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  • अध्याय 38 - श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएँ

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    जिस प्रकार विद्यार्थी एक-एक कक्षा पास करके आगे बढ़ता जाता है। उसी प्रकार श्रावक भी क्रमश: प्रतिमाओं का पालन करके आगे बढ़ता जाता है। इस अध्याय में श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं का वर्णन है |

     

    1. श्रावक किसे कहते हैं ?
     श्रद्धावान, विवेकवान एवं क्रियावान को श्रावक कहते हैं।

     

    2. श्रावक के कितने भेद हैं ?
     श्रावक के तीन भेद हैं - पाक्षिक श्रावक, नैष्ठिक श्रावक एवं साधक श्रावक। 

    1. पाक्षिक श्रावक - जो श्रावक के षट् आवश्यक का पालन करता हो, स्थूल रूप से अष्ट मूलगुणधारी हो और सप्तव्यसन का त्यागी हो। ऐसा जिनेन्द्र भगवान् का पक्ष लेने वाला पाक्षिक श्रावक कहलाता है। यह रात्रिभोजन का त्यागी होता है।
    2. नैष्ठिक श्रावक - दर्शन प्रतिमा आदि ग्यारह प्रतिमाओं वाला श्रावक नैष्ठिक श्रावक कहलाता है। 
    3. साधक श्रावक - (अ) जो समाधिमरण की साधना में लगा है, वह साधक श्रावक कहलाता है। (ब) जो श्रावक आनन्दित होता हुआ जीवन के अंत में अर्थात् मृत्यु के समय शरीर, भोजन और मन, वचन, काय के व्यापार के त्याग से पवित्र ध्यान के द्वारा आत्मा की शुद्धि के लिए साधना करता है, वह साधक श्रावक है। (सा.ध, 1/20) 

     

    3. नैष्ठिक श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं के नाम क्या है ?
    उद्विष्ट त्याग प्रतिमा। (रक.श्रा., 136)

     

    4. प्रतिमा किसे कहते हैं ?
    श्रावक के विकासशील चारित्र का नाम प्रतिमा है।

     

    5. दर्शन प्रतिमा किसे कहते हैं ?
    जो सम्यक् दर्शन से शुद्ध है, संसार, शरीर और भोगों से उदास है, पञ्च परमेठियों के चरणों की शरण जिसे प्राप्त हुई है तथा धारण किए हुए अष्ट मूलगुण एवं सप्त व्यसन के त्याग में अतिचार नहीं लगाता है। उसके दर्शन प्रतिमा होती है। यह शल्यों से रहित होता है। मर्यादा का भोजन नियम से प्रारम्भ हो जाता है। प्रतिमाधारी श्रावक सूर्य अस्त के दो घड़ी पहले भोजन कर लेता है एवं सूर्योदय के दो घड़ी बाद से भोजन प्रारम्भ कर सकता है। 

     

    6. शल्य किसे कहते हैं एवं कितनी होती हैं ?
    जो आत्मा में काँटे की तरह चुभती हैं, दु:ख देती हैं, उसे शल्य कहते हैं। शल्य तीन होती हैं - मिथ्या शल्य, माया शल्य और निदान शल्य । (स.सि. 7/18/697)

    1. मिथ्या शल्य - अतत्वों का श्रद्धान मिथ्या शल्य है। 
    2. माया शल्य - मेरे अपध्यान को कोई नहीं जानता, इस अभिप्राय से बाह्य वेश का आचरण करके लोगों को आकर्षित करते हुए चित्त की मलिनता रखने को माया शल्य कहते हैं।
    3. निदान शल्य - व्रतों के फलस्वरूप आगामी विषय भोगों की आकांक्षा रखना, निदान शल्य है। 

     

    7. व्रत प्रतिमा किसे कहते हैं ?
     निरतिचार पूर्वक पाँच अणुव्रतों और सात शीलों का पालन करता है, वह व्रत प्रतिमाधारी श्रावक कहलाता है।

     

    8. अणुव्रत एवं शीलव्रत किसे कहते हैं ?
    हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन 5 पापों का स्थूल रूप से त्याग करने को अणुव्रत कहते हैं तथा 3 गुणव्रत एवं 4 शिक्षाव्रत का पालन करना शीलव्रत है। 

     

    9. 5 अणुव्रत और 7 शीलव्रत के नाम बताइए ? 
    अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह परिमाण व्रत तथा 7 शील अर्थात् 3 गुणव्रत और 4 शिक्षाव्रत। 

     

    10. अहिंसाणुव्रत किसे कहते हैं ?
    जो मन, वचन व काय से संकल्प पूर्वक त्रस जीवों का घात न स्वयं करता है, न दूसरों से कराता है और न करने वाले की अनुमोदना करता है तथा निष्प्रयोजन पञ्चस्थावरों की हिंसा नहीं करता है, उसका अहिंसाणुव्रत कहलाता है। (र.क.श्रा, 53)

