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    अध्याय 45 - पाप

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    जिसे सर्वत्र बुरा कहा जाता है ऐसा कार्य पाप कहलाता है। वे कितने होते हैं एवं उनका फल क्या है, इसका वर्णन इस अध्याय में है | पाप के बारे में इतना याद रखाना है कि पाप और पारा कभी पचता नहीं है।

     

    1. पाप किसे कहते हैं एवं कितने होते हैं ? 
    जिस कार्य के करने से इस लोक में एवं परलोक में अनेक प्रकार के दु:खों को सहन करना पड़ता है और निंदा एवं अपयश को सहन करना पड़ता है, उसे पाप कहते हैं। पाप 5 होते हैं - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह। 

     

    2. पाप की शाब्दिक परिभाषा क्या है ? 
    "पाति रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्"। "तदसट्टेद्यादि'। जो आत्मा को शुभ से बचाता है, वह पाप है। जैसे - असातावेदनीय आदि। 

     

    3. हिंसा किसे कहते हैं ? 
    मन, वचन, काय से किसी भी प्राणी को मारना, दु:ख देना हिंसा कहलाती है एवं स्वयं का घात करना भी हिंसा कहलाती है। 

     

    4. हिंसा कितने प्रकार की होती है ? 
    हिंसा चार प्रकार की होती है - संकल्पी हिंसा, आरम्भी हिंसा, उद्योगी हिंसा एवं विरोधी हिंसा।

    1. संकल्पी हिंसा - संकल्प पूर्वक किसी भी प्राणी को मारने का भाव करना यह संकल्पी हिंसा है। संकल्प करने के बाद जीव मरे या न मरे पाप अवश्य ही लगता है। किसी जीव की बलि चढ़ाना, पुतला दहन करना, काष्ठादि में बने चित्रों को मारना, चिड़िया आदि आकार के गोली बिस्कुट खाना, बूचड़खाने की हिंसा, कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करना, वीडियो गेम में चिड़िया को मारना, लक्ष्मणरेखा, मच्छर मारने के बेट आदि का प्रयोग करना, एन्टी पेस्ट इमल्सन कराना संकल्पी हिंसा है। 
    2. आरम्भी हिंसा - गृहस्थ को भोजन बनाने के लिए पानी भरना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति छीलना, बनाना। घर की सफाई करना, शरीर की सफाई करना, वस्त्र की सफाई करना आदि में षट्काय जीवों की विराधना होती है। यह आरम्भी हिंसा कहलाती है। श्रावक के लिए यह हिंसा क्षम्य है, किन्तु विवेक पूर्वक करें।
    3. उद्योगी हिंसा - श्रावक का जीवन धन के बिना नहीं चल सकता है। धन प्राप्ति के लिए वह खेती, व्यापार, सरकारी सेवा आदि कार्य करता है। इसमें जो हिंसा होती है, वह उद्योगी हिंसा है, यह भी श्रावक के लिए क्षम्य है। उद्योगी हिंसा एवं हिंसा के उद्योग में स्वर्ग-पाताल का अंतर है। बूचड़खाने, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि के करने में महापाप है, इसे उद्योगी हिंसा में नहीं ले सकते हैं। यह संकल्पी हिंसा है।
    4. विरोधी हिंसा - स्वयं की रक्षा, परिवार की रक्षा, समाज की रक्षा, संस्कृति की रक्षा, धर्म आयतनों की रक्षा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए, किसी से युद्ध करना पड़ता है और युद्ध में कोई मर भी जाता है,तो वह विरोधी हिंसा है। जैसे - लक्ष्मण ने रावण को मारा था। यह हिंसा भी श्रावक के लिए क्षम्य है। श्रावक का मात्र संकल्पी हिंसा का त्याग होता है। आरंभी, उद्योगी एवं विरोधी हिंसा का नहीं।

     

    5. हिंसा का समीकरण क्या है ?

