हो रहे शोभित ऐसे वीर देव बुध जन-जन में ॥ कुन्द पुष्प की शुक्ल कान्ति-सम कान्तिधाम शशि हो भाता। घिरा हुआ हो जिससे उडुदल गीत-गगन में हो गाता ॥१॥ सत युग में था कलियुग में भी तव शासन जयवन्त रहा। भव्यजनों के भव का नाशक मम भव का भी अन्त रहा ॥ दोष चाबु को निरस्त करते पर मत खण्डन करते हैं। निज-प्रतिभा से अतः गणी ये जिनमत मण्डन करते हैं ॥२॥ प्रत्यक्षादिक से ना बाधित अनेकान्त मत तव भाता। स्याद्-वाद सब वाद-विवादों का नाशक मुनिवर! साता ॥ प्रत्यक्षादिक से हैं बाधित स्यावाद से दूर रहे। एकान्ती मत इसीलिए सब दोष धूल से पूर रहे ॥३॥ दुष्ट दुराशय धारक जन से पूजित जिनवर रहे कदा। किन्तु सुजन से सुरासुरों से पूजित वंदित रहे सदा ॥ तीन लोक के चराचरों के परमोत्तम हितकारक हैं। पूर्ण ज्ञान से भासमान शिव को पाया अघहारक हैं ॥४॥ समवसरण थित भव्यजनों को रुचते मन को लोभ रहे। सामुद्रिक औ आत्मिक गुण से हे प्रभुवर अति शोभ रहे ॥ चमचम चमके निजी कान्ति से ललित मनोहर उस शशि को। जीत लिया तब काय कान्ति ने प्रणाम मम हो जिन ऋषि को ॥५॥ मुमुक्षु-जन के मनवांछित फलदायक! नायक! जिन तुम हो। तत्त्व-प्ररूपक तव आगम तो श्रेष्ठ रहा अति उत्तम हो ॥ बाहर-भीतर श्री से युत हो माया को नि:शेष किया। श्रेष्ठ श्रेष्ठतम कठिन कठिनतम यम-दम का उपदेश दिया ॥६॥ मोह-शमन के पथ के रक्षक अदया तज कर सदय हुए। किया जगत में गमन अबाधित सभय सभीजन, अभय हुए ॥ ऐसा लगते तब, गज जैसा मद-धारा, मद बरसाता। बाधक गिरि की गिरा कटिनियाँ अरुक अनाहत बस जाता ॥७॥ एकान्ती मत-मतान्तरों में वचन यदपि श्रुति-मधुर सभी। किन्तु मिले ना सुगुण कभी भी नहीं सकल-गुण प्रचुर कभी॥ तव मत समन्तभद्र देव है सकल गुणों से पूरण है। विविध नयों की भक्ति-भूख को शीघ्र जगाता चूरण है ॥८॥ (दोहा) नीर-निधी से धीर हो वीर बने गंभीर। पूर्ण तैर कर पा लिया भवसागर का तीर ॥१॥ अधीर हूँ मुझ धीर दो सहन करूँ सब पीर। चीर-चीर कर चिर लखें अन्तर की तस्वीर ॥२॥
  18. संयम स्वर्ण महोत्सव

    जनक जननी जिन संस्कारो के -

  19. संयम स्वर्ण महोत्सव

    अध्याय 5 - समवसरण

    तीर्थंकरों को केवल ज्ञान होते ही उनके सातिशय पुण्य से समवसरण की रचना होती है। ऐसे समवसरण की विशेषताओं का वर्णन इस अध्याय में है। 1. समवसरण क्या है ? तीर्थंकरों के धर्मोपदेश देने की सभा का नाम समवसरण है। 2. समवसरण की विशेषताएँ बताइए? तीर्थंकरों को केवल ज्ञान उत्पन्न होने के बाद सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विशेष रत्न एवं मणियों से समवसरण की रचना करता है। यह समवसरण भूतल से 5000 धनुष ऊपर आकाश के अधर में बारह योजन विस्तृत एक गोलाकार इन्द्र नीलमणि की शिला होती है। इस शिला पर समवसरण की रचना बनाई जाती है। (1धनुष = 4 हाथ अर्थात् 6 फीट) अत: यह समवसरण 30,000 फीट ऊपर रहता है। (ति.