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    प्रवचन पर्व 4 - उत्तम अार्जव

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    मोत्तूण कुडिलभावं णिम्मलहिदयेण चरदि जो समणो | 

    अज्जवधम्मं तड़यो, तस्स दु संभवदि णियमेण || 

    जो मनस्वी पुरुष कुटिल भाव वा मायाचारी परिणामों को छोड़कर शुद्ध हृदय से चारित्र का पालन करता है, उसके नियम से तीसरा आर्जव नाम का धर्म होता है।


    'योगस्यावक्रता आर्जवम्' योगों की वक्रता न होना ही आर्जव धर्म है ऐसा श्री पूज्यपाद स्वामी ने अपने सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ में कहा है। मन, वचन और काय इन तीनों की क्रियाओं में वक्रता नहीं होने का नाम 'आर्जव' है। ऋजोर्भावो ऋजुता का भाव ही आर्जव है। ऋजुता का अर्थ है सीधापन। ध्यान करते समय ध्यान के काल में आनन्द कब आता है? कौन सी वह घड़ी है जो आनन्द लाती है? तो इतना अवश्य कहा जा सकता है कि घड़ी देखते हुए ध्यान करने वालों के जीवन में ऐसी घड़ी नहीं आयेगी क्योंकि आपका मन अपने में लीन नहीं है। अपनी सीमा का उल्लंघन कर रहा है। अपनी सीमा से वहाँ तात्पर्य है मन, वचन और काय की प्रवृत्ति को सीमित करना और उसमें वक्रता नहीं आने देना। सीधे होने के उपरान्त ही एकाग्रता सम्भव होती है और एकाग्रता आये तो आनन्द की प्राप्ति स्वत: होने लगती है।


    ध्यान में एकाग्रता लाने के लिए ध्यान में बैठने से पहले समझाया जाता है कि रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठना। जिस व्यक्ति के अभी रीढ़ में सीधापन नहीं आया, शरीर में सीधापन नहीं आया, वह ध्यान में एकाग्रता कैसे ला पायेगा? जीवन की रीढ़ सीधी होनी चाहिए, क्योंकि चारित्र ही जीवन की रीढ़ है। यदि वह न हो अथवा हो पर वक्र हो, तब आर्जव धर्म नहीं आ पायेगा।


    विषय-कषाय में उलझे हुए उपयोग को वहाँ से हटाकर योग की ओर ले आना और फिर योगों की व्यर्थ प्रवृत्ति को रोककर दृष्टि को अपने में स्थिर करना, सीधे अपने से सम्पर्क करना, एक पर टिक जाना, प्रकंपित नहीं होना, चंचल नहीं होना ही ऋजुता है। यही आर्जव-धर्म है। जैसे जल के पास शीतलता है, तरलता भी है, अग्नि बुझाने की क्षमता भी है और बहने का स्वभाव भी है। इसके अलावा कोई आकर उसमें अपना मुख देखना चाहे तो झाँकने पर मुख भी दिख जाता है। यह जल की विशेषता है। लेकिन यदि जल स्पन्दित हो, तरंगायित हो, हवा के झोंकों से उसमें लहरें उठ रही हों, तब आप उस जल के सामने जाकर भी अपना मुख नहीं देख पायेंगे। जल में क्षमता होते हुए भी उस समय वह प्रकट नहीं है क्योंकि जल तरंगित हो गया है। इस प्रकार भोगों के माध्यम से आत्मा में होने वाले परिस्पन्दन के समय आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप में अनुभव नहीं किया जा सकता।

    एक बात और है कि यदि जल शान्त भी हो और हमारी दृष्टि चलायमान हो, तो भी जल के तल में पड़ी वस्तु देखने में नहीं आयेगी। लेकिन जो व्यक्ति जल की वक्रता होते हुए भी अपनी दृष्टि को निस्पंद कर लेता है तो वह लहरों को भेदकर भीतर की वस्तु को देखने में भी समर्थ हो जाता है। जिसकी दृष्टि में एकाग्रता रहती है, उसको नियम से उन लहरों में भी रास्ता मिल जाता है। इसी प्रकार साधक को अपने मन-वचन और काय की चञ्चलता के बीच एकाग्र होकर अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करने का प्रयास करना चाहिए।


