Jump to content
आचार्य श्री विद्यासागर मोबाइल एप्प डाउनलोड करें | Read more... ×
  • पावन प्रवचन 4 - मानसिक सफलता : एक अनुचिंतन

       (2 reviews)

    मनोविज्ञान सही-सही पूछा जाय तो, अध्यात्म तक पहुँचने के लिए, एक पृष्ठ भूमि का काम करता है लेकिन! ये ध्यान रखना, भौतिकवाद जहाँ विश्रान्त हो जाता है, जहाँ पर मनोविज्ञान का समापन होता है, वहाँ पर, अध्यात्मवाद नजर आने लगता है।


    जिसका ज्ञान पंचेन्द्रिय विषयों से आकर्षित है, वह व्यक्ति मन के माध्यम से विकास के स्थान पर अपनी आत्मा को विनाश की ओर ले जा रहा है।


    जिसको मनोविज्ञान प्राप्त हो गया वह नियम से कल्याण कर जाएगा इसमें कोई संदेह नहीं है। हमें वह ज्ञान प्राप्त करना है, जो हमारे जीवन में सुख-शांति ला सके।


    लोहशाला की बात है। लोहार प्रभात में उठकर अपने कार्यक्रमों से पूर्ण निवृत होकर अग्नि देवता को प्रज्वलित करता है। (केवल यहाँ पर भाव लेना यह पहले कह देता हूँ) और वह लोहार अग्नि-देवता को नमस्कार करता है, इसके उपरान्त उस अग्नि में जिस लोहे को तपाना था, वह उस लोहे को तपाना प्रारम्भ कर देता है, धोंकनी के माध्यम से धोंकता है। कुछ समय के उपरान्त उस लोह पिण्ड को वह बाहर निकालता है, उसे निहाई पर रखकर, ऊपर से घन का प्रहार करना प्रारंभ करता है।


    पसीना आना प्रारम्भ हुआ और श्वास लेने की गति तीव्र हुई। कोई बोले, तो वह सुनता नहीं है। किसी की तरफ वह देखता नहीं है। जहाँ पर मुड़न है वहाँ पर वह यह सीधा करने के लिए घन का प्रहार करता है। उन घनों के प्रहार करते समय एक आवाज उसके कानों में आती है, जैसे आकाशवाणी हो रही है, और वह वाणी प्रार्थना के रूप में लोहार के कानों में प्रवेश करती है। मेरे ऊपर दया कीजिए अन्यथा मैं जला दूँगी। जबकि मेरे ही सामने आकर सर्व-प्रथम मेरी वंदना/स्तुति की,और मेरे लिए अब पीट रहे हो, इतनी निर्दयता के साथ यह आपका व्यवहार मेरे प्रति ठीक नहीं है। मैं यदि कुपित हो जाऊँगी तो ध्यान रखना! लोहार को और लोहे के गोले को दोनों को जला दूँगी, राख-राख मिलेगी।


    इस वाणी को सुनकर लोहार कहता है कि तेरे पास अब वह हिम्मत नहीं है कि तू मुझे जला सके, क्योंकि! अब तुम लोहे के अधीन हो, और लोहा मेरे अधीन है। यदि तुम स्वतन्त्र रह जाती तो मैं बार-बार नमस्कार कर लेता, लेकिन! अब तू परतंत्र हो गई है। तूने ऐसे व्यक्ति की संगति पाई है, जिसको केवल पीट-पीट कर ही सीधा किया जा सकता है। वह पूजा से कभी भी सीधा होने वाला नहीं है। अग्नि ने वाणी को सुना तब वह अपनी गलती महसूस करती है। वह लोहार कहता है, ये ही तो बात है। मैं तुझे उस समय नमस्कार करूंगा जिस समय तू अपने रंग-रोगन के साथ विद्यमान रहेगी, तूने! लोहे की संगति की है इसलिए तेरी यह दशा हो रही है। लोहे को ही तूने जीवन बना लिया है। लोहार का कर्तव्य होता है उसको भी सही दिशा बता दी जाए। लोहा भी सुन रहा हैदेखो मेरे विकास के लिए कारण अग्नि बनी, और मेरे अन्दर जो खोट थी, उसको निकालने में कारण यह लोहार बना लेकिन अग्नि की क्या स्थिति हो गई! बड़ी अजीब स्थिति है -


    संत समागम प्रभुं भजन, तुलसी दुर्लभ दोड्य ।

    सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय।

    आज तक संसारी प्राणी ने इस दोहे के रहस्य को नहीं समझा। संतों की वाणी को हृदय से नहीं पकड़ा। उनका आशय क्या है ? आज तक समझने की कोशिश नहीं की। जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए इस पर कभी विचार नहीं किया, विचार करने के उपरान्त वहाँ तक पहुँचे नहीं। ऐसी संगतियों का समागम बीच में हुआ, जैसे अग्नि ने लोहे की संगति की,और उसकी पिटाई शुरू हो गई। उसी प्रकार की स्थिति संसारी प्राणी की हो रही है। देह रूपी लोहे की संगति में यह आया है, आने के उपरान्त इस संगति को बहुत अच्छा समझ कर उसे छोड़ना नहीं चाहता। और जब देह छूटने लग जाती है, तो उस समय देह को अक्षुण्ण रूप से रखने के लिए आविष्कारों की खोज करना प्रारम्भ करता है। उस समय संत की वाणी काम करती है और कहती है कि 'हमारा यह कार्य गलत हो रहा है तुम अरिहंत हो. सर्वज्ञ हो. पूज्य हो संसार में यदि कोई पूज्य है तो कौन-सी वस्तु पूज्य है"? भारतवासियों जागो! आँखें खोलो कौन-सी वस्तु पूज्य है? बोलो! मौन क्यों हो? (श्रोता समुदाय से पूछते हुए) महाराज! इसमें पूछने की क्या आवश्यकता है ? जहाँ कहीं भी आप चले जाओ जिसका आदर अधिक हो रहा हो वही तो पूज्य है ? किसका आदर हो रहा है ? वह कौन सी वस्तु है जो तुम्हें पूज्य है ?


    जिसकी सुरक्षा की जाती है, और जिसकी सुरक्षा के लिए जो खड़ा हो जाता है, उसकी पूजा! उस बीज की पूजा! हाँ-जिसके लिए जो नियुक्त किया जाता है नियुक्तवान व्यक्ति पूज्य नहीं है, किन्तु जिसके लिए नियुक्त किया जाता है, वह वस्तु पूज्य है। भारत में वह वस्तु पूज्य है, जिसके पास ज्ञान है, जिसके पास संवेदना शक्ति है। और हित की आकाँक्षा बनी रहती है, जिसने हित प्राप्त कर लिया, जिसके पास जानने-देखने की शक्ति है, वही पूज्य है। पूज्य बनने की योग्यता प्रत्येक आत्मा में विद्यमान है किन्तु ये ध्यान रखना वर्तमान में उसकी पिटाई हो रही है लोहे की संगति से लोहार के द्वारा। इस करुण दृश्य को देखकर इस अज्ञानता पर और इस मोह के प्रभाव पर संत लोग विचार करते हैं, करुणा करने से काम होगा या दण्ड देने से काम होगा, किस माध्यम से इस मूर्खताअज्ञानता को, इस दयनीय स्थिति को हम ठीक कर दें, सब विचार करते हैं।

    सन्त लोगों का काम और कुछ नहीं रहता। जीवन में जीते हुए वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, किन्तु जो लक्ष्यहीन जनता है, सुख की चाह रखती है, उस जनता के लिए भी कोई रास्ता?पथ-दिशाबोध देते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि हमारे पास जो प्रकाश है उस से सही रूप से लोगों का मार्ग प्रशस्त हो। इस प्रकार लोहार की वाणी को सुनकर अग्नि अपनी कमी पर विचार करती है। हाँ, वस्तुत: मुझे स्वतंत्र रहना था, और किसी भी प्रकार से मुझे स्वतंत्र जीवन-जीने की इच्छा रखनी चाहिए। लेकिन! मैंने उसका साथ दिया, तो मेरी पिटाई हो गई। अग्नि की पिटाई कब तक होती है? जब तक लोहे की संगति अग्नि करेगी तब तक पिटाई होगी। इसी प्रकार देह की संगति करने से आत्मा की पिटाई हो रही है, और जब तक आत्मा देह की संगति करेगी तब तक उसकी पिटाई होगी। आप कितना भी इलाज करिये! बचने की कोशिश करिये, और बहुत सारी सामग्री का निर्माण भी कर लीजिए तो भी संभव नहीं है। तो हमें यहाँ आकर ज्ञात हो जाता है कि मात्र ज्ञेय की कद्र नहीं है बल्कि! ज्ञान की कद्र है, दृश्य की नहीं दृष्टा की कद्र है, भोग की नहीं भोक्ता की कद्र है, वह पूजा करना सिखाता है।