     

    11. अतिचार एवं अनाचार किसे कहते हैं ? 
    व्रतों का एक देश भंग हो जाना, अतिचार है और व्रतों का सर्वथा भंग हो जाना, अनाचार है। 

     

    12. अहिंसाणुव्रत के कितने अतिचार हैं ? 
    अहिंसाणुव्रत 5 अतिचार हैं 

    1. बंध - मानव, पशु, पक्षियों को ऐसा बाँधना जिससे वह इच्छानुसार विचरण न कर सकें। 
    2. वध - हन्टर, चाबुक, छड़ी, हाथ-पैर आदि से पीटना। यहाँ वध से आशय प्राणों के वियोग से नहीं है, वह तो अनाचार है। 
    3. छेद - कषाय वश किसी के अंग-उपान्ड़ो का छेदन करना। श्रृंगार के लिए बालिकाओं के नाक कान भी छेदे जाते हैं, वह इसमें नहीं आते हैं। 
    4. अतिभारारोपण - पशुओं पर शक्ति से ज्यादा भार लादना। नौकरों से ज्यादा काम लेना। 
    5. अन्नपान निरोध - समय पर पशुओं को भोजन नहीं देना। नौकरों को भी समय से भोजन के लिए नहीं जाने देना (ससि, 7/25/711) एवं महिलाएँ समय से भोजन नहीं बनाती तो यह भी अन्नपान निरोध है।

     

    13. सत्याणुव्रत किसे कहते हैं ?
     स्थूल झूठ स्वयं नहीं बोलता और न दूसरों से बुलवाता है तथा ऐसा सत्य भी नहीं बोलता, जिससे कोई विपत्ति में आ जाएँ, उसे सत्याणुव्रत कहते हैं। (र.क.श्रा, 55)

     

    14. स्थूल झूठ किसे कहते हैं ?
    जिसे लोक व्यवहार में अच्छा नहीं माना जाता है। जैसे

    1. शपथ लेकर अन्यथा कथन करना।
    2. पञ्च या जज के पद पर प्रतिष्ठित होकर झूठ बोलना। जैसे-राजा वसु ने किया था।
    3. धर्मोपदेष्टा बनकर अन्यथा उपदेश देना। जैसे-पञ्चमकाल में मुनि नहीं होते और आज एक भी प्रतिमा का पालन नहीं हो सकता।
    4. विश्वास देकर झूठ बोलना। जैसे—सत्यघोष ने किया था।

     

    15. सत्याणुव्रत के कितने अतिचार हैं ?
    सत्याणुव्रत के पाँच अतिचार हैं

    1. मिथ्या उपदेश - झूठा उपदेश देना।
    2. रहोभ्याख्यान - स्त्री-पुरुष द्वारा एकान्त में किए गए आचरण विशेष का प्रकट कर देना।
    3. कूटलेख क्रिया - नकली दस्तावेज रखना। कोरे कागज पर साइन करवाना। झूठे लेख लिखना।
    4. न्यासापहार - किसी की धरोहर का अपहरण करना।
    5. साकार मंत्रभेद - कोई आपस में चर्चा कर रहे थे, उनकी मुख की आकृति से जानकर, यह क्या बात कर रहे थे, कह देना जिससे उनकी बदनामी हो इसे चुगली भी कह सकते हैं। (स सि,7/26/712)

     

    16.अचौर्याणुव्रत किसे कहते हैं ?
    सार्वजनिक जल एवं मिट्टी के अलावा दूसरों की रखी हुई, गिरी हुई, भूली हुई अथवा नहीं दी हुई वस्तु को न तो स्वयं ग्रहण करता है। न दूसरों को देता है, वह अचौर्याणुव्रत कहलाता है।

     

    17. अचौर्याणुव्रत के कितने अतिचार हैं ?
    अचौर्याणुव्रत के पाँच अतिचार हैं

    1. स्तेनप्रयोग - चोरी के लिए प्रेरित करना तथा चोरी का तरीका बताना।
    2. तदाहृतादान - चोरी का माल खरीदना।
    3. विरुद्ध राज्यातिक्रम - राज्य नियम के विरुद्ध टैक्स चोरी करना, अधिक स्टॉक रखकर काला बाजारी करना आदि।
    4. हीनाधिक मानोन्मान - तौलने के बाँट को मान कहते हैं, तराजू को उन्मान कहते हैं। बाँट तराजू दो प्रकार के रखना। कम से देना, अधिक से लेना।
    5. प्रतिरूपक व्यवहार - एक-सी दिखने वाली सस्ती वस्तु को मिलाकर महंगे भाव में बेचना। जैसेखसखस में सूजी, कालीमिर्च में पपीते के बीज, हल्दी में ज्वार का आटा। आज शास्त्रों में भी मिलावट आ गई है, ऊपर आचार्यों के नाम ज्यों-के-त्यों रहते हैं और हिन्दी टीका, भावार्थ एवं विशेषार्थों में अपने अर्थों को समाहित कर दिया जाता है।

