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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अध्याय 4 : सूत्र 12

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    Vidyasagar.Guru

    अब ज्योतिष्क देवों के भेद कहते हैं-

     

    ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥

     

     

    अर्थ - ज्योतिष्क देव पाँच प्रकार के होते हैं- सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और सर्वत्र फैले हुए तारे। चूंकि ये सब चमकीले होते हैं, इसलिए इन्हें ज्योतिष्क कहते हैं।

     

    English - The Stellar (luminary) devas comprise the sun, the moon, the planets, the constellation, and the scattered stars. 

     

    विशेषार्थ - सूर्य और चन्द्रमा का प्राधान्य बतलाने के लिए उन्हें सूत्र में अलग से रखा गया है, क्योंकि ग्रह वगैरह से उनका प्रभाव वगैरह अधिक है। इनमें चन्द्रमा इन्द्र है और सूर्य प्रतीन्द्र है। ये सब ज्योतिष्क देव मध्यलोक में रहते हैं। धरातल से सात सौ नब्बे योजन ऊपर तारे विचरण करते रहते हैं। वे सब ज्योतिष्क देवों के नीचे हैं। तारों से दस योजन ऊपर सूर्य का विमान है। सूर्य से अस्सी योजन ऊपर चन्द्रमा है। चन्द्रमा से चार योजन ऊपर नक्षत्र हैं। नक्षत्रों से चार योजन ऊपर बुध का विमान है। बुध से तीन योजन ऊपर शुक्र का विमान है। शुक्र से तीन योजन ऊपर बृहस्पति है। बृहस्पति से तीन योजन ऊपर मंगल है और मंगल से तीन योजन ऊपर शनि है। इस तरह एक सौ दस योजन की मोटाई में सब ज्योतिषी देव रहते हैं तथा तिर्यक् रूप से घनोदधि वातवलय तक फैले हुए हैं।


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