    अपने यहाँ भेदविज्ञान की बड़ी विशेषता बतायी गयी है। भेदविज्ञान का अर्थ इतना ही नहीं है कि जो बहुत मिले-जुले पदार्थ हैं, उन्हें अलग-अलग करना, किन्तु भेदविज्ञान का अर्थ यह भी है कि भेद करके भीतर पहुँच जाना। लहरों के कारण वस्तु हमें ऊपर देखने में नहीं आती, लेकिन यदि हम भीतर डूब जायें तो ऊपर उठने वाली लहरों के कारण भीतर किसी भी प्रकार की बाधा नहीं पहुँच सकती। जो व्यक्ति एक बार वस्तु के स्वरूप में डूब जाता है तो फिर बाह्य में पर्याय की चंचलता उसे बाधक नहीं बनती। अभी जिसकी दृष्टि में भेदने की क्षमता नहीं आयी तो वह ऊपर उठने वाली लहरों के समान पर्यायों को ही देखेगा और उन्हीं में उलझता रहेगा। उन्हीं को लेकर रागद्वेष करता रहेगा। वह जितना-जितना रागद्वेष के माध्यम से उलझेगा, उतना-उतना स्वयं को देख नहीं पायेगा। वह कहेगा अवश्य कि देख रहा हूँ, लेकिन मात्र सतह को ही देख पायेगा।


    किसी को बुखार आ जाता है तो कोई हकीम-वैद्य की तरह हाथ की नब्ड्रा देखने लगे, तो क्या देखेगा? केवल नाड़ी की फड़कन को ही देख पायेगा। फड़कन देखना तो आसान है, उसे सभी देख लेते हैं लेकिन भीतर कहाँ क्या रोग हुआ है, इसका ज्ञान तो नाड़ी के विशेषज्ञ को ही हो सकता है, क्योंकि नाड़ी का स्पन्दन भीतर की व्याधि की सूचना देता है। अकेले नाड़ी की फड़कन को देखना जैसे पर्याप्त नहीं है इसके माध्यम से भीतर की व्याधि को जानना भी आवश्यक है, इसी प्रकार 'भेदं कृत्वा यद् विज्ञानं तद्भेदविज्ञानम्' या कहो कि 'भेदस्य यद्वज्ञानं तद्भेदविज्ञानम्' भेद करके जो जानता है वह भेदविज्ञानी है अथवा भेद को अर्थात् भीतरी रहस्य को जो जानता है वह भेदविज्ञानी है।


    जिन परमपैनी सुबुधि छैनी, डारि अंतर भेदिया ।

    वर्णादी अरु रागादि तैं निज-भाव को न्यारा किया।

    छहढाला

    भेदविज्ञानरूपी अत्यन्त पैनी छेनी के द्वारा, जो एक जैसा दिखाई पड़ रहा है, वह पृथक्पृथक् हो जाये। उसका भेद समझ में आ जाये, तो अपने निज-स्वभाव को उससे पृथक् किया जा सकता है। एक हंस होता है तथा एक बगुला होता है। दोनों सफेद होते हैं और दोनों की चोंच होती है लेकिन हंस की चोंच के भीतर ऐसी विशेषता है कि वह दूध और जल को पृथक् -पृथक् बना देता है और दूध का आसानी से सेवन करता रहता है और जल को छोड़ता जाता है? तात्पर्य यह हुआ कि जिसके पास भेद-विज्ञान आ जाता है वह सीधे अपनी निजी वस्तु तक पहुँच जाता है और व्यर्थ के रागद्वेष में नहीं उलझता।


    जब तक हम इस रागद्वेष में उलझते रहेंगे तब तक हम अपने भीतर वहाँ नहीं पहुँच पायेंगे जहाँ ऋजुता का पारावार है। वास्तव में देखा जाये तो दूसरे की ओर जाना ही टेढ़ापन है। रागद्वेष करना ही उलझना है। अपनी ओर आना हो तो सीधेपन से ही आना सम्भव है। रागद्वेष के अभाव में ही सुलझा जा सकता है। जैसे सीधी तलवार हो तो ही म्यान में जायेगी किन्तु यदि टेढ़ी हो तो नहीं जायेगी। ऐसे ही यदि ज्ञान का विषय सीधा ज्ञान ही बन जाये तो नियम से समझना काम हो जायेगा। किन्तु यदि ज्ञान का विषय हम अन्य किसी को बनाते हैं और बाह्य पदार्थों के साथ अपने ज्ञान को जोड़ते हैं तो वक्रता नियम से आयेगी, रागद्वेष रूपी उलझन खडी हो जायेगी।


    जैसे सीधे देखते हैं तो कोई Angle (कोण) नहीं बनता, टेढ़ापन नहीं आता। यदि थोड़ा भी अपने सिवाय कोई आजू-बाजू की वस्तुओं पर दृष्टिपात करता है तो आँख को मोड़ना पड़ेगा और कोण बन जायेगा अर्थात् दृष्टि में वक्रता आ जायेगी। इसी प्रकार मोह-माया के वशीभूत होकर यह जीव अपने-आत्म स्वभाव की ओर जब तक दृष्टिपात नहीं करता जो कि बिल्कुल सीधा है, तो नियम से वक्रता आती है। अपने स्वभाव से स्खलित होना पड़ता है। आर्जव धर्म अपने स्वभाव की ओर सीधे गमन करने पर ही सम्भव है।


