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  • अध्याय 41 - द्रव्य

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    जिसका कभी नाश नहीं होता वह द्रव्य है। लोकाकाश सभी द्रव्यों से भरा है, ये द्रव्य कितने होते हैं, इनका क्या लक्षण है, इनका क्या उपकार है। इसका वर्णन इस अध्याय में है।


    1. द्रव्य किसे कहते हैं ?

    1. जो गुण और पर्याय वाला होता है, उसे द्रव्य कहते हैं। जैसे-स्वर्ण पुद्गल द्रव्य है, रूपवान होना उसका गुण है। हार, मुकुट, कंगन आदि द्रव्य की पर्याय हैं तथा पीलापन उसके रूप गुण की पर्याय है। द्रव्य के बिना गुण और पर्याय नहीं होती है, उसी प्रकार गुण व पर्याय के बिना द्रव्य भी नहीं होता है। 
    2. जो पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता है, उसे द्रव्य कहते हैं। 

     

    2. वर्तमान विज्ञान द्रव्य को किस रूप में मानता है ?
    वर्तमान विज्ञान कहता है कि हम किसी पदार्थ को न बना सकते हैं और न मिटा सकते हैं, इस सिद्धान्त को अविनाशता के सिद्धान्त से जाना जाता है। 

     

    3. द्रव्य कितने होते हैं ?
    द्रव्य छ: होते हैं -जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। 

     

    4. जीव द्रव्य किसे कहते हैं ?
    जिसमें दर्शन, ज्ञान रूप चेतना पाई जाती है, वह जीव द्रव्य है। अथवा जो जीता था, जी रहा है एवं जिएगा, उसे जीव कहते हैं। 

     

    5. पुद्गल द्रव्य किसे कहते हैं ?
    जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण पाए जाते हैं, जो संवेदन से रहित है, पूरण और गलन स्वभाव वाला है, (पूरण अर्थात् मिलने वाला तथा गलन अर्थात् मिटने वाला है) उसे पुद्गल द्रव्य कहते हैं। 

     

    6. पुद्गल को विज्ञान की भाषा में क्या कहते हैं ?
    जिस पदार्थ का फ्यूजन एवं फिशन होता है, उसे पुद्गल कहते हैं। फ्यूजन का अर्थ है-एकरूप होना, संयोग पाना और फिशन का अर्थ है-टूटकर फैलना। फ्जूयन एवं फिशन को क्रम से इन्टीग्रेशन और डिसइन्टीग्रेशन भी कहते हैं। इसे मेटर भी कहते हैं। 

     

    7. पुद्गल के कितने भेद हैं ?
    पुद्गल के 2 भेद हैं -अणु और स्कन्ध। 

    1. अणु - अविभागी 1 प्रदेशी पुद्गल द्रव्य को अणु या परमाणु कहते हैं। अणु 1 प्रदेशी होने से काय नहीं है, अत: शुद्ध अस्तिकाय तो 4 हैं। पुद्गल परमाणु को उपचार से अस्तिकाय कहा है। इस प्रकार अस्तिकाय 5 होते हैं। अस्ति का अर्थ ‘है' और काय का अर्थ 'बहु प्रदेशी'।
    2. स्कन्ध - 2, 3, 4, 8, संख्यात, असंख्यात तथा अनन्त परमाणुओं के पिण्ड को स्कन्ध कहते हैं।स्कन्ध के 6 भेद हैं। 

     