प.4/724-725) चारों दिशाओं में 20000-20000 सीढ़ियाँ होती हैं, इन सीढ़ियों से बिना परिश्रम के चढ़ जाते हैं। जैसे—आज लिफ्ट से ऊपर चढ़ जाते हैं एवं एसकेलेटर में मात्र खड़े हो जाते हैं और सीढ़ियाँ चलती रहती हैं। प्रत्येक दिशा में सीढ़ियों से लगा एक मार्ग होता है, जो समवसरण के केन्द्र में स्थित गंधकुटी के प्रथम पीठ तक जाता है। समवसरण में आठ भूमियाँ होती हैं- 1. चैत्य प्रासाद भूमि, 2. जल खातिका भूमि, 3. लतावन भूमि, 4. उपवन भूमि, 5. ध्वज भूमि, 6. कल्पवृक्ष भूमि, 7. भवन भूमि, 8. श्रीमण्डप भूमि एवं इसके आगे स्फटिक मणिमय वेदी है। इस वेदी के आगे एक के ऊपर एक क्रमश: तीन पीठ होती हैं। प्रथम पीठ, द्वितीय पीठ, तृतीय पीठ के ऊपर ही गंधकुटी होती है। इस गंधकुटी में स्थित सिंहासन में रचे हुए कमल से 4 अङ्गल ऊपर तीर्थंकर अष्ट प्रातिहार्यों के साथ आकाश में विराजमान रहते हैं। समवसरण के बाहरी भाग में मार्ग के दोनों तरफ दो-दो नाट्यशालायें अर्थात् कुल 16 नाट्यशालाएँ होती हैं, जिनमें 32-32 देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं। इन द्वारों के भीतर प्रविष्ट होने पर कुछ आगे चारों दिशाओं में चार मान स्तम्भ होते हैं, जिन्हें देखने से मानी व्यक्तियों का मान गलित हो जाता है। श्री मण्डप भूमि में स्फटिक मणिमय '16 दीवारों' से विभाजित बारह कोठे होते हैं जिनमें बारह सभाएँ होती हैं। तीर्थंकर की दाई ओर से क्रमश: 1. गणधर एवं समस्त मुनि, 2. कल्पवासी देवियाँ, 3. आर्यिकाएँ एवं श्राविकाएँ, 4. ज्योतिषी देवियाँ 5. व्यन्तर देवियाँ, 6. भवनवासी देवियाँ, 7. भवनवासी देव, 8. व्यन्तर देव, 9. ज्योतिषी देव, 10. कल्पवासी देव, 11. चक्रवर्ती एवं मनुष्य, 12. पशु-पक्षी बैठते हैं। (ति.प.4/866-872) योजनों विस्तार वाले समवसरण में प्रवेश करने व निकलने में मात्र अन्तर्मुहूर्त का ही समय लगता है। समवसरण में मात्र संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव ही आते हैं। समवसरण में तीन लोक के जीव आते हैं,क्योंकि अधोलोक से भवनवासी और व्यन्तर देव भी वहाँ आते हैं। समवसरण में तीर्थंकर के महात्म्य से आतंक, रोग, मरण, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी नहीं लगती है एवं हमेशा बैर रखने वाले सर्प नेवला, मृग-मृगेन्द्र भी एक साथ बैठते हैं और तीर्थंकर का उपदेश सुनते हैं। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इससे सम्बन्धित एक दोहा लिखा है:- पानी भरते देव हैं, वैभव होता दास। मृग-मृगेन्द्र मिल बैठते, देख दया का वास। (सर्वोदय शतक, 29) 3. समवसरण व्रत के कितने उपवास होते हैं एवं कब से प्रारम्भ होते हैं? एक वर्ष पर्यन्त प्रत्येक चतुर्दशी को एक उपवास करें। इस प्रकार 24 उपवास करें। यह व्रत किसी भी चतुर्दशी से प्रारम्भ कर सकते है तथा "ओं ह्रीं जगदापद्विनाशाये सकलगुड करडय श्रीसर्वज्ञाय अर्हत्परमेष्टिने नम:" इस मन्त्र का त्रिकाल जाप करें।
