Jump to content
  • Sign in to follow this  

    अध्याय 55 - लेश्या

       (0 reviews)

    लेश्या कितनी होती हैं, उनका लक्षण क्या है, किस गति में कितनी लेश्या होती हैं। इसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. लेश्या के मूल में कितने भेद हैं ?

    लेश्या के दो भेद हैं-द्रव्य लेश्या और भाव लेश्या।

     

    2. द्रव्य लेश्या किसे कहते हैं ?

    वर्णनामकर्म के उदय से उत्पन्न हुआ जो शरीर का वर्ण है, उसको द्रव्य लेश्या कहते हैं। (गोजी,494)

     

    3. भाव लेश्या किसे कहते हैं ?

    1. "कषायोदयरंजिता योग प्रवृतिरितिकृत्वा औदयिकीत्युच्यते" | कषाय के उदय से अनुरंजित योग की प्रवृत्ति को भाव लेश्या कहते हैं। इसलिए वह औदयिकी कही जाती है। (रावा, 2/6/8)
    2. कषाय से अनुरंजित मन,वचन और काय की प्रवृत्ति को भाव लेश्या कहते हैं।
    3. "लिम्पतीति लेश्या" - जो लिम्पन करती है, उसको लेश्या कहते हैं। अर्थात् जो कर्मों से आत्मा को लिप्त करती है, उसको भाव लेश्या कहते हैं।
    4. संसारी आत्मा के भावों को (परिणामों को) भाव लेश्या कहते हैं। अन्य दर्शनकार इसे चित्तवृत्ति कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे आभामण्डल कहा है।

     

    4. द्रव्य एवं भाव लेश्या के भेद कितने हैं ?

    द्रव्य एवं भाव लेश्या के छ:भेद हैं - कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म एवं शुक्ल लेश्या। (गोजी,493)

     

    5. कृष्णादि भाव लेश्याओं के लक्षण बताइए ?

    1. कृष्ण लेश्या - तीव्र क्रोध करने वाला हो, शत्रुता को न छोड़ने वाला हो, लड़ना जिसका स्वभाव हो, धर्म और दया से रहित हो, दुष्ट हो, दोगला हो, विषयों में लम्पट हो आदि यह सब कृष्ण लेश्या वाले के लक्षण हैं। (ध.पु., 1/390)
    2. नील लेश्या - बहुत निद्रालु हो, परवंचना में दक्ष हो, अतिलोभी हो, आहारादि संज्ञाओं में आसक्त हो आदि नील लेश्या वाले के लक्षण हैं।
    3. कापोत लेश्या - दूसरों के ऊपर रोष करता हो, निन्दा करता हो, दूसरों से ईष्र्या रखता हो, पर का पराभव करता हो, अपनी प्रशंसा करता हो, पर का विश्वास न करता हो, प्रशंसक को धन देता हो आदि कापोत लेश्या वाले के लक्षण हैं।
    4. पीत लेश्या - जो अपने कर्तव्य-अकर्तव्य, सेव्य-असेव्य को जानता हो, दया और दान में रत हो,मृदुभाषी हो, दृढ़ता रखने वाला हो आदि पीत लेश्या वाले के लक्षण हैं।
    5. पद्म लेश्या - जो त्यागी हो, भद्र हो, सच्चा हो, साधुजनों की पूजा में तत्पर हो, उत्तम कार्य करने वाला हो, बहुत अपराध या हानि पहुँचाने वाले को भी क्षमा कर दे आदि पद्म लेश्या वाले के लक्षण हैं।
    6. शुक्ल लेश्या - जो शत्रु के दोषों पर भी दृष्टि न देने वाला हो, जिसे पर से राग-द्वेष व स्नेह न हो,पाप कार्यों से उदासीन हो, श्रेयो कार्य में रुचि रखने वाला हो, जो पक्षपात न करता हो और न निदान करता हो, सबमें समान व्यवहार करता हो आदि शुक्ल लेश्या वाले के लक्षण हैं।

     

    6. छ: लेश्याओं में से कितनी शुभ एवं कितनी अशुभ हैं ?

