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    अध्याय 49 - आयु बन्ध

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    सात कर्मो का बन्ध प्रति समय होता रहता है किन्तु आयु कर्म का बन्ध कब होता है, उसकी आबाधा कितनी है, अकाल मरण क्या है आदि का वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. आयु कर्म किसे कहते हैं ?

    () जिसके द्वारा जीव नारकादि भवों को जाता हैवह आयु कर्म है।

    () जो भव धारण के लिए ले जाता है, वह आयु कर्म है।

    () जो जीव को गति विशेष में रोके रखता है, वह आयु कर्म है।

     

    2. आयु कर्म का बन्ध कितने अपकर्ष काल में होता है एवं अपकर्ष काल किसे कहते हैं ?

    आयु कर्म का बन्ध आठ अपकर्ष काल में होता है। आयु बन्ध के योग्य काल को अपकर्ष काल कहते हैं।

     

    3. कर्मभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों में आयु बन्ध कब होता है ?

    आयु के त्रिभाग में आठ अपकर्ष पड़ते हैं। जैसे किसी मनुष्य की आयु 729 वर्ष की है, तो 486 वर्ष तक आयुबन्ध होगा ही नहीं, शेष 243 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक आयुबन्ध होगा। यहाँ न हुआ तो इसी प्रकार आगे-आगे क्रमशः त्रिभाग करेंगे।

    243 वर्ष - 162 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 81 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    81 वर्ष - 54 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 27 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    27 वर्ष - 18 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 9 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    9 वर्ष - 6 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 3 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    3 वर्ष - 2 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 1 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    1 वर्ष – 8 माह तक नहीं होगा। शेष 4 माह के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    120 दिन - 80 दिन तक नहीं होगाशेष 40 दिन के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक।

    इन आठ अपकर्ष काल में आयु बन्ध नहीं हुआ तो 'असंक्षेपाद्धाकाल' (आँवली का संख्यातवाँ भाग) प्रमाण आयु शेष रहने पर नियम से आयुबन्ध होगा। जैसे रेल्वे स्टेशन के टिकट घर में लिखा रहता है, गाड़ी छूटने के पाँच मिनट पहले टिकट घर बन्द हो जाएगा। अर्थात् पहले टिकट लो, फिर गाड़ी में बैठो। उसी प्रकार पहले आयु बन्ध कीजिए बाद में दूसरी गति के लिए गाड़ी छूटेगी अर्थात् मरण होगा। आयु कर्म का बन्ध प्रथम अपकर्षकाल से लेकर आठों अपकर्ष कालों में भी हो सकता है।

     

    4. देव एवं नारकियों में आयु बन्ध कब होता है ?

    भुज्यमान (वर्तमान) आयु के अंतिम : माह के आठ अपकर्ष काल में ही आयु बन्ध होता है।

     

    5. भोगभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों में आयु बन्ध कब होता है ?

    इनका भी आयु बन्ध आयु के अंतिम 6 माह के 8 अपकर्ष कालों में होता है एवं किन्हीं के मत से अंतिम नौ माह के आठ अपकर्ष कालों में होता है।

     

    6. अकाल मरण क्या है ?

    भुज्यमान आयु (जो आयु वर्तमान में भोग रहे हैं) जितनी थी, उससे पहले मरण हो जाना अकाल मरण है।

     

    7. अकाल मरण किन-किन कारणों से होता है ?

    आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने भावपाहुड, गाथा 25 में अकाल मरण के निम्न कारण कहे हैं

    विसवेयण रक्तक्खय भय सत्थगहण संकिलेसाण।

    आहारुस्सासाणं णिरोहणा खिजए आउ॥

    अर्थ विष की वेदनारक्तक्षय, भय, शस्त्र की चोष्ट, संक्लेश तथा आहार एवं श्वासोच्छास के निरोध से आयु क्षीण हो जाती है, उसे अकाल मरण या कदलीघात मरण कहते हैं।

     

    8. अकाल मरण क्या चारों गतियों में होता है ?