    बच्चों को आनन्द तभी आता है जब वे सीधे-साधे न भागकर टेढ़े-मेढ़े भागते हैं। यही दशा वैभाविक दशा में संसारी प्राणी की है। उसे टेढ़ेपन में ही आनन्द आता है जबकि वह आनन्द नहीं है। वह तो मात्र सुखाभास है, जो दुख रूप ही है। विभाव रूप परिणति का नाम ही एक प्रकार से वक्रता है। जल में कोई चीज डालो तो सीधी नहीं जाती, यहाँ-वहाँ होकर नीचे जाती है। वैसे ही संसार में जब तक जीव रागद्वेष-मोह के साथ है तब तक वह चलेगा भी, तो जल में डाली गयी वस्तु के समान ही टेढ़ा चलेगा, सीधा नहीं चलेगा। उसका कोई भी कार्य सीधा नहीं होता। आप देख लीजिये आपके देखने में टेढ़ापन, आपके चलने में टेढ़ापन, आपके खाने-पीने, उठने-बैठने में टेढ़ापन, बोलने और यहाँ तक कि सोचने में भी टेढ़ापन है। सोचना स्वयं ही स्पन्दन रूप है अर्थात् विभाव है और विभाव ही टेढ़ापन है। वास्तव में परमार्थ से देखा जाये तो ऋजुता के स्वभाव में किसी भी प्रकार की विक्रिया सम्भव नहीं होती और विभाव के स्वभाव में किसी भी प्रकार की प्रक्रिया बिना विक्रिया के संभव नहीं होती।

    आपने युद्ध का वर्णन पुराणों में पढ़ा होगा। देखा-सुना भी होगा। दो तरह के आयुध होते हैं। कुछ जो फेंककर युद्ध में प्रयुक्त करते हैं वे 'अस्त्र' कहलाते हैं और कुछ हाथ में लेकर ही लड़ायी की जाती है वे 'शस्त्र' कहलाते हैं। धनुष बाण अस्त्र हैं। बाण से निशाना साधने वाला कितना ही दक्ष क्यों न हो यदि वह बाण टेढ़ा है तो लक्ष्य तक/मंजिल तक नहीं पहुँच पायेगा। पहले बाण का सीधा होना आवश्यक है फिर सीधा बाण लेकर जब निशाना साधते हैं तो दृष्टि में निस्पंदता होनी चाहिए और हाथ भी निष्कम्प होना चाहिए। हृदय में धैर्य होना चाहिए। अब तो समय के साथ सब कुछ बदल गया। धनुष के स्थान पर बंदूकें आ गयीं क्योंकि हृदय में, हाथ में और दृष्टि में सभी में चंचलता आती जा रही है। भय आता जा रहा है। आज तो छुप-छुप कर लड़ाई होती है। यह क्षत्रियता नहीं है, यह वीरता नहीं है बल्कि यह तो कायरता है। यह ऋजुता नहीं बल्कि वक्रता का परिणाम है।


    आज का जीवन भय से इतना त्रस्त हो गया है कि किसी के प्रति मन में सरलता नहीं रही। आज आणविक-शक्ति का विकास हो रहा है। दूसरे पर निगाह रखने के लिए Radar का उपयोग किया जा रहा है लेकिन यह सब चंचलता का सूचक है। जिस दिन यह चंचलता अधिक बढ़ जायेगी उसी दिन विस्फोट हो जायेगा और विनाश होने में देर नहीं लगेगी। बंधुओ! सुरक्षा तो सरलता में है। एकाग्रता में है। वक्रता या चंचलता में सुरक्षा कभी सम्भव नहीं है।


    आपने दीपक की लौ देखी होगी उससे प्रकाश होता रहता है और ऊष्मा भी निकलती रहती है। लेकिन यदि दीपक को लौ स्पन्दित हो तो प्रकाश में तेजी नहीं रहती। आप इस प्रकाश में पढ़ना चाहें तो आसानी से पढ़ नहीं सकते और दूसरी बात यह है कि उस समय ऊष्मा भी कम हो जाती है। सीधी निस्पंद जलती हुई लौ पर हाथ रखो तो फौरन जलन होने लगेगी। लेकिन यदि लौ हिल रही हो, प्रकम्पित हो तो हाथ रखने पर एकदम नहीं जलता। कुछ गर्माहट तो होती है लेकिन तीव्र जलन नहीं होती। कारण यही है कि लौ में एकाग्रता होने पर उसमें प्रकाश और ऊष्मा की सामथ्र्य अधिक बढ़ जाती है। लेकिन हवाओं के माध्यम से जब वही लौ चंचल हो जाती है, स्पन्दित होने लगती है, उसमें टेढ़ापन आ जाता है, वक्रता आ जाती है तो उसकी सामथ्र्य कमजोर पड़ जाती है। इसी प्रकार जब तक हमारा ज्ञान, माया रूपी हवाओं से स्पन्दित होता रहता है तब तक उसमें एकाग्र होने और जलाने की क्षमता अर्थात् कर्मों को जलाने या कर्मों की निर्जरा करने की क्षमता नहीं आ पाती। इसलिए हमें अपने ज्ञान को एकाग्र अर्थात् सीधा बनाना चाहिए। ज्ञान की वक्रता यही है कि वह पर पदार्थों को अपना मानकर उनकी ओर मुड़ने लग जाता है। उनमें उलझने लग जाता है और यदि वह पर पदार्थों को पकड़ने की जगह अपने में स्तब्ध, स्थिर एवं एकाग्र हो जाये तो वही ज्ञान
    कमों की निर्जरा में सहायक हो जाता है।

