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  • अध्याय 61 - अनेकान्त और स्याद्वाद

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    जैन दर्शन की रीढ़ अनेकान्त एवं स्याद्वाद का वर्णन इस अन्तिम अध्याय में है।

     

    1. अनेकान्त किसे कहते हैं ?

    अनेक + अन्त = अनेकान्त। अनेक का अर्थ है एक से अधिक, अन्त का अर्थ है गुण या धर्म। वस्तु में परस्पर विरोधी अनेक गुणों या धर्मों के विद्यमान रहने को अनेकान्त कहते हैं।

     

    2. अनेकान्त के कितने भेद हैं ?

    अनेकान्त के दो भेद हैं -

    1. सम्यक् अनेकान्त - वस्तु के अनेक गुण धर्मो को सापेक्ष रूप से स्वीकार करना।
    2. मिथ्या अनेकान्त - निरपेक्ष रूप से अनेक गुण धर्मों की कल्पना करना।

     

    3. स्याद्वाद किसे कहते हैं ?

    अनेकान्त धर्म का कथन करने वाली भाषा पद्धति को स्याद्वाद कहते हैं। स्यात् का अर्थ है कथचित् किसी अपेक्षा से एवं वाद का अर्थ है कथन करना।

     

    4. स्याद्वाद के कितने भङ्ग हैं ?

    स्याद्वाद के सात भङ्ग हैं, जिसे सप्तभङ्गी के नाम से भी जाना जाता है।

     

    5. सप्तभङ्गी किसे कहते हैं ?

    1. “प्रश्न वशादेकस्मिन् वस्तुन्यविरोधेन विधि प्रतिषेध विकल्पना सप्तभङ्गी'। अर्थ– प्रश्न के अनुसार एक वस्तु में प्रमाण से अविरुद्ध विधि निषेध धर्मों की कल्पना सप्त भङ्गी है। (रावा, 1/6/5)
    2. सप्त भङ्गों के समूह को सप्तभङ्गी कहते हैं।

     

    6. सप्त भङ्ग के नाम क्या हैं ?

    सप्त भङ्ग के नाम इस प्रकार हैं-1. स्यात् अस्ति एव, 2. स्यात् नास्ति एव, 3. स्यात् अस्ति—नास्ति, 4. स्यात् अवक्तव्य एव, 5. स्यात् अस्ति अवक्तव्य, 6. स्यात् नास्ति अवक्तव्य, 7. स्यात् अस्ति—नास्ति अवक्तव्य। (रा. वा., 4/42/15)

    1. स्यात् अस्ति एव - किसी अपेक्षा से है। जैसे-सीताजी रामचन्द्रजी की अपेक्षा से धर्मपत्नी ही हैं।
    2. स्यात् नास्ति एव - किसी अपेक्षा से नहीं है। जैसे-सीताजी रामचन्द्रजी के अतिरिक्त अन्य पुरुष की अपेक्षा से धर्मपत्नी नहीं है।
    3. स्यात् अस्ति-नास्ति - किसी अपेक्षा से है, किसी अपेक्षा से नहीं है। जैसे-सीताजी रामचन्द्रजी की अपेक्षा से धर्मपत्नी है, अन्य पुरुषों की अपेक्षा से धर्मपत्नी नहीं है।
    4. स्यात् अवक्तव्य एव - किसी अपेक्षा से अवक्तव्य है। (नहीं कहा जा सकता है) जैसे-सीताजी रामचन्द्रजी की अपेक्षा से धर्मपत्नी है, अन्य पुरुषों की अपेक्षा से ही, इन दोनों अपेक्षाओं को एक साथ नहीं कहा जा सकता है। अतः युगपत् अपेक्षा अवक्तव्य है।
    5. स्यात् अस्ति अवक्तव्य - किसी अपेक्षा से है, पर अवत्तव्य है। जैसे-सीताजी रामचन्द्रजी की अपेक्षा से धर्मपत्नी है एवं उसी समय रामचन्द्रजी एवं अन्य पुरुष इन दोनों की अपेक्षाओं से एक साथ नहीं कहा जा सकता है।
    6. स्यात्नास्ति अवक्तव्य - किसी अपेक्षा से नहीं है, पर अवत्तव्य है। जैसे-सीताजी अन्य पुरुषों की अपेक्षा से धर्मपत्नी नहीं है एवं उसी समय रामचन्द्रजी एवं अन्य पुरुष इन दोनों अवस्थाओं का कथन युगपत् संभव नहीं है, अत: नास्ति अवक्तव्य है।
    7. स्यात् अस्ति-नास्ति अवक्तव्य - किसी अपेक्षा से है, नहीं भी है, पर अवत्तव्य है। जैसे-सीता जी रामचन्द्र जी की अपेक्षा से धर्मपत्नी है, अन्य पुरुष की अपेक्षा से धर्मपत्नी नहीं है एवं उसी समय तीनों अवस्थाओं का कथन युगपत् संभव नहीं है, अत: अस्ति-नास्ति अवक्तव्य है।

     

    7. सप्तभङ्गी का सैद्धांतिक उदाहरण आचार्य श्री ज्ञानसागरजी ने कौन-सा दिया था ?

    1. प्रथम गुणस्थानवर्ती अस्ति मिथ्यादृष्टि होता है।
    2. क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव नास्ति मिथ्यादृष्टि होता है।
    3. तीसरे गुणस्थान वाला जीव अस्ति-नास्ति मिथ्यादृष्टि होता है।
    4. दूसरे गुणस्थान वाला जीव अवक्तव्य मिथ्यादृष्टि होता है।
    5. क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव अस्ति अवक्तव्य मिथ्यादृष्टि है।
    6. उपशम सम्यग्दृष्टि नास्ति अवक्तव्य मिथ्यादृष्टि है।
    7. करण लब्धि वाला जीव अस्ति-नास्ति अवत्तव्य मिथ्यादृष्टि है।

     

    8. अनेकान्त हमारे नित्य व्यवहार की वस्तु किस प्रकार से है ?