    कृष्ण, नील, कापोत लेश्याएँ अशुभ एवं पीत, पद्म, शुक्ल लेश्याएँ शुभ हैं।

     

    7. तीव्रतम, तीव्रतर, तीव्र, मन्द, मन्दतर, मन्दतम लेश्याएँ कौन-कौन सी हैं ?

    तीव्रतम-कृष्ण लेश्या, तीव्रतर-नील लेश्या, तीव्र-कापोत लेश्या, मन्द-पीत लेश्या,मन्दतर-पद्म लेश्या एवं मन्दतम-शुक्ल लेश्या है। (गो.जी., 500)

     

    8. लेश्याओं के दृष्टान्त क्या हैं ?

    छ: मनुष्य यात्रा को निकले, खाने को पास में कुछ भी नहीं था। सामने एक वृक्ष दिखा। उनके परिणाम कैसे-कैसे हुए। देखिए -

    1. कृष्ण लेश्या वाला कहता है कि जड़ से वृक्ष को उखाड़ो, तब फल खाएंगे।
    2. नील लेश्या वाला कहता है कि स्कन्ध (तने) को तोड़ो, तब फल खाएंगे।
    3. कापोत लेश्या वाला कहता है कि शाखा को तोड़ो तब फल खाएंगे।
    4. पीत लेश्या वाला कहता है कि उपशाखा को तोड़ो तब फल खाएंगे।
    5. पद्म लेश्या वाला कहता है कि फलों को तोड़कर खाएंगे।
    6. शुक्ल लेश्या वाला कहता है कि जो फल अपने आप जमीन पर गिर रहे हैं, उन्हें खाकर अपनी क्षुधा को शान्त करेंगे। (गो.जी., 507-508)

    55.PNG

     

    9. कौन-सी लेश्या कौन-से गुणस्थान तक रहती है ?

    कृष्ण, नील और कापोत लेश्या प्रथम गुणस्थान से चतुर्थ गुणस्थान तक एवं पीत और पद्म लेश्या प्रथम गुणस्थान से सप्तम गुणस्थान तक तथा शुक्ल लेश्या प्रथम गुणस्थान से तेरहवें गुणस्थान तक। (ध.पु., 1/137-139,392-393)

     

    10. नरकगति में कौन-कौन-सी लेश्याएँ होती हैं ?

    नरकगति में 3 अशुभ लेश्याएँ होती हैं। प्रथम एवं दूसरी पृथ्वी में कापोत लेश्या। तीसरी पृथ्वी में कापोत एवं नील लेश्या। चौथी पृथ्वी में नील लेश्या। पाँचवीं पृथ्वी में नील एवं कृष्ण लेश्या। छठवीं पृथ्वी में कृष्ण लेश्या एवं सप्तम पृथ्वी में परम कृष्ण लेश्या होती है। (स.सि. 3/3/371)

     

    11. देवगति में कौन-कौन सी लेश्याएँ होती हैं ?

    देवगति में 6 लेश्याएँ होती हैं।

    भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में अपर्याप्त अवस्था में कृष्ण, नील और कापोत लेश्याएँ होती हैं एवं पर्याप्त अवस्था में जघन्य पीत लेश्या होती है। (धपु, 2/545)

    - सौधर्म एवं ऐशान स्वर्ग के देवों में मध्यम पीत लेश्या होती है।

    - सानत्कुमार एवं माहेन्द्र स्वर्ग के देवों में उत्कृष्ट पीत एवं जघन्य पद्म लेश्या होती है।

    - ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ एवं शुक्र-महाशुक्र स्वर्ग के देवों में मध्यम पद्म लेश्या होती है।

    - शतार एवं सहस्रार स्वर्ग के देवों में उत्कृष्ट पद्म एवं जघन्य शुक्ल लेश्या होती है।