    भारतीय संस्कृति का एक मात्र यही लक्ष्य है, कि स्व को पहिचानो-उसको देखने की चेष्टा करो यद्यपि वह इस स्थिति में देखने के लिए मिलने वाला नहीं है। जानने के लिए भी मिलेगा नहीं, वह वर्तमान में संवेदन के लिए मिलने वाला नहीं है। इसके उपरान्त भी सन्तों की अनुभूति के माध्यम से जो कुछ भी वाणी खिरी है, उससे यह ज्ञात होता है कि ऐसी भी कोई अद्वितीय शक्ति है, जिसके द्वारा यह सारा का सारा संचालन हो रहा है। प्रात:काल से लेकर शाम तक चौबीसों घण्टों तक सारा काम अक्षुण्ण रूप से चलता रहता है।


    किसी भी मशीन का वर्तमान में आविष्कार हुआ है, तो वह आठ घंटे तक ड्यूटी दे सकती है। फिर उसके उपरान्त उसे विश्राम की आवश्यकता होती है। मशीन तप जाती है, और उसको ठंडा बनाने के लिए बहुत सारे प्रयास किये जाते हैं। इसके उपरान्त भी यदि थोड़ी असावधानी हो जाती है, तो मशीन फेल हो जाती है, नष्ट हो जाती है, बर्बाद हो जाती है। किन्तु यह कौन-सी मशीन है, जिसका कार्य रात - दिन चल रहा है? और ऐसा चल रहा है कि ऊपर का ढाँचा खिसक करके जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। किन्तु वह कौन सी अद्वितीय शक्ति है, जिसका कभी नाश नहीं हुआ और न होगा। जिसमें कभी जीणों द्वार करने की आवश्यकता नहीं है।


    भारतीय सभ्यता उसी शक्ति की उपासना सिखाती है। उसी की उपासना करना है, अन्य की नहीं। लेकिन! उपहास की बात तो ये है कि सारे लोग भारतीय संस्कृति को भूल कर किस ओर जा रहे हैं, पता भी नहीं है उन्हें । आज प्रत्येक पदार्थ के ऊपर कीमत-मूल्य लिखा हुआ है लेकिन! ज्ञान के ऊपर मूल्य आज तक नहीं लिखा गया। ज्ञान के द्वारा आविष्कृत किए ज्ञेय पदार्थ का मूल्य तो हम जानते हैं, और हम उसकी कद्र करते हैं। जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर वह पदार्थ निर्मूल्य हो जाता है। किन्तु इसके उपरान्त भी आज कूड़ा-कचरा (वेस्टेज सामग्री) का भी मूल्य होता चला जा रहा है। और मूल्य आँकने वाला ज्ञान भी वेस्ट होता चला जा रहा है। ज्ञान का मूल्य आज समाप्त हो गया है। पदार्थ की कीमत हो गई है। जीर्ण-शीर्ण पदार्थ की भी कीमत हो गई है। जंग खाया हुआ लोहा और टीन का टुकड़ा भी ऐसे एयर कन्डीशन में पहुँच रहा है, जो यह भिलाई स्टील प्लांट आपको बता रहा है। क्या है ये समझ में नहीं आ रहा? सब की कीमत हो गई आज! कोई भी नीचे रहने योग्य पदार्थ नहीं रहा। सारे के सारे पदार्थों को Decoration (सजावट) में रखा जा रहा है। लेकिन! रखने वालों की फजीहत हो रही हैं। उन्हें पसीना आ रहा है, वे भटक रहे हैं। आज निर्धन भी भटक रहा है, और धनवान भी भटक रहा है। सारा का सारा मानव समाज सही दिशा बोध नहीं मिलने से भटक रहा है, ज्ञान भटक रहा है। लेकिन ज्ञेय पदार्थ बढ़िया-बढ़िया शो-रूम में है, इसी को बोलते हैं भौतिकवाद-पाश्चात्य संस्कृति।


    विज्ञानवाद का चमत्कार है कि वह ज्ञान को न पूज करके ज्ञान के द्वारा जो बनाया हुआ पदार्थ है, उस पदार्थ को पूज रहा है। किसकी सोबत में आ गए आप? जड़ की सोबत में! और आते ही जा रहे हैं। आज कोई विदेश रिटर्न होकर आता है, तो क्या बताएँ वह भारतीय संस्कृति वहाँ पर जायेगी? देहली के ऐरोड्रम पर मालाओं के द्वारा उसका स्वागत होगा। फूलों से लद जाएगा, लेकिन वह वहाँ से क्या लेकर के आ रहा है ? ज्ञेय की उपासना, यह ज्ञान की कीमत नहीं है। इसे महान् दुर्भाग्य कहना होगा कि जैसे-जैसे विज्ञानवाद बढ़ रहा है वैसे-वैसे अध्यात्मवाद मिटता जा रहा है। और ज्ञेय की कीमत इतनी हो रही है कि वह आसमान तक पहुँच रहा है, और इसके बहकावे में, इसकी चपेट में सारी की सारी भारतीय संस्कृति आ रही है। जब तक वह भारत में पड़ा रहेगा, तब तक उसकी कीमत कम और यहाँ से विदेश चला जायेगा तो उसकी कीमत बढ़ जायेगी। क्योंकि ज्ञेयों को पैदा करता चला जा रहा है। साथ में ऐसे-ऐसे पदार्थों को जिनके द्वारा ज्ञान और अध्यात्मवाद समाप्त होता चला जाएगा।


    स्थिति बहुत विचित्र है, मैं बोल्यूँ और प्रशंसा करूं तो किसकी करूं? मैं बोल्यूँगा, भले ही भौतिकवाद के ऊपर लेकिन पूर्ण रूपेण उसकी क्या करूंगा बुराई! भले ही आप लोगों को बुरा लग जाए। मैं कभी भी उसको मूल्य की दृष्टि से नहीं देख सकता! जो जड़ है उसको मूल्य नहीं दिया जाएगा। जो ज्ञान विकास की ओर जा सकता है उस ज्ञान को मूल्य दिया जाएगा और उसकी हम पूजा करने हमेशा तत्पर रहेंगे। वही ज्ञान जिसके द्वारा आत्मा को शांति मिलती है वही ज्ञान जो विश्व को शांति प्रदान कर सकता है, वही ज्ञान परतन्त्रता से छुड़ा कर स्वतन्त्रता प्रदान करने वाला है। वही ज्ञान हमें मुक्ति तक ले जाएगा, उसी ज्ञान की पूजा हमें करनी है।

    वह अग्नि छटपटा रही है, कि लोहे की संगति मैंने क्यों की? छटपटाने का अर्थ यही है कि लोहार के द्वारा जो ज्ञात हुआ कि लोहा जो टेढ़ा हो गया, उसे सीधा करने के लिए अग्नि को बुलाया गया। उसी प्रकार आपके देह रूपी लोहे को सीधा करने के लिए, ध्यान रूपी अग्नि को बुलाना होगा, और तप-त्याग-तपस्या-संयम के घन से उसकी पिटाई करनी होगी तब उस आत्म तत्व की उपलब्धि होगी, अन्यथा तीन काल में संभव नहीं है। शरीर तो एक दिन अग्नि को समर्पित करना ही है, किन्तु शरीर के मिटते-मिटते, आत्मतत्व की उपलब्धि हो जाए, और अपने जीवन में निखार आ जाए, वहाँ कंचन पैदा हो जाए। काँच के पीछे दौड़ने वाला यह युग कंचन को भूल गया है। आज काँच के मंदिर बनते जा रहे हैं। आज काँच देखने में आ रहा है लेकिन हीरा देखने में नहीं आ रहा है जिसकी कीमत अनमोल है। एक इतना सा टुकड़ा (अँगुलियों को सिकोड़कर बताते हुए) और उसका मूल्य नहीं आंका जा सकता। वह खुद नहीं कह सकता कि मेरी कीमत इतनी है, उसकी चमक अपने आप कीमत का अंकन कर लेगी।