     

    18. ब्रह्मचर्याणुव्रत किसे कहते हैं ?
    जिससे विवाह हुआ उस स्त्री के अलावा वह अन्य स्त्रियों को माता, बहिन एवं बेटी के समान समझता है अर्थात् सबसे विरत रहता है, उसके इस व्रत को स्वदार संतोष या ब्रह्मचर्याणुव्रत कहते हैं। अथवा जो पाप के भय से दूसरे की स्त्री को नहीं चाहता और न दूसरों को ऐसा करने के लिए कहता है। अपनी स्त्री में ही संतुष्ट रहता है, उसे स्वदार संतोष व्रत या ब्रह्मचर्याणुव्रत कहते हैं। (र.क.श्रा, 59) 

     

    19. ब्रह्मचर्याणुव्रत के कितने अतिचार हैं ?
     ब्रह्मचर्याणुव्रत के पाँच अतिचार हैं

    1. परविवाहकरण - अपनी या अपने आश्रित भाई आदि की संतान को छोड़कर अन्य लोगों की संतानों का विवाह प्रमुख बनकर करना। दलाली करना, कुण्डली मिलवाना आदि। 
    2. इत्वरिकाअपरिगृहीतगमन - पति रहित व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास आना-जाना, लेन-देन रखना। 
    3. इत्वरिकापरिगृहीतगमन - पति सहित व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास आना-जाना, लेन-देन रखना।
    4. अनंगक्रीड़ा - कामसेवन के निश्चित अंगो को छोड़कर अन्य अंगो से काम सेवन करना।
    5. कामतीव्राभिनिवेश - हमेशा काम की तीव्र लालसा रखना। (स.सि. 7/28/714)

     

    20. परिग्रह परिमाणव्रत किसे कहते हैं ? 
    धन, धान्य आदि दस प्रकार के बाह्य परिग्रह का प्रमाण करके उससे अधिक में इच्छा रहित होना, परिग्रह परिमाणव्रत है। इसका दूसरा नाम इच्छा परिमाणव्रत भी है। 

     

    21.परिग्रह परिमाणव्रत के कितने अतिचार हैं ? 
    दस प्रकार के परिग्रह के प्रमाण का उल्लंघन करना। क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रम, हिरण्यसुवर्णप्रमाणातिक्रम, धनधान्य प्रमाणातिक्रम, दासीदास प्रमाणातिक्रम और कुप्यभाण्ड प्रमाणातिक्रम। 

     

    22. पाँच अणुव्रतों के धारण करने का फल क्या है ?
     कर्मों की निर्जरा होती है एवं वह नियम से देवगति में ही जाता है, वहाँ के वैभव को प्राप्त करता है। 

     

    23. पाँच अणुव्रतों में कौन-कौन प्रसिद्ध हुए हैं ?
     क्रमशः यमपाल चाण्डाल, धनदेव सेठ, वारिषेण राजकुमार, नीली और जयकुमार राजा।। (रक.श्रा., 64) 

     

    24. गुणव्रत किसे कहते हैं एवं कितने होते हैं ?
     जिससे अणुव्रतों में वृद्धि हो वह गुणव्रत हैं। जैसे-खेती की रक्षा के लिए जो बाड़ का स्थान है, वही पाँच अणुव्रतों की रक्षा के लिए गुणव्रत का स्थान है। गुणव्रत तीन होते हैं। दिग्विरति व्रत, देशविरति व्रत और अनर्थदण्डविरति व्रत। (तसू, 7/21) 

     

    25. दिग्विरति व्रत किसे कहते हैं एवं उसके कितने अतिचार हैं ?
    सूक्ष्म पापों से बचने के लिए मरणपर्यन्त दसों दिशाओं में सीमा कर लेना और उससे आगे न जाना दिग्विरति व्रत है। जैसे-पूर्व में कलकत्ता, दक्षिण में मद्रास, पश्चिम में मुम्बई और उत्तर में काश्मीर। इसके पाँच अतिचार हैं।

    1. ऊध्र्वव्यतिक्रम - अज्ञान, प्रमाद अथवा लोभ के वश ऊपर की सीमा का उल्लंगन करना। 
    2. अधोव्यतिक्रम - अज्ञान, प्रमाद अथवा लोभ के वश नीचे की सीमा का उल्लंगन करना।
    3. तिर्यग्व्यतिक्रम - अज्ञान, प्रमाद अथवा लोभ के वश तिर्यग्सीमा का उल्लंगन करना।
    4. क्षेत्रवृद्धि - लोभ के कारण सीमा की वृद्धि करने का अभिप्राय रखना। 
    5. विस्मरण - निर्धारित सीमा को भूल जाना। (स.सि.,7/30/717)

     

