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    आयुर्वेद : भारतीय संस्कृति का अमूल्य दस्तावेज

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    आज की चिकित्सा पद्धति व्यवसायिक चिकित्सा पद्धति बना दी गई है, जबकि भारत में प्राचीन समय में चिकित्सा और शिक्षा सेवा के रूप में दी जाती थी। ऐसा नहीं है कि पहले शरीर की चिकित्सा नहीं होती थी, प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थों को पढ़ो तो ज्ञात हो जाएगा। हजारों वर्ष पूर्व भी शरीर की शल्यचिकित्सा होती थी। ये जो प्लास्टिक सर्जरी है वह आज की नहीं है; यह आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार प्राचीन भारत में होती थी। यह विदेश का आविष्कार नहीं है। यह विशेष भारत का आविष्कार है। इस सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों ने भी लिखा है आप उसे देख सकते हैं।

     

    शरीर की चिकित्सा के लिए आज के डॉक्टर दवाईयाँ दे देकर उसे और खराब करते हैं। ऐलोपैथी वाले डॉक्टर स्वीकार करते हैं कि ऐलोपैथी से साईड इफेक्ट होते हैं, फिर भी वे आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार चिकित्सा नहीं करते, उन्होंने इसे पढ़ा ही नहीं। आयुर्वेद में शरीर चिकित्सा के लिए उपवास करना अनिवार्य बताया है। उपवास करने से कुछ बिगड़ता नहीं, बल्कि बिगड़ा हुआ बाहर आ जाता है। आप लोग शरीर की प्रकृति के विपरीत चलते हैं। कोई नियंत्रण नहीं रखते अपने मुख पर, कभी भी खाओ, कितना भी खाओ, कुछ भी खाओ, खाते जाओ, तो डॉक्टर कहता है गोली खाते जाओ और कुछ भी खाओ, कभी भी खाओ। उसको तो अपना व्यवसाय चलाना है। जब उनका व्यवसाय नहीं चलता है तो कहते हैं-सीजन नहीं चल रहा है। आज तो चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत बड़ा व्यवसाय बन गया है। इतना बड़ा व्यवसाय तो भारत में कभी नहीं रहा, क्योंकि आयुर्वेद तो जड़-मूल से ठीक करता है। उसका उद्देश्य व्यवसाय चलाना नहीं होता है। आज देश को आजाद हुए ७0 साल हो गए हैं। उसे अपनी आयुर्वेद संस्कृति की ओर लौटना चाहिए जिससे ऐलोपैथी की परतंत्रता और आर्थिक हानि से बच सकें। सभी को यह बात याद रखनी चाहिए-'जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन। जैसा पीवे पानी, वैसी होवे वाणी।'

    -१५ अगस्त २o१६, भोपाल

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    रतन लाल

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    शुद्ध खाओ, शुद्ध पीओ, स्वस्थ रहो

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