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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अध्याय 3 : सूत्र 33

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    Vidyasagar.Guru

    आगे धातकी खण्ड द्वीप की रचना बतलाते हैं-

     

    द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥

     

     

    अर्थ - धातकी खण्ड द्वीप में भरत आदि क्षेत्र दो-दो हैं।

     

    English - In Dhatakikhanda regions, mountains, lakes,  rivers etc are twice that in Jambudvipa. 

     

    विशेषार्थ - धातकी खण्ड की दक्षिण दिशा और उत्तर दिशा में दो इष्वाकार पर्वत हैं। वे दोनों पर्वत इषु यानि बाण की तरह सीधे और दक्षिण से उत्तर तक लम्बे हैं। उनकी लम्बाई द्वीप के बराबर यानि चार लाख योजन है। इसी से वे एक ओर लवण समुद्र को छूते हैं तो दूसरी ओर कालोदधि समुद्र को छूते हैं। उनके कारण धातकी खण्ड के दो भाग हो गये हैं - एक पूर्व भाग, दूसरा पश्चिम भाग दोनों भागों के बीच में एकएक मेरु पर्वत है। और उनके दोनों ओर भरत आदि क्षेत्र तथा हिमवन् आदि पर्वत हैं।

     

    इस तरह वहाँ दो भरत, दो हिमवन् आदि हैं। उनकी रचना गाड़ी के पहिये की तरह है। जैसे गाड़ी के पहिये में जो डंडे लगे रहते हैं, जिन्हें अर कहते हैं, उनके समान तो हिमवन् आदि पर्वत हैं। वे पर्वत सर्वत्र समान विस्तार वाले हैं। और अरों के बीच में जो खाली स्थान होता है, उसके समान भरत आदि क्षेत्र हैं। वे क्षेत्र कालोदधि के पास में अधिक चौड़े हैं। और लवण समुद्र के पास में कम चौड़े हैं। जम्बूद्वीप में जिस स्थान पर जामुन का पार्थिव वृक्ष है, धातकीखण्ड में उसी स्थान पर धातकी (धतूरा) का एक विशाल पार्थिव वृक्ष है। उसके कारण द्वीप का नाम धातकी खण्ड पड़ा है। धातकीखण्ड को घेरे हुए कालोदधि समुद्र है। उसका विस्तार आठ लाख योजन है और कालोदधि को घेरे हुए पुष्करवर द्वीप है। उसका विस्तार सोलह लाख योजन हैं।


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