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  • अध्याय 30 - सच्चे देव-शास्त्र-गुरु

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    सच्चे देव-शास्त्र-गुरु पर श्रद्धान करना सम्यक् दर्शन कहलाता है। इनका स्वरूप क्या है। इसका वर्णन इस अध्याय में है।

     

    1. आप्त किसे कहते हैं ?
    सच्चे देव को आप्त कहते हैं।

     

    2. सच्चे देव कौन हैं ?
    जो वीतरागी, सर्वज्ञ तथा हितोपदेशी होते हैं, वे ही सच्चे देव हैं।

     

    3. वीतरागी किसे कहते हैं ?
    जिस महान् आत्मा में 18 दोष नहीं पाए जाते हैं, उन्हें वीतरागी कहते हैं। अथवा ‘वीतो नष्टो रागो येषां ते वीतराग:'। जिनका राग नष्ट हो गया है, उन्हें वीतराग कहते हैं।

     

    4. सर्वज्ञ किसे कहते हैं ?
    जो लोक के समस्त पदार्थों को और उनकी त्रिकालवर्ती अनन्त पर्यायों को युगपत् जानते हैं, ऐसे परमात्मा को सर्वज्ञ कहते हैं।

     

    5. हितोपदेशी किसे कहते हैं ?
    जो रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग के नेता हैं तथा भव्य जीवों को मोक्षमार्ग पर लगाने के लिए हित का उपदेश देते हैं, उन परमात्मा को हितोपदेशी कहते हैं।

     

    6. वीतरागी एवं सर्वज्ञ कितने परमेष्ठी हैं ?
    वीतरागी एवं सर्वज्ञ दो परमेष्ठी हैं-अरिहंत एवं सिद्ध।

     

    7. हितोपदेशी कौन से परमेष्ठी हैं ?
    हितोपदेशी अरिहंत परमेष्ठी हैं।

     

    8. अठारह दोष कौन से हैं जो वीतरागी में नहीं पाए जाते हैं ?
    आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में श्लोक 6 में अठारह दोष इस प्रकार बताए हैं 

    क्षुत्पिपासाजरातंक, जन्मान्तकभयस्मयाः॥
     न राग-द्वेष-मोहाश्च, यस्याप्तः स प्रकीत्र्यते॥

    अर्थ - क्षुधा (भूख), पिपासा (प्यास), बुढ़ापा, रोग, जन्म, मरण, भय, घमण्ड, राग, द्वेष, मोह, और च से चिन्ता, अरति, आश्चर्य, निद्रा, खेद, शोक और पसीना ये अठारह दोष नहीं होते हैं।

     

    9. कोई यह मानते हैं कि केवली भगवान कवलाहार करते हैं, उसी से एक पूर्व कोटि वर्ष तक जीवित रहते हैं ?
    केवली (अरिहंत) को संसारी जीवों के समान कवलाहार कभी नहीं होता है, उनको कवलाहारी मानना मिथ्यात्व के बंध का कारण है। यदि केवली को कवलाहारी मानेंगे तो भूख, प्यास का सद्भाव मानना पड़ेगा, जिससे दोषों का सद्भाव होगा तथा वीतरागता भी नहीं रहेगी इसलिए उन्हें केवली भी नहीं कह सकते हैं।

     

    10. केवली कवलाहारी नहीं होते हैं, सिद्ध कीजिए ?
    केवली कवलाहारी नहीं हो सकते, इस तथ्य को निम्न प्रकार से सिद्ध कर सकते हैं

