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  • अध्याय 31 - मन्दिर किसका प्रतीक है

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    सम्यक् दृष्टि की आस्था का केन्द्र मन्दिर है, उसकी तुलना अनेक प्रकार से की गई है। उसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. मन्दिर किसे कहते हैं ? 
    जहाँ जिन प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है, उस स्थान को मन्दिर कहते हैं। 

     

    2. मन्दिर किसका प्रतीक है ?
    मन्दिर - समवसरण, नदी, चिकित्सालय, विद्यालय, जीवन बीमा निगम, टिकट घर, बैंक, धन की फैक्ट्री एवं संचार के साधन का प्रतीक है। 
    समवसरण - जिस प्रकार समवसरण में तीर्थकर का उपदेश प्राप्त होता है ठीक उसी प्रकार मन्दिर जी में जिन प्रतिमा के माध्यम से मौन उपदेश मिलता है, अत: मन्दिर समवसरण का प्रतीक है।

    नदी - जैसे नदी सबकी प्यास बुझाती है, चाहे गरीब हो या अमीर, पापी हो या पुण्यात्मा, हिंसक हो या अहिंसक सभी को भेदभाव से रहित होकर शांति प्रदान करती है। ऐसे ही संसार में भटकते हुए प्राणियों के लिए जिनमंदिर गरीब-अमीर, पापी-पुण्यात्मा के भेदभाव से रहित जन्म-जन्म के शारीरिक-मानसिक तपन को मिटा देता है। 
    चिकित्सालय - जब मानव बीमार होता है तब डॉक्टर के यहाँ जाता है। डॉक्टर रोग को ठीक करना चाहता है। कुछ रोग तो ठीक हो जाते हैं , किन्तु कुछ रोग ठीक नहीं हो पाते और रोगी का अवसान हो जाता है, किन्तु मन्दिर के माध्यम से ऐसे रोग ठीक होते हैं, जो कहीं पर भी ठीक नहीं हो सकते हैं। वे रोग हैं-जन्म, जरा, मृत्यु। मन्दिर रोग के मूल स्रोत जन्म, जरा, मृत्यु को नष्ट कर देता है, फिर ये बाहरी रोग तो होते ही नहीं हैं।
    विद्यालय - जैसे-आप अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल, कॉलेज आदि भेजते हैं कि मेरा बेटा पढ़कर एम.बी.ए, इंजीनियर, डॉक्टर आदि की डिग्री प्राप्त कर ले। उसी प्रकार संस्कृति-संस्कार को जीवित रखने के लिए मन्दिर में पाठशाला रहती है, जहाँ पर आत्मा को परमात्मा बनाने की विधि सिखाई जाती है। लौकिक डिग्री तो एक भव के लिए रहती है किन्तु पाठशाला से प्राप्त ज्ञान परम्परा से केवलज्ञान की डिग्री को प्राप्त करा देता है, जो डिग्री अनंत भवों के लिए हो जाती है।
    जीवन बीमा निगम - एक किस्त भरने के बाद किसी का मरण हो जाता है, तब वह धन (जितने का बीमा था उतना) परिवार वालों को मिल जाता है, किसी वस्तु का बीमा भी होता है। एक किस्त (Policy) जमा करने के बाद वह वस्तु नष्ट हो जाती है तो नई वस्तु मिल जाती है। उसी प्रकार देवदर्शन करने से एक बार भी सम्यकदर्शन  प्राप्त हो गया है और शरीर नष्ट भी हो जाता है तो नया वैक्रियिक (देव का) शरीर प्राप्त हो जाता है। जिससे अर्धपुद्गल परावर्तन के अन्दर ही परम औदारिक शरीर को प्राप्त कर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। 
    टिकट घर - टिकट लेकर विश्व का भ्रमण कर सकते हैं। वैसे ही सम्यक्त्व रूपी टिकट से केवलज्ञान को प्राप्त कर बैठे-बैठे ही तीन लोक की यात्रा हो जाती है।
    बैंक - बैंक में धन जमा करने से वह पाँच वर्ष में दूना होता है। किन्तु मन्दिर (दान) में जमा करने से वह वटवृक्ष के समान सहस्र गुना हो जाता है। कुछ बैंक तो रातों रात फेल हो जाते हैं। किन्तु यह बैंक कभी भी फेल नहीं होता है।
    धन की फैक्ट्री - जिन्हें मन्दिर के दर्शन, पूजन, स्वाध्याय आदि के धार्मिक संस्कार नहीं रहते हैं, वे दिन भर दुकान, फैक्ट्री में धन कमाते हैं और रात्रि में सीधे मधुशाला या क्लब जाते हैं, वहाँ जाकर धन और चारित्र दोनों को नष्ट कर देते हैं और जिन्हें मन्दिर के दर्शन, पूजन, स्वाध्याय के धार्मिक संस्कार रहते हैं। वे भी दिन भर दुकान, फैक्ट्री में धन कमाते हैं और रात्रि में सीधे घर आते हैं, जिससे घर में धन की वृद्धि होती है, अत: मन्दिर धन की फैक्ट्री है।
    संचार के साधन - जिस प्रकार संचार के साधनों से देश-विदेश के समाचार ज्ञात हो जाते हैं। उसी प्रकार मन्दिर में रखे शास्त्रों से तीन लोक का ज्ञान प्राप्त होता है और मन्दिरजी में अनेक स्थानों की पत्रिकाओं के माध्यम से ज्ञात हो जाता है, कौन से महाराज किस नगर में हैं एवं किस नगर में कौन-सा धार्मिक कार्य हो रहा है। 