    वह अजर-अमर-अविनाशी आत्म तत्व हीरे के समान है। आज उसकी रक्षा में कौन तत्पर है? और कौन उसका मूल्यांकन कर रहा है ? वे बहुत कम हैं ऊँगलियों में गिनती आएगी! विरले ही लोग आत्म तत्व की ओर अग्रसर हैं।


    सन्तों की वाणी सुनने से सन्तों के समागम से हमें आत्म तत्व का मूल्य ज्ञात हो जाता है। बातों से कोई मतलब नहीं है, मतलब हमें बस यही है कि हमारी दिशा बदल जाये। हमारा ज्ञान जिस ओर भाग रहा है, उसे सही दिशा-बोध मिल जाए। ये भागना ठीक नहीं क्योंकि त्राहि-त्राहि मची हुई है कहीं भी किसी भी क्षण शान्ति नहीं है। इन भोग्य पदार्थों में यदि शांति होती तो हमें अवश्य मिलती, किन्तु है ही नहीं तो मिलेगी कैसे? वस्तुओं के संग्रह-संकलन करने से अशान्ति ही मिलती है।


    बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य को माना है, इस सत्य को माना है। क्योंकि उन्हें सत्य की ओर जाना था, लेकिन! असत्य की ओर पहुँच गए। असत्य क्या है ? जिसके द्वारा दुख होता है, सत्य वह है जिसके द्वारा सुख होता है। इस सत्य को पहिचानने और ढूँढ़ने की फिर कोई आवश्यकता नहीं। मुझे शांति मिल गयी। आकुलता मिट गई। इसी के लिए तो लोग उद्यम कर रहे हैं, रात-दिन । संगति करना है तो सज्जनों की करिये । जड़ की ओर मत जाइये, चेतन की ओर जाइये । भले ही मूर्ख की संगति करिये। क्योंकि कभी मूर्ख के मुख से भी दिशा-बोध परक शब्द निकल जाते हैं। मूर्ख की सौबत करने से क्या होता है ? पागल की सौबत करने से क्या होता है ?


    यदि आप लेना चाहें तो बहुत कुछ मिल सकता है, महाराज! ये तो आप गजब की बात कर रहे हो। पागल के पीछे-पीछे हम चले जायें। हाँ,. हाँ पागल के पीछे ही आप रहते हैं, कभी पागल आपके पीछे नहीं रहता हमेशा आगे ही रहता है। और क्या सीखना चाहते हो? बोलिए! चुप क्यों हैं? आप हँसेंगे उसे देख कर लेकिन! वह आपको देख कर नहीं हँसेगा। पागल वो है या आप हैं। वस्तुत: जो व्यक्ति किसी से मतलब नहीं रखता वही वास्तव में निमोंही माना जाता है। पागल के पास परिग्रह की बात तो दूर मोह भी नहीं रहता, सीख लेना चाहते हो तो बहुत कुछ ले सकते हो। आप पागल बन जाओ, ये नहीं कह रहा हूँ, मैं तो उसकी वृत्ति की बात कर रहा हूँ। वह कभी कपड़े अच्छे नहीं माँगता, एयरकंडीशनर की आवश्यकता भी नहीं हैं। मान-अपमान से कभी हर्ष-विषाद नहीं, अच्छा और बुरा उसके दिमाग से निकल गया है। इन सब क्रियाओं के माध्यम से लगता है कि आपसे अच्छा तो वह पागल है, आप जैसी आकुलता तो नहीं है उसको। सही समय नींद आती है उसको। चुपचाप बैठा रहता है, किसी से कुछ भी मतलब नहीं, भले ही दुनियाँ उसके विरोध में हो जाए, लेकिन वह दुनियाँ के विरोध में नहीं होगा। कहने का मतलब यही है कि संगति जड़ की नहीं चेतन की करो।


    यदि संगति जड़ की करोगे तो रात में नींद नहीं आएगी। आज बड़े-बड़े सेठ- साहूकारों की यही स्थिति हो रही है, घर में ज्यादा हो गए, क्या हो गए? क्या बढ़ गए? मेम्बर बढ़ गए, सदस्य बढ़ गए? मान लो सदस्य उतने ही हैं, लेकिन! घर ज्यादा बड़ा बना दिया, दरवाजे भी बहुत हैं। झरोखे भी खोल दिये गए हैं। अब देखें चोर कहाँ से आता है आप जान भी नहीं सकेगे माल बिखरा हुआ है। अब क्या करें? वह जड़ आपको धीरे-धीरे जड़ बना रहा है, वह जड़ आपकी नींद हराम कर रहा है। बिल्कुल! नींद नहीं ले सकते आप, जब तक वह आपके घर में रहेगा तब तक आप नींद लेना भी चाहो तो भी नहीं आएगी। उस पागल के पास कुछ भी नहीं है, वह खुर्राटे ले रहा है फुटपाथ पर और आप डल्लप के गद्दे पर भी करवटें बदल रहे हैं। यह जड़ आपको सोने भी नहीं दे रहा है, और आप उसके पीछे पड़े हैं।


    ऐसा क्यों हो रहा है ? यही तो आश्चर्य की बात है। आपके जीवन में बहुत सारी आकुलताएँ? वेदनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं, यह मात्र फल है जड़ की उपासना का। जड़ की उपासना करना सबसे बड़ी मूर्खता है। भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ पर अध्यात्म की पूजा होती है। भारतीय संस्कृति बताती है कि अरे भैया! भौतिकवादी मत बनो, और धीरे-धीरे लोभ लालच कम करो। किन्तु! आज भारत में भी कम से कम में एक दिन तो छुप करके धन की पूजा होती है, वह कौन सा दिन है ?' धन तेरस'। वो दिन सबको याद है, महाराज उस दिन को तो हम ३६५ दिन में सबसे महत्वपूर्ण दिन मानते हैं और शाम को लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं।


    कितने ठाठ-बाट से आप जड़ की, धन की पूजा करते हैं। वह आपकी पूजा करे या न करे पर आप तो उसकी पूजा नियम से करते हैं, क्योंकि! लक्ष्मी जी गुस्सा न हो जाये, यदि नाराज हो गई, तो सारा का सारा काम चौपट हो जाएगा। इसलिए कम से कम पूजा तो कर लो । यह जड़ की पूजा, धन की पूजा, ही संसारी प्राणी को पतन के गर्त में ढकेल रही है। आत्मा की पूजा, गुणों की पूजा करना ही अध्यात्मवाद है। अपनी आत्मा को प्राप्त कर जो जीव परमात्मा बन गए हैं, उनकी पूजा करना आवश्यक है लेकिन संगति का असर हुए बिना रहता नहीं है। हम उत्सुक तो हो जाते हैं पर भूल जाते हैं, उसकी चपेट में आकर के, उसके द्वारा हम ऐसे प्रभावित हो जाते हैं कि लक्ष्य को भी भूल जाते हैं, परमात्मा बनने की शक्ति हमारे पास विद्यमान है लेकिन वह परमात्मा नहीं बन पा रही है, इसमें एकमात्र कारण है भूल का प्रभाव, संगति का प्रभाव।