  20. जानिए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के त्याग के बारे में वास्तव में इस पंचम काल में चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी के बाद पूर्णतया आगम अनुरूप चर्या देखना है तो वो है आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज उनके त्याग तपस्या चर्या इस प्रकार है - आजीवन चीनी का त्याग | आजीवन नमक का त्याग | आजीवन चटाई का त्याग | आजीवन हरी का त्याग | आजीवन दही का त्याग | सूखे मेवा (dry fruits) का त्याग | आजीवन तेल का त्याग | सभी प्रकार के भौतिक साधनो का त्याग | थूकने का त्याग | एक करवट में शयन | पूरे भारत में सबसे ज्यादा दीक्षा देने वाले | पूरे भारत में एक मात्र ऐसा संघ जो बाल ब्रह्मचारी है | पुरे भारत में एक ऐसे आचार्य जिनका लगभग पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है | शहर से दूर खुले मैदानों में नदी के किनारो पर या पहाड़ो पर अपनी साधना करना | अनियत विहारी यानि बिना बताये विहार करना | प्रचार प्रसार से दूर- मुनि दीक्षाएं, पीछी परिवर्तन इसका उदाहरण | आचार्य देशभूषण जी महराज जब ब्रह्मचारी व्रत के लिए स्वीकृति नहीं मिली तो गुरुवर ने व्रत के लिए 3 दिवस निर्जला उपवास किआ और स्वीकृति लेकर माने | ब्रह्मचारी अवस्था में भी परिवार जनो से चर्चा करके अपने गुरु से स्वीकृति लेते थे और परिजनों को पहले अपने गुरु के पास स्वीकृति लेने भेजते थे | आचार्य भगवंत सम दूसरा कोई संत नज़र नहीं आता जो न केवल मानव समाज के उत्थान के लिए इतने दूर की सोचते है वरन मूक प्राणियों के लिए भी उनके करुण ह्रदय में उतना ही स्थान है | शरीर का तेज ऐसा जिसके आगे सूरज का तेज भी फिका और कान्ति में चाँद भी फीका है | ऐसे हम सबके भगवन चलते फिरते साक्षात् तीर्थंकर सम संत I
  21. "एक साधक ने अपने लक्ष्य के अनुकूल पुरुषार्थ कर प्राप्त की कालजयी सफलता।" उन महान साधक की साधना से जुड़े विस्मयकारी प्रसंगों को, जिनसे जिनशासन हुआ गौरवान्वित, उन प्रसंगों को ही इस लेख का विषय बनाया जा रहा है। गुरुवाणी के साथ-साथ विषय की पूर्णता हेतु अन्य स्रोतों से भी विषय वस्तु को ग्रहण किया गया है। आगामी 25 नवम्बर 18 को हैं आचार्य पदारोहण दिवस आचार्य श्री ज्ञानसागर द्वारा मुनिश्री विद्यासागर को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा एवं संस्कार २२ नवम्बर १९७२, माघ शीर्ष कृष्ण द्वितीया, नसीराबाद, राजस्थान आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज का सन् १९७२ में नसीराबाद में चातुर्मास चल रहा था। चातुर्मास के पूर्व जब वह अजमेर में विराजमान थे, तभी से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। चातुर्मास समाप्ति की ओर था। आचार्य महाराज शारीरिक रूप से काफी अस्वस्थ एवं क्षीण हो चुके थे। साइटिका का दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दर्द की भयंकर पीड़ा के कारण आचार्य महाराज चलने-फिरने में असमर्थ होते जा रहे थे। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज का विस्मयकारी निर्णय ऐसी शारीरिक प्रतिकूलता की स्थिति में ज्ञानमूर्ति आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने सल्लेखना व्रत ग्रहण करने का निर्णय लिया। समाधि हेतु आचार्य पद का परित्याग तथा किसी अन्य आचार्य के सान्निध्य में जाने का आगम में विधान है। आचार्य महाराज के लिए इस भयंकर शारीरिक पीड़ा की स्थिति में किसी अन्य आचार्य के पास जाकर समाधि लेना भी संभव नहीं था। अत: उन्होंने स्वयं आचार्य पद का त्याग करके अपने सुयोग्य शिष्य मुनि श्री विद्यासागरजी महाराज को आचार्य पद पर आसीन करने का मानस बनाया। चातुर्मास निष्ठापन के दूसरे ही दिन आचार्य ज्ञानसागरजी ने संघ के समक्ष अपनी इस भावना को रखा। यह बात सुनकर संघ में सभी लोग सन्तुष्ट थे, सिर्फ मुनि श्री विद्यासागरजी को छोड़कर। मुनि श्री विद्यासागरजी की अस्वीकृति जब आचार्य महाराज ने मुनि विद्यासागरजी से आचार्यपद ग्रहण करने हेतु कहा, तब मुनिश्री बोले- "गुरुदेव! आप मुझे मुनि पद में ही साधना करने देंगे तो मुझ पर आपकी महती कृपा होगी।", मुनि विवेकसागरजी महाराज को आचार्य पद देगे तो अच्छा होगा (उस समय विवेकसागरजी महाराज वहाँ पर नहीं थे, उनका चातुर्मास कुचामन सिटी में था) अथवा क्षुल्लक श्री विजयसागरजी महाराज को मुनि दीक्षा देकर उन्हें आचार्यपद दे दीजिए। पद त्याग नहीं तो समाधि कैसे... जब मुनि श्री विद्यासागरजी ने मुनि पद पर रहते हुए अपनी साधना करने की भावना एवं आचार्य पद के प्रति अपनी निरीहता प्रकट कर दी तो आचार्य महाराज के सामने यह समस्या खड़ी हो गई कि अब मैं समाधि के लिए कहाँ जाऊँ...? मुनि श्री विद्यासागर जी ने दी गुरुदक्षिणा अनेक मूर्धन्य विद्वान ज्ञानार्जन एवं दर्शनार्थ उनके पास आते रहते थे। एक दिन आचार्य महाराज ने छगनलाल पाटनी, अजमेर वालों से कहा-"छगन जी! मेरी समाधि बिगड़ जाएगी।" पाटनी जी - "महाराज! ऐसा क्यों ?" ज्ञानसागरजी महाराज - "मुनि विद्यासागर आचार्य पद लेने से इंकार कर रहा है।" पाटनी जी - "आचार्य पद उनको लेना पड़ेगा। वो इंकार नहीं कर सकते।" महाराज - "वो तो साफ इनकार कर रहा है।" तब फिर छगनलाल पाटनी, ताराचंद जी गंगवाल व माधोलाल जी गदिया बीरवाले जहाँ मुनि विद्यासागरजी महाराज नसिया में ऊपर सामायिक कर रहे थे, वहाँ पहुँच गये। छगनलालजी ने महाराज से निवेदन किया - "महाराज श्री! क्या गुरु की समाधि बिगाड़नी है जो कि आप आचार्य पद नहीं ले रहे हैं।" मुनि विद्यासागरजी बोले - "मैं परिग्रह में नहीं फँसना चाहता, यह मेरे ऊपर बहुत भारी बोझ आ जाएगा।" उसी समय शान्तिलाल पाटनी, नसीराबाद वाले भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने मुनि श्री विद्यासागर जी से कहा -"आपको यह पद स्वीकार करने में क्या तकलीफ है ?" तब मुनि श्री बोले -"मुझे विनाशीक पद नहीं चाहिये अविनाशी पद चाहिये |" छगनलाल पाटनी पुनः बोले - "आप गुरु को गुरु दक्षिणा में क्या दोगे ? क्योंकि आपके पास और कोई परिग्रह है ही नहीं, जो आप अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में दे सको।" महाराजश्री कुछ देर मौन रहकर बोले - "चलो, गुरु की समाधि तो बिगड़ने नहीं दूँगा, चाहे मेरे ऊपर कितनी भी विपत्तियाँ आवें उनको मैं सहर्ष सह लूगा।" फिर मुनिश्री विद्यासागर जी ने आचार्य महाराज के पास आकर