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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पाठ ५ - सारस्वतांजलि

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    अध्ययन - अध्यापन एवं लेखन कार्य में जिनका संपूर्ण जीवन व्यतीत हुआ, ऐसे सरस्वती के पुत्र आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज से जुड़े पठन-पाठन सम्बन्धी प्रसंग, जो मुख्यतः आचार्य श्री विद्यासागरजी के श्रीमुख से निकले एवं कुछ अन्यत्र से भी चयन किए गए हैं, संकलित किए गए। उन प्रसंगों को इस पाठ में प्रस्तुत किया जा रहा है-

     

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    शिक्षा लेना-देना गुरुजी को अच्छा लगता था। ढलती अवस्था में भी उन्हें इस बात की प्रतीक्षा रहती थी कि किसी को दे दें। उन्होंने ऐसा दिया कि जो दीया, बाती और लाइट से भी अधिक प्रकाशित है। वह टिमटिमाते दीपक को देखकर भागती हुई रात के समान है। चोटी के विद्वान् आएँ या बालक, कठिन से कठिन विषय को सहज-सरल भाषा में अभिव्यक्त कर देना उनके बाएँ हाथ का खेल था। चोटी के विद्वानों के लिए वे चुटकियों में समझा देते थे। कोई भी पात्र आ जाए, वे उसको सिंचन करते रहते थे ताकि वह अपनी भवितव्यता के अनुसार कालांतर में अपना कल्याण कर सके। सरस्वती के माध्यम से जो वरदान उन्हें मिला, वह सब उन्होंने जो भी पात्र मिला उसे दे दिया। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने अपने जीवनकाल में बड़े-बड़े संघों के लिए अध्ययन कराया।

     

    आचार्य श्री देशभूषणजी, आचार्य श्री वीरसागरजी, आचार्य श्री शिवसागरजी, आचार्य श्री धर्मसागरजी आदि सभी को उन्होंने पढ़ाया। उनमें अंतिम विद्यार्थी मैं था।

     

    अंतिम विद्यार्थी एवं शिष्य आचार्य श्री विद्यासागरजी की शिक्षा

     

    गुरुदेव ने जब से होश सँभाला तब से शिक्षण का कार्य किया है, उसमें अंतिम विद्यार्थी मैं था। बहुत ही कम समय मिला हमें। उन्होंने कम अवधि में पिलाया, जैसे - माँ घोल-घोल कर पिलाती है उसी प्रकार अल्प समय में मेरे ऊपर जो उपकार किया वह शब्दों में गुँथित नहीं कर सकता। पढ़ाते समय उन्हें भी बहुत आनन्द आता था। गुरु ने मुझे दो- तीन वर्ष ही पढ़ाया। बाद में वे इतने वृद्ध हो गये कि जो कुछ वो बताते थे, वही पढ़ता था। ग्राहक खाली न जाये। एक भी आये, तो दे दो। नहीं आ पाये तो बंजी करके आओ। उन्होंने वृद्धावस्था में भी बंजी करना नहीं छोड़ा। मुँह में एक भी दाँत नहीं था, फिर भी पढ़ाया-लिखाया। उन्हें विहार करने में परेशानी होती थी। साइटिका का दर्द था, फिर भी प्रमाद नहीं किया। जो कोई भी पिपासु आते, उन्हें दे देते। उस उम्र में भी उन्होंने मेरे ऊपर कृपा करके मुझे कुछ मंत्र देकर आगे बढ़ाया-पढ़ाया एवं सिखाया है। वह मंत्र कुछ और नहीं है -'श्रम करना है, श्रम से ही आगे बढ़ना है। मैं वैसे माध्यमिक कक्षा का ही छात्र रहा हूँ, किन्तु ध्यान रखना मैं आचार्य ज्ञानसागरजी गुरु के विश्वविद्यालय में पढ़ा हूँ।

     

    हम तब आये, जब... - गुरुजी की काया भले ही ढीली-ढाली हो गयी हो, पर भीतर की साधना बहुत बलवती थी। आँखों में कमजोरी और हाथों में शिथिलता होने के कारण वे किसी श्रावक से लिखवाते थे। वे बोलते और श्रावक लिखता चला जाता था, फिर उन्हें वापिस सुनाता था। मेरा पुण्य था। उसी समय मैं उनके चरणों में आया जिससे उनकी शब्दावली मुझे प्राप्त हो गई। ब्रह्मचारी विद्याधर अजमेर में फरवरी १९६७ को गुरुचरणों में समर्पित हुए थे। उस समय उनकी उम्र २१ वर्ष ४ माह थी, एवं आचार्य श्री ज्ञानसागरजी की उम्र ७६ वर्ष थी।

     

    विद्या का अध्ययन करना मानो उनका व्यसन था - ‘वि-विशेषरूपेण असनं इति व्यसनं ।' वे खूब खाते और दूसरा आ जाये तो उसे खिलाते थे। व्यसन का अर्थ अतिरेक होता है और अतिरेक अध्यात्म में जब होता है तो वह मोक्षमार्ग में सहायक होता है।उनके जीवन में उदारता थी। हम लोगों के पास लेने का लोभ और उन्हें देने का लोभ रहता था। उनके संघ में अध्ययन-अध्यापन का कार्यक्रम वर्तमान युग के अध्यापक एवं अध्येता के लिए आश्चर्यकारक है। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी के संघ में अध्ययन का कार्यक्रम उदाहरणतः ग्रीष्मकाल में इस प्रकार था

