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    प्रवचन पर्व 7 - उत्तम संयम

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    वदसमिदिपालणाए, दंडच्चाएण इंदियजएण।

    परिणममाणस्स पुणो, संजमधम्मो हवे णियमा॥

    व्रत व समितियों का पालन, मन-वचन-काय की प्रवृत्ति का त्याग, इन्द्रियजय यह सब जिसको होते हैं, उसको नियम से संयम धर्म होता है।

    'अनाश्रिता लता स्वयमेव लीयते' आश्रयहीन बेल अपने जीवन की अन्तिम बेला आने से पूर्व स्वयमेव ही समाप्त हो जाती है। वह स्वयं अपनी शक्ति के द्वारा जमीन से रस खींचकर अपना विकास करती है। इसके उपरान्त भी वह बहुत जल्दी समाप्त हो जाती है, क्योंकि वह अनाश्रित होती है। किन्तु बाग का होशियार माली जब उस बेल के फैलते ही उसे लकड़ी का सहारा देकर हल्के से बाँध देता है तब वह ऊध्र्वगामी होकर बहुत ऊँचाई पर पहुँच जाती है। हल्का सा वह बाँधा गया, बंधन उसे उन्नति में बाधक नहीं बनता अपितु ऊँचे बढ़ने में साधक ही बनता है।


    अगर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि यह जो सहारा दिया गया उस बेल को, वह सहारा अपने आप में है और बेल का बढ़ना अपने आप में है। फिर भी यदि सहारा नहीं मिलता तब वह बेल निश्चित ही ऊध्र्वगामी न होकर अधोगामी हो जाती और शीघ्र ही मरण को प्राप्त हो जाती। या यूँ कहिये कि उसका असमय में ही जीवन समाप्त हो जाता। यह तो एक उदाहरण है, आप समझ गये होंगे सारी बात। जिस दिशा की ओर बढ़ने की हमारी भावना हो तथा जो हमारी दृष्टि या लक्ष्य हो, उसके अनुरूप फल पाने के लिए हमें एक सशक्त सहारे की और हल्के से बंधन की आवश्यकता तो होती है। आज का संयम धर्म आलम्बन और बंधन दोनों रूपों में है।


    मोहतिमिरापहरणे, दर्शनलाभादवाप्तसंज्ञानः ।

    रागद्वेषनिवृत्त्यै, चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥४७॥

    आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार में बहुत अच्छी बात हमारे लिए कहकर गये हैं कि जिसका मोहरूपी अंधकार समाप्त हो गया है, जिसे सम्यग्दर्शन का लाभ होने से सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति सहज हो गयी है, इसके उपरान्त वह क्या करे? जब तक अंधकार का अभाव नहीं हुआ था, सम्यक्त्व का सूर्य नहीं उगा था, तब तक बिस्तर पर पड़े पड़े वह सोच रहा था और सोचना उसका ठीक भी था कि ज्यों ही सूरज का उदय होगा, अंधकार हटेगा त्यों ही उसके कदम आगे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जायेंगे। अब जब प्रकाश हो गया, अंधकार हट गया तो अब क्या करें? अब यह कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि क्या करें? जीवन की उन्नति का विचार रखने वाले के लिए प्रकाश अपने आप बता देता है कि क्या करना आवश्यक है? ठीक ऐसे ही जैसे कि मंदाग्नि समाप्त होने पर भूख लगती है और अपने आप ज्ञात हो जाता है कि मुझे क्या करना है? सम्यग्दृष्टि को तो यह पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती कि अब क्या करना है? शान्तिनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए पूज्यपाद स्वामी ने कहा है कि-


    न स्नेहाच्छरण प्रयान्ति भगवन्! पादद्वयं ते प्रजा,

    हेतुस्तत्र विचित्र-दुःख-निचयः, संसार घोरार्णवः।

    अत्यन्त–स्फुरदुग्र -रश्मि-निकर,–व्याकीर्ण–भूमण्डलो,

    ग्रैष्मः कारयतीन्दु-पाद-सलिलच्-,छायानुरागं रविः॥

    (शान्तिभक्ति–१)

    हे भगवन्! मैंने जो आपके चरणों की शरण गही है वह मात्र यह सोचकर नहीं कि आपके चरण बहुत सुन्दर हैं, बहुत अच्छे हैं, बहुत उपकारी हैं, उनके प्रति स्नेह करना चाहिए और न ही आपके चरणों ने मुझे आपके पास आने का कोई सन्देश भेजा है पर फिर भी मैं आपके ही पास आया हूँ, अन्यत्र नहीं गया। इसका कारण तो एक मात्र यह विचित्र कर्मों के समूह से सहित संसार रूपी भयंकर समुद्र है क्योंकि अत्यन्त प्रचण्ड किरणों से धरती को तपा देने वाला ग्रीष्मकाल का सूर्य स्वयमेव ही चन्द्रमा की किरणों से, पानी से और छाया से अनुराग करा देता है। कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अनादिकाल की प्यास और पीड़ा ही मुझे यहाँ तक ले आयी है। आपके प्रति अनुराग सहज ही हो गया। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का उदय होते ही चरण शीघ्र ही, मज्जिल की ओर चल पड़ते हैं। राग-द्वेष की निवृत्ति के लिए साधु-पुरुष चरित्र का आश्रय सहज ही ले लेते हैं।