    ज्ञान का दूसरे की ओर दुलक जाना ही दीनता है. और ज्ञान का ज्ञान की ओर वापिस आना ही स्वाधीनता है। धन्य है वह ज्ञान जो पर पदार्थों की आधीनता स्वीकार नहीं करता, धन्य है वह ज्ञान जो बिल्कुल टंकोत्कीर्ण एक मात्र ज्ञायक पिण्ड की तरह रहा आता है। धन्य है वह ज्ञान जिस ज्ञान में तीन लोक पूरे के पूरे झलकते हैं, लेकिन फिर भी जो अपने आत्म आनन्द में लीन हैं।


    सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि, निजानन्द रसलीन ।

    सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि-रज-रहस-विहीन ॥

    संसारी प्राणी ज्ञान की चंचलता के कारण या कहें संसार में भटकने और उलझने की इच्छा के कारण त्रस्त हो रहा है और दीन-हीन हो रहा है। अपने स्वभाव की ओर देखने का पुरुषार्थ करें तो सुलझने में देर नहीं लगेगी। जिस प्रकार खाया हुआ अन्न देह में, रग-रग में मिलकर रुधिर बन जाता है, उसी प्रकार हमारे जीवन में सरलता या सुलझापन हमारा अभिन्न अंग बन जाये तो जीवन धन्य एवं सार्थक हो जायेगा।


    अपव्यय के रूप में उस कार में से एक बूंद भी पेट्रोल नीचे नहीं गिरा। मशीन भी ठीक काम कर रही थी पर देखा गया कि कार रूक गयी। उसमें एक बूंद पेट्रोल भी नहीं बचा। अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए जितना पेट्रोल आवश्यक था उतना उसमें डाला गया था, लेकिन वह पहले ही कैसे समाप्त हो गया? तब उसे चलाने वाले ने कहा कि कार तो और अधिक भी चल सकती थी, लेकिन रुकने का कारण यही है कि रास्ते की वक्रता के कारण पेट्रोल अधिक खर्च हुआ और दूरी कम तय की गयी। अगर रास्ता सीधा हो तो इतने ही पेट्रोल से अधिक दूरी तक कार को ले जाया जा सकता था। यदि सरल-पथ हो तो वह लाभ मिल सकता है।


    बंधुओ! आज आर्जव-धर्म की बात है। ऋजुता के अभाव में जब जड़ पदार्थ भी ठीक काम नहीं कर सकता, तो फिर चेतन को तनाव तो होता ही है। वक्रता तनाव उत्पन्न करती है। हमारे उपयोग में वक्रता होने के कारण मन में वक्रता, वचन में वक्रता और काय-चेष्टाओं में भी वक्रता आ जाती है। जैसा हम चाहते हैं, जैसा मन में विचार आता है, वैसा ही हम उपयोग को बदलना प्रारम्भ कर देते हैं। लेकिन यह ठीक नहीं है। यही तनाव का कारण बनता है। वास्तव में जैसा हम चाहते हैं उसके अनुसार नहीं, बल्कि जैसी वस्तु है उसके अनुसार हम अपने उपयोग को बनाने की चेष्टा करें तो ऋजुता आयेगी। हमें जानना चाहिए कि उपयोग के अनुरूप वस्तु का परिणमन नहीं होता। किन्तु ज्ञेयभूत वस्तु के अनुरूप ज्ञान जानता है, अन्यथा वह ज्ञान अप्रमाणता की कोटि में आ जाता है।


    विचार करें वक्रता कैसे आती है और क्यों आती है? तो बात ऐसी है कि जिस प्रकार के जीवन को हम जीना चाहते हैं या जिस जीवन के आदी बन चुके हैं उसी के अनुसार ही सब कुछ होता चला जाता है। जैसे किसी पौधे को कोई कुछ प्रबन्ध करके सीधा ऊपर ले जाने की चेष्टा करें तो वह पौधा सीधा ऊपर बढ़ने लगता है। यदि कोई प्रबन्ध नहीं किया जाए तो नियम से पौधा विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं में बँटकर यहाँ-वहाँ फैलने लग जाता है और उसकी ऊध्वगति रुक जाती है। इसी प्रकार यदि हम अपनी शक्ति को इधर-उधर नहीं दौड़ाते तो हमारी यह शक्ति एक ही दिशा में लगकर अधिक काम कर सकती है। लेकिन आज टेढ़ा-मेढ़ा चलना ही संसारी प्राणी का स्वभाव जैसा हो गया है और निरन्तर इसी में शक्ति का अपव्यय हो रहा है। वक्रता बढ़ती जा रही है। वक्रता का संसार दिनोंदिन और मजबूत होता जा रहा है।