    एक मेघ का टुकड़ा ऊपर डोल रहा है, शीत का सम्बन्ध यदि होता है, तो वह जम जाता है। और फिर जल बनकर बरसने लगता है। वह शुद्ध जल की धारा नीचे आकर धूल में मिल जाती है, तो कीचड़ का रूप ले लेती है, वह यदि समुद्र में गिर जाती है तो लवण का रूप ले लेती है, नीम की जड़ में चली जाती है, तो कड़वेपन का रूप धारण कर लेती है, इक्षु-दण्ड में पहुँच जाती है तो मिठास का रूप धारण कर लेती है, यदि वही धारा स्वाति नक्षत्र में समुद्र में पड़े सीप में चली जाती है, तो मोती बन जाती है और वही धारा सर्प के मुख में चली जाए तो विष बन जाती है। धारा एक है, लेकिन! संगति का प्रभाव पड़ जाता है। वह समुद्र में जाने पर मुक्ता का रूप लेती है। जल का विकास यहाँ तक हुआ कि वह मुता बन गया। इसी प्रकार आत्मा का भी हिसाब-किताब है, अभी तक आत्मा उस सीप में नहीं पहुँची। उस सीप की बड़ी आवश्यकता है उस सीप की गवेषणा आवश्यक है।


    अपना उपादान, आप साधे रहो, और यदि निमित मिल जाए तो उसमें ढालने का प्रयास करते जाओ, अन्यथा आपका उपादान कड़वी नीम में भी परिणत हो सकता है, कीचड़ के रूप में भी परिणत हो सकता है, जहर के रूप में भी परिणत हो सकता है, मिट्टी में भी मिल सकता है और सूर्य का ताप मिलने पर वह वाष्प में भी परिणत हो सकता है, उसकी कोई परिणति नियामक नहीं है, बनाने वाला चाहिए, योग-निमित्त बनाकर वह उसमें ढाल देता है, बड़ी सावधानी की आवश्यकता है।

     

    यदि आप अपने जीवन को मौलिक बनाना चाहते हो तो, कसरत की, मेहनत की, साधन की बड़ी आवश्यकता है। लोग साधना के माध्यम से सब कुछ कर सकते हैं लेकिन साधना में परिश्रम होता है, पसीना बहाना पड़ता है जबकि आप आराम चाहते हैं। ये बात ध्यान में रखना, आराम तो मिलेगा परन्तु बाद में मिलेगा, अभी आराम नहीं, साधना सामने है। जब वह साधना पूर्ण हो जाएगी, तब आराम अपने आप मिल जायेगा फिर अनंत काल के लिए विश्राम है। संसारी प्राणी देह को Rest मिलने पर उसी को आराम समझने लगता है। यह समझने की कमी है वस्तुत:! अभी तक आत्मा को Rest नहीं मिला, सुख-शांति नहीं मिली, एक भी श्वास आत्मा ने शांति से नहीं लिया। हमारी सभ्यता में विकृति आ गई है, हम सोच भी नहीं पा रहे हैं कि क्या करें? किन्तु! संत कहते हैं कि शरीर द्वारा काम लेते हुए अपनी शरीर के द्वारा आत्मा को पुष्ट बनाना ही हमारी सभ्यता है। शरीर को पुष्ट बनाओ लेकिन लक्ष्य हो आत्मिक पुष्टि का कितना अन्तर हो गया। नौकर की हम सेवा कर रहे हैं, वह हमारा नौकर है, उसका जीवन हमारे लिए है, हमारा जीवन उसके लिए नहीं है। जड़ का कोई जीवन नहीं है, वह जड़ है, हम चेतन हैं। आप उसको कुछ भी कर दो, बाहर रखो, या अन्दर इसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, हाँ! चेतन के द्वारा, उसको सुरक्षित रखने का प्रयास चल रहा है।

     

    हमारे लिए यदि कोई पूज्य होगा, तो वह ज्ञान होगा, दर्शन होगा। और जो भोक्ता पुरुष आत्माराम है, उसकी प्राप्ति के लिए, हमें सन्तों के पास जाना है। एक बार जाने से काम नहीं होने वाला, दो बार जाने से कुछ काम नहीं होने वाला, रहस्य की बात जानने के लिए बहुत काल की आवश्यकता पड़ती है, साधना की आवश्यकता है। कई सज्जन जो कि भौतिक क्षेत्र में काम कर रहे है, वे बार-बार आकर मुझसे कहते हैं कि महाराज बताओ । क्या बतायें ? रहस्य की बात बताओ ताकि हम आत्मा को समझे क्योंकि अभी तक हमें बताया नहीं गया है। और जब विहार होने लगता है उसी समय हम पूछ रहे हैं। मैंने कहा कि देखो भैया! जब वह आँखों के द्वारा देखने में नहीं आती, स्यूंघने में नहीं आती तो आप उस रहस्य की बात को क्यों पूछ लेते हैं ? आप रहस्य की बात पूछना चाहते हो तो ध्यान में रखो मेरी बात को, मैंने उनसे कुछ प्रश्न पूछे।


    -आप कौन सी कक्षा में पढ़ते हो ? एम० ए० में महाराज जी, उसने कहा! -विषय कौन-सा है ? अर्थशास्त्र ! -एम० ए० के बाद क्या होता है ? जी उसके बाद Research ( शोध) किया जाता है। -Research का अर्थ क्या हैं ? जो कुछ उसमें छुपा है उसे हम उद्धाटित करते हैं। - देखो भैया ! बुरा मत मानना, तुम पागल हो। कैसे महाराज? आपने वस्तु के बोध के लिए सोलह साल लगा दिये, अब उस वस्तु के बोध के माध्यम से आप शोध में उतरोगे और शोध के लिए कम से कम तीन वर्ष लगेंगे ही। महाराज शोध की क्या कहें, वह तो बढ़ता ही जाता है। इसलिए तो मैं कह रहा हूँ कि आप पागल हो क्योंकि आपने वस्तु के बोध के लिए सोलह वर्ष लगा दिए फिर इसके उपरान्त शोध के लिए पूरा जीवन लगा दिया जाये तो भी सही-सही शोध नहीं हो सकता और आप १०-१५ मिनट में आत्मा की बात पूछ रहे हो। १०-१५ मिनट में तो वह बताई नहीं जा सकती।


    किसी भी चीज की अनुभूति के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता है। तुम तो बातों-बातों में कहते हो, कि हमने जान लिया, मान लिया, हमें सब कुछ मालूम पड़ गया जबकि बात कुछ और ही है। मालूम ये पड़ गया कि हमारे जीवन में कुछ काम होने वाला नहीं है।


    वस्तुत: यदि उस ज्ञान की खोज करना चाहते हो तो सन्तों के समागम का लाभ उठाओ। आप कहीं भी चले जायें वहाँ आपको अध्ययन के लिए जीव मिलेंगे। चाहे छोटा कीड़ा हो या मकोड़ा हो, या कोई भी पशु, गाय हो, भैंस हो, बन्दर हो या पेड़-पौधे। इस प्रकार पृथ्वी सारे के सारे जीवविज्ञान से भरी पड़ी है। इसके द्वारा हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसी ढंग से कर सकते हैं। अपने आप अपना भी आभास होना प्रारम्भ हो जाएगा। जीव-तत्व क्या है ? ये देखने के लिए बहुत बार परिश्रम अपेक्षित है। आज के वैज्ञानिकों ने भी इस ओर थोड़ा परिश्रम किया है पहले तो वे इसको बिल्कुल जड़ समझते थे। लेकिन! अब वनस्पति, पेड़-पौधों को भी जीव मानने लगे हैं। जगदीशचन्द्र वसु ने इसे कलकत्ता यूनिवर्सिटी में सिद्ध किया कि इसमें भी जीव है, किन्तु जीव तो उसमें पहले से था ही। लेकिन! जो नहीं मानते थे उनको पुरुस्कृत कर दिया गया। इसके उपरान्त आगे और बढ़ता जा रहा है जीवविज्ञान इसमें भी जीव है। देखो! सारे के सारे विश्व में जीव भरे हुए हैं। कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है, जो जीवत्व से रहित हो, और पहले से जीवत्व के साथ सम्बन्ध न रखता हो। कोई भी पदार्थ देख लीजिए, चारों ओर यही मिट्टी है, तो इसमें भी जीव रह चुका है. रह गया है..... आगे भी रहेगा...... यह अटल नियम है। भले ही हमारी आँखें, हमारा ज्ञान उसे देख न सके। इस प्रकार का सम्बन्ध जल के साथ है। जो कोई भी पदार्थ देखने में आ जाते हैं, वे सब पहले जीवविज्ञान से संबंधित थे, हैं और आगे भी रहेंगे इस प्रकार जीवात्मा का अस्तित्व वैकालिक सिद्ध हो जाता है।