    नहीं। देव, नारकी एवं भोगभूमि के मनुष्य तिर्यज्चों का अकाल मरण नहीं होता है। मात्र कर्मभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यच्चों का होता है।

     

    9. क्या सभी मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों का अकाल मरण होता है ?

    नहीं। जिस जीव ने आगामी आयु का बन्ध (बद्धायुष्क) कर लिया है, उसका अकाल मरण नहीं होता है एवं चरमोत्तम देह वालों का भी नहीं होता, किन्तु चरम देह वालों का अकाल मरण हो सकता है, जैसे पाण्डव आदि। उत्तम देह वालों का भी अकाल मरण हो सकता है, जैसे-सुभौम चक्रवर्ती, कृष्ण, ब्रह्मदत चक्रवर्ती का हुआ था। जो चरम देह एवं उत्तम देह वाले भी हैं, ऐसे चरमोत्तम देहधारी मात्र तीर्थंकर को छोड़कर सभी का अकालमरण संभव है। (.वृ, 2/53/110) किन्तु आचार्य अकलंकदेव ने राजवार्तिक ग्रन्थ (2/53/6-9) में चरम शब्द उत्तम का विशेषण लिया है। अत: चरमदेह वालों की अकाल मृत्यु नहीं होती है।

     

    10. अकाल मरण कैसे होता है, उदाहरण द्वारा बताइए ?

    एक मिट्टी का घड़ा है, उसमें पानी भरा हुआ है। उस घड़े में एक छिद्र है, जिसमें से एक-एक बूंद पानी गिर रहा है, वह घड़ा मान लीजिए 24 घंटे में खाली होता है। उस घड़े को किसी ने पत्थर मार दिया तो पूरा पानी एक साथ बाहर गयाउसी प्रकार आयु कर्म के निषेक (एक समय में जितने कर्म परमाणु उदय में आते हैं उनका समूह) हैं, प्रतिसमय खिर (निकल) रहे हैं। इसी प्रकार किसी ने शरीर का घात आदि कर दिया तो एक साथ सारे निषेक खिर जाते हैं। यही अकाल मरण है।

     

    11. भुज्यमान आयु किसे कहते हैं एवं क्या हम भुज्यमान आयु का अपकर्षण-उत्कर्षण कर सकते हैं ?

    जो आयु वर्तमान में भोग रहे वह भुज्यमान आयु है। भुज्यमान आयु का उत्कर्षण तो नहीं हो सकता है किन्तु अपकर्षण हो सकता है।

     

    12. क्या बध्यमान आयु का अपकर्षण-उत्कर्षण होता है ?

    बध्यमान आयु का उत्कर्षण एवं अपकर्षण भी होता है। उत्कर्षण तो अपकर्ष काल में ही होता है किन्तु अपकर्षण कभी भी हो सकता है। जैसे-रेत से भरा एक ट्रक जा रहा है, उसमें से थोड़ी-थोड़ी रेत गिर रही है, अर्थात् अपकर्षण हो रहा है, किन्तु उत्कर्षण करना है अर्थात् उस ट्रक में और रेत डालना है, तो ट्रक को खड़ा करना पड़ेगा तब उसमें और रेत डाल सकते हैं। अर्थात् उत्कर्षण अपकर्ष काल में ही होता है एवं अपकर्षण कभी भी हो सकता है।

     

    13. आठ अपकर्ष कालों में बंधी आयु का समीकरण क्या है ?

    पहले अपकर्ष काल में 100 वर्ष की आयु का बन्ध किया, दूसरे अपकर्ष काल में 120 वर्ष की आयु का बन्ध किया तो मुख्यता 120 वर्ष की रहेगी। इसी प्रकार प्रथम अपकर्ष काल में 100 वर्ष की आयु का बन्ध किया, दूसरे अपकर्ष काल में 80 वर्ष की आयु का बंध किया तो मुख्यता 100 वर्ष की रहेगी। (गो..जी., 643)

     

    14. आयु कर्म की आबाधा कितनी है ?

    आयु कर्म की उत्कृष्ट आबाधा एक पूर्व कोटि का त्रिभाग है एवं जघन्य आबाधा असंक्षेपाद्धा काल प्रमाण (ऑवली का संख्यातवां भाग) होती है। (गोक,917)

     

    15. आबाधा किसे कहते हैं ?