     

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    ऐसे किया बहुभाषा में निष्णात

     

    सामान्य हिन्दी भाषा - न हम मारवाड़ी भाषा समझते थे, न हिन्दी और न संस्कृत जानते थे। गुरु से हमें ‘तीन भाषाएँ रत्नत्रय' के रूप में मिलीं। जब मैं राजस्थान में गुरु महाराज के पास पहुँचा, उस समय मेरी स्थिति ऐसी थी कि अच्छे से हिन्दी आती नहीं थी, बोलने में तो हम डरते थे। ऐसा लगता था कि कुछ गड़बड़ न हो जाये। बस हओ-हओ (हाँ-हाँ) कहना सीख लिया था। अनुभवी विद्वान् आते थे। महाराज से चर्चा करते थे। हम भी बैठे-बैठे सुनते रहते थे। कुछ समझ में नहीं आता था, अतः चुपचाप सुनते थे। उस समय पंडित हीरालालजी शास्त्री ब्यावरवाले आचार्य महाराज के पास आते थे। पंडितजी प्रतिदिन आचार्य महाराज से धर्म चर्चा करते थे। एक दिन हमने आचार्य महाराज से पूछा कि पंडितजी इतनी अच्छी हिन्दी बोलते हैं, हमें ऐसा बोलना कब आएगा? तब आचार्य महाराज मुस्कराकर बोले- ‘चिंता मत करो, सब आ जाएगा।’ सीखने की ललक लगी रहती। विकल्प भी रहता था। दिन भर उसी में लगा रहता था। रात में तैयारी करता था एवं सुबह महाराज को सुनाता था। इस तरह ब्रह्मचारी विद्याधर ने अपने गुरुजी से सामान्य हिन्दी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया।

     

    साहित्यिक हिन्दी - मुझे गुरुवर के पास राजस्थान पहुँचने के बाद हिन्दी सीखने की ललक लगी। फिर गुरुदेव ने मुझे संस्कृत भाषा का ज्ञान कराया। जब मुझे साहित्यिक हिन्दी सीखने की तीव्र भावना जागृत हुई तब अजमेर के ही हिन्दी के एक प्रो. पं. महेन्द्र पाटनी से हिन्दी साहित्य को उपलब्ध कराने को कहा, उस समय मैं ब्रह्मचारी अवस्था में था। निमित्त की बात देखो कि मेरा भोजन भी उन्हीं के यहाँ हुआ। उन्होंने वहीं पर मुझे कामायनी, उपनिषद् आदि कुछ नाम बताए और आकर उन्होंने आचार्य महाराज को भी बताया, तो गुरुदेव मुझसे बोले वह तो एम.ए. कक्षा की हिन्दी है। आप छोटी कक्षा की हिन्दी सीखो। परन्तु प्रो. साहब ने मुझे पहले संस्कृत भी पढ़ायी थी, अतः उन्होंने मुझे कामायनी दी। उसे पढ़कर विशिष्ट हिन्दी का ज्ञानार्जन किया।

     

    अंग्रेजी भाषा - इसी क्रम में उन्होंने अपने शिष्य को (मुनि अवस्था में) अंग्रेजी भाषा का शिक्षण कार्य डॉ. फैय्याज अली एवं के.डी. जैन विद्यालय, मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर, राजस्थान के तत्कालीन प्राचार्य ओमप्रकाश जैन से कराया।

     

    संस्कृत भाषा - साहित्यिक हिन्दी सीखने के पूर्व से ही संस्कृत, प्राकृत भाषा का अध्ययन गुरुदेव के पास ही चल रहा था। जैनेन्द्र व्याकरण से व्याकरण का अध्ययन कराया। कातन्त्र रूपमाला से भी सिखाते थे। इसकी अपनी बड़ी विशेषता है, गुरुजी ऐसा कहते थे। ब्रह्मचारी अवस्था में मुझे लगभग दो माह तक व्याकरण का अध्ययन कराया। दीक्षा के बाद तो बिल्कुल बाजू में बैठाकर संस्कृत व्याकरण पढ़ाते थे। पढ़ाते समय उन्हें भी बहुत आनन्द आता था।

     

    नाममाला - आचार्य महाराज ने कातन्त्ररूपमाला के साथ-साथ नाममाला (धनंजय नाममाला) भी कंठस्थ कराई। वे कहते थे ‘संस्कृत भाषा में प्रवेश के लिए यह बहुत आवश्यक है। सामान्यरूप से संस्कृत के प्रत्येक बिन्दु की पकड़ अच्छी होनी चाहिए। आचार्य महाराज पढ़ाने के बाद यह नहीं पूछते थे कि समझ में आया कि नहीं। वे तो मात्र कंठस्थ करने को कहते थे।

     

