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    अध्याय 10 - आचार्य श्री शान्तिसागरजी

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    बीसवीं शताब्दी में श्रमण परम्परा को पुनर्जीवन देने वाले घोर उपसर्ग विजेता, महान् तपस्वी आचार्य शान्तिसागर जी का जीवन परिचय एवं चारित्र के विकास का वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. सातगौड़ा का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
    भोजग्राम (कर्नाटक) के समीप येलगुल (महाराष्ट्र) में नाना के यहाँ आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, वि.सं. 1929, 25 जुलाई सन् 1872 को बुधवार रात्रि के समय हुआ था।

     

    2. सातगौड़ा जब माता के गर्भ में थे, तब माता को कैसा दोहला (तीव्र इच्छा) हुआ था ?
    108 सहस्रदल वाले कमलों से जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करूं। तब कोल्हापुर के समीप के तालाब से वे कमल लाए गए और भगवान् की बड़ी भक्तिपूर्वक पूजा की गई थी।

     

    3. आचार्य श्री शान्तिसागर जी का पूर्व का क्या नाम था ?
     आचार्य श्री शान्तिसागर जी का पूर्व नाम सातगौड़ा था।

     

    4. सातगौड़ा के माता-पिता का क्या नाम था ?
    माता सत्यवती एवं पिता भीमगौड़ा पाटील (मुखिया) थे। जाति चतुर्थ जैन थी।

     

    5. सातगौड़ा कितने भाई-बहिन थे ?
    सातगौड़ा पाँच भाई-बहिन थे। आदिगौड़ा, दैवगौड़ा, सातगौड़ा (आचार्य श्रीशान्तिसागर जी), कुम्भगौड़ा एवं बहिन कृष्णाबाई थी।

     

    6. सातगौड़ा विवाहित थे या बालब्रह्मचारी ?
    विवाहित बालब्रह्मचारी थे। अर्थात् 9 वर्ष की अवस्था में 6 वर्ष की बालिका के साथ इनका विवाह हो गया था। दैवयोग से उस बालिका का 6 माह बाद मरण भी हो गया। महाराज ने बताया था कि "हमने उसे अपनी स्त्री के रूप में कभी नहीं जाना था’’ बाद में उन्होंने विवाह नहीं किया।

     

    7. सातगौड़ा के कब से मुनि बनने के भाव थे ?
    बाल्यावस्था 17-18 वर्ष में ही मुनि बनना चाहते थे, किन्तु आपके पिता का आप पर बड़ा अनुराग था। पिता ने कहा जब तक हमारा जीवन है, तब तक तुम घर में रहकर साधना करो। बाद में मुनि बनना। अतः पिता की आज्ञा के कारण उनके समाधिमरण के बाद 43 वर्ष की अवस्था में क्षुल्लक बने एवं 48 वर्ष की अवस्था में मुनि बने थे। 

     

    8. सातगौड़ा ने सम्मेदशिखर जी की वंदना कब की एवं वहां क्या त्याग करके आए थे ?
    32 वर्ष की अवस्था में सम्मेदशिखर जी की वंदना के लिए गए थे। स्मृति स्वरूप घी-तेल खाने का आजीवन त्यागकर आए एवं घर आते ही एक बार भोजन करने की प्रतिज्ञा ले ली।

     

    9. सातगौड़ा के बचपन में प्राणी-रक्षा के भाव थे या नहीं  ? 
    प्राणी-रक्षा के भाव थे। एक दिन की घटना है, सातगौड़ा शौच के लिए बाहर (जंगल में) गए थे। वापस आने पर उनके हाथ में टूटे हुए लोटे को देखकर घर में पूछा गया यह लोटा कैसे टूट गया? उन्होंने बताया कि, एक सर्प एक मेंढक को खाने जा रहा था, उस समय उस मेंढक की प्राण रक्षा के लिए मैंने तत्काल इस लोटे को पत्थर पर जोर से पटक दिया, जिससे वह सर्प भाग गया। जब खेत पर जाते तो पक्षी फसल को नुकसान पहुँचाते थे, परन्तु उन्हें भगाते नहीं थे बल्कि पीने के लिए पानी और रख देते थे।

     

    10. सातगौड़ा का व्यापारिक जीवन कैसा था ?
    सातगौड़ा एवं कुम्भगौड़ा कपड़े की दुकान पर बैठते थे। जब सातगौड़ा रहते थे। दुकान पर ग्राहक आता तो उससे कहते थे कौन सा कपड़ा लेना है, अपने हाथ से नाप लो और पैसे यहाँ रख दो। वे पैसे भी स्वयं नहीं गिनते थे |

     

    11. सातगौड़ा घर में वीतरागी कैसे थे ?
    हाँ, सातगौड़ा घर में वीतरागी थे, इसी कारण वे अपने छोटे भाई कुम्भगौड़ा एवं बहिन कृष्णा के विवाह में शामिल नहीं हुए थे।

     

    12. सातगौड़ा की करुणा एवं शारीरिक शक्ति कैसी थी ?
    जब सातगौड़ा सम्मेदशिखर जी की वंदना कर रहे थे तब एक वृद्धा चल नहीं पा रही थी एवं उसके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह डोली कर सके। अत: सातगौड़ा ने देखा और उस वृद्धा को अपने कंधे पर बिठाकर वंदना करा दी। इसी प्रकार एक पुरुष को भी राजगृही की पञ्च पहाड़ियों की वंदना करा दी थी।