    26. देश विरति व्रत किसे कहते हैं एवं इसके कितने अतिचार हैं ? 
    जीवन पर्यन्त के लिए किए हुए दिग्व्रत में और भी संकोच करके घड़ी, घंटा, दिन, महीना आदि तक किसी मुहल्ले, चौराहे आदि तक सीमा रखना, यह देश विरति व्रत कहलाता है। (र.क.श्रा, 68) इसके पाँच अतिचार होते हैं - 

    1. आनयन - सीमा से बाहर की वस्तु को किसी से मंगवाना।
    2. प्रेष्यप्रयोग - सीमा से बाहर क्षेत्र में किसी को भेजकर काम कराना। 
    3. शब्दानुपात - सीमा के बाहर क्षेत्र में किसी को खाँसी, चुटकी, ताली, फोन, फैक्स आदि से इशारा करके बुलाना। 
    4. रूपानुपात - सीमा के बाहर अपना रूप, शरीर, हाथ, वस्त्र आदि दिखाकर इशारा करना। 
    5. पुद्गलक्षेप - सीमा के बाहर कंकड़, पत्थर आदि फेंककर बुलाना।। (स सि, 7/31/718)

     

    27. अनर्थदण्डविरति व्रत किसे कहते हैं एवं इसके कितने अतिचार हैं ?
     जिससे अपना कुछ प्रयोजन तो सिद्ध न हो और व्यर्थ ही पाप का संचय होता है ऐसे कार्यों को अनर्थदण्ड कहते हैं और उनके त्याग को अनर्थदण्डविरति व्रत कहते हैं। इसके पाँच अतिचार हैं

    1. कन्दर्प - राग की अधिकता होने से हास्य के साथ अशिष्ट वचन बोलना। 
    2. कौत्कुच्य - हास्य और अशिष्ट वचन के साथ शरीर से भी कुचेष्टा करना। 
    3. मौखर्य - धृष्टता पूर्वक बहुत बकवास करना। 
    4. असमीक्ष्याधिकरण - बिना विचारे अधिक कार्य करना। 
    5. उपभोग - परिभोग अनर्थक्य - अधिक उपभोग - परिभोग सामग्री का संग्रह करना। (ससि.7/32/719)

     

    28. अनर्थदण्ड के कितने भेद हैं ?
     अनर्थदण्ड के 5 भेद हैं

    1. पापोपदेश - खोटे व्यापार आदि पाप क्रियाओं का उपदेश देना। जैसे-मछली की खेती करो, बूचड़खाने खोलो आदि। ऐसी चर्चा करना कि अमुक जंगल में हिरण बहुत अच्छे थे, कसाई ने सुन लिया तो क्या हुआ वह वहाँ गया और सारे हिरणों का वध कर दिया। 
    2. हिंसादान - हिंसक उपकरणों का देना, व्यापार करना। जैसे-बम, पिस्तौल, फरसा, पटाखा, जे.सी.बी. मिट्टी खोदने की मशीन, क्रेशर, ब्लास्टिग के उपकरणों को लेना-देना एवं हिंसक पशुओं का पालन करना। जैसे-बिल्ली, कुत्ता, मुर्गा, सर्प आदि। 
    3. अपध्यान - पर के दोषों को ग्रहण करना, पर की लक्ष्मी को चाहना, पर की स्त्री को चाहना आदि। द्वेष के कारण वह मर जाए, उसकी दुकान नष्ट हो जाए, उसकी खेती जल जाए, वह चुनाव में हार जाए, उसके यहाँ डाका पड़ जाए आदि। 
    4. प्रमादचर्या - बिना प्रयोजन के जमीन खोदना, जल फेंकना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति तोड़ना, घूमना, घुमाना आदि।
    5. दुःश्रुति - चित्त को कलुषित करने वाला अश्लील साहित्य पढ्ना, सुनना, गीत सुनना, नाटक,टेलीविजन एवं सिनेमा आदि देखना दु:श्रुति नामक अनर्थदण्ड है।

     

    29. शिक्षाव्रत किसे कहते हैं एवं कितने होते हैं ? 
    जिससे मुनि, आर्यिका बनने की शिक्षा मिले, वह शिक्षाव्रत है। शिक्षाव्रत चार होते हैं - सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग-परिभोग परिमाण एवं अतिथि संविभाग। 

     

    30. सामायिक शिक्षाव्रत किसे कहते हैं एवं इसके कितने अतिचार होते हैं ? 
    समता भाव धारण करना सामायिक है। मुनि हमेशा समता धारण करते हैं। किन्तु श्रावक हमेशा समता धारण नहीं रख सकता,अतः वह श्रावक स्वयं समय की सीमा रखकर निश्चित समय तक मन-वचनकाय एवं कृत-कारित-अनुमोदना से पाँचों पापों का त्याग करके परमात्म स्वरूप चिन्तन करना सामायिक है, इस व्रत का धारी, दिन में दो बार अथवा तीन बार सामायिक करता है। इसके पाँच अतिचार हैं