    ज्योतिष शास्त्र एवं स्वर ज्ञान - एक बार आचार्य महाराज ज्योतिषशास्त्र पढ़ा रहे थे। उस समय उसमें एक विषय आया कि कोई पक्षी माँस का टुकड़ा ले जा रहा है। वह किसका माँस है, तो उसके अनुसार भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु यह सुनकर मैंने कहा यह मुझे अच्छा नहीं लगता। तब आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने कहा यह ज्योतिष विफल हो सकता है, किन्तु स्वर ज्ञान कभी विफल नहीं हो सकता। अतः इसका ज्ञान कराना चाहिए। उसके बाद स्वरों का ज्ञान कराया।

     

    न्यायशास्त्र - आचार्य महाराज जिस समय न्यायशास्त्र पढ़ाते थे, उस समय मुझे अच्छे से हिन्दी भी नहीं आती थी। विषय भी समझ में नहीं आता था, तब भी चुप बैठकर सुनता रहता था। कुछ बोलता नहीं था। डर था कि कहीं कुछ गलत न निकल जाये। मुझे अष्टसहस्री पढ़ना था। उसकी प्रति उपलब्ध नहीं थी, तो ग्राम ‘राणोली', सीकर, राजस्थान से अष्टसहस्री मँगवायी थी, जिसे आचार्य महाराज ने ब्रह्मचारी (पं. भूरामलजी) अवस्था में पढ़ा था और उसमें निशान लगे थे। एक ही प्रति थी। आचार्य महाराज बिना पुस्तक के पढ़ाते थे। वह पुस्तक हमारे हाथ में रहती थी। वे अर्थ समझाते थे और कहते थे, देखो वहाँ निशान लगा है।

     

    जिस अष्टसहस्री को लोग ‘कष्टसहस्री’ कहते थे, आचार्य महाराज उसे 'मिष्टसहस्री' कहते थे। इसको पढ़ाना उनका बाएँ हाथ का काम था। ये देखा है हमने। आचार्य महाराज कहते थे साधक को, स्वाध्यायी को, मुमुक्षु को, आस्थावान् को हमेशा आचार्य प्रणीत अध्यात्म ग्रन्थ को ही पढ़ना चाहिए। यदि बुद्धि / ज्ञान ज्यादा है तो न्याय पढ़ना चाहिए। लेकिन इसके लिए वैराग्य का होना आवश्यक है। ऐसा हमें उनके स्वाध्यायी जीवन से देखने, सीखने या ग्रहण करने को मिलता था।

     

    दर्शनशास्त्र - पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में मेरा दर्शन का अध्ययन चल रहा था। उस समय के भाव आज भी मेरे मानस में पूर्ववत् तरंगायित हैं। मैंने पूछा- ‘महाराजजी, आपने कहा था कि मुझे न्याय व दर्शन का विषय कठिनाई से हस्तगत होगा, इसका क्या कारण है?’ वे बोले- देखो! ‘प्रथमानुयोग’ पौराणिक कथाओं और त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन करने वाला है, वह हजम हो जायेगा। ‘करणानुयोग’ भूगोल का ज्ञान कराता है। दूरवर्ती होने के कारण उस पर भी विश्वास किया जा सकता है। इसमें कोई विवाद नहीं चलेगा। ‘चरणानुयोग’ आचरण की प्रधानता वाला है। हिंसा को धर्म नहीं मानना। किसी को पीड़ा दो यह किसी भी धर्म में नहीं कहा गया। इसलिए यह भी सर्वमान्य होगा। किन्तु ‘द्रव्यानुयोग’ के अंतर्गत आगम और अध्यात्म ये दो प्ररूपणायें चलती हैं। प्रत्येक आत्मार्थी ‘अध्यात्म’ को चाहता है, अतः जहाँ पर इसका कथन मिलता है वहाँ तो साम्य हो जाता है, परन्तु ‘आगम’ में साम्य नहीं होगा।

     

    ध्यान के विषय में सर्व एकमत हैं। ध्यान करना चाहिए। मुक्ति के लिए यह अनिवार्य है, किन्तु ध्यान किसका करना? उसके लिए ज्ञान कहाँ से और कैसे प्राप्त करें? इसके लिए आगम देखना होगा। आगम में भी कर्म सिद्धान्त को सारी दुनिया अपने-अपने ढंग से स्वीकार करती है। दृष्टियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन कर्म को सबने स्वीकृत किया है। मैंने बीच में टोकते हुए निवेदन किया - ‘तो फिर रहा ही क्या?’

     

    गुरुदेव ने उत्तर दिया- ‘रहा वह, जो आपके गले उतरना कठिन है। मैंने पूछा ‘वह क्या?’ बड़े सहज भाव से बोले- ‘द्रव्यानुयोग’ के दो भेद हैं-  १.आगम और २. अध्यात्म आगम के भी दो भेद हैं- १.कर्म सिद्धान्त-जो सभी को ग्राह्य है। १४८ कर्म प्रकृतियों को या मूल में ८ कर्मों को सब स्वीकार करते हैं। २. दर्शन- यहीं पर विचारों में विषमता आ जाती है।' दर्शन के क्षेत्र में तत्त्वचिंतक अपने-अपने ज्ञान के अनुरूप विचार प्रस्तुत करते हैं। ऐसी स्थिति में छद्मस्थ होने के कारण वैचारिक संघर्ष संभव है। मैंने पुनः पूछा- “आप यह सब बताकर क्या कहना चाह रहे हैं?”