    माली ने बगीचा लगाया है। उसने बगीचे में भिन्न-भिन्न प्रकार के पौधे लगाए हैं। उनकी एक-एक डाल पर एक-एक फूल खिला हुआ है। कोई गुलाब का है, कोई रजनी गंध का, कोई चमेली का, कोई चंपक आदि का। सारा का सारा उपवन महक रहा है। चारों ओर सौरभ फैल रही है, पवन भी साथ-साथ बह रहा हैं, और सुगन्ध को दूर-दूर तक ले जा रहा है। भेंवर भी गुंजार कर रहे हैं। भिन्न-भिन्न दृश्य वहाँ पर देखने में आ रहे हैं। माली का काम है सिर्फ सिंचन करना, उनकी देख-रेख करना, उनको सुरक्षित रखना। ज्यों ही माली बगीचे में उन पौधों के पास पहुँच जाता है त्यों ही वे पौधे वे फूल हिल-हिल कर बच्चों के समान उछल कूद मचाने लगते हैं। वे सोचने लगते हैं कि हमें अब अच्छी खाद मिलेगी, प्यार मिलेगा, सब कुछ मिलेगा। अपना जीवन इसके हाथ में है, हमें चाहने वाला यह व्यक्ति मिला है। सब लोग यही चाहते हैं कि हमें सब लोग चाहें, भले ही वह व्यक्ति दूसरे को चाहता है या नहीं चाहता ये बात अलग है प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि हमें सब व्यक्ति चाहें। मतलब क्या है, हमारी कद्र करें हम दूसरे की करें अथवा नहीं करें ये अलग बात है, हमारी कद्र प्रत्येक प्राणी करे किन्तु यह कैसे बन सकता?


    माली उन पौधों की कद्र करता है, प्यार करता है, जीवन देता है, विकास की ओर ले जाता है। उन फूलों के पास वे भ्रमर उनके अन्दर की पराग का पान करने आते हैं, और फिर उड़ जाते हैं। सारे के सारे लोग देखने के लिए आ जाते हैं। लेकिन! यह भी ज्ञान होता है, कि जब उस माली के स्थान पर, आप लोगों में से कोई पहुँच जाता है, तो उस फूल को सन्देह हो जाता है। क्योंकि यह देह ही कुछ अलग Type (प्रकार) की दिखती है। पहले जो देह थी, संदेह पैदा करने वाली नहीं थी, वह प्यार का संदेश लेकर आया था, और यह संदेह लेकर आया है, क्यों? पता नहीं, प्यार करता या पार करता ।


    कोई भी व्यक्ति फूल को उस पौधे पर देखना नहीं चाहता। वह अपने हाथ में चाहता है, वह अपनी नासिका के पास चाहता है। और कुछ महिलाएँ वगैरह तो अपने सिर में लगाना चाहती हैं। आप लोग अपने कोट में लगाना चाहते हैं। उसकी दशा तो ऐसी होती है, आप लोगों को देख करके कि ये आ गए हैं, अब हमारी स्वतंत्रता नियम से नष्ट होगी। हमारा जीवन नियम से समाप्त होगा।


    जीव विज्ञान कितना सूक्ष्म है, समग्र वायु-मण्डल में तरंगायित है, भावना वश फूल को हाथ नहीं लगाया केवल तोड़ने की भावना की है, और यह भावना की है कि यह पौधे के ऊपर न होकर हमारे पास आ जाए। वह फूल जान लेता है कि मेरे लिए हितकारी कौन है ? मुझे स्वतंत्रता दिलाने वाला कौन है ? मेरा शुभचिन्तक/हितैषी कौन है ? और मेरे आनंद को छीनने वाला कौन है ? उस फूल को भी ज्ञान है, पत्तों को भी ज्ञान है, सबको ज्ञान है। क्योंकि सबके पास ज्ञान है, हित का जानना और अहित से बचना यह प्रत्येक जीव का लक्ष्य है। यह बात अलग है कोई लक्ष्य तक पहुँच जाता है कोई नहीं पहुँच पाता। फूल पत्तों के पास पेड़ पौधों के पास पैर नहीं है जो आपकी चपेट से, आपकी पकड़ से भाग निकलें। इसलिए वे आपके हाथ में आ जाते हैं लेकिन आते-आते आपको अभिशाप देते हैं। आपके प्रति उनको कषाय होती है कि देखो प्यार की ओट में इन्होंने हमारे साथ धोखा किया। जब तक मैं खिला नहीं था तब तक तो यह मौन था, ज्यों ही मैं खिला और आनंद से झूमने लगा त्यों ही इसने मेरे आनंद को छीनकर अपने आपको संतुष्ट बनाने का उद्यम किया।


    ध्यान रखो! माली आता है, तो एक दशा हो जाती है, और कोई नागरिक आता है,? तो दूसरी दशा हो जाती है। यह दशा एक ही फूल में भिन्न-भिन्न प्रकार से क्यों हो रही है ? यहाँ तक तो ज्ञान हो गया, इतना ही नहीं और आगे तक ज्ञान हुआ।


    एक बार की बात है, बहुत दिन हो गए, मैंने एक चित्र देखा था, गीत के माध्यम से कमल को खिलाया गया था। संगीत के माध्यम से दीप को जलाया गया था। हाँ जीवन को शब्दों के माध्यम से आनंद विभोर भी कर सकते हैं। बहुतों के जीवन में अंतिम क्षण तक ऐसी तिलमिलाहट पैदा कर सकते हैं जो वह भव-भवान्तर में भूल नहीं सकता और उसका हृदय पल नहीं सकता, जल सकता है, एक-एक सेकेण्ड में जल सकता है। शब्दों में भी यह बल है, उसके माध्यम से पेड़ पौधों में, आनंद की लहर दौड़ सकती है। भले ही सुनें या न सुनें किन्तु! शब्द के माध्यम से आपकी भावना व्यक्त हो जाती है, भाव तरंगें उससे आकर टकरा जाती हैं। एक आनंद का हाथ उठाकर तथास्तु कहने से सामने वाला भयभीत व्यक्ति भी अभय का अनुभव कर सकता है। यदि तथास्तु नहीं कहा, तो वह सोचता है कि तथास्तु की जगह कोई अभिशाप तो नहीं है ? शंका की दृष्टि से देखने लग जाता है।

     

    फिर शब्द की भी कोई आवश्यकता नहीं किन्तु उसके प्रति आपका क्या भाव है? यह देखना है। हमारे भावों की तरंगें वायु-मण्डल में तरंगित हो करके हम जहाँ पहुँचाना चाहें, वहाँ पहुँचा सकते हैं। आज का यह युग एक-एक कदम बढ़ाता वहाँ तक पहुँच गया है। सर्वप्रथम शब्द का आविष्कार किया गया और फिर उनके माध्यम से, ग्रामोफोन का आविष्कार, फिर हम शब्दों को गीत बनाकर रिकार्ड प्लेयर के माध्यम से सुनने लगे। टेलीफोन आ गया, टेपरिकार्डर आ गया फिर इसके उपरान्त शब्द के साथ आत्मा का पुट भी कुछ और विशेष आवश्यक है, इसलिए आज का मानव सोचने लगा, और फिर शब्द के उपरान्त मनोरंजन के लिए टीवी आ गया। शब्द गौण हो गए और चित्र आ गए।


    उस समय मैं बहुत छोटा था, मैंने एक फिल्म देखी थी, उसमें बोलते नहीं थे, मूक चित्र था, एक्शन मात्र करते थे। उसके माध्यम से समझ में सब आता था क्या कहना चाहते हैं? सब कुछ समझ जाते थे। शब्द का निखार फोन के माध्यम से टेपरिकार्डर के माध्यम से बहुत आगे बढ़ता चला गया है लेकिन टेलीविजन के साथ मात्र हम सुन ही नहीं रहे हैं, बल्कि देख भी रहे हैं। ये आविष्कार टीवी- ही या वी०डी०ओ० सब पुराने पड़ रहे हैं और दूसरा ये आविष्कार प्रारम्भ हो चुका है, लेकिन वह बहुत मंहगा है, telepathy किसको बोलते हैं ? वह संप्रेषण कला है, शब्द का माध्यम ले करके आगे उठी हुई एक कला है। जिसमें तन भी शान्त हो जाता है, और मन भी शांत हो जाता है। और तन और मन, वचन के ऊपर उठकर केवल अकेला स्वतंत्र हो जाता है। तब हम उस मनोविज्ञान के माध्यम से उस संप्रेषण शक्ति के माध्यम से जिसके दुखों को दूर करना है तो हम कर सकते हैं। जिसमें सुख का आरोपण करना है कर सकते हैं। बन्धन से छुटकारा दे सकते हैं और बंधन में भी डाल सकते हैं वह अद्भुत शक्ति है।