    1. क्षुधा की प्रवृत्ति वेदनीय कर्म के उदय से होती है, वेदनीय कर्म का फल मोहनीय कर्म के साहचर्य से मिलता है। मोहनीय कर्म का अभाव होने से केवली को क्षुधा लगती ही नहीं है।
    2. आहार संज्ञा छठवें गुणस्थान तक होती है एवं आहार क्रिया सप्तम गुणस्थान में भी होती है, अत: वहाँ आहार संज्ञा नहीं है आहार क्रिया है। किन्तु सयोग केवली का तेरहवाँ गुणस्थान है, अत: वह आहार नहीं करते हैं। 
    3. केवली के पास केवलज्ञान है, लोक के अनन्तानन्त शुभाशुभ पदार्थ स्पष्ट दिख रहे हैं इसलिए अशुभ पदार्थों को देखने से अन्तराय का प्रसंग आ जाएगा। जब अशुभ पदार्थ देखने से सामान्य श्रावक भी अंतराय करते हैं तो केवली न करें, यह संभव नहीं है। (र.क.श्रा.टी., 6) 
    4. हमारे शरीर में अनन्त स्थावर एवं असंख्यात त्रसजीव भरे हुए हैं, वे हमारे शरीर में स्थित भोजन को करते हैं, जिससे हमारा शरीर निरन्तर क्षीण होता रहता है। उस कमी को दूर करने के लिए हमें आहार लेना आवश्यक होता है। केवली भगवान के शरीर में अन्य कोई भी जीव नहीं पाया जाता है, अत: उनको कवलाहार की आवश्यकता नहीं पड़ती है। 

     

    11. आहार के बिना केवली का शरीर कुछ कम एक पूर्व कोटि वर्ष तक कैसे स्थिर रहता है ?
    नोकर्माहार के माध्यम से। उनके शुद्ध परिणामों के निमित्त से निरन्तर शुद्ध पुद्गल वर्गणाएँ आती रहती हैं, जो नोकर्म रूप शरीर की स्थिति में सहायक होती है। 

     

    12. केवली नोकर्माहार करते हैं तो आहार कितने प्रकार के होते हैं तथा वे कौन-सा आहार करते हैं ?
    आहार 6 प्रकार के होते हैं।

    नोकर्माहार

    केवली का

    कर्माहार

    नारकियों का

    कवलाहार

    मनुष्य एवं तिर्यञ्चों का (कवल अर्थात् ग्रास)

    लेपाहार

    वनस्पति आदि में

    ओंज आहार

    अण्डस्थ पक्षियों में

    मानसिक आहार

    देवों में। (र.श्रा.वि., 6) 

     

    13. आप्त के पर्यायवाची नाम बताइए ?

    परमेष्ठी, पंरज्योति, वीतराग, विमल, क्रती, सर्वज्ञ, अनादिमद्यांत, सर्व, शास्ता अर्धनारीश्वर और जगन्नाथ आदि ।

     

    14. नवदेवता के नाम बताइए ? 
    अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य एवं जिनचैत्यालय, ये नवदेवता हैं। 

     

    15. आचार्य, उपाध्याय और साधु को देव क्यों कहते हैं ? 
    अरिहंत के पश्चात् छद्मस्थ ज्ञान के धारक उन्हीं के समान दिगम्बर रूप धारण करने वाले आचार्य, उपाध्याय एवं साधु हैं। वह भी देव हैं, क्योंकि अरिहंत में जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र है, उस रत्नत्रय की एकदेश शुद्धता उनमें भी पाई जाती है और वे ही संवर, निर्जरा और मोक्ष का कारण है। इसलिए अरिहंत की भाँति ये तीनों भी एक देश रूप से निर्दोष हैं, वे मोक्षमार्ग के साधक हैं व उपदेश करने वाले हैं, पूज्य हैं, अत: उन्हें भी देव कहते हैं। 

     