     

    मेरी प्रसन्न मुद्रा को देखते हुए गुरुदेव बोले- ‘देखो! षड्दर्शन में जैनदर्शन कोई दर्शन नहीं है। परन्तु यदि उन छह दर्शनों का संचालन करने वाला कोई है तो वह है जैनदर्शन। जो छह दर्शनों की ओर अलग-अलग भाग रहे हैं, उन्हें एकत्र करके समझाने वाला यह जैनदर्शन है। मैं पुनः बोल पड़ा- ‘तब तो इसके लिए सभी के साथ मिलन की आवश्यकता पड़ेगी। महाराज बोले- ‘इसलिए तो मुनि बनाया है और मुनि बनने के बाद यह आवश्यक है कि समता आनी चाहिए। तभी अनेकान्त का हृदय विश्व के सामने रख सकोगे।’ यदि समता नहीं रखोगे तो जैनदर्शन को भी नहीं समझ सकोगे। उसे साफ़ (समाप्त) कर दोगे, यह ध्यान रखना।

     

    जैनदर्शन वकालत नहीं करता, अपितु जो वकालत करने के लिए विविध तर्को से लैस होकर संघर्ष की मुद्रा में वकील आते हैं, उन्हें साम्य भाव से सुनकर सही-सही निर्णय देता है, निष्पक्ष होकर निर्णय देता है। आज हम लोगों के सामने ३६३ मतों की कोई समस्या नहीं है। उन्हें समझाया जा सकता है, बशर्ते कि हम उनकी बात सुनें और समझे। उनकी बात काटनी नहीं है और काटना चाहें तो काट नहीं सकते, क्योंकि जिसका अस्तित्व है उसका नाश, विनाश हो नहीं सकता। उसको मिटाने का प्रयास करोगे तो पिटोगे अवश्य, क्योंकि संघर्ष होगा। अनेकान्त का हृदय है समता। सामने वाला जो कहता है उसे सहर्ष स्वीकार करो। षड्दर्शनों का अध्ययन करोगे तो आपको स्वतः ज्ञात हो जायेगा कि अनेकान्तात्मक वस्तु क्या है?

     

    जब मैं आचार्य महाराज के पास अष्टसहस्री और प्रमेयकमलमार्तण्ड इन ग्रन्थों को पढ़ रहा था, तो वे शंकित हुए कि मैं इसमें सफल हो पाऊँगा कि नहीं। किन्तु यह मात्र आशंका ही सिद्ध हुई। मैं समझ चुका था। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस व्यक्ति के पास समता आ जायेगी, वह सारे के सारे विरोधी प्रश्नों को पचा जायेगा और उनके सही-सही उत्तर देने में सक्षम हो जायेगा। समता के बिना ममता के साथ यदि प्रमत्त दशा में जीवनयापन करोगे तो विजयश्री का वरण नहीं कर सकोगे।

     

    मुझे तो संस्कृत एवं प्राकृत भाषा भी नहीं आती थी, लेकिन आचार्य महाराज ने मुझे सभी बातों का धीरे-धीरे ज्ञान कराया। मुझे तो आचार्य महाराज का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, उनकी साक्षात् प्रेरणा मिली। शिक्षा-दीक्षा सभी उन्हीं के माध्यम से हुई। इतनी सरल भाषा में अध्यात्म की व्याख्या मैंने कहीं नहीं सुनी, जो हिन्दी में पूज्य आचार्य महाराज ने समयसार की व्याख्या की है।

     

    शिक्षा नहीं, शिक्षा पद्धति दी

    आचार्य श्री विद्यासागरजी ने कहा कि हमें गुरुजी ने दो-तीन वर्ष ही पढ़ाया, पर उनके सर्वांगीणज्ञान से यह विदित होता है कि दो-तीन वर्षों की शिक्षा मात्र से कोई सर्वशास्त्र पारंगत नहीं हो सकता है। इससे प्रतीत होता है कि आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने उन्हें शिक्षा नहीं, शिक्षा पद्धति' प्रदान की, शास्त्र नहीं अपितु शास्त्र दृष्टि प्रदान की। इस सम्बन्धी जो भी बिन्दु हमें आचार्यश्री के श्रीमुख से प्राप्त हुए, उन्हें यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है

     

    विद्या कंठस्थ हो - कंठस्थ विद्या विद्वानों के द्वारा सदा प्रकाश्य होती है। इसलिए आचार्य महाराज ज्ञानार्जन की क्रिया में अपने द्वारा दिए गए सूत्रों को कंठस्थ कराते थे। मुझे आचार्य महाराज रोज पाँच सूत्र पढ़ाते थे और याद करने को बोलते थे। जब हम याद करके आते थे, तभी पुनः पाँच सूत्र पढ़ाते थे। जितना पचता था, उतना ही देते थे। ज्ञान को वे सर्वांगीण महत्त्व देते थे।

     

    प्रसंग एवं अर्थ याद रखो - आचार्य महाराज कहा करते थे कि जो कुछ पढ़ा है, उसका प्रसंग एवं अर्थ याद रहना चाहिए। अन्यथा सही क्या, गलत क्या- उसका निर्णय नहीं किया जा सकता।

