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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पाठ ४ - भवितव्यांजलि

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    क्या ज्योतिषविद्, निमित्तज्ञानी आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने जान लिया था कि उनका सुशिष्य भारत की वसुंधरा पर श्रमणत्व की एक अमिट गौरव गाथा लिखेगा? क्या उन्हें अपने प्रथम मुनिशिष्य की भवितव्यता/होनहार का आभास था? ...इससे जुड़े हुये कुछ प्रसंग आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के श्रीमुख से अपने गुरु की स्मृति में नि:सृत हुए हैं। साथ ही साथ उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों से भी प्राप्त हुए हैं, जिन्हें कभी दादा गुरुजी की साक्षात् चरण छाँव प्राप्त थी। उन्हीं प्रसंगों को इस पाठ का विषय बनाया जा रहा है-

     

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    गणमान्य श्रेष्ठीजनों के संस्मरणों से चयनित प्रसंग

    सभी विद्याओं में पारंगत होगा - जब आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ब्रह्मचारी अवस्था में थे तब एक दिन आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने मयूर पिच्छिका के पंखों को सहसा बिखेर दिया और देखने लगे कि देखो यह क्या करता है? ब्रह्मचारी विद्याधर ने तत्काल ही उन पंखों को संग्रहीत करके उसे पिच्छी का आकार दे दिया। उसे देख शिष्य के भविष्य निर्माता गुरुवर श्री ज्ञानसागरजी महाराज को प्रतिभासित हो गया कि अब यह शिष्य सभी विद्याओं में, कलाओं में पारंगत हो गया है, प्रवीण हो गया है और यह संयम के मार्ग पर चलने के योग्य हो गया है। अब यह स्व-पर को सँभाल सकता है। अतः वह समय आ गया है कि मैं विद्या के ज्ञान को चारित्र के साँचे में ढालूँ। आचार्य ज्ञानसागरजी की पारखी दृष्टि में उस समय जो प्रतिभासित हुआ, आज वह पूर्णतः प्रतिफलित दिख रहा है।

     

    चारित्र द्रडी होगा - जब ब्रह्मचारी विद्याधरजी मुनि श्री ज्ञानसागरजी महाराज के सान्निध्य में केशलोंच कर रहे थे, उस समय प्रत्येक बाल खींचते समय खून निकल रहा था। उस दृश्य को देखकर वहाँ पर उपस्थित क्षुल्लक श्री आदिसागरजी ने मुनिवर ज्ञानसागरजी को इस स्थिति से अवगत कराया तो उन्होंने कहा चुप रहो। फिर भी क्षुल्लकजी से देखा नहीं गया, अतः उन्होंने थोड़ी देर बाद पुनः ब्रह्मचारी विद्याधर से कहा- क्यों! कैंची मँगवाएँ ? ब्रह्मचारी विद्याधर बोले- ‘ओम् हूँ। तो मुनि श्री ज्ञानसागरजी ने कहा- “हाँ दृढ़ता है।” ब्रह्मचारी विद्याधरजी की यही दृढ़ता उन्हें आचार्य विद्यासागर बना गई। आज हम देख रहे हैं कि आचार्य विद्यासागर “न चलन्ति चरित्रतः सदा नृसिंहाः”- आचार्य श्री पूज्यपाद देव कृत ‘योगिभक्ति' (६) की इन पंक्तियों को अपनी दृढ़ता के माध्यम से चरितार्थ कर रहे हैं।

     

    भारत को नई दिशा देगा - यह चर्चा तो सब जगह आती है कि मुनि श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने किस प्रकार विद्यासागरजी को दीक्षित किया। लेकिन यह कठोर सत्य है कि जब अजमेर, राजस्थान में आषाढ़ शुक्ल पंचमी, वीर निर्वाण संवत् २४९४, विक्रम संवत् २०२५, दिनांक ३० जून, १९६८, रविवार को दीक्षा का कार्यक्रम था, उस वक्त अजमेर में अल्प वय में होने वाली इस दीक्षा का काफी विरोध हुआ, और मुनि ज्ञानसागरजी को सर सेठ श्री भागचन्द्रजी सोनी ने समझाया कि जो लड़का मात्र २२ वर्ष का है, अभी ब्रह्मचारी है, पूरी हिन्दी नहीं जानता है, उसको इस उम्र में आप दीक्षा नहीं दें। उस वक्त मुनि श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने कहा था कि मैं इस लड़के में तेज देख रहा हूँ और मात्र १० वर्ष के अन्दर यह भारत को एक नई दिशा देगा।' ऐसी आगामी पहचान मुनि श्री ज्ञानसागरजी की थी और वाकई १० वर्ष बीता भी नहीं कि सारे भारत ने आचार्य श्री विद्यासागरजी के गुण को देख लिया और आज मुनि श्री ज्ञानसागरजी जहाँ भी होंगे, यदि वो आचार्य श्री विद्यासागरजी के समवसरण जैसे विराट् संघ को देखते होंगे तो उनको कितना बड़ा संतोष होता होगा कि उनका चुनाव कैसा है।