    1. हिंसा न करते हुए हिंसक - जैसे - धीवर मछली पकड़ने गया। एक भी मछली जाल में नहीं फंसी फिर भी वह हिंसक कहलाएगा। कोई किसी को मारने के उद्देश्य से निकला और वह व्यक्ति नहीं मिला तो भी मारने का पाप लगेगा।
    2. हिंसा हो जाने पर भी हिंसक नहीं - जैसे - डॉक्टर रोगी का ऑपरेशन कर रोगी को बचाना चाह रहा था, किन्तु वह मरण को प्राप्त हो गया फिर भी डॉक्टर हिंसक नहीं। इसी प्रकार ईयसमिति से चलता साधु, फायर ब्रिगेड की गाड़ी, एम्बुलेंस आदि।
    3. हिंसा एक करे - फल अनेक भोगते हैं - बलि एक व्यक्ति चढ़ा रहा है, हजारों उसकी अनुमोदना (प्रशंसा) कर रहे हैं। सबको पाप लगेगा और सामूहिक पाप का फल भूकम्प, बाढ़, ट्रेन, प्लेन दुर्घटना में हजारों का मरण होना। इसी प्रकार पशु-पक्षियों की लड़ाई में आनंद मानना, पुतला दहन में आनंद मानना आदि ।
    4. बहुत से हिंसा करें किन्तु फल एक को - एक राज्य का स्वामी दूसरे राज्य पर आक्रमण करके उसके साथ युद्ध छेड़ देता है। हजारों सैनिक एक-दूसरे को मारते हुए मर जाते हैं। सबका पाप राजा को लगेगा, सैनिक तो केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए शस्त्र चलाते हैं। विवाह में जो भी आरम्भ होता है, उसका पाप दूल्हा एवं दुल्हन को लगता है।
    5. कार्य वही किन्तु परिणामों में अंतर - पहले कोई आलू-प्याज खाता था एवं स्वयं बनाता भी था।उसने अब आलू-प्याज खाना बंद कर दिया, किन्तु परिवार के लिए बनाना पड़ता है, मजबूरी है। पहले कषाय तीव्र थी, अब मंद कषाय है।

     

    6. हिंसा किन-किन कारणों से होती है ? 
    हिंसा मुख्य चार कारणों से होती है

    1. क्रोध के कारण - जैसे-द्वीपायन मुनि को क्रोध आने के कारण द्वारिका भस्म हो गई थी। तोताराजा की कहानी। सर्प - नेवला-बेटा, महिला की कहानी आदि। 
    2. मान के कारण - भरतचक्रवर्ती ने बाहुबली पर चक्र चला दिया। 
    3. माया के कारण - 1. कई ऐसे व्यक्ति मिलेंगे धन के कारण बालक का अपहरण किया था। पकड़ने के डर से लोग क्या कहेंगे हमारा मायाचार जान लेंगे इस कारण उसे मार देते हैं।  2. स्त्री का दुराचार ज्ञात हो गया तो पति वैराग्य धारण की बात घर में कहता है। स्त्री समझ जाती है, मेरा दुराचार ज्ञात हो गया। इससे दीक्षा ले रहे हैं। वह सोचती ये मेरा मायाचार प्रकट कर देंगे। अत: भोजन में विष मिला देती है और वही भोजन पति को दे देती है। जिससे पति का मरण हो जाता है। 3. गर्भपात भी मायाचार के कारण होता है। 
    4. लोभ के कारण - पाण्डवों को लाक्षागृह में बन्द कर दिया और वहाँ आग लगा दी। भले ही वे सुरंग से निकल गए। बूचड़खाने में जो हिंसा हो रही है, वह भी लोभ के कारण हो रही है।

     

    7. हिंसा त्याग का फल क्या होता है ?

    1. खदिरसार भील (राजा श्रेणिक के जीव ने) मात्र कौवे के माँस का त्याग किया था। जिसके कारण अगले ही भव में तीर्थंकर पद को प्राप्त करने वाला होगा।
    2. यमपाल चाण्डाल ने भी एक दिन (चतुर्दशी) के लिए हिंसा का त्याग करके स्वर्गीय सम्पदा को प्राप्त किया था।

     

    8. हिंसा करने का क्या फल है ?

    हिंसा ही दुर्गति का द्वार है,पाप का समुद्र है तथा माँसभक्षी जीव नरकों के दुखों को भोगते हैं एवं यहाँ भी जेल आदि में यातनाओं को सहन करते हैं। (ज्ञा, 8/17-18)

     

    9. झूठ पाप किसे कहते हैं ?

    आँखों से जैसा देखा हो, कानों से जैसा सुना हो वैसा नहीं कहना झूठ है, जिससे किसी का जीवन ही चला जाए, ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए एवं अंधे से अंधा, चोर से चोर, डाकू से डाकू कहना भी असत्य (झूठ) है। क्योंकि अंधे से अंधा कहने में उसे पीड़ा होती है। किसी ने कहा है -

    अंधे से अंधा कहो, तुरतई परहै टूट।

    धीरे-धीरे पूछ लो, कैसे गई है फूट॥

     

    10. झूठ बोलने के क्या-क्या कारण हैं ?