    सरलता की शक्ति को पहचानना होगा। सरलता की शक्ति अद्भुत है। आज जो कार्य यन्त्र नहीं कर सकता, पहले वही कार्य मनुष्य मन्त्र के माध्यम से अपनी शक्ति को एक दिशा में लगाकर कर लेता था। बात ऐसी है कि धारणा के बल पर जिस क्षेत्र में हम बढ़ने लग जाते हैं वहाँ पर बहुत कुछ साधना अपने आप होती चली जाती है। वस्तुत: यह एक दृष्टिकोण का कार्य है। एक आपने विचार बना लिया, या जिस रूप में धारणा बना ली, उसी रूप में वह वस्तु देखने में आने लगती है। जिस दिशा में हमारी दृष्टि सीधी-साफ होती है उसी दिशा में सफलता मिलना प्रारम्भ हो जाती है। वक्रता का अभाव और ऋजुता का सद्भाव होना चाहिए। जैसे आपकी दृष्टि किसी वस्तु को या मान लीजिये पाषाण को देखने में लगी है। और उसे साधना के बल से अनिमेष देखने लगे, तो सम्भव है कि उस दृष्टि के द्वारा पाषाण भी टूट सकता है और लोहा भी पिघल सकता है। इतनी शक्ति आ सकती है। किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि दृष्टि को सीधा रखा जाए और प्राणप्रण से उसी में लगाया जाए। །


    मान लीजिये, आप बैठे हैं और जगह ऐसी है कि इधर-उधर जाने की कोई गुञ्जाइश नहीं है। अचानक एक बड़ा सा काला बिच्छू पास बैठा हुआ दिख जाए तो मैं पूछना चाहता हूँ कि आप अपने शरीर के किसी भी अंग-उपांग को हिलायेंगे-डुलायेंगे क्या? नहीं हिलायेंगे, बल्कि एकदम स्तब्ध से होकर बैठे रह जायेंगे, जैसे कि कोई योगी ध्यान में बैठा हो।


    सम्यक् प्रकार निरोध मन-वच-काय आतम ध्यावतें।

    तिन सुथिर मुद्रा देखि मृग गण उपल खाज खुजावते॥

    छहढाला (छठवीं ढाल)

    मन-वचन-काय की क्रियाओं का भली प्रकार निरोध करके जैसे कोई योगी अपनी आत्मा के ध्यान में लीन हो जाता है। उसकी स्थिर-मुद्रा को देखकर वन में विचरण करने वाले हिरण लोग उसे चट्टान समझकर अपने शरीर को रगड़ने लग जाते हैं। ऐसी ही दशा उस समय आपकी हो जायेगी। आपके पास यह शक्ति इस समय कहाँ से आ गयी? वह कहीं अन्यत्र से नहीं आती, अपितु

    यह शक्ति तो पहले से ही विद्यमान थी। पर आप उस समय हिल जाते तो बिच्छू ही आपको हिला देता। इसलिए प्राणों की रक्षा की बात आते ही आपने अपनी ऋजुता की शक्ति का पूर्ण निर्वाह किया। अपनी शक्ति का सही उपयोग किया।


    प्रत्येक क्षेत्र में यही बात है। आप चाहें तो धर्म के क्षेत्र में भी यही बात अपना सकते हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और शैक्षणिक आदि सभी विधाओं के लिए एकमात्र दृष्टि की ऋजुता ही उपयोगी है। यदि एक ही वस्तु पर ध्यान केन्द्रित हो जाए तो नियम से क्रांति घटित हो जायेगी। एक व्यक्ति बहुत ही प्रेम-भाव के साथ देखता है। उसकी दृष्टि में सरलता होती है तो सामने वाला व्यक्ति भी उसकी और सहज ही आकृष्ट हो जाता है। कोई व्यक्ति जिसकी दृष्टि में वक्रता है, जिसके भावों में कुटिलता है तो उसे देखकर हर कोई उससे बचना प्रारम्भ कर देता है। जैसे मुस्कराती हुई माँ की दृष्टि ज्यों ही सीधी बच्चे के ऊपर पड़ती है तो वह बच्चा रोना भूल जाता है और देखने लगता है। इतना सरल हो जाता है कि सब कुछ भूलकर उसी सुख में लीन हो जाता है। यही सरलता की बात है।