    आज संयम का दिन है। उत्तम संयम का दिन है। आप लोगों के लिए अभी तक संयम एक प्रकार से बंधन ही लगा करता है। लेकिन जैसे उस लता के लिए लकड़ी आलम्बन और बंधन के रूप में उसके अपने विकास के लिए आवश्यक है। उसी प्रकार दर्शन और ज्ञान को अपनी चरम सीमा अर्थात् मोक्ष तक पहुँचाने वाला ही संयम का आलम्बन और बंधन है। उसका सहारा लेते समय ध्यान रखना कि जैसे योग्य खाद्य और पानी देना भी पौधों के लिए अनिवार्य है, अकेले सहारे या बंधन से काम नहीं चलेगा, वैसे ही संयम के साथ शुद्ध भाव करना भी अनिवार्य है। आज तक संयम के अभाव में ही इस संसारी-प्राणी ने अनेक दुख उठाये हैं। जो उत्तम संयम को अंगीकार कर लेता है, साक्षात् या परम्परा से वह मोक्ष अवश्य पा लेता है। आत्मा का विकास संयम के बिना सम्भव नहीं है। संयम वह सहारा है जिससे आत्मा उध्र्वगामी होती है। पुष्ट और सन्तुष्ट होती है। संयम को ग्रहण कर लेने वाले की दृष्टि में इन्द्रिय के विषय हेय मालूम पड़ने लगते हैं। लोग उसके संयमित जीवन को देखकर भले ही कुछ भी कह दें, पागल भी क्यों न कह दें, तो भी वह शान्त भाव से कह देता है कि आपको यदि खाने में सुख मिल रहा है तो मुझे खाने के त्याग में आनन्द आ रहा है। मैं क्या करूं? यह तो अपनी-अपनी दृष्टि की बात है। सम्यग्दृष्टि संयम को सहज स्वीकार करता है। इसलिए वह सब कुछ छोड़कर भी आनन्दित होता है।


    प्रारम्भ में तो संयम बंधन जैसा लगता है लेकिन बाद में वही जब हमें निबन्ध बना देता है, हमारे विकास में सहायक बनता है, हम ऊपर उठने लगते हैं और अपने स्वभाव को प्राप्त करके आनन्द पाते हैं, तब ज्ञात होता है कि यह बंधन तो निबन्ध करने का बंधन था। प्रारम्भ में मन और इन्द्रियों की स्वच्छंदता को दूर करने के लिए संयम का बंधन स्वीकार करना हमारे हित में है।


    जब हम बचपन में साइकिल चलाते थे, तब साइकिल चलाना तो आता नहीं था और मन करता था कि साइकिल चलायें और पूरी गति से चलायें, तभी आनन्द आयेगा। साइकिल बड़ी थी और सीट पर हम बैठ नहीं पाते थे, क्योंकि शरीर की ऊँचाई कम थी और यदि सीट पर बैठ भी जायें तो पैर पैडिल तक पहुँच नहीं पाते थे। तब पहले-पहले पीछे कोई व्यक्ति पकड़ता था और आगे भी एक हाथ से हैण्डिल पकड़ता था। धीरे-धीरे हैण्डिल पकड़ना आने लगा लेकिन बिना सहारे चला नहीं पाते थे। फिर पैरों में जब अभ्यास हुआ और हाथ से पकड़ने की क्षमता भी आ गयी और अपने बोझ को सँभालने का साहस भी आ गया तो हमने कहा कि भइया! तुम पकड़ते क्यों हो? छोड़ दो। लेकिन कुछ दिन वह पीछे से सहारा देकर पकड़े रहता था। कभी जरा छोड़ता था तो गिरने की नौबत आ जाती थी। फिर उसने कहा कि देखो मैं इस तरह पकड़े हूँ कि तुम्हें चलाने में बाधा नहीं आती। पीछे पकड़कर मैं खींचता नहीं हूँ, मैं तो मात्र सहारा दिये रहता हूँ।


    यही संयम का बंधन ऐसा ही सहारा देने वाला है। फिर जब पूरी तरह अपने बल पर चलने की क्षमता आ गयी तो उसने अपने आप छोड़ दिया। लेकिन समझा दिया कि ध्यान रखना मोड आने पर या किसी के सामने आ जाने पर Brake (रोधक) का सहारा अभी भी लेना पड़ेगा। संयम के पालन में निष्णात हो जाने पर भी प्रतिकूल परिस्थितियों में विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है।


    एक बार आनन्द लेने के लिए गाड़ी को हम चढ़ाव पर लेकर गये, फिर उसके उपरान्त उतार पर गाडी को लगा दिया और पाँच-छह पैडिल भी तेज-तेज चला दिया। गति ऐसी आ गयी कि अब संभालना मुश्किल लगने लगा। आगे एक मोड़ था और सँभालना नहीं आ रहा था। अचानक ब्रेक लगाऊं तो गिरने का डर था। तब एक पगडण्डी जो सड़क के बाजू से जाती थी, जो थोड़ी चढ़ाव वाली थी। बस! हमने उस और हैण्डिल मोड़ दिया और गाड़ी उस पगडण्डी पर जाकर धीरे-धीरे थम गयी। अगर ऐसे ही छोड़ देता तो नियम से गिरना पड़ता। अर्थ यह हुआ कि संयम के साथ सावधानी की बडी आवश्यकता है।


    आप लोग तो अभी Brake (रोधक) लगाये बिना ही गाड़ी को दौड़ा रहे हैं और नीचे जाते हुए भी आँख मींचे बैठे हैं। अनन्तकाल यूँ ही व्यतीत हो गया। आप सोचते हैं कि हम सुरक्षित रह जायेंगे, लेकिन आप स्वयं सोची, क्या संयम के बिना जीवन सुरक्षित रह पायेगा? जैसे गाड़ी सीखने-समझने के उपरान्त भी संयम और सावधानी की बडी आवश्यकता है, ऐसे ही सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान हो जाने के उपरान्त भी संयम की बडी आवश्यकता है। कोई चैम्पियन भी क्यों न हो, उसे भी वाहन चलाते समय संयम रखना पड़ता है अन्यथा दुर्घटना होने में देर नहीं लगती। सड़क के नियमों का पालन न करें तो भी दुर्घटना हो सकती है। जैसे सड़क पर चलने वाले हर यात्री को सड़क के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, उसी प्रकार मोक्ष के मार्ग में चलने वाले के लिए नियम-संयम का पालन अनिवार्य है।