    अज्ञान, क्रोध, लोभ, भय, मान, स्नेह आदि के कारण झूठ बोला जाता है।

    लोभ - सत्यघोष नामक पुरोहित लोभ के कारण झूठ बोलता था।

    स्नेह - गुरु पत्नी से स्नेह होने के कारण राजा वसु झुठ बोला था। गुरु क्षीरकदम्ब का पुत्र पर्वत, सेठ का पुत्र नारद और राजा का पुत्र वसु की कहानी।

     

    11. झूठ बोलने का फल क्या होता है ?

    सत्यघोष ने झूठ बोला। यहाँ अपमान को सहन किया और अब नरकों के दु:खों को सहन कर रहा है।

     

    12. चोरी पाप किसे कहते हैं ?

    दूसरों की रखी हुई, गिरी हुई, भूली हुई अथवा नहीं दी हुई वस्तु को लेना या लेकर के दूसरों को देना चोरी कहलाती है। दस प्राण तो सभी जानते हैं, किन्तु 11 वाँ प्राण अन्न है। अन्न के बिना प्राण ठहरते नहीं है। अत: उसे भी प्राण कहा है। अन्न धन से प्राप्त होता है, अत: धन को बारहवाँ प्राण कहा है। अत: किसी के धन की चोरी करने का अर्थ है, उसके प्राण ही ले लेना।

     

    13. चोरी करने के क्या कारण हैं ?

    गरीबी के कारण, धनवान बनने के लिए एवं कोई धनवान रहे गरीब हो जाए, इन तीन कारणों से जीव चोरी करता है।

     

    14. चोरी करने का क्या फल है ?

    जब पकड़े जाते हैं तो अनेक प्रकार के दण्ड भोगने पड़ते हैं और कभी किसी को फाँसी भी हो जाती हैं एवं परलोक में नरक आदि के दु:खों को सहन करना पड़ता है।

     

    15. कुशील पाप किसे कहते हैं ?

    जिनका परस्पर में विवाह हुआ है, ऐसे स्त्री-पुरुष का एक दूसरे को छोड़कर अन्य स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध रखना कुशील कहलाता है एवं गालियाँ देना भी कुशील पाप कहलाता है।

     

    16. कुशील पाप क्यों होता है ?

    एक तो चारित्रमोहनीय का तीव्र उदय, दूसरा इन्द्रिय सुख मिले, इस कारण यह कुशील पाप होता है।

     

    17. कुशील पाप का क्या फल है ?

    परस्त्री सेवन करने वालों को नरकों में लोहे की गर्म गर्म पुतलियों से आलिंगन करवाया जाता है एवं यहाँ एड्स जैसी बीमारी भी इसी कारण से होती है।

     

    18. परिग्रह पाप किसे कहते हैं ?

    क्षेत्र वास्तु, हिरण्य सुवर्ण, धन धान्य, दासी दास, और कुष्य भाण्ड इन पदार्थों में मूच्छ (तीव्र लालसा) रखना परिग्रह पाप है।

     

    19. परिग्रह क्यों इकट्ठा करते हैं ?

    दुनिया में सबसे बड़ा व्यक्ति बनूँ इस भावना को लोग परिग्रह को इकट्ठा करते हैं।

     

    20. परिग्रह के बिना श्रावक का कैसे जीवनयापन होगा ?

    जितना आवश्यक है, उतना रखना तो ठीक है। कुछ ज्यादा भी रखते हैं तो समय पर राष्ट्र, धर्म, साधर्मी के लिए दान देना, यह तो संचय कहलाएगा, किन्तु आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करना परिग्रह है।

     

    21. परिग्रह पाप का क्या फल है ?

    बहुत परिग्रह जब नष्ट होता है तब मानव आकुल व्याकुल हो जाता है एवं जब सरकार की ओर से छापे पड़ते हैं तब धन भी चला जाता है और बदनामी भी होती है एवं बहुत परिग्रह वाला नरक आयु का भी बंध करता है।

     

    22. पाँच पापों में प्रसिद्ध होने वालों के नाम बताइए ?

    हिंसा पाप में धनश्री नाम की सेठानी, झूठ पाप में सत्यघोष नाम का पुरोहित, चोरी पाप में एक तापसी, कुशील पाप में यमदण्ड नाम का कोतवाल और परिग्रह पाप में श्मश्रुनवनीत नामक वणिक प्रसिद्ध हुए। (रक.श्रा., 65)


     

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