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    अध्याय 53 - संहनन

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    मनुष्य एवं तिर्यच्च किस सहनन के माध्यम से कौन से स्वर्ग एवं नरक तक जाते हैं।इसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. संहनन नाम कर्म किसे कहते हैं ?

    जिसके उदय से हड़ियों के बंधन में विशेषता आती है, उसे संहनन नाम कर्म कहते हैं।

     

    2. संहनन के कितने भेद हैं ?

    संहनन के छ: भेद हैं। 1. वज़ऋषभनाराचसंहनन, 2. वज़नाराचसंहनन, 3. नाराचसंहनन, 4. अर्द्धनाराच संहनन, 5. कीलक संहनन, 6.असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन।

     

    3. वज़, ऋषभ, नाराच और संहनन का क्या अर्थ है ?

    1. वज - जो वज़ के समान अभेद्य अर्थात् जिसका भेदन न किया जाए उसे वज़ कहते हैं।
    2. ऋषभ - जिससे बाँधा जाए उसे ऋषभ (बेस्टन) कहते हैं।
    3. नाराच - नाराच नाम कील का है। जैसे - दरवाजे के कब्जों के बीच लोहे की कील होती है।
    4. संहनन - हड़ियों का समूह।

     

    4. संहननों की परिभाषा बताइए ?

    1. वज़ऋषभनाराच संहनन - जिस शरीर में वज़ की हड़ियाँ हों, वज़ का ऋषभ हो और वज़ का नाराच हो, उसे वज़ऋषभनाराचसंहनन कहते हैं।
    2. वज़नाराचसंहनन - जिसमें वज़ के बंधन न हों, सामान्य बंधन से बाँधा जाए किन्तु कील व हड़ियाँ वज़ की हों, उसे वज़नाराच संहनन कहते हैं। जैसे - लोहे के सामान को सुतली से बांधना।
    3. नाराच संहनन - जिसमें वज़ विशेष से रहित साधारण नाराच से कीलित हड़ियों की संधि हो, उसे नाराच संहनन कहते हैं।
    4. अर्द्धनाराच संहनन - जिसमें हड़ियों की सन्धियाँ नाराच से आधी जुड़ी होती हैं, उसे अर्द्धनाराच संहनन कहते हैं।
    5. कीलक संहनन - जिसमें हड़ियाँ परस्पर में नोंक व गड़े के द्वारा फँसी हों, अर्थात् अलग से कील नहीं रहती, उसे कीलक संहनन कहते हैं।
    6. असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन - जिसमें अलग-अलग हड्डियो से बंधी हों, परस्पर में कीलित न हों, उसे असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन कहते हैं। (जै.सि.को, 4/155)

     

    5. नरकगति, देवगति व एकेन्द्रिय जीवों में कौन-सा संहनन रहता है ?

    नरकगति, देवगति व एकेन्द्रिय जीवों में किसी भी संहनन का उदय नहीं रहता है।

     

    6. तिर्यउचगति में कितने संहनन रहते हैं ?

    तिर्यच्चगति में छ: संहनन रहते हैं।

     

    7. द्वीन्द्रिय से असंज्ञी पज्चेन्द्रिय तक के जीवों में कौन-सा संहनन रहता है ?

    द्वीन्द्रिय से असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय तक के जीवों में असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन रहता है।

     

    8. भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यज्चों में कौन-सा संहनन रहता है ?

    भोगभूमि के मनुष्य एवं तिर्यज्चों में मात्र वज़ऋषभनाराच संहनन रहता है।

     

    9. मनुष्यगति में कितने संहनन रहते हैं ?

    मनुष्यगति में छ: संहनन रहते हैं।

     

    10. कर्मभूमि की महिलाओं में कितने संहनन रहते हैं ?

    कर्मभूमि की महिलाओं में अंतिम तीन संहनन रहते हैं। (गोक, 32)

     

    11. कौन-सा संहनन कौन-से गुणस्थान तक रहता है ?

    वजत्रदृषभनाराच संहनन

    1 से 13 गुणस्थान तक

    वज्रनाराच्च और नाराच्च संहनन अर्द्धनाराच,कीलक संहनन और

    1 से 11 गुणस्थान तक

    असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन

    1 से 7 गुणस्थान तक

     

    12. कौन-से संहनन वाला मरणकर कौन-से स्वर्ग तक जाता है ?

    असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन

    8 वें स्वर्ग तक

    कीलक संहनन

    12 वें स्वर्ग तक

    अर्द्धनाराच

    16 वें स्वर्ग तक

    नाराच्च संहनन

    नवग्रैवेयक तक

    वज्रनाराच

    नवअनुदिश तक

    वजत्रदृषभनाराच संहनन

    सर्वार्थसिद्धि एवं मोक्ष भी (गो..30)

     

    13. कौन-से संहनन वाला मरण कर कौन-सी पृथ्वी (नरक) तक जाता है ?

    वजत्रट्टषभनाराच संहनन वाला

    सातवी पृथ्वी तक

    वज्रनाराच्च संहनन से अर्द्धनाराचसंहनन वाला

    छठवी पृथ्वी तक

    कीलक संहनन वाला

    पाँचवीं पृथ्वी तक

    असम्प्राप्तासूपाटिका संहनन वाला

    तीसरी पृथ्वी तक। (गो.क.31) 

     

    14. पञ्चम काल के मनुष्य व तिर्यञ्चों में कितने संहनन होते हैं ?

    पञ्चम काल के मनुष्य व तिर्यज्चों में अंतिम तीन संहनन होते हैं।

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