    1. मन:दुष्प्रणिधान - सामायिक करते हुए मन में अशुभ संकल्प-विकल्प करना।
    2. वचन दुष्प्रणिधान - मन्त्र, सामायिक आदि पाठ का अशुद्ध उच्चारण करना, जल्दी-जल्दी पढ़ना अादि । 
    3. काय दुष्प्रणिधान - सामायिक में हाथ-पैर हिलाना, यहाँ-वहाँ देखना आदि। 
    4. अनादर - उत्साह रहित हो, मात्र नियम की पूर्ति करना। 
    5. स्मृत्यनुपस्थान - सामायिक का काल ही भूल जाना एवं सामायिक पाठ पढ़ते-पढ़ते भक्तामर का पाठ पढ़ने लगना।। (स.सि., 7/33/720) 

     

    31. प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत किसे कहते हैं एवं इसके कितने अतिचार हैं ?

    प्रोषध का अर्थ पर्व के दिन से है। पर्व के दिन उपवास करना, प्रोषधोपवास कहलाता है। उपवास के दिन समस्त आरम्भ का त्याग कर वन में या मंदिर में रहकर धम्र्यध्यान करना चाहिए। उस दिन मंजन, स्नान भी नहीं करना चाहिए। शिक्षा ले रहे हैं तो पूरी शिक्षा लें। मुनि मंजन, स्नान नहीं करते तो श्रावक भी उपवास के दिन न करे। (र.क.श्रा,106-109) यह शिक्षाव्रत तीन प्रकार का होता है।

    उत्कृष्ट

    सप्तमी एकाशन

    अष्टमी उपवास

    नवमी एकाशन

    त्रयोदशी एकाशन

    चतुर्दशी उपवास

    अमा./पूर्णमासी एकाशन

    मध्यम

    सप्तमी दो बार भोजन

    अष्टमी उपवास

    नवमी दो बार भोजन

    त्रयोदशी दो बार भोजन

    चतुर्दशी उपवास

    अमा./पूर्णमासी दो बार भोजन

    जघन्य

    सप्तमी दो बार भोजन

    अष्टमी एकाशन

    नवमी दो बार भोजन

    त्रयोदशी दो बार भोजन

    चतुर्दशी एकाशन

    अमा./पूर्णमासी दो बार भोजन

     

     

     

     

     

     

     

     

    नोट - उपवास में चारों प्रकार के (खाद्य, पेय, लेह्य और स्वाद्य)आहार का त्याग होता है। इसके पाँच अतिचार हैं - 

    1. अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित उत्सर्ग - बिना देखी और बिना शोधी हुई जमीन में मल-मूत्र आदि करना। 
    2. अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित आदान - बिना देखे-बिना शोधे उपकरण आदि ग्रहण करना।
    3. अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित संस्तरोपक्रमण - बिना देखी बिना शोधी भूमि पर संस्तर आदि बिछाना। 
    4. अनादर - उपवास के कारण भूख-प्यास से पीड़ित होने से आवश्यक क्रियाओं में उत्साह न होना।
    5. स्मृत्यनुपस्थान - आवश्यक क्रियाओं को ही भूल जाना।। (स.सि., 7/24/721)

     

    32. उपभोग-परिभोग परिमाण किसे कहते हैं एवं इससे मुनि बनने के लिए क्या शिक्षा मिलती है ? 
    परिग्रह परिमाण व्रत में आजीवन के लिए नियम किया था। उन वस्तुओं से राग घटाने के लिए प्रतिदिन उस नियम के ही अंतर्गत यह नियम करना, मैं आज इतनी वस्तुओं का उपभोग एवं परिभोग करूंगा। 
    उपभोग - जो वस्तु एक बार भोगने में आती है। जैसे-भोजन, पानी आदि। 
    परिभोग - जो वस्तु बार-बार भोगने में आती है। जैसे-वस्त्र, आभूषण, वाहन, यान आदि। (स सि,7/21/03) 
    इससे यह शिक्षा मिलती है कि जब मुनि बनेंगे तो मौसम के अनुकूल, स्वास्थ्य के अनुकूल आहार, पानी नहीं मिलता हो तो पहले से ही अभ्यास रहना चाहिए। 

     

    33. क्या भक्ष्य-अभक्ष्य दोनों का नियम किया जाता है ?
    भक्ष्य का नियम किया जाता है। अभक्ष्य का तो वह त्यागी ही होता है। 

     

    34. अभक्ष्य कितने प्रकार के होते हैं ? 
    अभक्ष्य 5 प्रकार के होते हैं। इसका वर्णन अभक्ष्य पदार्थ अध्याय में किया गया है। 

     

    35. उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत के कितने अतिचार हैं ? 
    उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत के 5 अतिचार होते हैं