     

    3. भगवान को वेदी पर विराजमान क्यों करते हैं ?
    समवसरण में तीन पीठ के ऊपर गंधकुटी होती है। गंधकुटी वह स्थान है, जहाँ पर तीर्थकर का सिंहासन होता है। जिस पर तीर्थकर चार अज़ुल ऊपर अधर में विराजमान रहते हैं। अतः वेदी भी समवसरण की तीन पीठ का प्रतीक है, इसी कारण से भगवान को वेदी में विराजमान करते हैं।

     

    4. तीर्थकर की प्रतिमा के ऊपर कितने छत्र लगते हैं और क्यों ?
    तीर्थकर की प्रतिमा के ऊपर तीन छत्र लगते हैं, क्योंकि तीर्थकर भगवान तीन लोक के स्वामी हैं। नीचे बड़ा छत्र, बीच में उससे छोटा छत्र एवं सबसे ऊपर सबसे छोटा छत्र रहता है, क्योंकि अधोलोक के अंत में लोक की चौड़ाई 7 राजू, ब्रह्मस्वर्ग में लोक की चौड़ाई 5 राजू एवं लोक के शीर्ष में चौड़ाई 1 राजू है।

     

    5. तीर्थकर की प्रतिमा के दोनों तरफ चँवर क्यों लगाते हैं ?
     समवसरण में 64 चँवर दुराए जाते हैं। इसलिए तीर्थकर की प्रतिमा के दोनों तरफ एक-एक या दो-दो चँवर प्रतीक रूप लगाए जाते हैं।

     

    6. तीर्थकर की प्रतिमा के पीछे भामण्डल क्यों लगाते हैं ?
    समवसरण में तीर्थकर भगवान के मस्तक के चारों ओर आभामण्डल रहता है, जिसमें प्रत्येक जीव को 3 पूर्व के,1 वर्तमान का और 3 भविष्य के कुल 7 भव दिखाई देते हैं। उसी दृष्टि को सामने रखकर तीर्थकर की प्रतिमा के पीछे भामण्डल लगाते हैं।

     

    7. मन्दिर में शिखर क्यों बनाते हैं ?

    1. जो वस्तु विशेष होती है, उसे विशेष रूप से व्यक्त किया जाता है। मकान सामान्य होता है एवं मन्दिर विशेष। मकान और मन्दिर में अंतर दिखाने के लिए शिखर बनाए जाते हैं।
    2. शिखर का आकार पिरामिड के समान होता है, जिससे ध्वनि तरंगें एकत्रित होती हैं, जिससे स्वभावत: मन में शांति मिलती है एवं सात्विक विचार उत्पन्न होने लगते हैं।
    3. मन्दिर का उतुंग शिखर देखने से मनुष्यों का मान खण्डित होता है। 
    4. जिस स्थान पर भगवान विराजमान होते हैं, उसके ऊपर किसी का पैर न पड़े। 
    5. शिखर के कारण जिनमन्दिर का ज्ञान दूर से ही हो जाता है।

     

    8. मन्दिर के शिखर पर कलश क्यों चढ़ाते हैं ?
     कलश के बिना मन्दिर अधूरा माना जाता है उसके बिना मंदिर की शोभा नहीं बनती, इसी कारण से कलश चढ़ाते हैं।

     

    9. मन्दिर के शिखर पर कलश के ऊपर ध्वजा क्यों फहराते हैं ?

    1. यदि मन्दिर के शिखर पर कलश के ऊपर ध्वजा न फहराई जाए तो मन्दिर में राक्षस देवों का आवास हो जाता है, इसलिए ध्वजा फहराते हैं।
    2. जिस प्रकार देश की पहचान ध्वज से होती है, उसी प्रकार अपने आयतनों की पहचान धर्म ध्वज के माध्यम से होती है। 

     

    10. मन्दिर के बाहर मानस्तम्भ क्यों बनाते हैं ?

    समवसरण के बाहरी भाग में चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तम्भ होता है। जिसे देखकर मानी व्यक्ति का मान गलित हो जाता है। उसी दृष्टि को सामने रखकर मन्दिर के सामने एक ही दिशा में एक मानस्तम्भ बनाया जाता है, जिसमें अरिहंत परमेष्ठी की मूर्ति चारों दिशाओं में एक-एक रहती है। 

     

    11. मन्दिर एवं चैत्यालय में क्या अंतर है ?
    दोनों का शाब्दिक अर्थ एक ही है। जिन प्रतिमाओं के स्थापना के स्थान को मन्दिर या चैत्यालय कहते हैं। किन्तु वर्तमान में शिखर सहित देवालय को मन्दिर एवं शिखर रहित देवालय को चैत्यालय कहते हैं।

     

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