    लेटे हुए व्यक्ति को कोई विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं पड़ती, पर बैठे हुए व्यक्ति को थोड़ी सावधानी की आवश्यकता है। क्योंकि बैठे-बैठे भी असावधानी होने से गिरना सम्भव है। इसके उपरान्त यदि कोई व्यक्ति एक स्थान पर खड़ा हो जाये और आँख मींच ले, तब तो बडी सावधानी रखने की आवश्यकता होती है। ऐसे ही मोक्षमार्ग में स्थित होकर नियम-संयम से चलने वाले को सावधानी रखने की बडी आवश्यकता है।


    आचार्यों ने कहा है कि खडे होकर साधक यदि ध्यान लगाये या महाव्रती आहार ग्रहण करें तो इस बात का ध्यान रखे कि दोनों पञ्जों के बीच में लगभग बारह अंगुल का और दोनों पैरों की एड़ियों के बीच कम से कम चार अंगुल का अन्तर बनाये रखें। तभी संतुलन (Balance) अधिक देर तक बना रह सकेगा, अन्यथा गिरना भी सम्भव है। यह तो खड़े होने की बात कही। यदि आप चल रहे हैं और मान लीजिये बहुत सकरे रास्ते से चल रहे हैं तब तो और भी सावधानी रखनी होगी। शिखरजी में चन्द्रप्रभु भगवान् की टोंक पर चढ़ते समय सकरी पगडण्डी से चलना पड़ता है। सीढ़ियाँ नहीं हैं, उबड़-खाबड़ रास्ता है, तो वहाँ सन्तुलन आवश्यक हो जाता है। वैसे ही सभी जगह सन्तुलन आवश्यक है।


    अभी आप यहाँ सुन रहे हैं। सुनने के लिए भी सन्तुलन की आवश्यकता है। जरा भी ध्यान यहाँ-वहाँ हुआ कि शब्द छूट जायेंगे। बात पूरी समझ में नहीं आ पायेगी। अभी थोड़ी देर पहले हम बोलते-बोलते रुक गये थे। आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों हुआ? तो बात ये है भइया! कि आचार्यों ने हमारे लिए भाषा-समिति पूर्वक बोलने का आदेश दिया है। आचार्यों ने कहा कि हमेशा संयम का ध्यान रखना। असंयमी के बीच बैठकर भी असंयम का व्यवहार नहीं करना। जिस समय बोलना सहज रूप से सम्भव हो उसी समय बोलना। यदि बोलते समय किसी व्यवधान के कारण बोलने में विशेष शक्ति लगानी पड़े तो भाषा-समिति भंग होने की संभावना रहती है। अभी ऊपर पण्डाल पर पानी की बूंदों के गिरने की तेज आवाज आ रही थी और माइक होते हुए भी आवाज आप तक नहीं पहुँच रही थी अत: तेज आवाज में बोलना ठीक नहीं था, इसलिए चुप रह गया।

     

    'प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपण हिंसा।' प्रमाद पूर्वक प्राणों का घात करने से नियम से हिंसा होती है। अत: संयम सभी क्षेत्रों में रखना होगा। संयम से व्यक्ति का स्वयं बचाव होता है और दूसरे का बचाव भी हो जाता है। जब आप लौकिक कार्यों में भी संयम का ध्यान रखते हैं तो आचार्य कहते हैं कि जिस मोक्षमार्ग पर मुमुक्षु चलता है उसके लिए तो चौबीसों घण्टे या जीवन पर्यन्त ही सावधानी की, संयम की बड़ी आवश्यकता होती है। थोड़े समय के लिए भी यदि असंयम भाव आ जायेगा तो नियम से वह गुणस्थान से नीचे गिर जायेगा अर्थात् परिणामों से पतित हो जायेगा। तब जहाँ निर्जरा होना अपेक्षित थी, वहाँ निर्जरा न होकर बंध होना प्रारम्भ हो जायेगा। असंयम के द्वारा जो बंध होता है वह कभी भी पूरी तरह निर्जरित नहीं हो सकता और मुक्ति भी नहीं मिलती। संयम के साथ जो संवर पूर्वक निर्जरा होती है उसी से निर्बन्ध दशा की प्राप्ति होती है। संयम के द्वारा प्रतिक्षण असंख्यात गुणी कर्म निर्जरा होती रहती है।

     

    "सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोह-क्षपकोपशमकोपशान्तमोहक्षपक-क्षीणमोहजिनाः क्रमशोसंख्येयगुणनिर्जरा:"

    तत्वार्थसूत्र (९/४५)

    इसमें कहीं भी असंयम के द्वारा असंख्यातगुणी निर्जरा होने का उल्लेख नहीं आया। सम्यग्दर्शन के साथ भी मात्र उत्पति के समय असंख्यातगुणी निर्जरा होती है, उसके उपरान्त नहीं। जीवन पर्यन्त सम्यग्दृष्टि अकेले सम्यक्त्व के द्वारा असंख्यात गुणी निर्जरा नहीं कर सकता। लेकिन यदि वह देशसंयम को अंगीकार कर लेता है अर्थात् श्रावक के व्रत अंगीकार कर लेता है, तो उसे असंख्यात गुणी निर्जरा होने लगती है। एक अव्रती क्षायिक सम्यग्दृष्टि मान लीजिये सामायिक के काल में सामायिक करने बैठा है तो भी उसकी असंख्यात गुणी निर्जरा नहीं होगी और वहीं एक देशव्रती भोजन कर रहा है तो भी उसकी असंख्यात गुणी निर्जरा हो रही है। आचार्य कहते हैं कि यही तो संयम का लाभ है तथा संयम का महत्व है। यदि कोई सकल-संयम को धारण करके महाव्रती बन जाता है तो उसकी असंख्यात गुणी निर्जरा और बढ़ जाती है। एक देशसंयमी श्रावक सामायिक में जितनी कर्म-निर्जरा करता है उससे असंख्यात गुणी निर्जरा एक मुनि महाराज आहार लेते समय भी कर लेते हैं। इसका कारण यही है कि जिसने संयम की ओर कदम ज्यादा बढ़ाये हैं उसकी कर्म-निर्जरा भी उतनी ज्यादा होगी। इतना ही नहीं, जिसने संयम की ओर कदम बढ़ाये उसके लिए बिना मांगे ऐसा अपूर्व-पुण्य का सञ्चय भी होने लगता है जो असंयमी के लिए कभी सम्भव ही नहीं है।


