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    अध्याय 40 - सल्लेखना

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    जो जन्म लेता है उसका मरण निश्चित है क्योंकि यह जीवन की एक अनिवार्य घटना है, किन्तु सल्लेखना के साथ मरण करने वाला शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करता है। उसी सल्लेखना का वर्णन इस अध्याय में है।

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    1. सल्लेखना क्या है ?

    1. अच्छे प्रकार से काय और कषाय का लेखन करना अर्थात् कृश करना सल्लेखना है।
    2. बाहरी शरीर को और भीतरी कषायों के उत्तरोत्तर पुष्ट करने वाले कारणों को घटाते हुए भले प्रकार से लेखन करना अर्थात् कृश करना सल्लेखना है। (स.सि., 7/22/705)

     

    2. सल्लेखना की क्या आवश्यकता है ?
     मरण किसी को इष्ट नहीं है। प्रधानमंत्री भी चाहता है कि हमारी सीट पाँच वर्ष तक सुरक्षित रहे, मुख्यमंत्री भी यही चाहता है, एक व्यापारी भी यही चाहता है कि मेरी दुकान का मरण न हो, अर्थात् वह चलती रहे। सर्विस करने वाला भी यही चाहता है मेरी सर्विस 60 वर्ष तक चलती रहे। उसी प्रकार संयमी भी चाहता है कि मेरा रत्नत्रय सुरक्षित रहे किन्तु रत्नत्रय भावों के साथ शरीर का भी साथ चाहता है। अब शरीर कहता है कि मुझे अस्पताल ले चलो, किन्तु संयमी कहता है, भाई तुम्हें मेरा साथ नहीं देना तो मत दो, मैं परलोक तो जा सकता हूँ किन्तु तुम्हें (शरीर) अस्पताल नहीं भेज सकता हूँ। शरीर साथ देना बंद कर देता है, तो वह शरीर को भी धीरे-धीरे आहार-पानी देना बंद कर देता है अर्थात् काय और कषाय का लेखन अर्थात् कृश करना प्रारम्भ कर देता है और एक दिन वह अपने रत्नत्रय को न छोड़कर शरीर को ही छोड़कर यहाँ से विदा ले लेता है।

     

    3. किन-किन कारणों के उपस्थित होने पर सल्लेखना ली जाती है ? 
    आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में सल्लेखना के निम्न कारणों का उल्लेख किया है

    उपसर्गे दुर्भिक्षे जरसि रुजायां च नि:प्रतीकारे। 
    धर्माय तनुविमोचनमाहुः सल्लेखनामार्याः ॥ 122॥

     अर्थ - उपसर्ग आने पर, दुर्भिक्ष आने पर, बुढ़ापा आने पर और असाध्य रोग आने पर, धर्म की रक्षा के लिए सल्लेखना ली जाती है। 

    1. उपसर्ग - उपसर्ग हो गया, जीवित रहने की संभावना नहीं है, तब चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिया जैसे-मुनि सुकौशल, मुनि सुकुमाल आदि ने किया था। एक संक्षेप प्रत्याख्यान भी होता है, कोई उपसर्ग हो गया, जब तक दूर नहीं होगा, तब तक के लिए चारों प्रकार के आहार का त्याग। जैसे-अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजों ने किया था।
    2. दुर्भिक्ष - अकाल के समय। जब श्रावकों को ही खाने के लिए नहीं है तब वह साधु को कैसे देगा। जब बारह वर्ष का अकाल पड़ा तब 12,000 मुनिराजों का संघ दक्षिण भारत चला गया। उनका वहाँ निर्वाह हो गया किन्तु जो यहाँ रहे थे, उन्हें सल्लेखना लेनी थी। नहीं ली तो क्या हुआ। दिगम्बर संघ से एक अर्धफलक संघ का जन्म हुआ जो कालान्तर में श्वेताम्बर संघ में विलीन हो गया। 
    3. जरसि - जरसि अर्थात् बुढ़ापा में शरीर शिथिल पड़ गया। जब दिखाई नहीं देता, न चला जाता, न खड़े हो सकते हैं। ऐसे मरणान्त उपस्थित होने पर सल्लेखना ग्रहण कर लेनी चाहिए। 
    4. असाध्य रोग होने पर - असाध्य रोग होने पर जो ठीक हो ही नहीं सकता, तब सल्लेखना ग्रहण कर लेनी चाहिए।

     

    4. सल्लेखना करने की क्या विधि है ? 
    जो सल्लेखना धारण करता है, वह क्षपक कहलाता है। वह क्षपक सबसे राग, द्वेष, मोह और परिग्रह को छोड़कर प्रियवचनों से स्वजन, परिजन, सबसे क्षमा माँगे एवं सबको क्षमा कर दे। अपने सम्पूर्ण जीवन के पापों की आलोचना करके, आजीवन के लिए पाँचों पापों का त्याग करे। शोक, भय, विषाद आदि को छोड़कर श्रुत रूपी अमृत का पान करे और क्रमश: इस प्रकार कषायों को कृश करता हुआ अपनी काया को कृश करने के लिए सर्वप्रथम इष्ट रस, इष्ट वस्तु का त्याग करे, पुन: गरिष्ठ रसों का त्याग करके, मोटे (ठोस) अनाज का त्याग करके पेय को बढ़ाए, फिर छाछ एवं गरम जल को ग्रहण करे, ऐसा करता हुआ जल का भी त्याग करके उपवास धारण करे एवं पञ्च नमस्कार का जाप, पाठ, ध्यान करते हुए देह का विसर्जन करे। 