निवेदन किया, "हे गुरुदेव! मेरे लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।" आचार्य महाराज ने उन्हें अपने कर्तव्य, गुरु सेवा और आगम की आज्ञा का स्मरण कराया और कहा कि - "गुरु दक्षिणा तो आपको देनी ही होगी।" इतना सुनते ही मुनिश्री अपने भावों को रोक न सके और एक बालक की भाँति विचलित हो उठे। शिष्य पर गुरु संग्रह, अनुग्रह आदि के माध्यम से कई प्रकार के उपकार करते हैं, पर शिष्य का गुरु पर क्या उपकार है ? गुरु के अनुकूल वृत्ति करके गुरु पर शिष्य उपकार कर सकता है। ऐसा विचार कर मुनि श्री विद्यासागर गुरु चरणों में नतमस्तक हो गए। तब इच्छा नहीं होते हुए भी दस दिनों के लम्बे अंतराल के पश्चात् उनको अपने ही दीक्षा-शिक्षा गुरु महाराज को आचार्य पद ग्रहण करने की "मौन स्वीकृति देकर गुरु दक्षिणा समर्पित करनी ही पड़ी।" मौन स्वीकृति मिलने पर आचार्य महाराज अत्यन्त आह्वादित हुए और उन्होंने तत्काल ही मुहूर्त देखने का संकेत किया। आचार्य पदारोहण मुहूर्त निर्धारण उसी समय वहाँ अन्य संघस्थ एक क्षुल्लक पद्मसागरजी महाराज विराजमान थे, जो ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। उनसे आचार्य पद का मुहूर्त निकलवाया। क्षुल्लक जी मुहूर्त देखकर बोले - "मैंने मेरी जिंदगी में ऐसा बढ़िया मुहूर्त नहीं देखा, जो आचार्य पद दीक्षा लेने वाले के लिए और देने वाले के लिए निकला हो। बहुत ही उत्तम मुहूर्त है।" वह दिन था मगसिर कृष्ण दोज, वीर निर्वाण संवत् २४९९, विक्रम संवत् २०२९, दिनांक २२ नवम्बर १९७२, स्थान-श्री दिगम्बर जैन नसिया जी मंदिर, नसीराबाद, जिलाअजमेर, समय- प्रात: काल लगभग ९ बजे का। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का आचार्यपद से अंतिम प्रवचन जैसे कोई श्रावक (पिता) जब तक अपनी योग्य कन्या का विवाह समय पर नहीं कर देता तब तक उसे चैन नहीं रहता। उसी प्रकार आचार्य श्री ज्ञानसागरजी को पद देने से पूर्व तक चैन नहीं रहा, अत: उन्होंने उचित समय पर कन्यादान के समान अपने पद का दान किया और सब कुछ त्याग कर, समाधि जो मुख्य लक्ष्य था, उसकी ओर बढ़ गए। विशाल जनसमूह इस विस्मयकारी उत्सव को देखने के लिए उपस्थित था। आचार्य आसन पर आचार्य श्री ज्ञानसागरजी विराजमान हैं। उनके पास ही मुनि आसन पर श्रमण विद्यासागरजी विराजमान हैं। उस दिन मुनि श्री विद्यासागर जी ने उपवास किया था। आचार्य पद से आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने अंतिम उपदेश दिया, उन्होंने बहुत ही मार्मिक शब्दों में कहा - "यह नश्वर शरीर धीरे-धीरे गिरता जा रहा है और मैं अब इस पद का मोह छोड़ कर आत्म-कल्याण में पूर्णरूपेण लगना चाहता हूँ। जैनागम के अनुसार यह करना अत्यन्त आवश्यक और उचित भी है।" आचार्य पद त्याग प्रवचन के पश्चात् जैसे ही मुहूर्त का समय हुआ, वैसे ही आचार्य श्री ज्ञानसागरजी अपने आचार्य आसन से उठे और मुनि आसन पर विराजमान मुनि श्री विद्यासागर को उठाकर अपने आचार्य आसन पर बिठाया। वे स्वयं मुनि आसन पर विराजमान हो गए। तत्पश्चात् उन्होंने