    1. सचित आहार - सचेतन हरे फल, फूल, पत्र आदि का सेवन करना। 
    2. सचित्त सम्बन्ध आहार - सचित पदार्थों से सम्बन्धित आहार का सेवन करना। 
    3. सचित्त सम्मिश्र आहार - सचित पदार्थ से मिले हुए पदार्थ आदि का सेवन करना। 
    4. अभिषव आहार - इन्द्रियों को मद उत्पन्न करने वाले गरिष्ठ पदार्थों आदि का सेवन करना। 
    5. दु:पक्वाहार - अधपके, अधिक पके एवं जले हुए पदार्थों आदि का सेवन करना।। (ससि,7/25/722) 

     

    36. अतिथि संविभाग व्रत किसे कहते हैं एवं इसके कितने अतिचार हैं ? 
    संयम की विराधना न करते हुए जो गमन करता है, उसे अतिथि कहते हैं या जिसके आने की कोई तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं। ऐसे साधुओं को आहार, औषधि, उपकरण एवं वसतिका देना यह अतिथि संविभाग व्रत कहलाता है। इसके पाँच अतिचार हैं

    1. सचित निक्षेप - सचित कमल के पते आदि पर रखा आहार देना। 
    2. सचित अपिधान - सचित पते आदि से ढका आहार देना। 
    3. पर व्यपदेश - स्वयं न देकर दूसरों से दिलवाना अथवा दूसरे की वस्तु का दान देना।
    4. मात्सर्य - दूसरे दाताओं से ईष्य रखना।
    5. कालातिक्रम - आहार के काल का उल्लंघन कर देना। (स.सि.,7/36/723)

     

    37. सामायिक प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    अपने स्वरूप का, जिनबिम्ब का, पञ्चपरमेष्ठी के वाचक अक्षरों का अथवा बारह भावनाओं का चिन्तन करते हुए ध्यान करता है, उसके सामायिक प्रतिमा होती है।

     

    38. सामायिक करने की क्या विधि है ? 
    सर्वप्रथम पूर्व दिशा में खड़े होकर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़कर फिर दोनों हाथ जोड़कर बाएँ से दाएँ की ओर तीन बार घुमाना (प्रदक्षिणा रूप)आवर्त कहलाता है। इसे चारों दिशाओं में क्रमश: (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में ) किया जाता है। आवर्त करने के बाद खडे-खडे ही नमस्कार करना प्रणाम है, यह भी चारों दिशाओं में किया जाता है। पूर्व दिशा में आवर्त, प्रणाम के बाद बैठकर नमस्कार (गवासन से) करना निषद्य है। यह पूर्व एवं उत्तर दिशा में किया जाता है। आवर्त करते समय यह बोलना चाहिए कि पूर्व दिशा और इसकी विदिशा में जितने केवली, जिन, सिद्ध, साधु एवं ऋद्धिधारी मुनि हैं, उन सबको मेरा मन से, वचन से और काय से नमस्कार हो।
    दक्षिण आदि दिशा में आवर्त करते समय उस दिशा और उसकी विदिशा में बोलना चाहिए। ऐसा चारों दिशाओं में करने के बाद उत्तर मुख या पूर्व मुख बैठकर सामायिक प्रारम्भ करें। इसी प्रकार सामायिक का समापन भी करना चाहिए।

     

    39. सामायिक के लिए आसन, स्थान कैसा हो ? 
    सामायिक के लिए दो आसन बताए हैं, पद्मासन एवं खड्गासन। स्थान एकान्त हो, एकान्त के अनेक अर्थ हैं, जहाँ कोई भी न हो। दूसरा अर्थ जहाँस्त्री, पशु, नपुंसक न हों और जहाँ कोलाहल, डाँस, मच्छर, बिच्छू आदि न हों। सामायिक के लिए वन, नदी का तट अच्छा माना गया है। वह न हो तो घर, मंदिर आदि में भी कर सकते हैं।

     

    40. सामायिक में क्या करें ? 
    शत्रु-मित्र, लाभ-अलाभ, जीवन-मरण में समता रखने का नाम सामायिक है। श्रावक भी सामायिक के समय समता रखें । उपसर्ग होते हैं, सर्दी-गर्मी लगती है, उसे समता से सहन करें। सामायिक में संसार, शरीर, भोग के बारे में चिन्तन करें, बारह भावनाओं का चिन्तन करें, पञ्च नमस्कार मंत्र का जाप करें। जाप करते-करते मन भटकता है तो दूसरे क्रम में जाप करें। उल्टे क्रम से भी कर सकते हैं। जैसे-णमो लोए सव्वसाहूर्ण। मध्य में से भी कर सकते हैं जैसे- णमो आइरियाण। जहाँ की आपने तीर्थयात्रा की है, उसका चिन्तन करें आदि। एक, दो, तीन क्या होते हैं। जैसे-एक आत्मा, दो जीव, तीन रत्नत्रय आदि करके जहाँ तक बने चिंतन करते जाएं।

     