     

    एक-एक शब्द को पीओ - जैसे फोटोकॉपी को एक बार सुरक्षित रखोगे तो आगे भी उसका प्रयोग होता है, ऐसे ही एक शब्द को सुनो और उसे सुरक्षित रखो। दूसरे शब्द के समय पहले वाला शब्द गायब हो जाता है। बहुत शब्द सुनने की अपेक्षा एक-एक महत्त्वपूर्ण शब्द पीते चले जाइये।

     

    शिक्षा पात्रानुसार ही हो - मेरे शुरूआत के दिनों में जब पुराण पढ़ने की बात आयी तो आचार्य महाराज ने आदेश की भाषा में मुझे बुलाकर कहा कि आदिपुराण ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध को और जयोदय को अभी तुम्हें नहीं पढ़ना है। इस प्रकार आचार्य महाराज पात्र को देखकर ग्रन्थ का चयन करते थे, जिससे पात्र में परिपक्वता आ जाती थी।

     

    बार-बार पढ़ें - स्वाध्याय करने से यदि स्व की ओर दृष्टि चली जाती है तो स्व का ज्ञान होने में देर नहीं लगती। यही जीवन का सच्चा स्वाध्याय है। इसी बात को ध्यान में रखकर आचार्य महाराज कहते थे- ‘हमें बहुत ग्रन्थ पढ़ने की आवश्यकता नहीं, बहुत बार पढ़ने की आवश्यकता है। बहुत ग्रन्थ पढ़ने से कोई विद्वान् नहीं होता, बल्कि शब्दों के रहस्य को समझने में पाण्डित्य गुण प्राप्त होता है। हम जितनी बार ग्रन्थ का पाठ करेंगे या टीका ग्रन्थ पढ़ेंगे, उतना ही हमारा मन (जीवन) पवित्र होता जायेगा। इसलिए उन्होंने अपने जीवन में १०८ बार सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ को पढ़ा, जो उनके जीवन में सर्व साधनों की सिद्धि का कारण बना।

     

    ज्ञान तलस्पर्शी हो - ऊपरी-ऊपरी ज्ञान से कुछ नहीं होता। ‘ज्ञान तलस्पर्शी होना चाहिए।’ अतः वे तलस्पर्शी ज्ञान रखते थे। तलस्पर्शी ज्ञान किसी ग्रन्थ को एक बार पढ़ने से नहीं, किन्तु अनेक बार पढ़ने से होता है।

     

    अध्ययन के साथ मंथन हो - आचार्य महाराज ‘स्वाध्याय को पाठ बोलते थे। वस्तुतः स्वाध्याय किताब लेकर हाथ में रखने से ही हो, ऐसा नहीं। वह बार-बार कहा करते थे जैसे सरस्वती हाथ में किताब रखती हैं, उसी प्रकार बगल में समयसार रखने से स्वाध्याय नहीं होता। जो व्यक्ति न तो मथानी को देखेगा, न मटकी को देखेगा, न ही छाछ को देखेगा। तब इन सबसे दृष्टि हटाकर मंथन करने वाला ही उस नवनीत को पा लेता है। वे भी जो मंथन करते थे। उसमें से भावश्रुत के नवनीत को प्राप्त कर लेते थे। अपने मंथन से प्राप्त नवनीत को चाहने वालों को दे देते थे। ऐसे कई शिष्यों को उन्होंने तैयार किया।

     

    मूल भाषा में ही अध्ययन हो - आचार्य महाराज प्रायः कहा करते थे कि प्राचीन आचार्यों के द्वारा प्रणीत मूल ग्रंथों को ही पढ़ने का अभ्यास होना चाहिये। हिन्दी टीकाओं को पढ़ने से दिग्भ्रमित होने की संभावना होती है। जब वे पढ़ाते थे तो मूल के ऊपर दृष्टि रखने की बात कहा करते थे। वे हिन्दी नहीं देखने देते थे। वे कहते थे कि ‘मूल के ऊपर सोचो, विचार करो।’ यह सूत्र उनका मुझे आज भी प्राप्त है। ‘तत्त्वार्थसूत्र’ को जितनी बार पढ़ता हूँ उतनी बार मुझे बहुत आनन्द आता है और आचार्य महाराज का सूत्र ताजा होता चला जाता है। जब वे उदाहरण देकर समझाते थे, तो कहा करते थे- उदाहरण के बतौर।

     

    स्वयं को देखकर बोलो - आचार्य महाराज इतने अनुशासित थे कि वे पढ़ाते समय कभी सामने देखते नहीं थे। हम तो इसी प्रतीक्षा में रहते थे कि देखकर वह हमें खुश कर दें, पर वे हमेशा अपने को देखकर बोलते थे, क्योंकि यदि इसको देखकर कहा जायेगा तो ये भी सामने वाले को देखकर ही बोलना सीखेगा, अपने को नहीं देखेगा। ज्यादा पढ़ना अच्छा नहीं। समझ में आना अच्छा है। हमें तो ऐसा ही समझ में आया है। जो कुछ पढ़ाया, सो पढ़ लिया। नहीं समझे... जितना समय मिला, वो मिला। उससे समझ लो कि क्या हेय और क्या उपादेय।

