Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • प्रवचन सुरभि 15 - जैसी दृष्टि- वैसी वृष्टि

       (2 reviews)

    धर्म उसे कहते हैं जो संसार रूपी महा समुद्र से इस दुखी जीव को उच्च स्थान पर पहुँचा दे। जो उत्तम ज्ञान और उत्तम चारित्र युक्त हो। कुदृष्टि, कुज्ञान, कुचारित्र संसार में दुख के कारण हैं। इनका अभाव सो ही धर्म है। सद्दृष्टि, सद्ज्ञान और सद्चारित्र का आलंबन लेना हमारा परम कर्तव्य है। हम बाह्य कारणों से दूर नहीं रहते हैं। साधक कारणों को भी संग्रह करने लग जाते हैं। जब तक हम अपनी दृष्टि को नहीं मांजते, तब तक वस्तु ठीक-ठीक देखने में नहीं आती है। पीलिया के रोगी को जगत के सब पदार्थ पीले नजर आते हैं, उसे यह मालूम नहीं कि मेरी आँखें पीली हैं। हमें उस दृष्टि को, उस विकार को, उस रोग को दूर हटाना है। संसारी जीव की भी यही स्थिति है, उसको भी वस्तुएँ इष्ट-अनिष्टकारी प्रतीत नहीं हो रहीं हैं। उसकी दृष्टि में विकार है। हरेक की आँखें क्या जवान, क्या वृद्ध सबकी कुदृष्टि बनी हुई है, विकार भरा हुआ है, वह अनिष्टता के लिए है।

     

    जो जीव सुख चाहते हैं, विकास, अनाकुलता चाहते है, उनके लिए ये विकार अनादि और अनन्त नहीं हैं। दूध में घी का सम्मिश्रण भी अनादि से है। पाषाण में स्वर्ण भी अनादि से है, पर प्रयत्न किया जाये तो पृथक् -पृथक् हो सकते हैं। कुदृष्टि, कुज्ञान, कुचारित्र मेरे स्वभाव नहीं हैं मैं चाहूँ तो हटा सकता हूँ, मेरी दृष्टि समीचीन हो सकती है।

     