    जब हम Geometry (ज्यामिति) पढ़ते थे, उस समय की बात है। उसमें कई प्रकार के कोण बनाये जाते थे। एक सरल-कोण होता था। एक सौ अस्सी अंश के कोण को सरल-कोण बोलते हैं। सरल कोण क्या है? वह तो एक सीधी रेखा ही है। हमारी दृष्टि में आज भी इतनी सरलता आ सकती है कि उसमें सरल-कोण बन जाये। हम सरलता के धनी बन सकते हैं। जिसकी दृष्टि में ऐसा सरल कोण बन जाता है तो वह श्रमण बन जाता है। वह तीन-लोक में पूज्य हो जाता है। लेकिन हमारे जीवन में ऐसे बहुत कम समय आ पाते हैं, जबकि दृष्टि में सरल कोण बने और दृष्टि में सरलता आये।


    ऑख के उदाहरण के माध्यम से हम और समझें कि हमारी दोनों ऑखों को दोनों ओर दायेंबायें अपनी विपरीत दिशा की ओर भेज करके सरल कोण बनाना चाहें तो यह संभव नहीं है। दो आँखों से हम दो काम नहीं कर सकते। जब वस्तु के ऊपर दोनों आँखों की दृष्टि पड़ती है और दृष्टि चंचल नहीं हो तो ही वस्तु सही ढंग से दिखायी पड़ सकती है, अन्यथा नहीं। बहुत कम व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपनी दृष्टि को स्थिर रख पाते हैं और सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। नासाग्र दृष्टि ही ऐसी सरल दृष्टि है जहाँ विपरीतता समाप्त हो जाती है और समता आ जाती है। दृष्टि वहाँ दृष्टि में ही रह जाती है। दृष्टि का एक अर्थ यहाँ प्रमाण-ज्ञान से भी है और दृष्टि कोण का अर्थ नय ज्ञान से है।


    ‘नयन' शब्द में देखा जाए तो नय+न अर्थात् नयों के पार जो दृष्टि है वही वास्तव में शांत निर्विकल्प और सरल दृष्टि है। नयनों को विश्राम देना हो, आराम देना हो, उनकी पीड़ा दूर करना हो तो एक ही उपाय है कि दृष्टि को नासाग्र रखो। भगवान् कैसे बैठे हैं?'छवि वीतरागी नग्न मुद्रा दृष्टि नासा पे धरें।' हमारी यानि छद्मस्थों की दृष्टि वह मानी जाती है जो पदार्थ की ओर जाने का प्रयास करती है। और सर्वज्ञ की दृष्टि वह है जिसमें पूरे के पूरे लोक के जितने पदार्थ हैं-भूत, अनागत और वर्तमान वे सब युगपत् दर्पण के समान झलक जाते हैं। पुरुषार्थसिद्धयुपाय का मंगलाचरण देखिए


    तज्जयति परं ज्योतिः, समं समस्तैरनन्तपर्यायैः ।

    दर्पणातल इव सकला, प्रतिफलति पदार्थमालिका यत्र ॥

    उमास्वामी महाराज ने अपने तत्वार्थसूत्र में कहा है कि 'एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम्' और एकाग्रता का अर्थ बताते हुए अकलंक स्वामी अपने तत्वार्थवार्तिक में लिखते हैं कि 'व्यग्रतानिवृत्यर्थम्। एकाग्रताशब्दस्य प्रयोग:' एकाग्रता शब्द का प्रयोग व्यग्रता के निरोध के लिए आया है। जहाँ पदार्थ को देखने की व्यग्रता नहीं है, वहीं दृष्टि सरल है। केवलज्ञान के लिए ऐसे ही ध्यान की आवश्यकता है। ऐसी ही एकाग्र अर्थात् सरल दृष्टि की आवश्यकता है वस्तु को जानने के लिए। व्यग्र हुए ज्ञान के द्वारा केवलज्ञान नहीं होगा। जब ज्ञान स्थिर हो जायेगा उसमें व्यग्रता रूप वक्रता का अभाव हो जाएगा, वह ध्यान में ढल जायेगा तभी केवलज्ञान की उत्पत्ति में सहायक होगा।


    पूरे आगम ज्ञान का अध्येता भी क्यों न हो वह भी, तब तक मुक्ति का अधिकारी नहीं बन सकता, अपनी आत्मा की अनुभूति में लीन नहीं हो सकता जब तक कि उसकी व्यग्रता नहीं मिटती। जब तक कि दृष्टि रागद्वेष से मुक्त होकर सरल नहीं होती। व्यग्रता दूर करने के लिए ध्यान की एकाग्रता उपाय है। ध्यान के माध्यम से हम मन-वचन-काय की चेष्टाओं में ऋजुता ला सकते हैं और इन योगों में जितनी-जितनी ऋजुता/सरलता आती जायेगी, उपयोग में भी उतनी-उतनी व्यग्रता/वक्रता धीरे-धीरे मिटती जायेगी।