    - आनत से नवग्रैवेयक-तक के देवों में मध्यम शुक्ल लेश्या होती है।

    - नव अनुदिश एवं पञ्च अनुतरों के देवों में उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या होती है। (धपु, 2/545–567)

    विशेष -

    1. सौधर्म-ऐशान कल्प में पीत लेश्या होती है। सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्प में पीत और पद्म दो लेश्याएँ होती हैं। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ कल्पों में पद्म लेश्या होती है। शुक्र-महाशुक्र, शतारसहस्रार कल्पों में पद्म और शुक्ल लेश्या होती हैं। आनत-प्राणत, आरण-अच्युत कल्पों में शुक्ल लेश्या होती है। नवग्रैवेयक में शुक्ल लेश्या होती है। नव अनुदिश एवं पञ्च अनुत्तर विमानों में परम शुक्ल लेश्या होती है। (स सि,4/22/485)
    2. सौधर्म स्वर्ग से पञ्च अनुत्तर विमानों तक पर्याप्त एवं अपर्याप्त दोनों अवस्था में एक-सी भाव लेश्या होती है।

     

    12. मनुष्यगति में कौन-कौन-सी लेश्याएँ होती हैं ?

    मनुष्यगति में सभी छ: लेश्याएँ होती हैं।

     

    13. तिर्यञ्चगति में कौन-कौन-सी लेश्याएँ होती हैं ?

    तिर्यञ्चगति में सभी छ: लेश्याएँ होती हैं किन्तु एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय एवं असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय में 3 अशुभ अर्थात् कृष्ण, नील और कापोत लेश्याएँ होती हैं। (धपु., 1/393)

     

    14. भोगभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों में कौन-कौन-सी लेश्याएँ होती हैं ?

    छ: लेश्याएँ होती हैं-विशेष यह है कि पर्याप्त अवस्था में तीन शुभ लेश्याएँ एवं अपर्याप्त अवस्था में तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं।

     

    15. नारकियों की द्रव्य लेश्या कौन-सी होती है ?

    सभी नारकी कृष्ण लेश्या वाले होते हैं। (धपु.2/458)

     

    16. पर्याप्त भवनत्रिक के देवों की द्रव्य से कितनी लेश्याएँ होती हैं ?

    पर्याप्त भवनत्रिक देवों की द्रव्य से छ: लेश्याएँ होती हैं। (ध.पु. 2/547)

     

    17. पर्याप्त वैमानिक देवों में द्रव्य से कौन-सी लेश्या रहती हैं ?

    पर्याप्त वैमानिक देवों में द्रव्य एवं भाव लेश्या समान होती हैं। (गो.जी., 496)

     

    18. अपर्याप्त अवस्था में द्रव्य लेश्या कौन-सी होती हैं ?

    अपर्याप्त अवस्था में शुक्ल एवं कापोत लेश्या होती है। सम्पूर्ण कर्मों का विस्रसोपचय शुक्ल ही होता है, इसलिए विग्रहगति में विद्यमान सम्पूर्ण जीवों के शरीर की शुक्ल लेश्या होती है। तदनन्तर शरीर को ग्रहण करके जब तक पर्याप्तियों को पूर्ण करता है तब तक छ: वर्ण वाले परमाणुओं के पुज्जों से शरीर की उत्पत्ति होती है, इसलिए उस शरीर की कापोत लेश्या कही जाती है। (ध.पु. 2/426)

     

    19. मनुष्य एवं तिर्यञ्चों में द्रव्य लेश्याएँ कितनी होती हैं ?

    मनुष्य एवं तिर्यच्चों में छ: लेश्याएँ होती है। (गो.जी., 496)

    Edited by admin

    Sign in to follow this  


    User Feedback

    Join the conversation

    You can post now and register later. If you have an account, sign in now to post with your account.

    Guest

×
×
  • Create New...