    कर्मबन्ध होने के बाद जब तक वह उदय में नहीं आता है, तब तक उसे आबाधा काल कहते हैं। जैसे खीर बनकर तैयार हो गयी किन्तु तुरन्त (उसी समय) नहीं खा सकते हैं, जब थोड़ी ठंडी हो जाती है, तब खाते हैं। जो ठंडी होने का समय है, उसे आबाधाकाल कहते हैं।

     

    16. क्या संक्लेश परिणामों से अकालमरण होता है ?

    हाँ। अधिक तनाव, अत्यधिक परिश्रम एवं पारिवारिक कलह से बढ़ता हुआ संक्लेश भी अकालमरण का कारण बनता है।

     

    17. बध्यायुष्क किसे कहते हैं एवं क्या बध्यायुष्क सम्यकदर्शन प्राप्त कर सकता है ?

    जिसने आगामी आयु का बन्ध कर लिया, वह बध्यायुष्क कहलाता है। चारों आयु में से किसी भी आयुबन्ध के बाद जीव सम्यकदर्शन प्राप्त कर सकता है। (गोक, 334)

     

    18. क्या बध्यायुष्क संयम प्राप्त कर सकता है ?

    किसी भी आयु का बन्ध नहीं किया है तो जीव देशसंयम और सकल संयम प्राप्त कर सकता है। देवायु का बन्ध करने के बाद भी जीव देशसंयम और सकल संयम प्राप्त कर सकता है, किन्तु नरकायु, तिर्यच्चायु एवं मनुष्यायु का बन्ध कर लिया है तो जीव देशसंयम या सकल संयम प्राप्त नहीं कर सकता है। (गोक, 334)

     

    19. मरण के बाद जीव को पुन: नवीन शरीर प्रारम्भ करने में कितना समय लगता है ?

    अधिक-से-अधिक तीन समय। पश्चात् चौथे समय में शरीर की रचना प्रारम्भ कर ही लेता है। मरण के बाद जीव का गमन श्रेणी के अनुसार होता है। लोक के मध्य से लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रम से स्थित आकाश प्रदेशों की पंक्ति को श्रेणी कहते हैं। जैसे ग्राफ पेपर या वस्त्र में ताने-बाने होते हैं।

     

    20. जीव मरण के बाद सीधा ही गमन करता है या मुड़ता भी है ?

    दोनों प्रकार से। जिसमें जीव को मुड़ना पड़ता है, उसे विग्रहगति कहते हैं या विग्रह अर्थात् शरीर के लिए जो गति होती है, उसे विग्रहगति कहते हैं। जिसमें जीव को मुड़ना नहीं पड़ता, उसे ऋजुगति कहते हैं। (.सि., 2/25/310)

     

    21. विग्रह गतियाँ कितने प्रकार की हैं ?

    विग्रहगतियाँ चार प्रकार की हैं -

    1. इषुगति - धनुष से छूटे हुए वाण के समान मोडे से रहित गति को इषुगति कहते हैं। इसमें एक समय लगता है।
    2. पाणिमुक्ता गति - जैसे हाथ से छोड़े गए द्रव्य की एक मोडे वाली गति को पाणिमुक्ता गति कहते हैं। इसमें दो समय लगते हैं।
    3. लांगलिका गति - जैसे हल में दो मोड़े होते हैं। उसी प्रकार दो मोड़े वाली गति को लांगलिका गति कहते हैं। इसमें तीन समय लगते हैं।
    4. गोमूत्रिका गतिजैसे-गाय चलते समय मूत्र (पेशाब) करती है, तब अनेक अर्थात् तीन मोड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार तीन मोडे वाली गति को गोमूत्रिका गति कहते हैं। इसमें चार समय लगते हैं

     

    22. विग्रह और अविग्रह गति के स्वामी कौन हैं ?

    मुक्त जीव की गति विग्रह रहित ही होती है और संसारी जीवों की गति विग्रह रहित विग्रह सहित दोनों प्रकार की होती है।

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