    41. सामायिक कैसे करें ?
    कैसे से आशय हमारी सामायिक निरवद्य हो। अवद्य का अर्थ पाप होता है। निर् उपसर्ग रहित के अर्थ में है। अर्थात् पाप से रहित सामायिक हो। सामायिक करते समय पंखा, टी.व्ही., कूलर, हीटर, सिगड़ी चालू करके न बैठे एवं टेपरिकार्ड भी न चलाएं। 

     

    42. सामायिक का काल (समय) क्या है तथा कितनी बार करनी चाहिए ? 
    सूर्योदय के तीन घडी (1:12 मिनट) पहले से तीन घडी बाद तक । मध्याहू में भी तीन घडी पूर्व से तीन घडी पश्चात्तक इसी प्रकार सन्ध्या में भी सूर्यास्त से तीन घडी पूर्व से तीन घडी पश्चात्तक सामायिक का उत्कृष्ट काल है। मध्यम काल 2-2 घड़ी और जघन्यकाल 1-1 घड़ी है। इस प्रतिमाधारी को तीनों कालों में सामायिक करना आवश्यक होता है। 

     

    43. सामायिक का मध्याह्न काल कैसे निकालते हैं ? 
    जैसे-सूर्योदय 6 बजे एवं सूर्यास्त 6 बजे होता है, तब सामायिक का मध्याह्न काल उत्कृष्ट होगा 10:48 से 1:12 तक। जघन्य निकालना है तो 11:36 से 12:24 तक 48 मिनट । 

     

    44. सामायिक शिक्षाव्रत एवं सामयिक प्रतिमा में क्या अंतर है ? 

    1. सामायिक शिक्षाव्रत में वह सामायिक दिन में दो बार भी कर सकता है, किन्तु सामायिक प्रतिमा में सामायिक तीन बार का नियम है। 
    2. सामायिक शिक्षाव्रत में सामायिक अतिचार सहित भी होती है किन्तु सामायिक प्रतिमा में सामायिक अतिचार रहित होती है।
    3. सामायिक शिक्षाव्रत में सामायिक 24 मिनट भी कर सकता है। किन्तु सामायिक प्रतिमा में सामायिक कम-से-कम 48 मिनट तो अवश्य ही करेगा।
    4. सामायिक शिक्षाव्रत में आवर्त आदि का नियम नहीं है। किन्तु सामायिक प्रतिमा में सामायिक में बैठते समय आवर्त आदि का नियम है। 

     

    45. प्रोषधोपवास प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    जो प्रत्येक माह की अष्टमी व चतुर्दशी को अपनी शक्ति न छिपाकर नियम पूर्वक प्रोषधोपवास करता है वह प्रोषधोपवास प्रतिमाधारी श्रावक है। 

     

    46. प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत व प्रोषधोपवास प्रतिमा में क्या अंतर है ?
    व्रत प्रतिमा वाला श्रावक कभी प्रोषधोपवास करता तथा कभी नहीं भी करता है किन्तु प्रोषधोपवास प्रतिमाधारी श्रावक नियम से प्रोषधोपवास करता है। (र.क.श्रा, 140) 

     

    47. सचित त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ?
    चित्त का अर्थ जीव होता है अर्थात् सचित्त त्याग प्रतिमा का धारी वनस्पति आदि को जीव रहित करके ही खाता है। वह श्रावक अब कच्चा जल, कच्ची वनस्पति आदि नहीं खाता है। वह पानी भी प्रासुक करके ही प्रयोग में लेता है एवं वनस्पति भी अग्नि पक्व या यन्त्र से पेलित अर्थात् रस को लेता है। यद्यपि सचित्त को अचित करके खाने में प्राणिसंयम नहीं पलता, किन्तु इन्द्रिय संयम पालने की दृष्टि से सचित त्याग आवश्यक है। यह प्रतिमा भी शिक्षाव्रत के रूप में है, क्योंकि मुनि प्रासुक (अचित) भोजन ही करते हैं। अत: इस श्रावक ने अभी से साधना करना प्रारम्भ कर दी है। (र.क.श्रा, 141) 

     

    48. रात्रि भुक्ति त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    रात्रि भोजन का त्याग तो प्रथम प्रतिमा में ही हो जाता है, किन्तु अब वह श्रावक रात्रि में चारों प्रकार का आहार दूसरों को भी नहीं खिलाता और न ही खाने वालों की अनुमोदना करता है। (का.आ,382) इस प्रतिमा का अपर नाम दिवा मैथुन त्याग भी है, अत: वह दिन में मैथुन भी नहीं करता है।

     

    49. ब्रह्मचर्य प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    मन, वचन, काय एवं कृत, कारित, अनुमोदना से जो श्रावक मैथुन का त्याग करता है, उसे ब्रह्मचर्य प्रतिमाधारी श्रावक कहते हैं। (का.आ, 383) ब्रह्मचर्याणु व्रत में स्व स्त्री से सम्बन्ध रहता है किन्तु ब्रह्मचर्य प्रतिमा में स्व स्त्री से भी विरत हो जाता है।

     