    अनेकान्त हमारे नित्य व्यवहार की वस्तु है, इसे स्वीकार किए बिना हमारा लोक व्यवहार एक क्षण भी नहीं चल सकता। लोक व्यवहार में देखा जाता है। जैसे-एक ही व्यक्ति अपने पिता की अपेक्षा से पुत्र कहलाता है, वही अपने पुत्र की अपेक्षा से पिता भी कहलाता है। इसी प्रकार अपने भांजे की अपेक्षा से मामा एवं अपने मामा की अपेक्षा से भांजा। इसी प्रकार श्वसुर की अपेक्षा से दामाद एवं अपने दामाद की अपेक्षा से श्वसुर कहलाता है। इसी प्रकार अपने गुरु की अपेक्षा से शिष्य एवं शिष्य की अपेक्षा से गुरु कहलाता है। जिस प्रकार एक ही व्यक्ति में अनेक रिश्ते संभव हैं, उसी प्रकार एक वस्तु में अनेक धर्म विद्यमान हैं। कोई कहे हमारे मामा हैं तो सबके मामा हैं, सब मामा कहो तो यह एकान्त दृष्टि है, झगड़े का कारण है, अनेकान्त समन्वय की वस्तु है।

     

    9. क्या वस्तु में सात ही भङ्ग होते हैं ?

    जिज्ञासा सात प्रकार से ज्यादा नहीं हो सकती एवं उनका समाधान भी सात प्रकार से किया जाता है, अत: प्रत्येक वस्तु में भङ्ग7 ही होते हैं।

     

    10. सप्तभङ्गी के मूल में कितने भङ्ग हैं ?

    सप्तभङ्गी के मूल में तीन भङ्ग हैं- स्यात् अस्ति एव, स्यात् नास्ति एव एवं स्यात् अवक्तव्य एव इन तीन भङ्गों से चार संयुक्त भङ्ग बनकर सप्त भङ्ग हो जाते हैं।

     

    11. क्या अनेकान्त छल है ?

    नहीं। छल में तो दूसरों को धोखा दिया जाता है किन्तु अनेकान्त में अनेक धर्म हैं। वत्ता किस धर्म को कहना चाह रहा वह अनेकान्त है। जैसे-‘नव कम्बलो देवदत्त:।' यहाँ नव शब्द के दो अर्थ होते हैं। एक 9 संख्या और दूसरा नया। इसके पास 9 कम्बल हैं3, 4, नहीं। श्रोता ने अर्थ किया इसका नया कम्बल है पुराना नहीं। (रा.वा, 1/6/8)

     

    12. बनारस के पंडित गङ्गारामजी से मित्र ने पूछा आप जैन धर्मावलंबियों में पैदा नहीं होकर भी इस धर्म में इतना अनुराग क्यों रखते हैं ?

    पंडितजी ने अपने मकान के चारों ओर से लिए हुए 4 फोटो उठाए। चारों दिशाओं के लिए थे। फोटो दिखाकर पंडितजी ने कहा किसके मकान के फोटो हैं, पंडितजी ये तो आपके मकान के फोटो हैं, पंडित जी बोले यही तो स्याद्वाद है। मकान तो एक है परन्तु चारों ओर से देखने पर चारों भिन्न-भिन्न लगते हैं। इसी तरह किसी भी वस्तु को उसमें जितने गुण धर्म तथा पर्यायें हैं उतनी दृष्टियों से उसको बताना ही स्याद्वाद है। स्याद्वाद के बिना एकान्तवाद से किसी वस्तु का सम्पूर्ण व यथार्थ बोध नहीं हो सकता।

     

    13. झगड़ते हुए एकान्तवादियों को अनेकान्तवादी ने किस प्रकार समझाया ?

    एक नगर में हाथी आया। छ: सूरदासों ने सुना तो सभी हाथी के पास पहुँचे। उनमें से एक ने पूँछ को छुआ और कहा कि ‘हाथी रस्सी की तरह है”। दूसरे ने उसके पैर को छुआ और कहा कि ‘हाथी तो खम्भे की तरह है”। तीसरे ने हाथी की सँड को छुआ और कहा ‘यह तो मूसल के समान है”। चौथे ने हाथी के पेट को छुआ और कहा ‘‘यह तो दीवार के समान है”। पाँचवें ने उसके कान को छुआ और कहा ‘यह तो सूप के समान है” छठवें सूरदास ने दाँत को छुआ और कहा‘यह तो धनुष के समान है”। छ: सूरदास एक स्थान पर बैठकर हाथी के विषय में झगड़ने लगे, सब अपनी-अपनी बात पर अड़े थे वहाँ से एक व्यक्ति निकला उसने उनके विवाद का कारण जानकर कहा, क्यों झगड़ते हो? तुम सबने हाथी के एक-एक अङ्ग का स्पर्श किया है, सम्पूर्ण हाथी का नहीं। इसलिए आपस में झगड़ रहे हो। ध्यान से सुनो-मैं तुम्हें हाथी का पूर्ण रूप बताता हूँ। पूँछ, पैर, सुंड, पेट, कान, दाँत आदि सभी अङ्गमिलाने से हाथी का पूर्ण रूप होता है। सूरदासों को बात समझ में आ गई। उन्हें अपनी-अपनी एकान्त दृष्टि पर पश्चाताप हुआ।

    Edited by admin



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    रतन लाल

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    उत्तम विवेचना

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