    जैनाचार्यों ने हजारों वर्ष पूर्व इसका उल्लेख किया है, तब आज विज्ञान का सूत्रपात हुआ है। किन्तु! जो कुछ भी है वह पहले से ही ग्रन्थों में चित्रित किया गया है। जो सबसे ज्यादा सशक्त है, वह मन है और यदि वह मन सबसे ज्यादा सशक्त होगा, तो मात्र मानव का ही होगा। देवों का नहीं होगा, दानवों का भी नहीं होगा, पशुओं का भी नहीं होगा, लेकिन ध्यान रखना, सबसे खतरनाक भी मानव का ही मन होगा।


    न सूरत बुरी है, न सीरत बुरी है।

    बुरा तो वह जिसकी नीयत बुरी है.....

    तो नीयत किसको बोलते हैं। भैया? नीयत उसकी बोलते हैं जो मनोविज्ञान है। मन के माध्यम से हम सुखी बना सकते हैं, क्रोध की कोई आवश्यकता नहीं और उसके लिए वैर की भी कोई आवश्यकता नहीं है। दुनियाँ के किसी भी पदार्थ की, आविष्कार की कोई आवश्यकता नहीं है। wireless भी वही काम करता है-वायर के अभाव में। जो मनोविज्ञान की तरंगें हैं उन्हें हम जिस व्यक्ति के पास भेजना चाहते हैं वे Direct उसी व्यक्ति को Pinch करेंगी और आपके भावों को वहाँ पर व्यक्त करेंगी। कोई आवश्यकता नहीं है इसको वायर की। हमने उदाहरण के माध्यम से आपको समझाने का प्रयास किया है, यदि आ जाए तो ठीक है, नहीं तो हमने तो समझ ही लिया है।


    जब बहुत छोटा था तब देखा था। एक बच्चे को हिचकी आ रही थी, हिचकी आने के उपरान्त वह माँ के पास आकर कहता है कि मुझे हिचकी आ रही हैं? दर्द हो रहा है। अरे! कुछ बात -नहीं बेटा! वह तो अभी पानी से ठीक हो जाएगी। माँ हम तो इसलिए आए थे,कि कुछ मिठाई वगैरह मिल जाएगी और आप तो पानी की बात कर रही हो। अच्छा! तो ये बात है ठीक है पानी तो पी ले, फिर मिठाई मिल जाएगी। कैसे मिल जाएगी? लाओ ना! नहीं. नहीं वो लेने गए अभी आते ही होंगे, बाजार गए हैं तो जाते समय मैंने कहा था कि आते समय छोटे मुन्नू को याद कर लेना इसका अर्थ यही है कि मिठाई लेते आना, उन्होंने वहाँ पर मिठाई खरीदने के लिए याद किया है, और यहाँ तुम्हें हिचकी आने लगी, यह बात बिल्कुल Fact है, समझने की है।

    मनोविज्ञान इतना सूक्ष्म है कि हम किसी भी प्रकार से किसी भी वस्तुओं के द्वारा उसको बाँध नहीं सकते। प्रेम को, भावना को हम तौल नहीं सकते, वह अनमोल है, उसका मूल्य और उसकी शक्ति आज तक किसी ने नहीं की। और इसके द्वारा जो काम आज हो सकता है, उसे करने में वैज्ञानिकों को हजारों साल लगेंगे, तो भी यह संभव नहीं। और हजारों वर्षों के उपरान्त इतनी मात्रा में काम हो ऐसी कोई बात नहीं। इसके लिए एक Second में बहुत सारा काम हो सकता है। मनोविज्ञान सही-सही पूछा जाय तो अध्यात्म तक पहुँचने के लिए, एक पृष्ठ भूमि का काम करता है लेकिन ये ध्यान रखना, जहाँ भौतिकवाद का विश्रान्त हो जाता है। जहाँ पर मनोविज्ञान का समापन होता है, वहाँ पर अध्यात्मवाद नजर आने लगता है। क्योंकि यह Nearest वस्तु है जिसने भाव तरंग को पकड़ा है। जिसने भाव प्रणाली को समझ लिया है, वही दूसरे की भाव प्रणाली को समझ सकता है। यह तादात्म्य स्थापित किये बिना सम्भव नहीं है। एक व्यक्ति का तादात्म्य दूसरे व्यक्ति से तो है नहीं लेकिन! वही व्यक्ति हम हैं ऐसा महसूस करना प्रारम्भ कर दें, तो यह सम्भाव्य है। इसमें भक्तिवाद गर्भित हो जाता है। यहाँ पर ज्ञान, ज्ञान नहीं, यहाँ पर ज्ञान भक्तिवाद में समर्पित हो जाता है।


    इस ज्ञान के माध्यम से वह सामने वाले की वेदना को समझ लेता है। सम्वेदना को अनुभूत कर लेता है। वहाँ नजदीक जाना आवश्यक होता है, शब्द टकराते हैं। और कई मूर्त पदार्थ टकराते हैं, किन्तु मनोविज्ञान किसी से टकराता नहीं है। आज के वैज्ञानिकों ने फोटो लेने का प्रयास किया, एक्सरे लेने का प्रयास किया, इसकी पकड़ने की कोशिश की किन्तु! वह शक्ति किसी भी यन्त्र के द्वारा पकड़ने की चीज है ही नहीं। ये मात्र ज्ञान के द्वारा जानने की चीज है। इस मनोविज्ञान के माध्यम से हम बहुत कुछ काम कर सकते हैं, अंधकार भी ला सकते हैं। मन के माध्यम से क्या नहीं कर सकते। मानव सब कुछ कर सकता है लेकिन! मन बदमाश है, वह अच्छा ही अच्छा तीन काल में भी नहीं कर सकता।


    मनोविज्ञान का प्रशिक्षण उसी मन के लिए ही सम्भव है जिसने अपने आपको Control संयत कर लिया है। इन्द्रियों से ऊपर उठकर मानसिक सफलता प्राप्त कर ली है, तामस वृत्ति से ऊपर उठ चुका है। तब कहीं जा करके हम इसको पकड़ सकते हैं, इसकी पृष्ठ-भूमि है समता। जिसका ज्ञान पंचेन्द्रिय विषयों से आकर्षित है, वह व्यक्ति मन के माध्यम से विकास के स्थान पर,अपनी आत्मा को विनाश की ओर ले जा रहा है। मनोविज्ञान के लिए सन्तों का क्या कहना है ? सन्त शब्द ही अपने आप में कह रहा है। 'स' से प्रारम्भ कर दी। तामस में 'त' पहले आता है, समता में 'स' पहले आता है। ‘स’ पहले आ जाएगा तो 'त' का अन्त किया जाएगा। तामस को अन्त मिल गया। तामसता जिसमें अन्त को प्राप्त हो गई उसी का नाम है सन्त। संक्षेप से संत की व्याख्या यही है कि जो समता से भरा हुआ हो और आत्म कल्याण के साथ-साथ जिसको यह मनोविज्ञान प्राप्त हो गया वह कल्याण कर ही जाएगा, इसमें सन्देह नहीं है। इसलिए हमें वह ज्ञान प्राप्त करना है, जिसके द्वारा कुछ सुख-शान्ति के साथ बैठ जायें, अपने आप का जीवन जी सके।