    आचार्यों ने वक्रता को माया-कषाय के साथ भी जोड़ा है और माया को तिर्यच आयु के लिए कारण बताया है। माया तैर्यग्योनस्य। तिर्यक्र शब्द का एक अर्थ तिरछा या वक्र भी है। इधर-उधर दृष्टि का जाना ही दृष्टि की वक्रता है। इधर-उधर कौन देखता है? वही देखता है जिसके भीतर कुछ डर रहता है। आपने कबूतर को देखा होगा। एक दाना चुगता है लेकिन इस बीच उसकी दृष्टि पता नहीं कितनी बार इधर-उधर चली जाती है। मायाचारी व्यक्ति को दिशा जल्दी नहीं मिलती। मायाचारी, तिर्यच्च गति का पात्र इसी से बनता है।


    माया अथार्त व्रक्र्ता भी कई प्रकार की है अनंतानुबंधी जन्य वक्रता अलग है अप्रत्याख्यान तथा प्रत्याख्यान कषायजन्य वक्रता अलग है और सज्ज्वलन की वक्रता अलग है। आचार्यों ने अनन्तानुबन्धी जन्य वक्रता के लिए बाँस की जड़ का उदाहरण दिया है। गांठों में गाटें इस प्रकार उलझी रहती हैं कि उनको सीधा करना चाहो तो सीधी न हों। अप्रत्याख्यान जन्य वक्रता के लिए मेढ़े के सींगों का उदाहरण दिया है। मेढ़े के सींग घुमावदार होते हैं। प्रत्याख्यान जन्य वक्रता खुरपे के समान है। जरा से ताप के द्वारा उसे सीधा किया जा सकता है। अब हमें देख लेना चाहिए कि हमारी उपयोग की स्थिति कैसी है? उसमें वक्रता कितनी है और किस तरह की है, उसमें कितने घुमाव और कितने मोड़ हैं?


    इस वक्रता को निकालने के लिए पहले मृदुता की बड़ी आवश्यकता है। मृदुता के अभाव में ऋजुता नहीं आती। जैसे किसी लोहे की सलाई में वक्रता आ जाये तो उसको ताप देने के उपरान्त जब उसमें थोड़ी मृदुता आ जाती है तब एक दो बार घन उसके ऊपर पटक दिया जाए तो उसमें सीधापन आ जाता है। इसी प्रकार कषायों की वक्रता निकालने के पहले रत्नत्रय धर्म को अंगीकार करके तप करना होगा। तभी ऋजुता आयेगी और आर्जव धर्म फलित होगा। घर बैठे-बैठे उपयोग में ऋजुता लाना संभव नहीं है। सलाई को लुहार के पास ले जाना होगा अर्थात् घर छोड़ना होगा। ऐसे ही तीर्थक्षेत्र पर आकर अपने उपयोग को गुरुओं के चरणों में समर्पित करना होगा और वे जो तप इत्यादि बतायें उसे ग्रहण करके कषायों पर घन का प्रहार करना होगा, तभी उपयोग में सरलता आयेगी।


    आपने शुक्लपक्ष में धीरे-धीरे उगते चन्द्रमा को देखा होगा। शुक्लपक्ष में प्रतिपदा के दिन चन्द्रमा की एक कला खुलती है। लेकिन उसे देखना सम्भव नहीं है। दूज के दिन देखने मिले तो मिल सकता है। दूज के चन्द्रमा को कभी-कभी कवि लोग बंकिम-चन्द्रमा भी कहते हैं। अर्थात् अभी चन्द्रमा में वक्रता है, टेढ़ापन है और जैसे-जैसे चन्द्रमा अपने पक्ष को पूर्ण करता जाता है, वैसे-वैसे उसकी वक्रता कम होती जाती है, जब पक्ष पूर्ण हो जाता है तब वह बंकिम चन्द्रमा नहीं बल्कि पूर्ण चन्द्रमा कहलाने लगता है। इसी प्रकार हमारे भीतर जो ग्रन्थियाँ पड़ी हैं, उन ग्रंथियों का विमोचन करके हम पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं। महावीर भगवान् का पक्ष अर्थात् उनका आधार लेकर जब हम धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे, तभी पूर्ण सरलता की प्राप्ति होगी। ग्रन्थियों का विमोचन करना अर्थात् निग्रन्थ होना, चारित्र को अंगीकार करना पहले अनिवार्य है। बारहभावना में पं. दौलतराम जी कहते हैं कि -


    जे भाव मोह तैं न्यारे, दूग-ज्ञान-व्रतादिक सारे |

    सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारै ||

    छहढाला (पाँचवी ढाल)