    1. बादर-बादर - जो पदार्थ छिन्न-भिन्न कर देने पर स्वयं नहीं जुड़ सकते, वे बादर-बादर हैं। जैसे पत्थर, लकड़ी, धातु, कपड़ा आदि। 
    2. बादर - जो पदार्थ छिन्न-भिन्न कर देने पर स्वयं जुड़ जाते हैं, वे बादर कहलाते हैं। जैसे-जल, दूध,पारा आदि। 
    3. बादर-सूक्ष्म - जो नेत्रों के द्वारा देखा तो जा सके, किन्तु पकड़ में न आ सके, वह बादर-सूक्ष्म है।जैसे-छाया, प्रकाश, अन्धकार, चाँदनी आदि।
    4. सूक्ष्म-बादर - जो नेत्रों से नहीं दिखते किन्तु शेष इन्द्रियों के द्वारा अनुभव किए जाते हैं, वे सूक्ष्म बादर हैं। जैसे-हवा, गन्ध आदि। 
    5. सूक्ष्म - जो किसी भी इन्द्रिय का विषय न हो। जैसे-कार्मण स्कन्ध। 
    6. सूक्ष्म-सूक्ष्म - अत्यन्त सूक्ष्म द्वि अणुक को सूक्ष्म-सूक्ष्म स्कन्ध कहते हैं। यह स्कन्ध की अंतिम इकाई है। 

     

    8. धर्म द्रव्य किसे कहते हैं ? 
    जो गतिशील जीव और पुद्गल के गमन, हलन, चलन, आगमन में सहकारी कारण है, उसे धर्म द्रव्य कहते हैं। यह उदासीन रहता है। यह अमूर्त तथा संवेदन शून्य है। यह किसी भी इन्द्रिय का विषय नहीं बनता है, मात्र केवलज्ञानी जानते हैं। जैसे- मछली के तैरने में जल सहायक होता है। हवाई जहाज के चलने में आकाश सहायक है एवं रेल के चलने में पटरी सहायक है। 

     

    9. धर्म द्रव्य के बारे में वैज्ञानिकों की क्या मान्यता है ? 
    विज्ञान इसे ईथर के रूप में स्वीकार करता है। ईथर को अमूर्तिक, व्यापक, निष्क्रिय और अदृश्य के साथसाथ उसे गति का आवश्यक माध्यम मानता है। आइंस्टीन ने भी गति हेतुत्व को स्वीकार करते हुए कहा है'लोक परिमित है, लोक से अलोक अपरिमित है। लोक के परिमित होने का कारण यह है कि द्रव्य अथवा शक्ति लोक के बाहर नहीं जा सकती, लोक के बाहर उस शक्ति का अभाव है, जो गति में सहायक होती है।” 

     

    10.अधर्म द्रव्य किसे कहते हैं ? 
    जो ठहरते हुए जीव और पुद्गलों को रुकने में सहायक है, वह अधर्म द्रव्य है। यह भी उदासीन, अमूर्त, संवेदन शून्य एवं लोकव्यापी है। जैसे-वृक्ष बटोही (पथिक) को रुकने में सहायक है। 

     

    11. धर्म द्रव्य तथा अधर्म द्रव्य उदासीन न होते तो क्या होता ? 
    धर्म द्रव्य तथा अधर्म द्रव्य उदासीन न होते तो आपस में झगड़ा प्रारम्भ हो जाता, क्योंकि धर्म द्रव्य तो जीव तथा पुद्गल को चलने के लिए प्रेरित करता और अधर्म द्रव्य रुकने के लिए प्रेरित करता। इससे व्यवस्था बिगड़ जाती और फिर हम सब न चल पाते, न रुक पाते। अच्छा है, ये उदासीन हैं। कोई चलना चाहे तो धर्म द्रव्य सहायक है। कोई रुकना चाहे तो अधर्म द्रव्य सहायक है।

     

    12. धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य कहाँ रहते हैं ?
    धर्म और अधर्म द्रव्य समस्त लोकाकाश में व्याप्त हैं। जैसे-तिल में तेल, दूध में घी सर्वत्र ही पाया जाता है, वैसे ही दोनों द्रव्य सम्पूर्ण लोकाकाश में पाए जाते हैं।

     