     

    मुझे लगता था कैसे क्या होगा। इतना पढ़ा-लिखा था नहीं, इतना बड़ा काम है। उनको आँखों से देखने में नहीं आता था, क्योंकि पानी आता था। उनके संकेत याद रह गये। हमें जो महाराज ने दिया वह समय पर याद आ जाता है और ज्यादा क्या करना है। सब कुछ उन्हीं का प्रसाद है, फल है। हम तो बीच में डोर हैं।

     

    शिक्षा लेना-देना उन्हें प्रिय था

    पंडित भूरामल शास्त्री (आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज) ने अपने जीवन काल में आचार्य श्री वीरसागर, आचार्य श्री देशभूषण, आचार्य श्री शिवसागर, आचार्य श्री धर्मसागर, आचार्य श्री अजितसागर, संघस्थ आर्यिका सुपार्श्वमति, ज्ञानमति, वीरमति एवं अभयमति आदि साधु वृन्दों को समय-समय पर न्याय, सिद्धान्त एवं अध्यात्म का अध्ययन कार्य कराया। उन्हीं संघों में वे क्रमशः क्षुल्लक, एलक एवं मुनि दीक्षा ग्रहण करके भी अध्ययन-अध्यापन का कार्य करते रहे। उनसे जुड़े हुए कुछ प्रसंग यहाँ प्रस्तुत हैं

     

    आचार्य श्री वीरसागरजी - एक बार मुनिदीक्षा लेने के कुछ वर्ष बाद पूज्य मुनि श्री वीरसागरजी (उस समय आचार्य नहीं थे) सन् १९३४ में ससंघ दाँता पधारे थे। वहाँ रुककर संघस्थ साधुओं को बाल ब्रह्मचारी पंडित भूरामल ने संस्कृत एवं न्याय का अध्ययन कराया था। श्री वीरसागरजी का वात्सल्यामृत जब उन्हें मिला तो उन्हीं के संकेत को शिरोधार्य करते हुए वे श्रमण पथ पर चलने को तैयार हो गये। यद्यपि वे ब्रह्मचारी थे, किन्तु उन्होंने आचार्यश्री से ब्रह्मचर्य प्रतिमा के व्रत एवं दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना की। पूज्य श्री वीरसागरजी ने सन् १९४७ में अजमेर में ब्रह्मचर्य प्रतिमा प्रदान कर दी। ब्रह्मचर्य व्रत देने के उपरांत आचार्य श्री वीरसागरजी ने प्रवचन में कहा था कि सभी संतों को कच्ची माटी के घड़ों की तरह शिष्य मिलते हैं, जिन्हें भारी श्रम से पढ़ाना पढ़ता है, साधु चर्या सिखलानी पड़ती है। किन्तु हमारे संतस्वभावी पंडितजी ऐसी अवस्था में प्राप्त हुए हैं कि वे अपने तन और मन से स्वयमेव ही एक ज्ञानी संत के रूप में पहचान लिये हुए है। वे कल ब्रह्मचारी थे और आज भी ब्रह्मचारी हैं, फ़र्क इतना है कि वे अब हमारे संघ के हो गये हैं। उनके आगमन से उन्हें धर्मध्यान होगा, ऐसा मेरा प्रयास रहेगा। किन्तु संघ के सदस्यों को भी उनसे ज्ञानलाभ होता रहेगा। वे आगम के अध्येता तो हैं ही, बहुत बड़े रचनाकार हैं। उनके संस्कृत की रचनाओं से सजे हुए विशाल ग्रन्थों की अनेक पाण्डुलिपियाँ मैंने देखी हैं, जिनके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि ‘ये वर्तमान में संस्कृत के सबसे बड़े विद्वान् एवं रचनाधर्मी हैं। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।' उन्होंने आचार्य श्री वीरसागरजी महाराज को न्याय के ग्रन्थों का अध्ययन कराया और सीधीसाधी-सी भाषा में कहें तो अध्यात्म का भोजन कराया।

     

    एक हृदयस्पर्शी प्रसंग - आचार्य महाराज ने अपनी ब्रह्मचारी अवस्था (सन् १९५१) का एक प्रसंग हमें सुनाया- फुलेरा (राजस्थान) में पट्टाधीश श्री वीरसागरजी महाराज ससंघ का चातुर्मास चल रहा था। एक दिन आचार्य श्री वीरसागरजी के साथ एक और मुनिराज जंगल (शौच) जाने के लिए कमण्डलु की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब मैं (ब्रह्मचारी भूरामल) दोनों महाराजों का कमण्डलु उठाकर ले आया, तो आचार्य श्री वीरसागरजी महाराज बोले- ‘ब्रह्मचारीजी! आप यह काम मत किया करो। कमण्डलु लाना आपको शोभा नहीं देता, क्योंकि आप हमारे शिक्षा गुरु हैं। आप हमको धर्मशास्त्र पढ़ाते हैं। आप कमण्डलु लेकर आये, इसलिए हमको अच्छा नहीं लगा। भविष्य में कभी भी ऐसा मत करना।' गुरुजी ने बताया कि आचार्य श्री वीरसागरजी ने यह शब्द अतिवात्सल्यपूर्ण भावों से कहे।