    संयम वह है जिसके द्वारा अनन्तकाल से बने संस्कार भी समाप्त हो जाते हैं। तीर्थकर भगवान भी घर में रहकर मुक्ति नहीं पा सकते। वे भी संयम लेने के उपरान्त निर्जरा करके सिद्धत्व को प्राप्त करते हैं। सम्यग्दर्शन का काम इतना ही है कि हमें प्रकाश मिल गया। अब मज्जिल पाने के लिए चलना हमें ही है। उद्यम हमें करना है और उस उद्यम में जितनी गति होगी उतनी ही जल्दी मज्जिल समीप आ जायेगी ।


    संयम के माध्यम से ही आत्मानुभूत होती है। संयम के माध्यम से ही हमारी यात्रा मञ्जिल की ओर प्रारम्भ होती है और मज्जिल तक पहुँचती है। यात्रा-पथ तो संयम का ही है। देशसंयम और सकल संयम ही पथ बनाते हैं क्योंकि चलने वाले से ही पथ का निर्माण होता है। बैठा हुआ व्यक्ति पथ का निर्माण नहीं कर सकता। वह पथ को अवरुद्ध अवश्य कर सकता है। असंयम के संस्कार अगर देखा जाए तो अनादिकाल से हैं तभी तो आज तक आप कभी भी, भूलकर भी, स्वप्न में भी दीक्षित नहीं हुए होंगे। कभी मुनि महाराज बनने का स्वप्न नहीं देखा होगा। हाँ, महाराजों को आहार देने का स्वप्न अवश्य देखा होगा।


    जिसकी संयम में रुचि गहरी है वह स्वप्न में भी अपने को संयमी ही देखता है। जिसका मन अभी दिन में भी भगवान् की पूजा, भक्ति और संयम की ओर नहीं लगता वह रात्रि में स्वप्न में भगवान् की पूजा करते हुए या संयम पूर्वक आचरण करते हुए स्वयं को कैसे देख पायेगा? बन्धुओ! अगर अपना आत्मकल्याण करना हो तो संयम कदम-कदम पर अपेक्षित है। लेकिन ध्यान रखना, संयम के माध्यम से किसी लौकिक चीज की अपेक्षा मत रखना। अन्यथा वह बाह्य तप या अकामनिजरा की कोटि में ही आयेगा। समन्तभद्र स्वामी ने स्वयम्भू-स्तोत्र में शीतलनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए लिखा है कि-


    अपत्यवित्तोत्तरलोकतृष्णया तपस्विनः केचन कर्म कुर्वते।

    भवान्पुनर्जन्मजराजिहासया त्रयीं प्रवृत्तिं समधीरवारुणत्॥४॥

    हे शीतलनाथ भगवन्! आपने जो संयम धारण किया, आपने जिस चारित्र को अंगीकार किया उसका उद्देश्य साधारण नहीं था। अन्य तपस्वियों की तरह आपने 'अपत्य-तृष्णया' अर्थात् पुत्र-रत्न की प्राप्ति की वाञ्छा से या 'वित्त-तृष्णया' अर्थात् धन–प्राप्ति की आकांक्षा से या “उत्तरलोकतृष्णया' अर्थात् परलोक या कदाचित् इहलोक के सुखों की प्राप्ति की आकांक्षा से संयम धारण नहीं किया, अपितु जन्म-जरा और मृत्यु का नाश करने के लिए संयम को अंगीकार किया है। यही आपकी असाधारण विशेषता है। आप रात-दिन अपनी आत्मा में लीन रहे। कभी प्रमाद को अंगीकार नहीं किया तथा कषाय को भी अंगीकार नहीं किया। आपकी प्रत्येक क्रिया में सावधानी ही नजर आती है। चलते समय आप सावधान रहे, भोजन करते समय भी आपने सावधानी को नहीं छोड़ा। अत: आप जैसे संयमी की चर्या से चौबीसों घण्टे उपदेश मिलता रहता है। संयमी का पूरा जीवन ही उपदेशमय हो जाता है। दौलतरामजी ने बारह-भावना का उपसंहार करते हुए पाँचवी-ढाल में लिखा है कि-


    सो धर्म मुनिन करि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये |

    ताको सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी ||

    और आचार्य पूज्यपाद स्वामी भी सर्वार्थसिद्धि के प्रारम्भ में कहते हैं कि अवाक्-विसर्ग वपुषा निरूपयन्तं मोक्षमार्ग-वचन बोले बिना, कुछ कहे बिना, जिनके दर्शन मात्र से मोक्षमार्ग का निरूपण होता रहता है, ऐसे सकल-संयम के धारी वीतरागी आचार्य ही भव्य जीवों का कल्याण करने में सहायक होते हैं।


    जिसके भीतर संयम के प्रति रुचि है वह तो संयमी के दर्शन मात्र से ही अपने कल्याण के पथ को अंगीकार कर लेता है। जिसे अभी आत्मतत्व के बारे में जिज्ञासा ही नहीं हुई कि हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? ऐसे कब से हैं? और ऐसे ही क्यों हैं? हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है? वह मोक्षमार्ग पर कैसे कदम बढ़ायेगा। जिसके मन में ऐसी जिज्ञासा होती है, वही संयम के प्रति और संयमी के प्रति भी आकृष्ट होता है। वह ही सच्चा मुमुक्षु है।