    13. आकाश द्रव्य किसे कहते हैं ?
    जो जीवादि सभी द्रव्यों को अवकाश (स्थान) देता है, वह आकाश द्रव्य है। यह भी अमूर्तिक, संवेदन शून्य एवं निष्क्रिय है। यद्यपि जीव और पुद्गल भी एक दूसरे को अवकाश देते हैं, किन्तु उन सबका आधार आकाश ही है।
    नोट - ऊपर दिखने वाला नीला-नीला यह आकाश नहीं, यह तो पुद्गलों का संचय बादल है।

     

    14. अन्य दर्शन एवं विज्ञान ने आकाश द्रव्य माना कि नहीं ?
    अन्य दर्शनों ने भी आकाश द्रव्य को स्वीकार किया है, किन्तु वे उसके लोक, अलोक का भेद नहीं मानते हैं, इसी कारण से उनके यहाँ धर्म और अधर्म द्रव्य की भी मान्यता नहीं है। आधुनिक विज्ञान ने भी आकाश द्रव्य के दोनों भेदों को माना है। जैसे कि धर्म द्रव्य के कथन में आइंस्टीन का दृष्टांत दिया गया है।

     

    15. आकाश के कितने भेद हैं ?
    आकाश के दो भेद हैं
    लोकाकाश - जहाँ पर छ: द्रव्य रहते हैं।
    अलोकाकाश - जहाँ मात्र एक आकाश द्रव्य है।

     

    16. काल द्रव्य किसे कहते हैं ?
    वर्तना (परिवर्तन) जिसका प्रमुख लक्षण है। अर्थात् जो स्वयं परिणमन करते हुए अन्य द्रव्यों के परिणमन में उदासीन रूप से सहकारी कारण होता है। पदार्थों में परिवर्तन यह जबरदस्ती नहीं कराता, बल्कि इसकी उपस्थिति में पदार्थ स्वयं परिवर्तित होते हैं। यह तो कुम्हार के चाक के नीचे रहने वाली कील के समान है,जो स्वयं नहीं चलती, न ही चाक को चलाती है, फिर भी कील के अभाव में चाक घूम नहीं सकता है।इसी प्रकार दूसरा उदाहरण भी है-पंखे (सीलिंग फेन) में हेन्डिल जो स्वयं नहीं चलता, न वह पंखे को चलाता है, किन्तु उसके बिना भी पंखा नहीं चलता है। यह भी उदासीन, अमूर्त, संवेदनशून्य एवं लोकव्यापी है।

     

    17. काल के कितने भेद हैं ?
    काल के दो भेद हैं -

    1. व्यवहार काल - मिनट, घंटा, दिन आदि व्यवहार काल हैं।
    2. निश्चय काल - जो प्रत्येक द्रव्य में प्रति समय परिणमन कराने में सहकारी कारण है, उस द्रव्य को निश्चय काल कहते हैं।

     

    18. समय किसे कहते हैं ?
    काल की सबसे छोटी इकाई को समय कहते हैं अथवा एक परमाणु मंदगति से एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर जाने में जो काल लगता है, उसे समय कहते हैं।

     

    19. समय तो सत्य है किन्तु निश्चय काल कुछ प्रतीत नहीं होता है ? 
    यदि समय ही समय मानते तो वह शाश्वत नहीं है, वह उत्पन्न होता है और दूसरे क्षण नष्ट होता है अत: समय पर्याय सिद्ध हुई। अब वह समय नामक पर्याय जिस द्रव्य की है, उसी द्रव्य का नाम निश्चयकाल है।

     

    20. प्रत्येक द्रव्य की संख्या एवं प्रदेश कितने हैं ? 
    जीव द्रव्य अनन्तानन्त हैं एवं एक जीव असंख्यात प्रदेशी होता है। पुद्गल द्रव्य भी अनन्तानन्त हैं किन्तु जीव द्रव्य से अनन्त गुने होते हैं। पुद्गल द्रव्य संख्यात, असंख्यात एवं अनन्त प्रदेशी भी होते हैं। धर्म द्रव्य एक है वह असंख्यात प्रदेशी है। अधर्म द्रव्य एक है यह भी असंख्यात प्रदेशी है। आकाश द्रव्य एक अखण्ड द्रव्य है। यह अनन्त प्रदेशी है किन्तु लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। काल द्रव्य असंख्यात हैं। यह लोकाकाश में रत्नों की राशि के समान एक-एक प्रदेश पर एक-एक व्याप्त होकर रहते हैं। यह स्वयं एक प्रदेशी है।