    50. आरम्भ त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    इस प्रतिमा में खेती, व्यापार, नौकरी सम्बन्धी समस्त आरम्भ का त्याग हो जाता है। (र.क.श्रा, 144) किन्तु वह पूजन, अभिषेक एवं भोजन बनाने के आरम्भ का त्यागी नहीं होता है। आरम्भ त्यागी बैंक बैलेंस नहीं रखता है किन्तु वह मकान का किराया एवं पेन्शन ले सकता है। 

     

    51. आरम्भ किसे कहते हैं ? 
    जिस कार्य के करने से षट्काय जीवों की हिंसा होती है, उसे आरम्भ कहते हैं। 

     

    52. परिग्रहत्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    जो पूजन के बर्तन, शौच उपकरण एवं वस्त्रों का परिग्रह रखकर शेष सब परिग्रह को छोड़ देता है उस श्रावक की परिग्रह त्याग प्रतिमा कहलाती है।

     

    53. अनुमति त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ? 
    इस प्रतिमा का धारी श्रावक अब किसी भी सांसारिक कार्य की अनुमति नहीं देता है। (रक श्रा, 146) घर में रहकर घर के कार्यों में अनुमति नहीं देना यही उसकी परीक्षा है, अनुमति त्याग की परीक्षा घर में होती है, जंगल में नहीं। यह प्रतिमा भी शिक्षाव्रत के रूप में है। आगे मुनि होने के बाद सांसारिक कार्य के उपदेश में मौन रहता है। उसी प्रकार वह श्रावक भी अभी से साधना कर रहा है। दस प्रतिमाधारी श्रावक भी घर में रह सकता है।

     

    54. उद्विष्टत्याग प्रतिमा किसे कहते हैं ?
    यह प्रतिमाधारी श्रावक सम्पूर्ण रूप से घर का त्यागकर मुनियों के समूह में जाकर व्रतों को ग्रहण कर तपस्या करता हुआ भिक्षा भोजन करने वाला होता है एवं एक खण्ड वस्त्र धारण करता है। (रक श्रा, 147) इस प्रतिमा के दो भेद हैं- एलक एवं क्षुल्लक। एलक करपात्र में ही आहार करते हैं, केशलोंच करते हैं, किन्तु केशलोंच उपवास के साथ करे यह नियम नहीं है। मात्र वे एक लंगोट (कोपीन) धारण करते हैं। क्षुल्लक लंगोट के साथ एक चादर या दुपट्टा भी रखते हैं वह चादर या दुपट्टा खण्ड होता है, अर्थात् सिर ढके तो पैर न ढके, पैर ढके तो सिर न ढके। वे भोजन पात्र में भी कर सकते हैं एवं कर पात्र में भी कर सकते हैं। केशलोंच करने का नियम नहीं है। वे मुण्डन भी करा सकते हैं। प्राचीन समय में इनकी आहार चर्या ऐसी थी कि सात घरों से अपने पात्र में आहार माँगकर लेते थे एवं कोई श्रावक कह दे कि यहीं बैठकर आहार कर लीजिए तो वहीं पर बैठकर कर लेते थे। नहीं कहा तो वे अपनी वसतिका में भी कर सकते हैं, किन्तु वर्तमान में ऐसी परम्परा नहीं है, वे भी मुनियों के समान आहार चर्या को निकलते हैं।

     

    55. कौन से प्रतिमाधारी श्रावक जघन्य, मध्यम एवं उत्कृष्ट कहलाते हैं ? 
    प्रथम प्रतिमाधारी से छठवीं प्रतिमा तक जघन्य श्रावक, सातवीं से नवमी प्रतिमा तक मध्यम श्रावक तथा दसवीं-ग्यारहवीं प्रतिमा वाला उत्कृष्ट श्रावक कहलाता है। 

     

    56. ग्यारह प्रतिमाधारी स्त्रियों को क्या कहते हैं ? 
    ग्यारह प्रतिमाधारी स्त्रियों को क्षुल्लिका कहते हैं, यह एक सफेद साड़ी और एक खण्ड वस्त्र रखती हैं, शेष चर्या क्षुल्लक के समान है। 

     

    57. श्रावक को कितने स्थानों पर मौन रखना चाहिए ? 
    श्रावक को सात स्थानों पर मौन रखना चाहिए। भोजन, वमन, स्नान, मैथुन, मल-मूत्र क्षेपण, जिनपूजा आदि छ: आवश्यक करते समय और जहाँ पाप कार्य की संभावना हो, वहाँ पर मौन रखना चाहिए ।

     

    58. किसे क्या कहकर वन्दना करनी चाहिए ? 
    मुनिराज को नमोस्तु, आर्यिकाओं को वन्दामि, एलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका एवं दशमी प्रतिमाधारी श्रावक को इच्छामि तथा अन्य प्रतिमाधारी श्रावक को वन्दना करना चाहिए। साधमी जनों से जयजिनेन्द्र कहना चाहिए।

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