     

    5. शरीर कितने प्रकार से छूटता है ? 
    शरीर तीन प्रकार से छूटता है

    1. च्युत - कारण के बिना केवल आयु पूर्ण होने पर जो शरीर छूटता है, उसे च्युत कहते हैं। 
    2. च्यावित - विष भक्षण, शस्त्रघात, श्वास निरोध आदि अकाल मरण के कारण मिलने से आयु पूर्ण होने से पहले संन्यास विधि से रहित जो शरीर छूटता है, उसे च्यावित कहते हैं। 
    3. त्यक्त - अकालमरण अथवा अकाल मरण के बिना, संन्यास विधि से शरीर छूटना उसे त्यक्त कहते हैं।

     

    6. संन्यास मरण के कितने भेद हैं ? 
    संन्यास मरण के तीन भेद हैं

    1. भक्त प्रत्याख्यान - आहार का त्याग करके इसमें वैयावृत्ति स्वयं भी करता है एवं दूसरों से भी कराता है। 
    2. इंगिनीमरण - इसमें वैयावृत्ति स्वयं करता है, दूसरों से नहीं कराता है।
    3. प्रायोपगमन - इसमें वैयावृत्ति न स्वयं करते हैं, न दूसरों से करवाते हैं। जिस आसन में बैठता है,उसी आसन से शरीर को छोड़ देता है। (गोक, 60-61) 

    नोट - इंगिनीमरण, प्रायोपगमन हीन संहनन वालों के नहीं होता है। अत: इस पञ्चम काल में मात्र भक्त प्रत्याख्यान संन्यास मरण ही होता है।

     

    7. पाँच प्रकार के मरण कौन-कौन से होते हैं ? 
    बाल - बाल मरण, बाल मरण, बाल-पण्डित मरण, पण्डित मरण, पण्डित-पण्डित मरण ।

    1. मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि के मरण को बाल-बाल मरण कहते हैं। 
    2. अविरत सम्यग्दृष्टि के मरण को बाल मरण कहते हैं।
    3. देशव्रती श्रावक के मरण को बाल - पण्डित मरण कहते हैं।
    4. मुनि (6 वें गुणस्थान से 11वें गुणस्थान तक) के मरण को पण्डित मरण कहते हैं। 
    5. अयोगकेवली भगवान् के मरण को पण्डित-पण्डित मरण कहते हैं। 

     

    8. बारह वर्ष की सल्लेखना का क्रम बताइए ? 
    निमित्तज्ञान के ज्ञाता, आयु का निर्धारण करके बारह वर्ष की सल्लेखना देते हैं। चार वर्ष तक कायक्लेश तप करता है। चार वर्ष तक दूध आदि रसों का त्याग करता है। दो वर्ष तक आचाम्ल (चावल एवं इमली का पानी ) और निर्विकृति (छाछ) लेता है। एक वर्ष तक आचाम्ल। छ: माह तक मध्यम तप करता है। छ: माह तक उत्कृष्ट तप करता है। (भ.आ, 254–256) 

     

    9. सल्लेखना एवं आत्महत्या में क्या अन्तर है ? 
    आत्महत्या कषायों से प्रेरित होकर की जाती है तो सल्लेखना का मूल आधार समता है। आत्मघाती को आत्मा की अविनश्वरता का भान नहीं होता है। वह तो शरीर के नष्ट हो जाने को ही जीवन मुक्ति समझता है। जबकि सल्लेखना का प्रमुख आधार आत्मा की अमरता को समझकर अपनी परलोक यात्रा को सुधारना है। सूर्योदय की लाली सल्लेखना के समान है जो हमें प्रकाश की ओर ले जाती है एवं सूर्यास्त की लाली आत्मघात के समान है जो हमें अंधकार की ओर ले जाती है। 

     

    10. सल्लेखना के अतिचार कौन-कौन से हैं ? 
    आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थसूत्र में सल्लेखना के पाँच अतिचार कहे हैं

    जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्ध निदानानि ॥ 7/37॥ 

    अर्थ - जीवितआशंसा, मरणआशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबंध और निदान । 