     

    प्रभावक होगा - दादा गुरुजी (आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज) जब १९७० में किशनगढ़, रेनवाल (जयपुर, राजस्थान) में चातुर्मास कर रहे थे, उस समय एक दिन कन्नड़भाषी मुनि विद्यासागरजी महाराज ने हिन्दी भाषा में प्रवचन करते हुए दो पंक्तियाँ कविता रूप में गाकर बोलीं-

     

    अधिक हवा भरने से, फुटबॉल फट जाय।

    बड़ी कृपा भगवान की, पेट नहीं फट जाय॥

     

    इसका अर्थ बताते हुए कहा- ‘अइमत्त-भोयणाए' यानी अतिमात्रा में भोजन करना अचौर्य व्रत का उल्लंघन है। इसी प्रकार एक दिन उन्होंने स्वरचित निम्न चार पंक्तियों को अपनी सुमधुर ध्वनि में उच्चारण कर प्रवचन का विषय बनाया

     

    साधना अभिशाप को वरदान बना देती है,

    भावना पाषाण को भगवान बना देती है।

    विवेक के स्तर से नीचे उतरने पर,

    वासना इंसान को शैतान बना देती है।।

     

    इन पंक्तियों का अर्थ भी पूज्यश्रीजी ने अपने प्रवचनों में बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। मुनि श्री विद्यासागरजी महाराज नीचे हाल में प्रवचन करते और ऊपर आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज सुनते थे और कहते थे- ‘देखो, विद्यासागरजी महाराज कितने अच्छे प्रवचन करते हैं। आगे चलकर बहुत प्रभावना करेंगे।'  गुरुणांगुरु श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने भविष्य की गोद में जो सत्य देखा था, वह वर्तमान के धरातल पर घटित होता हुआ नजर आ रहा है। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज जिनधर्म प्रभावना के प्रतापपुंज बनकर स्व-पर की प्रभावना कर रहे हैं।

     

    चतुर्थ काल-सी छवि - १९७१ में मदनगंज-किशनगढ़ (अजमेर, राजस्थान) में वर्षायोग के समय मुनि श्री विद्यासागरजी महाराज का सात दिन का मौन व्रत चल रहा था। वह एक दिन कमरे के बाहर भूमि पर आसन लगाकर कुछ लेखन कार्य कर रहे थे, उसी समय अजमेर से आए हुए सर सेठ साहब श्री भागचंदजी सोनी ने आकर आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के चरणों में नमोऽस्तु निवेदित किया। उन्होंने उन्हें बिना दृष्टि उठाए ही मौनपूर्वक आशीर्वाद दे दिया। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज कहते थे कि आहार के पश्चात् सौ कदम टहलना चाहिये।

     

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    वह जो कहते थे, वह करते भी थे। आहारोपरान्त टहलते हुए आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने जब यह दृश्य देखा तो उनके साथ टहल रहे क्षुल्लक स्वरूपानन्द जी से उन्होंने कहा- ‘चतुर्थ काल में मुनि श्री विद्यासागर जी जैसे साधु होते थे, जो अपने ज्ञान, ध्यान और तप में लीन रहते थे।

    वास्तव में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने मुनि विद्यासागरजी में जो चतुर्थ काल-सी मुनि चर्या की छवि देखी थी, वही आज हमें उनमें पूर्ण रूप से प्रतिफलित होती हुई दिख रही है।

     

    आचार्य श्री विद्यासागरजी के मुखारविन्द से नि:सृत चयनित प्रसंग

     

    गुरुकुल बनाना - हमने गुरुजी से पूछा और...आगे...हम क्या करेंगे? समझ में नहीं आ रहा है, तो उन्होंने कहा था- “संघ को गुरुकुल बनाना।” गुरुकुल बना देना कहा। इसका अर्थ है घबड़ाओ नहीं...सब गुरुकुल बन जाएगा। वो अब हम देख रहे हैं...। तो यह पक्का है कि गुरुओं के मुख से जो शब्द निकलते हैं वह सार्थक होते हैं।

     

