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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

संयम स्वर्ण महोत्सव

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  1. चैत्यभक्ति अजेय अघहर अद्भुत-अद्भुत पुण्य बन्ध के कारक हैं। करें उजाला पूर्ण जगत् में सत्य तथ्य भव तारक हैं॥ गौतम-पद को सन्मति-पद को प्रणाम करके कहता हूँ। चैत्य-वन्दना' जग का हित हो जग के हित में रहता हूँ ॥१॥ अमर मुकुटगत मणि आभा जिन को सहलाती सन्त कहे। कनक कमल पर चरण कमल को रखते जो जयवन्त रहे ॥ जिनकी छाया में आकर के उदार उर वाले बनते। अदय क्रूर उर धारे आरे मान दम्भ से जो तनते ॥१/१॥ जैनधर्म जयशील रहे नित सुर-सुख शिव-सुख का दाता। दुर्गति दुष्पथ दुःखों से जो हमें बचाता है त्राता ॥ प्रमाणपण औ विविध नयों से दोषों के जो वारक
  2. ‘समयसार' का पद्यानुवाद ‘कुन्दकुन्द का कुन्दन' और अध्यात्मरस से भरपूर ‘समयसारकलश' का पद्यानुवाद ‘निजामृतपान' ('कलशागीत' नाम से भी) है। यह ग्रन्थ संस्कृत में मूलरूप में है। इसमें अनुष्टुप्, आर्या, द्रुतविलम्बित, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलविक्रीडित, शिखरिणी, स्रग्धरा, वसन्ततिलका एवं मालिनी आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है, परन्तु निजामृतपान में छन्दों के अनुसार अनुवाद न होकर समस्त ग्रन्थ को अपने गुरुवर श्री ज्ञानसागरजी के नाम पर ही ‘ज्ञानोदय छन्द' में अनूदित किया गया है। नाटक समयसार कलश' की कठिन भाषा को ध्यान में रखते हुए आचार्यश्री ने लिखा है कि-मनोगत भावों को भाषा का रूप देना तो कठिन है ही,
  3. अध्ययन - अध्यापन एवं लेखन कार्य में जिनका संपूर्ण जीवन व्यतीत हुआ, ऐसे सरस्वती के पुत्र आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज से जुड़े पठन-पाठन सम्बन्धी प्रसंग, जो मुख्यतः आचार्य श्री विद्यासागरजी के श्रीमुख से निकले एवं कुछ अन्यत्र से भी चयन किए गए हैं, संकलित किए गए। उन प्रसंगों को इस पाठ में प्रस्तुत किया जा रहा है- शिक्षा लेना-देना गुरुजी को अच्छा लगता था। ढलती अवस्था में भी उन्हें इस बात की प्रतीक्षा रहती थी कि किसी को दे दें। उन्होंने ऐसा दिया कि जो दीया, बाती और लाइट से भी अधिक प्रकाशित है। वह टिमटिमाते दीपक को देखकर भागती हुई रात के समान है। चोटी के विद्वान् आएँ या बा
  4. संस्तुति 1 - आराध्य/आराधना विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/sagar-boond-samaye/araadhya-aaraadhna/
  5. परम श्रद्धेय गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अनेक रूपों में दर्शन होते हैं जब प्रज्ञाचक्षु उन्हें किसी भी अवस्था में देखते हैं तो वे मुनि, आचार्य, उपाध्याय, निर्यापकाचार्य, अभीक्षणज्ञानोपयोगी, आगमनिष्ठ, श्रेष्ठचर्यापालक, साधना की कसौटी, श्रमणसंस्कृति उन्नायक, ध्यानयोगी, आत्मवेत्ता-आध्यात्मिक संत, निस्पृही साधु, दार्शनिक कवि, साहित्यकार, महाकवि, बहुभाषाविद्, भारतीय भाषाओं के पैरोकार, भारतीय संस्कृति के पुरोधा महापुरुष, युगदृष्टा, युगप्रवर्तक, राष्ट्रीय चिंतक, शिक्षाविद्, सर्वोदयी संत, नवपीढ़ी प्रणेता, अपराजेय साधक आदि के रूप में पाते हैं। सन् १९६८ अजमेर नगर (राज.) में मह
  6. "एक साधक ने अपने लक्ष्य के अनुकूल पुरुषार्थ कर प्राप्त की कालजयी सफलता।" उन महान साधक की साधना से जुड़े विस्मयकारी प्रसंगों को, जिनसे जिनशासन हुआ गौरवान्वित, उन प्रसंगों को ही इस लेख का विषय बनाया जा रहा है। गुरुवाणी के साथ-साथ विषय की पूर्णता हेतु अन्य स्रोतों से भी विषय वस्तु को ग्रहण किया गया है। आगामी 2दिसम्बर 20 को हैं आचार्य पदारोहण दिवस आचार्य श्री ज्ञानसागर द्वारा मुनिश्री विद्यासागर को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा एवं संस्कार २२ नवम्बर १९७२, माघ शीर्ष कृष्ण द्वितीया, नसीराबाद, राजस्थान आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज का सन् १९७२ में नसीराबाद
  7. बीसवीं - इक्कीसवीं शताब्दी में सर्वाधिक दीक्षा देने वाले मूकमाटी महाकाव्य के रचयिता गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी का जीवन परिचय एवं चारित्र विकास का वर्णन इस अध्याय में है। 1. आचार्य श्री विद्यासागर जी कौन हैं ? आचार्य श्री शान्तिसागर जी के प्रथम शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी एवं आचार्य श्री वीरसागर जी के प्रथम शिष्य आचार्य श्री शिवसागर जी एवं आचार्य श्री शिवसागर जी के प्रथम शिष्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी एवं आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के प्रथम शिष्य सुप्रसिद्ध दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज हैं। 2. आचार्य श्री विद्यासागर जी का सामान्य जीवन परिचय बताइए ?
  8. दृष्टि पल्टा दो, तामस समता हो, और कुछ ना… हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  9. दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना करते हैं | हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी पंक्ति में ७ अक्षर, तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग ६०० हायकू लिखे हैं, वह इस प्रकार हैं :- १‍ - जुड़ो ना जोड़ो, जोड़ा छोड़ो जोड़ो तो, बेजोड़ जोड़ो। २ - संदेह होगा, देह है तो, देहाती ! विदेह हो जा | ३ - ज्ञान प्राण है, संयत हो त्राण है, अन्यथा श्वान| ४ -
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