आगमानुसार भक्तिपाठ आदि करते हुए, मुनि श्री विद्यासागर जी के ऊपर आचार्य पद के संस्कार किए। संस्कार करने के बाद आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपनी आचार्य पिच्छी मुनि श्री विद्यासागर जी को प्रदान की। स्वयं अपने मुनि आसन से नीचे उतरे और नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर को त्रयभक्ति पूर्वक नमोस्तु किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अत्यन्त विनम्र भाव से नग्रीभूत होकर मुनि श्री ज्ञानसागर जी को प्रति नमोस्तु निवेदित किया। उसी समय मुनिश्री ज्ञानसागर जी ने नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की तीन प्रदक्षिणा लगाई। यह दृश्य देखने लायक था। उसके बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी का आचार्य पद से प्रथम प्रवचन हुआ उन्होंने एकत्व विभक्त के ऊपर बहुत अच्छा प्रवचन दिया। आचार्य आसन पर किया प्रतिष्ठित आचार्य पद प्राप्त करने के पश्चात् आचार्य विद्यासागरजी अपने पूर्व स्थान पर बैठने लगे, तो मुनि श्री ज्ञानसागरजी आचार्य आसन की ओर संकेत करते हुए बोले "विद्यासागरजी ! क्या आचार्य आसन रिक्त रहेगा ? मैं अपना पद परित्याग कर चुका हूँ, आप यथास्थान बैठिएगा।" इस प्रकार उन्होंने विद्यासागरजी को आचार्य आसन पर बैठाया और स्वयं विद्यासागरजी के स्थान पर जाकर बैठ गए। ....और वे गदगद हो गए मुनि आसन पर बैठकर आचार्य महाराज (मुनिश्री ज्ञानसागर जी) गदगद हो गए। उनके चेहरे पर मुस्कान थी, क्योंकि वे आत्मसंस्कार के साथ सल्लेखना काल को स्वीकार कर रहे थे। उसके लिए वे निश्चिन्त हो गए थे। उन्हें हँसते हुए देख हम भी कुछ सोचकर हँसने लगे, तब गुरु महाराज ने मुझसे पूछा-"आप क्यों हँस रहे हैं ?" हमने कहा "जैसे आपने हँसते-हँसते आचार्य पद का त्याग किया है, वैसे ही मैं भी एक दिन हँसते हॅसते इस आचार्य पद का त्याग करूंगा, और ऐसे ही विकल्प रहित, उत्साह पूर्वक जीवन का उपसंहार करूंगा, यह विचार कर हँस रहा हूँ।" नवोदित आचार्य को बनाया अपना नियपिकाचार्य आचार्य श्री विद्यासागर जी गंभीर मुद्रा में आचार्य आसन में विराजमान थे। उनके हृदय में तरंगित भावनाओं को अभिव्यक्त करना कल्पनातिरेक होगा। कुछ क्षण पश्चात् मुनि श्री ज्ञानसागर जी उठे और आचार्य श्री विद्यासागरजी को नमन करते हुए बोले- "हे आचार्यश्री! मैं आपके आचार्यत्व में सल्लेखना लेना चाहता हूँ मुझे समाधिमरण की अनुमति प्रदान कीजिए।" मैं आपको निर्यापकाचार्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। आप मुझे अपना क्षपक बना लीजिए। मुनि श्री ज्ञानसागर जी द्वारा समाधिमरण की भावना व्यक्त करने पर उपस्थित विद्वानों, श्रेष्ठी, साधकों एवं श्रावकों की आँखें अश्रुपूरित हो उठीं। गुरु की वाणी सुनकर आचार्य श्री विद्यासागरजी विस्मित थे, उनका हृदय करुणा से विगलित हो उठा। इस तरह २२ नवम्बर, १९७२ को नसीराबाद स्थित सेठ जी की नसिया में प्रात:काल ९ बजे बड़ी शालीनता और विनम्रता से गुरु ने शिष्य को आचार्य पद प्रदान किया। ८२ वर्षीय गुरुदेव आचार्य ज्ञानसागर ने २६ वर्षीय अपने सुयोग्य शिष्य को आचार्य पद एवं निर्यापकाचार्य का दायित्व सौंपा ॥ यह सब देखकर जन समूह स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी उस दिन से लेकर फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक अर्थात् चार माह तक मात्र दूध, गेहूँ और जल ये तीन चीजें ही आहार में ग्रहण करते थे। कथनी-करनी में एकरूपता कार्यक्रम समापन के पश्चात् सर सेठ भागचंद्र जी सोनी, अजमेर (राजस्थान) ने लौटते समय आचार्य ज्ञानसागरजी से अजमेर पधारने की प्रार्थना की, तो गुरुवर मुस्कराने लगे। उनकी भक्ति और भोलेपन पर। और बोले - "भागचंद्रजी ! आप किससे अनुरोध कर रहे हैं। मैं अब संघ में मुनि हूँ, आचार्य नहीं। आप आचार्य विद्यासागरजी से चर्चा कीजिए।" मान मर्दन का अनूठा उदाहरण आचार्य पदारोहण देखने के बाद छगनलाल पाटनी जब अजमेर आए, तब अजमेर नसिया में विराजमान आर्यिका श्री विशुद्धमति माता जी ने श्रावक श्रेष्ठी पाटनी जी से आचार्य पद त्याग का आँखों देखा प्रसंग सुना। तब माता जी बोलीं - "ऐसा रिकॉर्ड हजारों वर्षों में नहीं मिलता, जो अपने शिष्य को आचार्य बनाकर स्वयं शिष्य बन जाए। इतना मान मर्दन करना बहुत ही कठिन है, जो कि अपने शिष्य को नमस्कार करे। धन्य हैं महाराज ज्ञानसागरजी।" दायित्व सौंपने की अनूठी कला काल का क्रम कभी रुकता नहीं। वह निरंतर प्रवाहमान है। चतुर्दशी का पावन पर्व आया। पूरे संघ ने उपवास के साथ पाक्षिक प्रतिक्रमण किया। प्रतिक्रमण के बाद आचार्य भक्ति करके नवोदित आचार्य की चरण वंदना की गई। यह दृश्य आश्चर्यकारी होने के साथ ही आनन्ददायक भी था। क्षपक मुनि श्री ज्ञानसागरजी ने अपने स्थान से उठकर आचार्य श्री विद्यासागरजी के चरणों में अपना मस्तक रख दिया। दोनों हाथों से नियपिकाचार्य जी के दोनों चरण कमलों को तीन बार स्पर्श किया और नवोदित आचार्य के चरण स्पर्श से पवित्रित अपने दोनों हाथों को प्रत्येक बार अपने सिर पर लगाते रहे। फिर आचार्य गुरुदेव के सामने नीचे धरती पर बैठकर गवासन की मुद्रा में प्रायश्चित हेतु प्रार्थना की। संस्कृत भाषा में ही प्राय: गुरु शिष्य की बातें होती थीं। वह बोले - "भी गुरुदेव! अस्मिन् पक्षे मम अष्टाविंशति - मूलगुणेषु.मा प्रायश्चितं दत्त्वा शुद्धि कुरुकुरु।" इस प्रकार प्रायश्चित का निवेदन करते हुए उन्होंने निर्यापकाचार्य श्री विद्यासागरजी के दोनों हाथ पकड़कर अपने सिर पर रख लिये, आचार्य विद्यासागर मौन मध्यस्थ बने रहे। संघस्थ साधु मुनि श्री विवेकसागरजी महाराज कुचामन सिटी, राजस्थान से चातुर्मास वर्षायोग सम्पन्न करके विहार करते हुए अपने दीक्षा गुरु क्षपक श्री ज्ञानसागरजी एवं नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के दर्शनार्थ नसीराबाद, अजमेर, राजस्थान पधारे थे। वह भी अपने स्थान से उठकर खड़े हुए और दोनों गुरुओं के श्रीचरणों में बैठकर विनयपूर्वक नमोऽस्तु निवेदन किया। उन्होंने भी अपने दीक्षा गुरु ज्ञानसागरजी का अनुकरण करते