     

    13. आचार्य श्री शान्तिसागर जी का संयम पथ किस प्रकार था ?
    1. क्षुल्लक दीक्षा - देवेन्द्रकीर्ति मुनि से ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी वि.सं. 1972, सन् 1915 में उत्तूरग्राम में। 
    2. एलक दीक्षा - स्वयं ली, सिद्धक्षेत्र गिरनार जी में पौष शुक्ल चतुर्दशी वि.सं.1975, 15 जनवरी,बुधवार सन् 1919 में।
    3. मुनिदीक्षा - यरनाल पञ्चकल्याणक में फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशीवि.सं.1976, 2 मार्च, मङ्गलवार,सन् 1920 में हुई थी। दीक्षा गुरु मुनि देवेन्द्रकीर्ति थे।
    4. आचार्यपद - समडोली में आश्विन शुक्ल एकादशी वि.सं.1981, 8 अक्टू, बुधवार सन् 1924 में। 
    5. चारित्र चक्रवर्ती पद - गजपंथा वि.सं. 1994 सन् 1937 में। 

     

    14. एलक शान्तिसागर जी ने वाहन का त्याग कब और कहाँ किया था ?
    सिद्धक्षेत्र गिरनारजी से वापस आकर सांगली के समीपवर्ती कुण्डल नाम के पहाड़ से अलंकृत स्टेशन पर उतरे। वहाँ के मंदिरों की वंदना कर जीवन भर के लिए वाहन (सवारी) का त्याग कर दिया था।

     

    15. आचार्य श्री शान्तिसागर जी का उत्तर भारत में प्रथम चतुर्मास कहाँ हुआ था ?
    आचार्य श्री शान्तिसागर जी का उत्तर भारत में प्रथम चतुर्मास सन् 1928 में कटनी (म.प्र.) में हुआ था।

     

    16. आचार्य श्री शान्तिसागर जी ने अपने मुनि जीवन में कितने उपवास किए थे ?
    35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 2 माह और 23 दिन अर्थात् 9,938 उपवास किए थे।

     

    17. आचार्य श्री शान्तिसागर जी ने आचार्य पद का त्याग कब, कहाँ किया था एवं किसे दिया था ?
    आचार्य पद का त्यागपत्र के द्वारा सन् 1955 में कुंथलगिरी में किया था और वह पत्र अतिशय क्षेत्र चूलगिरि खानियाँजी, जयपुर में मुनि श्री वीरसागर जी के पास भेजा जो उनके प्रथम शिष्य थे। अर्थात्मुनि श्री वीरसागर जी को आचार्य पद प्रथम भाद्रपद शुक्ल नवमी वि. सं. 2012, 26 अगस्त सन् 1955 दिन शुक्रवार को दिया।

     

    18. आचार्य श्री शान्तिसागर जी की समाधि कब और कहाँ हुई थी ?
    आचार्य श्री शान्तिसागर जी की समाधि द्वितीय भाद्रपद शुक्ल द्वितीया वि.सं.2012 दिन रविवार, 18 सितम्बर सन् 1955 में कुंथलगिरी में हुई थी।

     

    19. आचार्य श्री शान्तिसागर जी की सल्लेखना कितने दिन चली ?
    36 दिन की यम सल्लेखना हुई। 14 अगस्त को आहार के उपरान्त उन्होंने आहार को छोड़ा, किन्तु जलग्रहण की छूट रखी थी एवं 4 सितम्बर को अन्तिम बार जल लेकर उसका भी त्याग कर दिया था।

     

    20. मुनि श्री वर्धमानसागर जी (आचार्य श्री शान्तिसागर जी के अग्रज) के अनुसार आचार्य श्री शान्तिसागर जी ने मुनि दीक्षा किससे ली थी ?
    आचार्य श्री शान्तिसागर जी ने मुनि दीक्षा भौंसेकर आदिसागर जी मुनिराज से यरनाल में ली थी।

     

    21. आचार्य श्री शान्तिसागर जी की शिष्य परम्परा कौन-कौन सी हैं ?

    आचार्य श्री शान्तिसागर जी       

     आचार्य श्री शान्तिसागर जी
    आचार्य श्री वीरसागर जी                आचार्य श्री वीरसागरजी 
    आचार्य श्री शिवसागर जी               आचार्य श्री शिवसागर जी
    आचार्य श्री ज्ञानसागर जी   

     आचार्य श्री धर्मसागर जी

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    विशेष :- और भी अनेक शिष्य परम्परा हैं।

     

    22. आचार्य श्री शान्तिसागर जी का वर्णन किस ग्रन्थ में है एवं उसके लेखक कौन हैं ? 
    चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ में है। लेखक स्व.पंडित सुमेरूचंद जी दिवाकर सिवनी (म.प्र.)

     

    23. चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ का विमोचन कब हुआ था ?
    दिनाँक 4.3.1953 को प्रात: श्रवणबेलगोला में आचार्य श्री देशभूषणजी के ससंघ सानिध्य में।
    (लगभग सम्पूर्ण विषय चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ से लिया गया है)

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    Kiran Shete

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       1 of 1 member found this review helpful 1 / 1 member

    जय जिनेंद्र बहुत सुन्दर जानकारी

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