     

    आचार्य श्री शिवसागरजी - आचार्य श्री शिवसागरजी के वे दीक्षित प्रथम मुनि शिष्य थे। उन्होंने आचार्य श्री शिवसागरजी ससंघ के लिए भी अध्ययन का कार्य कराया। जब वह आचार्य श्री शिवसागरजी से मुनि दीक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब आचार्य श्री शिवसागरजी ने उसी समय उन्हें अपने संघ का उपाध्याय घोषित करते हुए कहा- ‘मुनिवर श्री ज्ञानसागरजी महाराज को इस संघ का उपाध्याय भी बनाया जाता है। वे संघ को पढ़ाने व शिक्षा प्रदान करने का दायित्व सँभालेंगे। आचार्य श्री शिवसागरजी महाराज ‘भूरामल' शब्द की व्याख्या करते हुए कहते थे- “भूरामल-भू-पृथ्वी पर, रा-राति, ददाति। यानी पृथ्वी के सारे मल को जो धो देता है। वह भूरामल है”- ऐसा शिवसागरजी महाराज कहा करते थे।

     

    आचार्य श्री धर्मसागरजी - आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने आचार्य श्री धर्मसागरजी महाराज को ब्रह्मचारी अवस्था में रत्नकरण्डकश्रावकाचार का अध्ययन कराया। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज कहा करते थे कि यह रत्नकरण्डकश्रावकाचार छोटी कृति जरूर है, किन्तु वास्तव में इसमें रत्नत्रय की स्तुति की गई है।

     

    एक वात्सल्यमयी प्रसंग- सन् १९७० की ही बात है। मदनगंज-किशनगढ़ (अजमेर, राजस्थान) में दोनों आचार्यों का मिलन हुआ। पूज्य आचार्य ज्ञानसागरजी ससंघ पहले से ही किशनगढ़ में विराजमान थे।अतः उन्होंने आचार्य धर्मसागरजी महाराज ससंघ की अगवानी की। जब दोनों संघ मंदिरजी में पहुँचे और बैठने की बात आई, तब आचार्य श्री ज्ञानसागरजी ने कहा-‘महाराज! आप तपोवृद्ध हैं, अतः पहले उच्चासन आप ग्रहण करें। तब आचार्य श्री धर्मसागरजी ने कहा- “आप ज्ञानवृद्ध हैं। मेरे शिक्षा गुरु भी हैं। अतः आप उच्चासन ग्रहण कीजिए।” तब आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज बोले- ‘चलो दोनों ही एक साथ उच्चासन ग्रहण करते हैं।' दोनों संतों की वार्ता का जनमानस पर प्रेरक प्रभाव पड़ा। अंत में भक्तों की प्रार्थना मानते हुये दोनों संत एक समान उच्च आसनों पर विराज गये। जयकारों से आकाश गूंज उठा। ऐसे करुणा और वात्सल्य प्रधान संत लोगों ने कभी देखे न थे।

     

    आर्यिका ज्ञानमति माताजी एवं आर्यिका सुपाश्र्वमति माताजी - आर्यिका ज्ञानमतिजी एवं आर्यिका सुपार्श्वमतिजी ने बाल ब्रह्मचारी पंडित भूरामल से काफी समय तक विद्याध्ययन का लाभ प्राप्त किया था। वे उन्हें शिक्षा गुरु मानती थीं। आर्यिका सुपार्श्वमतिजी को आप्तपरीक्षा, प्रमेयकमलमार्तण्ड, अष्टसहस्री जैसे ग्रन्थों का अध्ययन कराया। अंत-अंत तक उनकी यही भावना रही कि जिनवाणी की सेवा क्षण-क्षण करता रहूँ। अंतअंत तक मैंने देखा कि उनकी दृष्टि में ज्ञान महत्त्वपूर्ण नहीं था, संयम महत्त्वपूर्ण था। ‘ज्ञान महत्त्वपूर्ण नहीं, संयत ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण है।

     

    साक्षर नहीं, शिक्षित किया

    जिन्हें भी आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज से पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्हें आचार्य महाराज ने केवल आगम, सिद्धान्त और अध्यात्म ही नहीं पिलाया, अपितु समय-समय पर जीवन के सम्पूर्ण विकास हेतु आत्मा से परमात्मा बनने हेतु पूर्ण कला, कौशलता भी प्रदान की। इसके लिए वह अध्ययन के दौरान उन बिन्दुओं को बार-बार दोहराते रहते थे, जिनके चित्त पर उत्कीर्ण होने से यह आत्मा बाह्य से परान्मुख हो, आत्मस्थ होने के लिए लालायित रहती थी। कुछ बिन्दु निम्न हैं

     

    अनुकूल और प्रतिकूल वातावरणरूप वायु के झकोरों से अपने आपको कंपित मत करो।

    इन्द्रियों के दास, राक्षस के समान सर्वभक्षी बन जाते हैं। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज के मुखारविन्द से निम्न पंक्तियों का उच्चारण अनेक बार होता रहता था