    यह तो भीतरी बात हुई, पर बाहर का भी प्रभाव कम नहीं है। एक संयमी व्यक्ति के संयमित आचरण को देखकर दूसरा भी संयम की ओर कदम बढ़ाने लग जाता है। जैसे क्लास में एक विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पर आ जाये तो सारे के सारे विद्यार्थियों की दृष्टि उस ओर चली जाती है और मास्टर को कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि तुम सभी को और मेहनत पढ़ाई में करनी चाहिए। विद्यार्थी अपने आप पढ़ने में मेहनत करने लग जाते हैं। एक राजा यदि संयम ग्रहण कर लेता है तो अन्य प्रजाजनों के मन में भी संयम के प्रति अभिरुचि अवश्य जागृत होने लगती है। वीतरागता की सुगन्ध अपने आप सभी तरफ फैलकर अपना प्रभाव डालती है और स्वयमेव ज्ञात होने लगता है कि आत्मोपलब्धि के लिए संयम की बडी आवश्यकता है।


    संयम का एक अर्थ इन्द्रिय और मन पर लगाम लगाना भी है और असंयम का अर्थ बेलगाम होना है। बिना ब्रेक की गाड़ी और बिना लगाम का घोड़ा जैसे अपनी मज्जिल पर नहीं पहुँचता उसी प्रकार असंयम के साथ जीवन बिताने वाले को मज्जिल नहीं मिलती। एक नदी मज्जिल तक तभी पहुँच सकती है, सागर तक तभी जा सकती है जब कि उसके दोनों तट मजबूत हों। यदि तट भंग हो जायें तो नदी वहीं-कहीं मरुभूमि में विलीन हो जायेगी। उसी प्रकार संयम रूपी तटों के माध्यम से हम अपने जीवन की धारा को मज्जिल तक ले जाने में सक्षम होते हैं। अकेला सम्यग्दर्शन विषयों की ओर जाते हुए इन्द्रिय और मन को रोक नहीं पाता। उसके साथ सम्यक्रचारित्र का होना भी नितान्त आवश्यक है।


    संयमी व्यक्ति ही कर्म के उदय रूपी थपेड़े झेल पाता है। जैसे बिजली के वायर में भारी से भारी करेण्ट क्यों न हो, लेकिन एक जीरो वॉट का बल्ब लगा दिया जाए तो वह सारे के सारे करेण्ट को सँभाल देता है और धीमा-धीमा प्रकाश बाहर आ पाता है। जबकि उसी स्थान पर अगर सौ वॉट का बल्ब लगा दिया जाये तो पूरा प्रकाश बाहर आने लगता है इसी प्रकार भीतरी कर्म के उदय को संभालने के लिए संयम जीरो वॉट के बल्ब की तरह काम करता है। वह उदय आने पर विचलित नहीं होने देता। संयम बनाये रखता है। कर्म अपना प्रभाव पूरा नहीं दिखा पाता।

    कर्म के वेग और बोझ को सहने की क्षमता असंयमी के पास नहीं है। वह तो जब चाहे तब जैसा कर्म का उदय आया, वैसा कर लेता है। खाने की इच्छा हुई और खाने लगे। देखने की इच्छा हो गयी तो देख लिया। सुनने की इच्छा हुई तो सुन लिया। वास्तव में देखा जाये तो इन्द्रियाँ कुछ नहीं चाहती। वे तो खिड़कियों के समान हैं। भीतर बैठा हुआ मन ही उन खिड़कियों के माध्यम से काम करता रहता है। कभी कर्णन्द्रिय के माध्यम से शब्द की ओर आकृष्ट होता है, कभी आँख के द्वारा रूप को देखकर मुग्ध हो जाता है, कभी नासिका के द्वारा सँघ लेता है, कभी वह रसना इन्द्रिय के द्वारा रस चखने की आकांक्षा करता है, तो कभी स्पर्श इन्द्रिय के माध्यम से बाह्य पदार्थों के स्पर्श में सुख मानता है। जो उस मन पर लगाम लगाने का आत्म पुरुषार्थ करता है, वही संयमी हो पाता है और वही कर्म के उदय को, उसके आवेग को झेल पाता है।


    वह संयमी विचार करता है कि इन्द्रियों के विषयों की ओर जाना आत्मा का स्वभाव नहीं है। मेरा/आत्मा का स्वभाव तो मात्र अपनी ओर देखना और अपने को जानना है। संयमी ही ऐसा विचार कर पाता है और संयमी ही आत्म पुरुषार्थ के बल पर अपने स्वभाव को प्राप्त कर लेता है।


    न भूत की स्मृति, अनागत की अपेक्षा, भोगोपभोग मिलने पर भी उपेक्षा |

    ज्ञानी जिन्हें विषय तो विष दीखते हैं, वैराग्य-पाठ उनसे हम सीखते हैं ||

    (समयसार-गाथा का हिन्दी पद्यानुवाद आचार्य विद्यासागर कृत)

    संयमी ही वास्तव में ज्ञानी है। जिसे पूर्व में भोगे गये इन्द्रिय विषयों की स्मृति करना भी नहीं रुचता और आगे भोगोपभोग की सामग्री मिले, ऐसी लालसा भी मन में नहीं आती। वह तो विषयों को विष मानकर छोड़ देता है और निरन्तर हमें/संसारी प्राणियों को वैराग्य का पाठ सिखाता है। वैराग्य का पाठ सिखाने वाला संयमी के अलावा और कोई नहीं हो सकता। आप चाहो कि संयम के अभाव में मात्र सम्यग्दर्शन में यह काम हो जाये तो सम्भव नहीं है।