     

    21. प्रदेश किसे कहते हैं ? 
    एक परमाणु आकाश का जितना स्थान घेरता है, वह प्रदेश कहलाता है। 
    द्रव्यों की संख्या एवं उनके प्रदेशों के लिए तालिका देखें -

    द्रव्य

    संख्या

    प्रदेश

    जीव

    अनन्तानन्त

    असंख्यात प्रदेशी

    पुद्गल

    अनन्तानन्त

    संख्यात, असंख्यात एवं अनन्त प्रदेशी

    धर्म

    एक

    असंख्यात प्रदेशी

    अधर्म

    एक

    असंख्यात प्रदेशी

    आकाश

    एक (अखण्ड द्रव्य )

    अनन्त प्रदेशी

    काल

    असंख्यात

    एक प्रदेशी

    आकाश के भेद

    अलोकाकाश

    एक

    अनन्त प्रदेशी

    लोकाकाश

    एक

    असंख्यात प्रदेशी

     

    22. जीव द्रव्य का क्या उपकार है ?
    जीव परस्पर में उपकार करते हैं। आचार्य श्री उमास्वामी महाराज ने तत्वार्थसूत्र में कहा है 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' जैसे-मालिक मुनीम को वेतन देकर उपकार करता है, मुनीम भी ईमानदारी से काम करता है तो दुकान में चार चाँद लग जाते हैं अर्थात् सेठ को ज्यादा लाभ होता है, यह मुनीम का उपकार सेठ के ऊपर है। इसी प्रकार गुरु-शिष्य। भगवान्-भत में भी परस्पर उपकार होता है एवं अंधा-लंगड़ा भी आपस में उपकार करते हैं।

     

    23. पुद्गल द्रव्य के उपकार क्या हैं ? 
    जीव को सुख-दु:ख, जीवन-मरण, शरीर, मन, वचन, प्राण और अपान। ये सब पुद्गल द्रव्य के उपकार जीव के ऊपर हैं। पुद्गल का उपकार पुद्गल के ऊपर जैसे-साबुन से कपड़े धोना, राख से बर्तन साफ करना आदि। शेष चार द्रव्यों के लक्षण ही उनके उपकार हैं।

     

    24. लोकाकाश के असंख्यात प्रदेशों में अनन्तानन्त जीव और अनन्तानन्त पुद्गल कैसे रहते हैं ?
    लोकाकाश में अवगाहन शक्ति होने एवं पुद्गल के अणुओं में सूक्ष्म रूप से परिणमन होने के कारण। जैसे-दूध से भरा बर्तन है, उसमें एक बूंद भी दूध डालेंगे तो दूध बाहर आ जायेगा, किन्तु उसमें थोड़ीथोड़ी शक्कर डालें तो वह घुल जाती है अब उसमें धीरे-धीरे राजगिर के दाने डालें तो वह भी समाहित हो जाएंगे। इसी प्रकार असंख्यात प्रदेशी लोक में अनन्तानन्त जीव, पुद्गल समाहित हो जाते हैं। उदाहरण दूसरा - एक कमरे में एक बल्ब का प्रकाश रहता है, वहाँ हजारों बल्बों का प्रकाश भी समाहित हो जाता है।

     

    25. पुद्गल द्रव्य की पर्याय कौन-कौन सी हैं ?
    पुद्गल द्रव्य की निम्न पर्याय हैं- शब्द, बंध, सूक्ष्म, स्थूल, संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप और उद्योत आदि हैं।

    Edited by admin



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