    आचार्यों ने कहा है कि किसी वस्तु को देखना, जानना-मानना-चिंतन करना कुदृष्टि नहीं है, पकड़ना कुदृष्टि है। पदार्थों को पकड़ना यही कुदृष्टि है। समीचीन दृष्टि सो वास्तविक स्वभाव और कुदृष्टि सो संसार। दुख का स्रोत पकड़ने में है, जानने में नहीं, क्योंकि जानना आत्मा का स्वभाव है। कुदृष्टि को माँजने की आवश्यकता है। यह तभी मैंज सकती है, जब हम अपने आपको जाने। दुनियाँ की कोई वस्तु अच्छी बुरी नहीं है। हमारी दृष्टि अच्छी बुरी है। यह ज्ञान जब प्राप्त हो जाता है तो आनन्द का अनुभव हो जाता है, सद् दृष्टि प्राप्त हो जाती है। अनन्त की परिभाषा यह है कि सब कुछ दे दे तो भी संतुष्ट न हो। लोभ परिग्रह का प्रतीक है। जीव इसके वशीभूत होकर अपने स्वभाव को भूलकर कुदृष्टि को अपना लेता है। अनंत लोभ वह है जिसका समाधान ही नहीं होता। लिप्सा की तुलना में दादाजी भी पोते से पीछे नहीं रहते है। कुदृष्टि के साथ जब वृद्धावस्था आती है, तब शक्ति तो रहती नहीं है। खाने पीने की शक्ति नहीं, श्वांस भी अच्छी तरह नहीं ले पाता, इन्द्रियाँ भी पूर्ण रूपेण काम नहीं कर पाती किन्तु तृष्णा की पहली रेखा विषवन की है प्याली। यह तृष्णारूपी सर्प इस प्रकार का है, वह रात दिन दुनियाँ को खाता है। सर्प विष से तो एक बार ही मरना हो सकता है, पर तृष्णारूपी विष प्याली के द्वारा अनन्तबार, अनन्तभव, अनन्तमृत्यु होती है। आत्मा के अनन्त स्वभाव का इससे अंत हो जाता है। अक्षर का अनंतवां भाग ज्ञान रह जाता है, घड़े में घी के समान इस लोकाकाश में सूक्ष्म निगोदिया जीव भरे रहते हैं। एक बार जन्म लेने से कितनी वेदना होती है, उसको कहना मुश्किल है और जो जीव तृष्णा-लिप्सा के द्वारा अनन्त बार जन्म मरण को धारण कर रहा है, यहाँ तक कि श्वांस में १८ बार जन्म-मरण कर लेता है, उस दुख का वर्णन करने के लिए समुद्र को स्याही, सुमेरु पर्वत को लेखनी व पृथ्वी को कागज बनाना पड़ेगा। अनन्तानुबन्धी लिप्सा जब आ जाती है, तब ऐसी स्थिति इस जीव की होती है। कर्म सिद्धान्त को तो महावीर भगवान् भी नष्ट नहीं कर सकते हैं। अपने कर्म के फल को स्वयं वह व्यक्ति समय-समय पर भोगता है। दूसरों को मारने की हिंसा नहीं हुई है, पर मारने की कल्पना रात दिन हुई, यही अनंतानुबंधी का लक्षण है। भय की वजह से यह लोलुपी व्यक्ति, कुछ अनर्थ करता नहीं पर अनर्थ करने की इच्छा को छोड़ता नहीं है। डर के मारे द्रव्य हिंसा तो नहीं करते हैं, पर अनन्त हिंसा से नहीं डरते। जब दिशा ही खराब है तो दशा भी खराब होगी। दूसरों को हटा कर खुद की नियुक्ति न करो। अपने पुरुषार्थ से खाओ और कुछ बना कर रखो। आत्मा ने ज्ञान दर्शन को नहीं छोड़ा है अनंतकाल से पर संयोग की वजह से दुख का अनुभव किया है। हम प्रार्थना करते हैं, संयोग न छूटने की, यह प्रार्थना गलत है। जवानी छूटेगी, बुढ़ापा आवेगा और आपको ले जावेगा। बादाम का हलवा भी रोजखाओगे तो भी झुर्रियाँ गाल पर पड़ेगी, जो ललाई है, वह मिटेगी। आम का पीलापन समाप्त नहीं होगा पर लाल कांति जो है, वहाँ कुछ समय बाद झुर्रियां पड़ जाती है, जिसे आप भी बाजार में लेना पसंद नहीं करते। वह भी आम है। माली ने उसकी सुरक्षा भी की। आप उसे रेफ्रीजरेटर में रखोगे तो भी झुर्रियाँ तो पड़ेगी ही। काल का निमित्त पाकर मिटना, रुकना, उठना, झुकना लगा रहता है अत: अनन्तानुबन्धी के पीछे पड़कर जो वस्तु का संग्रह हो रहा है, वह संसार का कारण है। आचार्यों ने दर्शन, ज्ञान, चारित्र के प्रयोग से पहले सच्चा (Right) शब्द का भी प्रयोग किया है। जितना लौकिक क्षेत्र में कोई आगे बढ़ेगा वह पारमार्थिक क्षेत्र में उतना ही पीछे रहेगा। वास्तविक सेठ वही जिसने आत्मिक क्षेत्र में अनुभव प्राप्त किया है। बबूल से आम भी नहीं मिलेंगे और छाया भी नहीं मिलेगी। आप वर्तमान में चाहे जितना संग्रह कर लो पर खायेंगे चार-पाँच रोटी ही। धनवान कोई एक बोरी नहीं खाता। जब चिंता लग जाती है तो जठराग्रि भी मंद पड़ जाती है। धनवान की खुराक तो वैसे भी कम हो जाती है। सेठ भस्म खाकर भस्म भले ही हो जाएँगे, पर खुराक ज्यादा नहीं कर सकते है। जो ऐसा करते हैं वे विषय भोग को संपुष्ट करते हैं, वे जीने के लिए खा नहीं रहे हैं, बल्कि खाने के लिए जी रहे हैं। जीने के लिए खाना सम्यग्दृष्टि है और खाने के लिए जीना कुदृष्टि है। खाने में सुख की प्राप्ति नहीं है, बल्कि खाने में भी पसीना आता है, जो कष्ट का द्योतक है। खाने से दुख की निवृत्ति भी नहीं हो सकती है। आप जैसा चाहोगे वैसा मिलेगा, आप नया-नया शरीर, नया-नया जीवन मिले ऐसा चाहोगे तो वो भी मिलेगा, एक श्वांस में १८ बार जन्म व मरण मिलेगा। यह अनंतानुबंधी का प्रतीक है। जो जीने के लिए खाता है वह शरीर को गौण समझता है, वह जीवन की रक्षा करता है। जिनकी दृष्टि हिंसा से अहिंसा की ओर नहीं है बचने की ओर दृष्टि नहीं है, वे लोग जैन के कोटे में नहीं आ सकते हैं। संतोष के बिना मनुष्य जीवन मिलता नहीं और संतोष के बिना मनुष्य जीवन में सफलता नहीं मिलती है। शरीर को जो कारागार, हीन समझता है वह अल्प आरंभ परिग्रह रखेगा।


    User Feedback

    Recommended Comments

    There are no comments to display.



    Join the conversation

    You can post now and register later. If you have an account, sign in now to post with your account.

    Guest
    Add a comment...

    ×   Pasted as rich text.   Paste as plain text instead

      Only 75 emoji are allowed.

    ×   Your link has been automatically embedded.   Display as a link instead

    ×   Your previous content has been restored.   Clear editor

    ×   You cannot paste images directly. Upload or insert images from URL.


×
×
  • Create New...