    मैं पूछता हूँ कि यदि धर्म का फल मुक्ति है, ऐसा मजबूत श्रद्धान आपका है तो मोक्षमार्ग पर चलने का साहस क्यों नहीं है? रात्रि में खाते नहीं हैं, पर रात्रि भोजन का त्याग भी नहीं है। तात्पर्य यही हुआ कि कभी खाने का अवसर आया तो खा भी लेंगे। रास्ते से चलते समय आप देखकर चलते हैं, क्योंकि कंकर-पत्थर या काँटा लगने का भय है, लेकिन नीचे देखकर चलने के पीछे चींटी आदि को बचाने का भाव कभी नहीं आता। खाने-पीने की चीजें देखकर खाते पीते हैं कि कहीं भीतर जाकर शरीर के लिए बाधक न बन जायें। वहाँ दृष्टि आगम की अपेक्षा शोधन करने की नहीं है। अभिप्राय में यही अन्तर असंयम का प्रतीक है।


    एक बार पन्द्रह अगस्त की बात है। जिस समय हम स्कूल जाते थे। स्कूल में सुबह पहले प्रभात फेरी निकाली गयी फिर बाद में ध्वजारोहण किया जाना था। प्रबन्ध सब हो गया। ध्वजारोहण के साथ ही पुष्पवृष्टि की व्यवस्था भी की गयी थी। जब ध्वजारोहण के लिए डोर खींची गयी तो पुष्पवृष्टि नहीं हुई और ध्वजा भी नहीं फहरायी। बात यह हुई कि असावधानी हो गयी। ऐसी गाँठ ध्वजा की डोर में लगा दी कि समय पर डोर खींचने से खुली नहीं और ध्वजा के साथ पुष्पवृष्टि भी नहीं हुई।


    दुनियाँ के बंधन सब ऐसे ही हैं। तब हमने उसी समय समझ लिया कि भइया! ऐसे बंधन में नहीं बँधना है कि जिसके द्वारा जीवन में पुष्पवृष्टि रुक जावे। धर्म का फल मुक्ति है, ऐसा श्रद्धान होते ही संयम में इस ढंग से बँधी कि धर्म-ध्वजा ऊपर भी पहुँच जाये और ऊपर पहुँचकर फहराये तथा पुष्पों की वर्षा भी हो। बिना बंधे तो ध्वजा ऊपर नहीं जायेगी और न ही पुष्प ऊपर जा पायेंगे, इसलिए बंधन तो अनिवार्य है, पर ऐसा बंधन कि डोर खींचते ही ध्वजा फहराये और पुष्पों की वर्षा हो। गाँठ इतनी ढीली भी न हो कि बीच में ही खुल जाये और पुष्प गिर जायें। अकाल वृष्टि भी ठीक नहीं, अत: समय पर वृष्टि हो और वातावरण में सुगन्ध फैल जाये।


    बन्धुओ! संयम ऐसा होना चाहिए जो जीवन में सुगन्धि पैदा कर दे। संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में आदि से लेकर अन्त तक पुष्पवृष्टि के द्वारा अभिषिक्त होता रहता है। उसके जीवन में कभी विषाद या विकलांगता या दीनता-हीनता नहीं आती। वह तो राजाओं से बढ़कर अर्थात् महाराजा बनकर निश्चिन्तता को पा लेता है। उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहती। वह हमेशा खुश रहता है। ध्यान रखना-खुश्क नहीं रहता, खुश रहता है। (हँसी) हाँ ऐसा ही खुश। उसके वचन भी खुश करने वाले रहते हैं। जीवन भी खुश रहता है। सभी कुछ खुश रहता है और इस खुशहाली का कारण उत्तम-संयम ही है।


    सारे बंधनों से मुक्त होकर, सभी कुछ छोड़कर एक मात्र सच्चे देव-गुरु-शास्त्र से बंधना होता है, तभी जीवन में स्वतन्त्रता आती है। जीवन में उच्छंखलता ठीक नहीं है। भारत को स्वतन्त्रता पाये आज लगभग अड़तीस वर्ष हो गये, लेकिन स्वतन्त्रता जैसा अनुभव यदि कोई नहीं कर पाता तो उसका कारण यही है कि संयम को प्राप्त नहीं किया। वैसे तो स्वतन्त्रता को प्राप्त करना ही कठिन है, लेकिन स्वतन्त्रता के द्वारा आनन्द का अनुभव करना बिना संयमित जीवन के सम्भव नहीं है।


    संयम के साथ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जीवन में सुगन्ध आ रही है या नहीं? जीवन में संयम के साथ सुगन्ध तभी आती है, जब हम संयम को प्रदर्शित नहीं करते बल्कि अंतरंग में प्रकाशित करते हैं। प्राय: करके यही देखने में आ जाता है कि संयम का प्रदर्शन करने वालों के जीवन में खुशबू न देखकर अन्य लोग भी संयम से दूर हटने लग जाते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि कागज के बनावटी फूलों से खुशबू आ कैसे सकती है? संयम प्रदर्शन की चीज नहीं है। दिखावे की चीज नहीं है।


    अष्टपाहुड में आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने मुनियों के लिए भावपाहुड में लिखा है कि 'भावेण होई णग्गो' यानि भाव से नग्न हो। भाव से नग्नता ही जीवन को सुवासित करेगी, मात्र बाह्य नग्नता से काम नहीं चलेगा। साथ ही, यह भी कह दिया कि सकल संयम का धारी मुनि अपने आप में स्वयं तीर्थ है। उसे अन्य किसी तीर्थ पर जाना अनिवार्य नहीं है। लेकिन वह प्रमाद भी नहीं करता यानि तीर्थ के दर्शन मिलते हैं तो अवश्य करता है और नहीं मिलने पर अपने लिए जिनबिम्ब का निर्माण भी नहीं कराता।