हुए पहले आचार्य विद्यासागरजी का चरणवंदन किया। पश्चात् स्वगुरु ज्ञानसागरजी के चरणों का वंदन किया। फिर हिन्दी भाषा में ही अपने गुरु से प्रायश्चित का निवेदन किया कि दीक्षा के बाद से अब तक जो भी अट्ठाईस मूलगुणों में दोष लगे हों, आप प्रायश्चित देकर मुझे शुद्ध करने की कृपा करें। तब क्षपक श्री ज्ञानसागरजी ने अपने ही द्वारा दीक्षित शिष्य मुनि विवेकसागरजी से कहा - "मैंने भी आपके सामने ही इन्हीं आचार्य महाराज से प्रायश्चित देने हेतु प्रार्थना की है। अब आप भी इन्हीं से निवेदन कीजिये।" तब श्री विवेकसागरजी महाराज ने नवोदित आचार्य महाराज से विनयपूर्वक निवेदन किया कि मुझे भी प्रायश्चित प्रदान करने की अनुकम्पा करें। ऐसा निवेदन करने पर आचार्य श्री ने पहले क्षपक श्री ज्ञानसागरजी को पाक्षिक प्रतिक्रमण के प्रायश्चित के रूप में ११ मालाएँ जपने का और श्री विवेकसागरजी को पाँच उपवास और ५१ मालाएँ जपने का प्रायश्चित सबके सामने दिया। फिर संघ के ऐलक जी, क्षुल्लक जी आदि अन्य त्यागीगण ने भी पाक्षिक प्रायश्चित नवोदित आचार्य महाराज से ग्रहण किया। सबको सात सात मालाएँ जपने का प्रायश्चित मिला। उपसंहार गुरु जी के बारे में सुनाना औपचारिकता जैसा लगता है। गुरु के बारे में कहना है तो उसका कोई अंत है ही नहीं। वह अनंत को कहना है। उनके विषय में कैसे स्तुति मैं कर सकता हूँ परन्तु कहने से आस्था बलवती हो जाती है। चाँद को देखूँ परिवार से घिरा सूर्य संत सा। रात को चाँद अकेला नहीं रहता, तारामंडल उसके चारों ओर बिखरा हुआ रहता है। ताराओं में चंद्रमा को ताराचंद भी कहते हैं। किन्तु दिन में जब सूर्य को देखते हैं तो वह किसी से भी नहीं घिरा रहता है। सूर्य के सिवाय और कोई परिग्रह से, परिवार से रहित नजर नहीं आता। इसी तरह गुरुजी को मैं सूर्य की तरह मानता हूँ, पर आपको चंद्रमा पसंद है इसलिए गुरुजी को चंद्रमा कहता हूँ। यदि सूर्य धरती को न तपाये अपने तेज से, तो वर्षा प्रारंभ नहीं होती। सूर्य नारायण की बदौलत हम सब आज खा-पी रहे हैं। सूर्य की तरह गुरुजी ने यदि हमको न तपाया होता, तो आज तक हम ठण्डे पड़ जाते। मन का काम नहीं करना। मन से काम करोगे, तो उनको और हमको भी समझ पाओगे। आज के दिन एक उच्च साधक ने अपने जीवन की अंतिम दशा में अपनी यात्रा को पूर्ण करने के लिए पूर्व भूमिका बनाई। "मैं आज के इस दिवस को आचार्य पद त्याग के रूप में स्वीकार करता हूँ, ग्रहण के रूप में नहीं।" आचार्य पद कार्य करने की अपेक्षा से महत्वपूर्ण होता है, आसन पर बैठने की अपेक्षा से नहीं। "गुरु महाराज ने आज आचार्यपद त्याग किया था, यह महत्वपूर्ण है। पद ग्रहण करना महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि ग्रहण करना हमारा स्वभाव नहीं त्याग करना हमारा स्वभाव है।" आचार्य पदारोहण दिवस पर आचार्य श्री के प्रवचन - मेरा लक्ष्य तो मेरे गुरु का अनुकरण करना है। ये तो सब व्यवहार के पद हैं। गुरु और शिष्य आगे पीछे दोनों में अंतर कहाँ
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