    1. जीवितआशंसा - समाधि लेने के बाद अधिक जीने की इच्छा करना । कई बार ऐसा होता है कि असाध्य रोग था, सल्लेखना में आहार की मात्रा घटने से रोग थोड़ा-थोड़ा ठीक होने लगता है, तब लगता है, समाधि क्यों ले ली अभी तो और भी जी सकते हैं। 
    2. मरणआशंसा - सल्लेखना के समय विशेष वेदना होती है, तब जल्दी-जल्दी मरण हो जाए ऐसी इच्छा करना। 
    3. मित्रानुराग - अपना बचपना याद करना। जैसे-मेरे ऐसे मित्र थे, जिनके साथ में क्रिकेट, व्हॉलीबाल,हॉकी, वीडियो गेम, बैडमिंटन और टेबिल टेनिस आदि खेला करता था। 
    4. सुखानुबंध - पूर्व में अनुभव किए हुए स्त्री, पुत्र, वैभव, नेता और अभिनेता जनित विविध सुखों का पुन:-पुन: स्मरण करना सुखानुबंध है।
    5. निदान - इस तप का फल मुझे आगामी भव में भोग आदि मिले ऐसी आकांक्षा रखना। (स सि,7/27/24) 

     

    11. सल्लेखना का फल क्या है ? 
    अतिचार से रहित सल्लेखना करने वाला नियम से स्वर्ग जाता है, वहाँ के सुखों को भोगकर मनुष्य होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। जिसने एक बार सल्लेखना धारण कर मरण किया है, वह अधिक -से-अधिक 7-8 भव में एवं जघन्य से 2-3 भव में नियम से मोक्ष चला जाता है। (र.क.श्रा, 130) 

     

    12. कितनी गति के जीव सल्लेखना ले सकते हैं ? 
    दो गति के जीव सल्लेखना ले सकते हैं-मनुष्य एवं तिर्यज्चगति। सिंह, सर्प, गज आदि भी सल्लेखना लेकर स्वर्ग सम्पदा को प्राप्त करते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण आगम में भी मिलते हैं। 

     

    13. एक मुनि की सल्लेखना कितने मुनि कराते हैं ?
    एक मुनि की सल्लेखना को 48 मुनि कराते हैं
    4 मुनि क्षपक के हाथ-पैर दबाना, सुलाना, बैठाना, खड़ा करना आदि कार्य करते हैं। 
    4 मुनि विकथाओं का त्याग कराकर धर्मोपदेश देते हैं।
    4 मुनि क्षपक के योग्य श्रावकों के यहाँ से आहार लेकर आते हैं। 
    4 मुनि क्षपक के योग्य श्रावकों के यहाँ से पीने योग्य पेय लेकर आते हैं। 
    4 मुनि उस आहार की रक्षा करते हैं। 
    4 मुनि क्षपक को मल-मूत्र कराने तथा उसकी वसतिका संस्तर उपकरणों को शोधने का कार्य करते हैं। 
    4 मुनि वसतिका के द्वार का रक्षण करते हैं, जिससे वहाँ असंयमी प्रवेश न कर सकें।
    4 मुनि क्षपक के पास रात्रि में जागरण करते हैं। 
    4 मुनि उस नगर की शुभाशुभ वार्ता का निरीक्षण करते हैं। 
    4 मुनि धर्मोपदेश देने के मण्डप के द्वार की रक्षा करते हैं। 
    4 मुनि श्रोताओं को सभामण्डप में आक्षेपणी आदि कथाओं का तथा स्व-पर मत का सावधानी पूर्वक उपदेश देते हैं। 
    4 मुनि जो वादी मुनियों की रक्षार्थ सभा में इधर-उधर घूमते रहते हैं। (भ.आ. 648–669) 
    नोट - अधिकतम 48 मुनि और कम-से-कम 2 मुनि भी सल्लेखना करा सकते हैं।

     

    14. आचार्य एवं उपाध्याय परमेष्ठी सल्लेखना लेने के पूर्व सर्वप्रथम क्या करते हैं ?
    आचार्य एवं उपाध्याय पद का त्याग करते हैं, क्योंकि साधुपद से ही मुक्ति होती है। आचार्य एवं उपाध्याय विशेष पद हैं, संघ की व्यवस्था के लिए आवश्यक हैं। कषाय कृश करने का अर्थ यह भी है कि इन पदों का त्याग करे और संघ को छोड़कर अन्यत्र समाधि के लिए जाए, क्योंकि शिष्यों को राग तो रहेगा ही, अत: समाधि में बाधा आ सकती है या संग को वहाँ से अन्यत्र विहार करा दें जैसा कि आचार्य श्री धरसेनजी ने किया था। आगम के निर्माता तीर्थंकर भी आगम की आज्ञा का पालन करते हैं। अर्थात् वे भी योग निरोध के लिए समवसरण का त्याग कर देते हैं। उसी प्रकार आचार्य एवं उपाध्याय भी पद एवं संघ का त्याग कर देते हैं। आचार्य श्री विद्यासागरजी के गुरुआचार्य श्री ज्ञानसागरजी ने भी सल्लेखना के पूर्व आचार्य पद का त्याग कर अपने ही शिष्य को अपना आचार्य पद देकर उन्हें अपना गुरु(आचार्य) माना और उन्हें ही निर्यापक आचार्य बनाकर समाधिमरण किया। यह इतिहास की विशेष घटना थी।

     

    15. जो आचार्य समाधि कराते हैं, उन्हें क्या बोलते हैं ?
    समाधि कराने वाले आचार्य को निर्यापक आचार्य कहते हैं।

    Edited by admin

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