    बड़ी सावधानी का काम है। जो भगवान् को अपने हृदय में स्थापित कर लेता है वह तो प्रतिक्षण उनके दर्शन करता ही रहता है। स्वयम्भूस्तोत्र में नमिनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्र स्वामी लिखते हैं कि-


    स्तुतिः स्तोतुः साधोः कुशल-परिणामाय स तदा,

    भवेन्मा वा स्तुत्यः फलमपि ततस्तस्य च सतः।

    किमेवं स्वाधीन्याजगति सुलभे श्रायसपथे,

    स्तुयान्न त्वां विद्वान्सततमभिपूज्यं नमिजिनम्॥१॥

    हे नमि जिन! आप यहाँ हो तो ठीक और यहाँ नहीं हो तो भी ठीक। कुशल परिणामों के द्वारा की गयी आपकी स्तुति फलदायिनी हुए बिना रह नहीं सकती। आपके द्वारा बताया गया श्रेयस्कर मार्ग स्वाश्रित और सहज सुलभ है। इसी से तो विद्वान्-जन आपके चरणों में नतमस्तक होते हैं और आपकी ही स्तुति करते हैं। यह है संयमी की आस्था। आस्था के साथ संयमपूर्वक भक्ति की क्रिया चलती है। इसलिए तो संयमी को कहा कि तुम स्वयं चैत्य हो। तुम स्वयं तीर्थ हो। धर्म की मूर्ति भी तुम स्वयं हो। तुम्हें देखकर अनेक को दिशाबोध मिल जाता है।


    ऐसा यह जिनलिग धारण करने वाले संयमी महाव्रती का माहात्म्य है। जिसने तिल तुष मात्र भी परिग्रह नहीं रखा, आरम्भ और विषय कषाय सब छोड़ दिया। हाथ से भी छोड़ दिया और मन से भी छोड़ दिया। इस जिनलिंग को धारण करने वाले हे मुनि! अब स्मरण रखना कि कभी जोड़ने का भाव न आ जाये। भाव से भी नग्न रहना। अन्यथा संयम का बाना मात्र प्रदर्शन होकर रह जायेगा। संयम तो दर्शन की वस्तु है, उसे प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाना।


    संयम वह है जिसके द्वारा जीवन स्वतन्त्र और स्वावलम्बी हो जाता है। ऐसा संयम प्राप्त करना सरल भी है, और कठिन भी। जो चौबीसों घण्टे अपने में लीन रहे, अपने आत्मा के आनन्द को पान करे उसे तो सरल है और जब कोई अपने अकेले होने से आनन्द के स्थान पर दुख का अनुभव करने लगे तो यही उसे कठिन हो जाता है। जैसे कि बारात घर से चली जाती है तो घर में ऐसा लगता है कि भाग चलो यहाँ से। हमारी निधि ही मानों यहाँ से चली गयी हो। संयमी व्यक्ति जब संयोग और वियोग सभी में समान भाव से रहता है तो संयम का मार्ग सरल लगने लगता है। अपने में लीनता आना ही सरलता की ओर जाना है। संयमित जीवन में प्रतिक्षण आत्मा का अध्ययन चलता रहता है।


    आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने मुनियों के २८ मूलगुणों में षट् आवश्यक के अन्तर्गत अलग से स्वाध्याय नहीं रखा। नियमसार ग्रन्थ में कह दिया कि प्रतिक्रमण ही स्वाध्याय है। जो चौबीसों घण्टे अपने आवश्यकों में मन को लगाये रखता है, उसका स्वाध्याय तो निरन्तर चलता ही रहता है। ईर्यासमिति पूर्वक चलना, एषणा-समिति पूर्वक आहार ग्रहण करना, भाषा समिति पूर्वक बोलना, आदान-निक्षेपण समिति को ध्यान में रखते हुए उठना-बैठना, उपकरणों को उठाना-रखना तथा मलमूत्र के विसर्जन के समय प्रतिष्ठापन-समिति का पालन करना, इन सभी के माध्यम से जो निरन्तर सावधानी बनी रहेगी, जागरूकता और अप्रमत्तता बनी रहेगी, वही तो स्वाध्याय है।


    संयोग-वियोग में जो समता परिणाम बनाये रखता है तथा अनुकूलता और प्रतिकूलता में हर्ष-विषाद नहीं करता, ऐसा संयमी व्यक्ति ही सच्चा स्वाध्याय करने वाला है। अब तो कोई संयम पूर्वक ग्रन्थ की उपयोगी बातों को हृदयंगम नहीं करते, मात्र दूसरे को बताने की दृष्टि से समयसार आदि महान् ग्रन्थों को मुखाग्र कर लेते हैं। कहें कि मात्र शिरङ्गम कर लेते हैं और इसी को स्वाध्याय मानकर बैठ जाते हैं।


    बन्धुओ! वास्तव में तो स्वाध्याय अपनी प्रत्येक क्रिया के प्रति सजग रहने में है। 'स्व' का निकट से अध्ययन करने में है। संयमपूर्वक प्रत्येक घड़ी, असंख्यात गुणी निर्जरा करते हुए समय का सदुपयोग करना ही कल्याणकारी है और इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

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    Samprada Jain

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    संयम वह है जिसके द्वारा जीवन स्वतन्त्र और स्वावलम्बी हो जाता है।

     

    सारे बंधनों से मुक्त होकर, सभी कुछ छोड़कर एक मात्र सच्चे देव-गुरु-शास्त्र से बंधना होता है, तभी जीवन में स्वतन्त्रता आती है।

     

    जिसके भीतर संयम के प्रति रुचि है वह तो संयमी के दर्शन मात्र से ही अपने कल्याण के पथ को अंगीकार कर लेता है। जिसे अभी आत्मतत्व के बारे में जिज्ञासा ही नहीं हुई कि हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? ऐसे कब से हैं? और ऐसे ही क्यों हैं? हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है? वह मोक्षमार्ग पर कैसे कदम बढ़ायेगा। जिसके मन में ऐसी जिज्ञासा होती है, वही संयम के प्रति और संयमी के प्रति भी आकृष्ट होता है। वह ही सच्चा मुमुक्षु है।

