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    मूकमाटी : जिसने संगोष्ठी में विद्वानों को बोल दिए

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    (श्री अटल बिहारी बाजपेई राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय भोपाल एवं श्री दिगम्बर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट (रजि.) भोपाल के आयोजकत्व में १५ एवं १६ अक्टूबर २०१६ को दो दिवसीय मूकमाटी राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में भगवान आदिनाथ के चित्र के समक्ष आलोक संजर, अटल बिहारी वाजपेई राष्ट्रिय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनलाल छीपा एवं पूर्व कुलपति मिथलाप्रसाद जी तथा दिगम्बर जैन पंचायत के अध्यक्ष प्रमोद हिमांसु आदि ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।)

     

    इस अवसर पर उपस्थित अनेक कुलपतियों का स्वागत आयोजन समिति की ओर से किया गया। इस अवसर पर सांसद आलोक संजर ने आचार्य श्री को श्रीफल भेंट कर आशीष ग्रहण किया। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य में हिन्दी का योगदान सर्वोच्च है क्योंकि हिन्दी में भावों की स्पष्टता दिखाई देती है। मूकमाटी एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें जीवन का यथार्थ है। इस अवसर पर पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय,उज्जैन के पूर्व कुलपति श्री मिथिलाप्रसाद जी ने कहा कि माटी तो मूक थी परन्तु गुरुवर की कलम ने उसे शब्दातीत बना दिया है। श्री प्रसाद जी ने एक कविता के माध्यम से सम्पूर्ण मूकमाटी को अपने विचारों के माध्यम से सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। प्रमुख सचिव संस्कृति, वाणिज्य, पुरातत्व मनोज श्रीवास्तव ने गुरुवर का आशीष प्राप्त किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ हस्तीमल जैन ने कहा कि पीड़ा भी आनंद का विषय होता है जब उसमें से कुछ अनूठा निकलता है गुरुवर ने माटी में से अमृत निचोड़ा है। श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि जितनी रचनाधर्मिता गुरुवर की कलम में है भारतीय साहित्य समाज में विरल ही है। आजकल अनेक गुरु सर्जन की बजाए अर्जन में लगे हैं परन्तु कैवल्य के मार्ग को प्रशस्त करने वाले गुरुवर ने साहित्य का जो सर्जन किया है वो अंतरंग के निर्माल्य का परिणाम है। इस महाकाव्य के तारतम्य में स्पष्ट है माटी को अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है और उसमें स्वर्णमयी निखार आ जाता है। आतंकवाद के बारे में लिखी पंक्तियाँ ऐसी लगती हैं मानो अभी २९ सितम्बर २00१६ के सन्दर्भ में १९८८ में ही लिख दिया हो, ये उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। जिसका जीवन कविता हो गया हो उसकी कविता तो जीवनदायिनी हो ही जाएगी।

     

    राजा भोज विश्वविद्यालय के कुलपति तारिक अनवर ने घोषणा की कि मूकमाटी को अपने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की घोषणा की। साँची विश्वविद्यालय के कुलपति श्री यग्नेश्वर शास्त्री ने भी अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि अनेक शताब्दियों में ऐसे विरले महाकवि होते हैं जैसे कि आचार्य श्री विद्यासागर जी हैं।

     

    आप लोग वक्ताओं को एकाग्रता से सुन रहे थे। मैं भी एक श्रोता बनकर सुन रहा था। मंथन में ही जो देखते हैं वो गायब हो जाता है, जो नहीं दिखता वो उभर कर सामने आता है। भावों की कोई भाषा नहीं होती है वो तो तैरते हुए ही दिखाई देती हैं। अपने भावों की तरंगें व्यक्त करते रहना चाहिए।

     

    कल प्रधानमंत्री जी आये थे तो भारत की बात हुई। कोई कितना भी बड़ा कलाकार हो यदि पूर्ण निष्ठा से कला की अभिव्यक्ति नहीं करेगा तो सार्थकता दिखाई नहीं देगी। भाषा में उलझकर कभी-कभी भाव पिछड़ जाते हैं। केन्द्र बिन्दु की स्थापना करके एक रेखा खींची जाती है चारों तरफ से तो हरेक दिशा में केन्द्र को छूते हुए चतुर्भुज बनता है। केन्द्र से विचलित न हों तो सम्पूर्ण व्यास परिलक्षित होता है। दृष्टिकोण से ही व्यवहार में सरलता आती है। जीवन को सम्पूर्ण बनाना चाहते हो तो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश से ऊपर उठकर केन्द्र तक दृष्टि जाना चाहिए। परिधि में सूर्य का बिम्ब तभी दिखाई देता है जब सभी दिशाओं में एकरूपता होती है। शब्दों से ही उपजती हैं जीवन की विविध रूपताएँ। आज भारत के प्राचीन दृष्टिकोण को समझने और समझाने की जरूरत है। जो वीणा का संगीत होता था आज लुप्त हो गया है। शुभ यानि सरस्वती और लाभ यानि लक्ष्मी, ये दोनों एक दूसरे की पर्याय हैं परन्तु आज सरस्वती का लोप करके लक्ष्मी के पीछे दौड़ रहे हैं। सरस्वती को मन्त्र बनाकर ही महामंत्र का रूप दिया जाता है। यंत्र और तंत्र सब बेकार हैं महामन्त्र के सामने। पीछे भी देखो मगर पश्चिम के पिछलग्गू मत बनो। परदेश की यात्रा छोड़कर अपने देश में लौटने पर ही भारत देश का नवनिर्माण हो सकता है। लाभ के पीछे दौड़कर भला नहीं हो सकता। अंतरंग की लक्ष्मी को पाना है तो बाहर देखना बंद करो, भीतर जाओ और आप भी तर जाओ। जिस रंग का चश्मा लगाओ तो वैसा ही दृश्य दिखाई देता है। आज अंतरराष्ट्रीय होने की जरूरत नहीं है बल्कि अन्तर में राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने की जरूरत है। मंथन से चिंतन उपजता है और फिर नवनीत की तरह मुलायम परिणाम निकलते हैं। प्राचीन भारत की संस्कृति का मंथन करें तभी शुभ परिणाम दिखाई देंगे। विदेशी संस्कृति से भारत की प्रतिभाओं का दोहन हो रहा है, हमारी संस्कृति का ज्ञान कराने पर ही प्रतिभाएँ उभर कर आएँगी।

    -१५ अक्टूबर २०१६, शनिवार, भोपाल 

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    रतन लाल

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    आज अंतरराष्ट्रीय होने की जरूरत नहीं है बल्कि अन्तर में राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने की जरूरत है

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