    सम्यकदर्शन, ज्ञान और चारित्र रूपी धर्म को धारण करके सभी प्रकार की अंतरंग और बहिरंग ग्रन्थियों का विमोचन करके ही अचल सुख को पाया जा सकता है। अकेले किताबी ज्ञान से कुछ नहीं होगा।


    जीवन की प्रत्येक क्रिया में धर्म का ध्यान रखना होगा। जिसके पास क्षमा धर्म है, वही क्रोध का वातावरण मिलने पर भी शान्त रहेगा। जिसके पास मान कषाय नहीं है वही लोगों के माध्यम से अपनी प्रशंसा सुनकर भी समता-भाव धारण कर सकेगा। यथाजात निग्रन्थ होकर ही कोई जीवन में वास्तविक ऋजुता का दर्शन कर सकता है। किताबों में, कोशों में या मात्र शब्दों के माध्यम से धर्म का दर्शन नहीं हो सकता। इतना अवश्य है कि कुछ संकेत मिल सकते हैं। धर्म का दर्शन तो जीवन में धर्म को अंगीकार करने पर ही होगा या जिन्होंने धर्म को धारण कर लिया है उनके समीप जाने पर ही होगा। बालक अपनी माँ के पास बैठकर अपने हृदय की हर बात बड़ी सरलता से कह देता है उसी प्रकार सरल हृदय वाला साधक जब यथाजात होकर सभी ग्रन्थियाँ खोल देता है और सीधा-सीधा अपने मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर देता है तो उसके जीवन में धर्म का दर्शन होने लगता है। वह स्वयं भी धर्म का दर्शन करने लग जाता है।


    माया जब तक रहेगी, ध्यान रखना इस जीवन में और अगले जीवन में भी वह शल्य के समान चुभती रहेगी। मायावी व्यक्ति कभी सुख का अनुभव नहीं कर सकता। जिस समय काँटा चुभ जाता है उस समय तत्काल भले ही दर्द अधिक न हो लेकिन बाद में जब तक वह भीतर चुभा रहता है तब तक वह आपको चैन नहीं लेने देता। स्थिति ऐसी हो जाती है कि न रोना आता है, न हँसा जाता है, न भागा जाता है और न ही सोया जाता है, कुछ भी वह करने नहीं देता। निरन्तर पीड़ा देता है। ऐसे ही माया कषाय मायावी व्यक्ति के भीतर-भीतर निरन्तर घुटन पैदा करती रहती है।


    बंधुओ! अपने उपयोग को साफ-सुथरा और सीधा बनाओ। जीवन में ऐसा अवसर बार-बार आने वाला नहीं है। जैसे नदी बह रही हो, समीप ही साफ-सुथरी शिला पड़ी हो और साफ करने के लिए साबुन इत्यादि भी साथ में हो, फिर भी कोई अपने वस्त्रों को साफ नहीं करना चाहे तो बात कुछ समझ में नहीं आती। कितनी पर्यायें एक-एक करके यूँ ही व्यतीत हो गयीं। अनन्तकाल से आज तक आत्मा कर्ममल से मलिन होती आ रही है। उसे साफ-सुथरा बनाने का अवसर मिलने पर हमें चूकना नहीं चाहिए। कषायों का विमोचन करना चाहिए। बच्चे के समान जैसा वह बाहर और भीतर से सरल है, उसी प्रकार अपने को बनाना चाहिए। यथाजात का यही अर्थ है कि जैसा उत्पन्न हुआ, वैसा ही भीतर और बाहर निर्विकार होना चाहिए।


    यही यथाजात रूप वास्तव में ऋजुता का प्रतीक है। यही एकमात्र व्यग्रता से एकाग्रता की ओर जाने का राजपथ है। इस पथ पर आरूढ़ होने वाले महान् भाग्यशाली हैं। उनके दर्शन प्राप्त करना दुर्लभ है। उनके अनुरूप चर्या करना और भी दुर्लभ है।


    रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे |
    उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे ||

    (मेरीभावना)

    ऐसी भावना तो हमेशा भाते रहना चाहिए। तिर्यञ्च भी सम्यकदर्शन को प्राप्त करके एक देश संयम को धारण करके अपनी-अपनी कषायों की वक्रता को कम कर लेते हैं तो हम मनुष्य होकर संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होकर यथाजात रूप को धारण क्यों नहीं कर सकते? कर सकते हैं। यथाजात रूप को धारण करने की भावना भी भा सकते हैं। जो उस यथाजात रूप का बार-बार चिन्तन करता रहता है, वह अपने उपयोग की सरलता के माध्यम से नियम से मुक्ति की मज्जिल
    की ओर बढ़ता जाता है और एक दिन नियम से मज्जिल को पा लेता है।

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    रतन लाल

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       2 of 2 members found this review helpful 2 / 2 members

    रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे |
    उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे |

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    Ashok Kumar Jain1958

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       1 of 1 member found this review helpful 1 / 1 member

    आचार्यश्री जी को कोटि कोटि नमन 

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