     

    अगर अपना आत्मकल्याण करना हो तो संयम कदम-कदम पर अपेक्षित है। लेकिन ध्यान रखना, संयम के माध्यम से किसी लौकिक चीज की अपेक्षा मत रखना। अन्यथा वह बाह्य तप या अकामनिजरा की कोटि में ही आयेगा।

     

    संयम तो दर्शन की वस्तु है, उसे प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाना।

    मन पर लगाम लगाने का आत्म पुरुषार्थ करता है, वही संयमी हो पाता है और वही कर्म के उदय को, उसके आवेग को झेल पाता है।

     

    अपने में लीनता आना ही सरलता की ओर जाना है। 

     

    संयमी ही वास्तव में ज्ञानी है। जिसे पूर्व में भोगे गये इन्द्रिय विषयों की स्मृति करना भी नहीं रुचता और आगे भोगोपभोग की सामग्री मिले, ऐसी लालसा भी मन में नहीं आती। वह तो विषयों को विष मानकर छोड़ देता है और निरन्तर हमें/संसारी प्राणियों को वैराग्य का पाठ सिखाता है। वैराग्य का पाठ सिखाने वाला संयमी के अलावा और कोई नहीं हो सकता। आप चाहो कि संयम के अभाव में मात्र सम्यग्दर्शन में यह काम हो जाये तो सम्भव नहीं है।

     

    जैसे उस लता के लिए लकड़ी आलम्बन और बंधन के रूप में उसके अपने विकास के लिए आवश्यक है। उसी प्रकार दर्शन और ज्ञान को अपनी चरम सीमा अर्थात् मोक्ष तक पहुँचाने वाला ही संयम का आलम्बन और बंधन है। उसका सहारा लेते समय ध्यान रखना कि जैसे योग्य खाद्य और पानी देना भी पौधों के लिए अनिवार्य है, अकेले सहारे या बंधन से काम नहीं चलेगा, वैसे ही संयम के साथ शुद्ध भाव करना भी अनिवार्य है। आज तक संयम के अभाव में ही इस संसारी-प्राणी ने अनेक दुख उठाये हैं। जो उत्तम संयम को अंगीकार कर लेता है, साक्षात् या परम्परा से वह मोक्ष अवश्य पा लेता है। आत्मा का विकास संयम के बिना सम्भव नहीं है। संयम वह सहारा है जिससे आत्मा उध्र्वगामी होती है। पुष्ट और सन्तुष्ट होती है। संयम को ग्रहण कर लेने वाले की दृष्टि में इन्द्रिय के विषय हेय मालूम पड़ने लगते हैं। लोग उसके संयमित जीवन को देखकर भले ही कुछ भी कह दें, पागल भी क्यों न कह दें, तो भी वह शान्त भाव से कह देता है कि आपको यदि खाने में सुख मिल रहा है तो मुझे खाने के त्याग में आनन्द आ रहा है। मैं क्या करूं? यह तो अपनी-अपनी दृष्टि की बात है। सम्यग्दृष्टि संयम को सहज स्वीकार करता है। इसलिए वह सब कुछ छोड़कर भी आनन्दित होता है।

     

    जो भगवान् को अपने हृदय में स्थापित कर लेता है वह तो प्रतिक्षण उनके दर्शन करता ही रहता है। स्वयम्भूस्तोत्र में नमिनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्र स्वामी लिखते हैं कि-

     

    हे नमि जिन! आप यहाँ हो तो ठीक और यहाँ नहीं हो तो भी ठीक। कुशल परिणामों के द्वारा की गयी आपकी स्तुति फलदायिनी हुए बिना रह नहीं सकती। आपके द्वारा बताया गया श्रेयस्कर मार्ग स्वाश्रित और सहज सुलभ है। इसी से तो विद्वान्-जन आपके चरणों में नतमस्तक होते हैं और आपकी ही स्तुति करते हैं। यह है संयमी की आस्था। आस्था के साथ संयमपूर्वक भक्ति की क्रिया चलती है। इसलिए तो संयमी को कहा कि तुम स्वयं चैत्य हो। तुम स्वयं तीर्थ हो। धर्म की मूर्ति भी तुम स्वयं हो। तुम्हें देखकर अनेक को दिशाबोध मिल जाता है। ... (महाव्रती अवस्था में श्री जी को साथ रखना जरूरी नहीं। यह आ. समन्तभद्र indirectly saying)

     

    अष्टपाहुड में आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने मुनियों के लिए भावपाहुड में लिखा है कि 'भावेण होई णग्गो'यानि भाव से नग्न हो। भाव से नग्नता ही जीवन को सुवासित करेगी, मात्र बाह्य नग्नता से काम नहीं चलेगा। साथ ही, यह भी कह दिया कि सकल संयम का धारी मुनि अपने आप में स्वयं तीर्थ है। उसे अन्य किसी तीर्थ पर जाना अनिवार्य नहीं है। लेकिन वह प्रमाद भी नहीं करता यानि तीर्थ के दर्शन मिलते हैं तो अवश्य करता है और नहीं मिलने पर अपने लिए जिनबिम्ब का निर्माण भी नहीं कराता।

     

    ~~~ उत्तम संयम धर्म की जय!

    ~~~ णमो आइरियाणं।

     

    ~~~ जय जिनेंद्र, उत्तम क्षमा!

    ~~~ जय भारत।

    2018 Sept. 19 Wed.: 12:56 @ J

     

     

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    रतन लाल

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    संयम बिना हमारा जीवन भी बिना ब्रेक के दौड़ने वाली गाड़ी सा हो जाएगा

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