    • अंतिम ग्रीवक लौं की हद, पायो अनंत बिरियाँ पद। (छहढाला, ढाल-५, पद्य-१३)
    • जो ख्याति लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध-विध देह दाह। (छहढाला, ढाल-२, पद्य-१४)
    • हम तो कबहूँ न निज घर आये.....।
    • त्याग बिना नहीं तिर सके, जानो हिय मॅझार।

             तुम्बी लेप के त्यागने, पहुँचे तीर मॅझार.....।।१।।

    • नाम धराय जति, तपसी, मन विषयन में ललचावे।

             दौलत सो अनन्तभव भटके, औरन को भटकावे।।१।।

             ऐसा मोही क्यों न अधोगति जावे।

             जाको जिनवाणी न सुहावे.......॥२॥

    • पढ़-पढ़ के पंडित भया, ज्ञान हुआ अपार।

             निज वस्तु की खबर नहीं, सब नकटी का श्रृंगार......॥१॥

     

    यह दोहा आचार्य महाराज को बहुत अच्छा लगता था। इसको जब वह प्रवचन में कहते थे तो सब हँस जाते थे। मैं (आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज) तो हिन्दी ज्यादा नहीं जानता था, तो नहीं समझने के कारण, भाव-भासना नहीं होने के कारण चुपचाप रह जाता था। मतलब शब्द का मूल्य तब है, जब अर्थ का आभास हो

     

    उनकी प्रिय गाथाएँ - आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के मुखारविन्द से समय-समय पर ज्ञात हुआ कि आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज को आगमोक्त कुछ गाथाएँ अत्यन्त प्रिय थीं, जिन्हें वह बार-बार दोहराया करते थे-

     

    उवयरणं जिणमग्गे, लिंगं जहजादरूवमिदि भणिदं।

    गुरुवयणं पि य विणओ, सुत्तज्झयणं च णि ठिं॥

    प्रवचनसार, ३/२५

    भत्ते वा खमणे वा, आवसधे वा पुणो विहारे वा।

    उवधिम्हि वा णिबद्धं, णेच्छदि समणम्हि विकधम्हि॥

    प्रवचनसार, ३/१५

     

    एवं पणमिय सिद्धे जिणवरवसहे पुणो पुणो समणे।

    पडिवज्जदु सामण्णं जदि इच्छदि दुक्खपरिमोक्खं।

    प्रवचनसार, ३/१

    सो णाणं ण हवदि, जह्मा सो ण याणदे किंचि।

    तह्मा अण्णं णाणं, अण्णं सद्दं जिणा विंति॥

    समयसार, ४१५

     

     

    उपसंहार

    आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने सर्वार्थसिद्धि, प्रमेयरत्नमाला, प्रमेयकमलमार्तण्ड, आप्तपरीक्षा, अष्टसहस्री, समयसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, भगवती आराधना, अष्टपाहुड पढ़ाया और कहा- 'तुम्हारे लिए अब विशेष आवश्यकता नहीं -“विद्या कालेन पच्यते।” आशीर्वाद ही सब कुछ कार्य करता है। अब तो आचार्य महाराज और पास आ गये। लगता है दूरी है ही नहीं। इतने साल कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला। आशीर्वाद ही गुरु का सब काम करता है। उनको याद रखेंगे, तो पार हो जायेंगे।'

     

    हमेशा अध्ययन में ही उनका जीवन निकलता था। पढ़ना और पढ़ाना....ये ही साधना...और क्या? करुणा, अनुकम्पा, सक्रिय सम्यग्दर्शन- ये सब फलित होते हैं जिससे, ऐसी शिक्षा देते थे वे। चोटी के विद्वान् भी आ जाएं या छोटा-सा बालक भी आ जाए, अपढ़ आ जाए अथवा पढ़े- लिखे आ जाएं कोई भी हो... उसके योग्य तत्त्वों को देखते हुए देते थे। उदारता थी, अनुकम्पा थी उनके पास। सब कृपा थी...बस लेने वालों की कमी थी उनके पास। और क्या-क्या था, क्या पता? बहुत था उनके पास। जितना भाग्य था उतना मिला... लेकिन ये कम नहीं... हाँ... उनका यही कहना था ‘विद्या कालेन पच्यते’। हाँ... उसको जितना ही आप घोंटो, सुगंधि उतनी ही फैलती चली जाती है। यह सुगंधि / सुरभि सभी नासिकाओं तक पहुँच जाए, क्योंकि जो दुर्गन्धा हो अथवा जिसके पास नासिका नहीं है, उसके पास भी पहुँच जाए, तो वह भी सुगंधि से लाभान्वित हो जाए। ऐसे भाव थे... किन्तु तीव्र पुण्य कर्म का जब उदय रहता है, उसी को यह उपलब्ध होता है। सभी को उपलब्ध हो, ऐसी भावना है।

     

    थे ज्ञानसागर गुरू, मम प्राण प्यारे,

    थे पूज्य साधुगण से, बुध मुख्य न्यारे।

    शास्त्रानुसार चलते, मुझको चलाते,

    वंदें उन्हें विनय से, सिर को झुकाते॥

    (निजानुभवशतक, पद्य २ )

    आचार्य महाराज के ज्ञान को देखकर यह अनुभव हो गया कि

    वास्तव में केवलज्ञान भी कोई चीज है, सर्वज्ञता भी कोई चीज है।


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