    बुन्देलखण्ड चले जाना - आचार्य श्री विद्यासागर जी ने गुरुदेव श्री ज्ञानसागर जी महाराज से कहा- आपने संयम के वरदान से मुझे भगवान् बनने का रास्ता दे दिया। लेकिन जीवन में संयम साधना के लिए, आत्मकल्याण के लिए, धर्म प्रभावना के लिये कहाँ जाऊँगा? तब आचार्य श्री ज्ञानसागरजी बोले चिन्ता मत करना, बुंदेलखण्ड चले जाना।

     

    वह विश्वस्त थे - वे विश्वस्त होकर गए हैं कि अब इसका कुछ बिगाड़ नहीं होने वाला। जैसे भोगभूमि में सन्तान युगल का जन्म होता है तो माता-पिता का अवसान हो जाता है, उसी प्रकार गुरुदेव हमें जन्म देकर चले गए। लेकिन वे विश्वस्त होकर गए हैं। अब इसका कुछ बिगाड़ नहीं होने वाला, क्योंकि चार उपकरण इसके साथ हैं।

     

    मेरी समाधि देखी होगी - अंत में एक बात और कहना चाहूँगा। जिस प्रकार अभी पूर्व में मुनि संभवसागर ने कहा, कि आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ज्योतिषविद् थे, भविष्य को जानते थे। हम तो यह समझते हैं कि उन्होंने हमारी समाधि के बारे में भी तो समझा होगा। हमारी समाधि के बारे में भी अवश्य उनको कुछ ज्ञान होगा। निश्चित बात है- वो गुरुकुल बनाएँ या कुछ भी बनाएँ, हम बनाते चले जाएँ। इससे हमारे लिए कुछ नहीं होता, लेकिन हमारा ख्याल रखियो कि हमारी समाधि के बारे में कुछ भविष्य बन जाए तो थोड़ा-सा संकेत दे दें, ताकि हम भी उसकी साधना कर लेंगे। पक्की बात है, वो आपको नहीं बताएँगे, बताएँगे तो हमें और उन्होंने संकेत दिया भी होगा तो मैं कैसे कहूँगा।" उन्होंने कहा कि “हमारी बात किसी को कहियो नहीं”- क्योंकि वचन की बात है, इसलिए अगर उन्होंने हमारी समाधि का भविष्य देखा है... अवश्य देखा होगा, हम उसकी प्रतीक्षा में हैं।

     

    उपसंहार

     

    यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।

    तथैव धर्मो विदुषां परीक्ष्यते, श्रुतेन शीलेन तपोदयागुणैः॥

     

    जैसे सोने को घिस कर, छेद करके, तपाकर तथा पीटकर चार प्रकार से परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार पुरुष की ज्ञान, शील, तप तथा दया से परीक्षा की जाती है। गुरु हमेशा नजरों से परखते रहते हैं। कहा भी है- ‘छंदं स पडिलेहए’ अर्थात् व्यक्ति के अन्तर्मन को परखना चाहिए।

     

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    शिष्य विद्याधर की क्रियाओं में शुभ परिणामों को ग्रहण की इच्छा से ‘इच्छाकार', अशुभ परिणामों के त्याग में ‘मिथ्याकार’, जैसा आप कहो ऐसी स्वीकारोक्ति देने से ‘तथाकार’, आते-जाते वक्त ‘आसिका-निषेधिका’, वन्दनापूर्वक प्रश्न करने से ‘आपृच्छा’, इसी प्रकार ‘प्रतिपृच्छा’, अनुकूल प्रवृत्ति करने से ‘छन्दन’, किसी वस्तु या आज्ञा को माँगने में आदरपूर्वक नमस्कार करके फिर निवेदन करने से ‘निमन्त्रण’, गुरु के बृहत्पादमूल में आत्मसमर्पण कर देने से ‘उपसंपत्’ (मूलाचार, समाचार अधिकार/१२५-१४४) आदि समाचार प्रतिबिम्बित होने से कुशल पारखी की भाँति पूज्यवर आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने परख लिया कि यह आगमानुकूल चर्या का पालन करने वाला,

    मूलाचार को जीवंत रूप देने वाला भावी श्रेष्ठ अनोखे पारखी आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज श्रमण होगा और ‘विणओ मोक्खद्दारं’ (मूलाचार,

    पंचाचार अधिकार/३८६) माना गया है, इसलिए अतिशय विनय सम्पन्न होने से यह मोक्ष महल के कपाटों का उद्घाटक होगा।

     

    “वही शिष्य गुरु बन पाता है जो गुरु की

    एक-एक बात को जीवन में उतार लेता है।

    ऐसा ही शिष्य गुरु के गौरव की वस्तु बनता है।”

     

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    Moni Jain

      

    गुरु चरणों मे नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु 

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