    पाँच मिनट बैठने के लिए शक्ति तक नहीं है। लेट सकते हैं, स्थिति बिगड़ गई तो। मनोविज्ञान के माध्यम से हम इसे जानें और उसे ठीक करने की कोशिश करें। क्या कर सकते हैं ? इसका कितना बल हैं, कितना ओज हैं, कितनी शक्ति हैं ? उदाहरण एक उदाहरण नहीं हैं किन्तु एक सत्य घटना है।


    एक राजा और उसके साथी, वन में घूमने के लिए गए। राजा के मन में आता है कि किसी न किसी जानवर का शिकार करूं किन्तु! उस दिन चीता-सुअर-हिरण कुछ भी नहीं मिला। अन्त में एक हिरणों का समूह (झुण्ड) देखने को मिला, और राजा देखते ही घोड़े को उनके पीछे भगाने लगा। तीरकमान हाथों में उठा लिया। यह दृश्य उसका एक साथी जो शिकार करना नहीं चाहता था, उसने देखा। देखने के उपरान्त वह सोचता है कि देखो! इन भोले-भाले हिरणों के ऊपर, निरपराध पशुओं के ऊपर यह अत्याचार ठीक नहीं है। पशुओं के जो रक्षक हैं, जिनकी रक्षा करना राजा का धर्म है, वे ही आज इनके रक्त के प्यासे हैं, वे ही उनके भक्षक बन रहे हैं। यह देखा नहीं जाता, अब यह अत्याचार सहन नहीं होगा। यह सोचकर वह कहता है -


    हे अनाथ मृगो! ठहर जाओ, तुम्हारे इस समय भागने से कोई मतलब सिद्ध नहीं होगा। आज रक्षक ही तुम्हारा भक्षक बनकर पीछे लगा है तुम कहाँ जाकर अपने प्राण बचाओगे, रुक जाओ! ज्यों ही यह वाणी, यह करुण आवाज मृगों के कानों तक पहुँची त्यों ही वे कीलित से हो गये। राजा ने यह चमत्कार देखा तो तीर कमान चलाना भूल गया और आश्चर्य से उस साथी के मुख को देखने लगा और उसने सोचा कि यह क्या मामला है ? उसकी वाणी में क्या चमत्कार है, जादू है ? भागते हुए पशुओं का शिकार खेलना तो फिर भी ठीक है, लेकिन! ये तो रुके हुए हैं इनको मैं कैसे मारूं पहलवान कुश्ती उसी समय खेलता है जब दूसरा पहलवान ताल ठोंक कर चुनौती देता है, यदि वह बिना लड़े ही Surrender हो जाए तो फिर मजा नहीं आएगा। यही स्थिति उस समय राजा की हुई। वह राजा साथी से पूछता है। ये रुके कैसे? इससे तुम्हें क्या मतलब? शिकार करना है तो कर लो। साथी ने उत्तर दिया। तुम मजाक कर रहे हो? मजाक कैसे? आप तो भाग रहे थे, वे अपने आप रुक गए यहाँ पर, अब शिकार करना है आपको, शौक से करिए! साथी ने व्यंग भरे स्वर में कहा। नहीं मुझे यह जानना है कि ये रुके कैसे ? और बिल्कुल पास ही आकर खड़े हो गए। जीने की आशा ही छोड़ दी इन्होंने, इतने पास आ गए, पहले तो काँप रहे थे, और अब बिल्कुल आनंद के साथ खड़े हैं। ये क्या हो गया? इनके कानों में मंत्र तो नहीं फेंक दिया तुमने बताओ तो सही? राजा ने आश्चर्यपूर्वक पूछा। इससे क्या मतलब ? आपको जब शिकार करना ही है तो करते क्यों नहीं ? साथी ने उत्तर दिया। नहीं... नहीं तुम मुझे पहले यह बताओ ये रुके कैसे? राजा ने उत्कण्ठापूर्वक पूछा।

     

    आप सुनना चाहते हैं तो सुनिए! इन्हें रोकने में कारण है प्रेम की शक्ति, अहिंसा की शक्ति, दया-अभय-करुणा की शक्ति। राजन्! आप अपने पद की ओर भी जरा ध्यान दो, आपका कर्तव्य है, प्रजा की रक्षा करना, प्रजा का पालन करना, निरपराध पशुओं के प्रति जो आपने अपने हाथ में धनुष और बाण ले लिया है, वह निरपराध पशुओं की हिंसा के लिए नहीं बल्कि! उनकी रक्षा के लिए होना चाहिए, आपने राज्याभिषेक के समय क्या संकल्प लिया था? जरा याद तो करिये! कि मैं अनाथ-अशरण/दीन-हीन प्राणियों की रक्षा करूंगा, हमारे जीवित रहते हुए, किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं हो सकता और वह आज भी आपके परिवार द्वारा दुहराया जाता है। क्षत्रियता आज भी छुपी नहीं है, भले ही आप छुपाते चले जाओ ये बात अलग है। इतना कहकर वह साथी चुप हो गया।


    आज भी राष्ट्रपति भवन में जिस समय राष्ट्रपति की नियुक्ति होती है, उस समय उसे यही संकल्प कराया जाता है, कि जब तक मैं इस पद पर रहूँगा, तब तक जनता की रक्षा करूंगा, देश के प्रति आस्था रखूँगा । देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर दूँगा और यह एक बार नहीं तीन बार कहलवाया जाता है। महाराज तीन बार क्यों कहा जाता है ? तीन बार इसलिए कहा जाता है कि तीन बार कहने में बात वजनदार हो जाती है, बात प्रभावक हो जाती है।


    लेकिन, आप तीरकमान लिए, उन भोले मृगों के पीछे लगे हो प्रजापालक होकर। रक्षक होकर, भक्षक बन रहे हो। आप राजा हो या खाजा हकीकत तो यह है कि आपको पशुओं की रक्षा करनी थी। अहिंसामय अपना जीवन बनाना था, आज आपने अपने संकल्प का उल्लंघन किया, यह देखकर उनको हमने पास में बुला लिया, ताकि ज्यादा कष्ट न हो। उस साथी ने पुन: व्यंग्य किया। तो आपकी वाणी उन्हें कैसे समझ में आ गई ? राजा ने बात को समझने की दृष्टि से पूछा। दया की पुकार, रक्षा की पुकार सब को समझ में आती है बस! कान होना चाहिए कान के बिना भी समझ में आती है। ऐसी –भी वाणी है जो मन के माध्यम से, मन में भाव भी कर लें तो भी समझ में आती है, बस! समझने की दृष्टि चाहिए। साथी ने सारी बातों का खुलासा किया।

    -ओ हो. अहिंसा की यह शक्ति है। इतना कह कर वह सोचने लगा कि कुछ भी हो लेकिन आज तो मेरा अपमान हो गया, उसने मारा किसी को नहीं और वह महल की ओर चला गया। दूसरे दिन साथी से राजा कहता है कि यदि इस प्रकार की शक्ति तुम्हारे पास है, तो हमें बता दो क्यों सिंह भी आ सकता है। -हाँ. हाँ अवश्य आ सकता है। साथी ने कहा। -तो फिर बुलाओ, हम इसका भी चमत्कार देखेंगे। राजा ने गर्व से कहा। -हम सिंह को तो बुला सकते हैं, लेकिन नर सिंह को नहीं। जिस प्रकार मृग आए थे उसी प्रकार सिंह आएगा । साथी ने दृढ़तापूर्वक कहा। -एक शेर को पिंजड़े में बंद करके पाँच छह दिन भूखा रखा गया, उसको सताया गया, गुस्सा दिलाया गया, फिर उसके उपरान्त तारीख नियुक्त कर दी गई। समस्त प्रजाजन और दरबारीगण उपस्थित थे, फिर उनसे कहा गया - अगर तुम्हारे पास शक्ति है, अहिंसा का बल है तो इस शेर को ठीक कर दो और इसे शाकाहारी बनाओ।


    देख लीजिए! उस मनोविज्ञान का कितना बल है, एक जीव अगर दूसरे जीव को चाहता है तो हिंसक से हिंसक पशु भी अहिंसक बन जाता है लेकिन वह व्यक्ति निर्विकार होना चाहिए। विकार से ही विकार टकराता है, विकार विकार का संघर्ष है, विकार का और निर्विकार का संघर्ष तीन काल में संभव नहीं है, मिलना तभी संभव है जहाँ मिलने के लिए गुंजाइश रह जाए। दूध में पानी तो मिल सकता है पानी में दूध भी मिल सकता है लेकिन दूध में घी मिलता है क्या? पानी में घी मिल सकता है क्या? मैं पूछना चाहता हूँ! कि विकार से निर्विकार टकरा नहीं सकता वह विकार नीचे चला जाएगा। निर्विकार ऊपर आ जाएगा। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है। इसमें हम किसी प्रकार से, विचार ही नहीं कर सकते कि मिलावट वहाँ पर है, दोनों सजातीय जैसे लगते हैं, वर्ण सजातीय, गंध सजातीय और तरल पदार्थ इस अपेक्षा से सजातीय हो तो मिलावट संभव है। सोना, तांबा, पीतल इनमें मिलावट संभव है।


    निर्विकार किसी प्रकार नीचे नहीं जाएगा, विकार नीचे ही रहेगा। तो पानी पहले मत डालो पहले उस बर्तन में एक चम्मच घी डाली, उसका वजन कितना है, दस ग्राम समझ लो, अब उसके ऊपर दस किलो पानी डाल दो ताकि वह डूब जाए। क्या वह घी दब जाएगा? नहीं वह दस किलो पानी को दबाकर ऊपर आ करके सिंहासन पर बैठ जाएगा। दस ग्राम घी को दबाने की शक्ति एक क्विंटल पानी के पास नहीं है, आप समुद्र को उस के आ जाये और का नीचे चला जाये ऐसा नहीं होगा। विकार-विकारों का साम्य है, निर्विकार-विकारों का नहीं, नीचे का घी ऊपर आ जाए और ऊपर का नीचे चला जाए, ऐसा नहीं होगा। एक चम्मच घी के ऊपर एक किलो घी डालो तो वह मिल जाएगा, वह कहेगा ठीक है। लेकिन! विजातीय ऊपर आ गया, तो कहता है कि मेरे पास दया है, शक्ति है, उसको दबाकर ऊपर आने की। वह व्यक्ति जाता है तो साथी कहता है |


    यदि आप मेरी शक्ति देखना चाहते हो तो मैं तैयार हूँ और अगले ही पल सिंह दहाड़ता हुआ आया । तुझे यदि भूख मिटाना ही है तो ये जलेबियाँ खाकर मिटा ले और मांस खाना है तो मैं उपस्थित हूँ, साथी ने शेर से कहा। मुझे समय पर खाना नहीं मिलता जो भी मिल जाए उसे खाकर अपनी भूख मिटा सकता हूँ पेट भरने के उपरान्त मुझे कुछ नहीं चाहिए, सिंह बड़ी नम्रतापूर्वक बोला।


    यह सिंह की नीति है नरसिंह की नहीं। सिंह जब भूखा होगा, तो शिकार कर लेगा और उसे खा लेगा, वह छुप करके शिकार नहीं करता, खाने के उपरान्त शिकार नहीं करता, दूसरे के द्वारा किए गए शिकार को नहीं खाता, क्या-क्या बातें आ गई इसमें? बहुत सारी बातें आ गई महाराज! इसमें से मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन! नरसिंह में शेर की एक भी बात घटित नहीं होती। आप पीछे से हमला करते हो। और क्या करते हो ? छुप जाते ही दूसरे के द्वारा कमाए गए धन को हड़प लेते हो। वह साथी राजा से कहता है


    -मैं शेर को शाकाहारी बना कर ही रहूँगा भले आप मानो या ना मानो। -तुम्हें क्या चाहिए ? वह सिंह से बोला। -हमें खाना चाहिए, हम बहुत दिन से भूखे हैं, सिंह ने कहा। -तुम्हें भूख मिटाना है। -हाँ हमें भूख मिटाना है। -तो फिर थाली में गरम-गरम जलेबी हैं जितना चाहो खा लो और कढ़ाई में भी रखी हैं, खाने में कमी नहीं करना तुम्हारी पूरी व्यवस्था है, पीने के लिए दूध भी रखा है प्यासे नहीं रहना, साथी ने प्रेम-वात्सल्य के साथ सिंह से कहा। और वह अहिंसा का चमत्कार था, सिंह उठकर चुपचाप जलेबियाँ खाने लगता है, फिर वह साथी सिंह से पुन: कहता है.! -और कुछ चाहिए ? साथी ने कहा। -अब कुछ नहीं चाहिए मेरा पेट भर गया है, शेर ने तृप्तिपूर्वक कहा। सब देख रहे थे, सोच रहे थे कि पता नहीं ये दीवान जी शेर को अब क्या आदेश दे दें। फिर दीवान जी शेर से कहते हैं -अब जा कर इन सबको देख लो । राजा हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है और कहता है कि मुझे आज तक इस बात पर विश्वास नहीं था कि हम अपनी सच्चे अहिंसक परिणामों से पशुओं के ऊपर, पेड़ पौधों के ऊपर, अनाथों के ऊपर, सब के ऊपर अपना प्रभाव डाल सकते हैं इसी को बोलते हैं आत्मीयता। हमारे पास ये जो शक्ति विद्यमान है, वह धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर चली जा रही है। यह दु:ख की बात है लेकिन सुख की भी ये बात है कि आज भी इस प्रकार की शक्ति है, इस प्रकार के आज व्यक्ति हैं जो मनोविज्ञान के माध्यम से सब कुछ कर सकते हैं।


    वस्तुत: आप विश्व में शांति चाहते हो तो दया धर्म का अनुपालन करो। वह मनोविज्ञान, जो जीव तत्व की तलस्पर्शी खोज करता है उसकी प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करो। उससे बहुत सारे समाधान मिलते हैं, जो आप लोगों के पास मन है उसके माध्यम से बहुत कुछ काम कर सकते हो, उसी मन के माध्यम से आप अपने आत्मतत्व को प्राप्त कर सकते हो।


    यह घटना दीवान अमरचंद जी के साथ जयपुर में घटी थी। इसी प्रकार की घटनायें समय समय पर घटती रही हैं। यह घटना अधिक पुरानी नहीं है किन्तु भौतिकवाद का विस्तार इतना बढ़ गया है कि अब इस पर कोई ध्यान नहीं देता। किन्तु वैज्ञानिकों को अब यह तथ्य, सत्य प्रतीत हुआ है कि हजारों वर्ष जो काम नहीं होगा वह इस प्रकार के संयत मन के द्वारा अल्पकाल में संभव है लेकिन मन को संयत करने के लिए निर्विकार बनने की आवश्यकता है। बस! अन्त में यही कहना है कि आप लोग तामस का विलोम कर दीजिए। समता पर ही हम सभी का विश्राम हो और सुसंगति पर हमारा पड़ाव हो, वहीं पर हमारी यात्रा की समाप्ति है। वहीं से मोक्ष की उपलब्धि का
    सूत्रपात है।

    दुर्ग : फरवरी १९८४


    महावीर भगवान की जय



    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    रतन लाल

    Report ·

       2 of 2 members found this review helpful 2 / 2 members

    भारतीय संस्कृति का एक मात्र यही लक्ष्य है, कि स्व को पहिचानो-उसको देखने की चेष्टा करो यद्यपि वह इस स्थिति में देखने के लिए मिलने वाला नहीं है। जानने के लिए भी मिलेगा नहीं, वह वर्तमान में संवेदन के लिए मिलने वाला नहीं है। इसके उपरान्त भी सन्तों की अनुभूति के माध्यम से जो कुछ भी वाणी खिरी है, उससे यह ज्ञात होता है कि ऐसी भी कोई अद्वितीय शक्ति है, जिसके द्वारा यह सारा का सारा संचालन हो रहा है। प्रात:काल से लेकर शाम तक चौबीसों घण्टों तक सारा काम अक्षुण्ण रूप से चलता रहता है। नौ

    • Like 1

    Share this review


    Link to review
    Padma raj Padma raj

    Report ·

      

    जो  स्वयं को  जानने की  रास्ता  पकड़ता है वो भगवान  बनेगा । जैसे  हमारे गुरुदेव आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी  ने  पकड़े हैं।

    FB_IMG_1461149705081.jpg

    Share this review


    Link to review

×