    16. कोई कहता है सर्वज्ञ हैं ही नहीं, क्योंकि देखने में नहीं आते हैं ? इसका समाधान क्या है ?
    यदि आप कहते हैं कि सर्वज्ञ नहीं हैं, तो मैं पूछता हूँ कि सर्वज्ञ कहाँ नहीं हैं ? इस क्षेत्र में और इस काल में अथवा तीनों लोक में अथवा तीनों काल में ? यदि इस क्षेत्र में और इस काल में सर्वज्ञ नहीं हैं ऐसा कहो तो वह स्वीकार ही है। यदि तीनों लोक में और तीनों काल में सर्वज्ञ नहीं है। ऐसा कहो, तो बताइए वह आपने कैसे देखा-जाना ? यदि तीनों लोक को और तीनों काल को सर्वज्ञ के बिना आपने जान लिया तो आप ही सर्वज्ञ हो गए, क्योंकि जो तीन लोक और तीनों काल को जाने वही सर्वज्ञ है और यदि सर्वज्ञ रहित तीनों लोक और तीनों काल को आपने नहीं देखा-जाना है तो फिर तीन लोक और तीन काल में सर्वज्ञ नहीं है, ऐसा आप कैसे कह सकते हो ? इस प्रकार सिद्ध होता है कि तुम्हारे द्वारा किया गया सर्वज्ञ का निषेध उचित नहीं है। सूक्ष्म अर्थात्परमाणु आदिक, अन्तरित अर्थात् काल की अपेक्षा से दूर राम - रावणादि और दूरस्थ सुमेरु आदि, किसी - न-किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हैं, क्योंकि अनुमेय हैं। जैसे-अग्नि आदि पदार्थ अनुमान के विषय हैं सो ही किसी के प्रत्यक्ष भी अवश्य होते हैं। ऐसे सर्वज्ञ का भले प्रकार निश्चय होता है। अत: सर्वज्ञ की सिद्धि होती है। वेदान्ती और बौद्धों ने भी सर्वज्ञ को स्वीकार किया है। 

     

    17.  सच्चे शास्त्र का स्वरूप क्या है ?
    केवली भगवान् के द्वारा कहा गया तथा अतिशय बुद्धि, ऋद्धि के धारक गणधर देवों के द्वारा जो धारण किया गया है एवं आचार्य, उपाध्याय और साधु द्वारा लिपिबद्ध किए गए शास्त्र ही सच्चे शास्त्र कहलाते हैं। 

     

    18. सच्चे गुरु का स्वरूप बताइए ?
    रत्नकरण्ड श्रावकाचार की कारिका 10 के अनुसार सच्चे गुरु का स्वरूप इस प्रकार है

    विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः ॥ 
    ज्ञानध्यान तपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥ 

    अर्थ - जो पञ्चेन्द्रिय विषयों की आशा के वशीभूत नहीं हैं, आरम्भ तथा परिग्रह से रहित हैं, निरंतर ज्ञानध्यान तथा तप में लवलीन रहते हैं, वे ही सच्चे गुरु प्रशंसा के योग्य हैं। 

     

    19.  गुरु शब्द का अर्थ क्या है ?
    गुरु शब्द का अर्थ महान् होता है। लोक में शिक्षकों को गुरु कहते हैं। माता-पिता भी गुरु कहलाते हैं। परन्तु धार्मिक प्रकरण में आचार्य, उपाध्याय व साधु ही गुरु कहलाते हैं, क्योंकि वे जीव को उपदेश देकर अथवा बिना उपदेश दिए ही केवल अपने जीवन का दर्शन कराकर कल्याण का सच्चा मार्ग बताते हैं, जिसे पाकर वह सदा के लिए कृतकृत्य हो जाता है।

     

    20. साधुका मुख्य लक्षण क्या है ?
    साधु का मुख्य लक्षण प्रवचनसार की गाथा 241 के अनुसार इस प्रकार है–

    समसतुबंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणिदसमो। 
    समलोट्टकंचणो पुण जीवितमरणेसमो समणो॥ 

    अर्थ - जिसे शत्रु और बंधु वर्ग समान हैं, सुख-दुख समान हैं, प्रशंसा और निंदा के प्रति जिसको समता है, जिसे पत्थर और सोना (स्वर्ण) समान है तथा जीवन - मरण के प्रति जिसको समता है, वह श्रमण है।

     

     21. साधु के अनेक सामान्य गुण कौन-कौन से हैं ?
    श्री धवलाजी, पुस्तक 1 में साधु के अनेक सामान्य गुण इस प्रकार प्रदर्शित किए हैं

    सीह-गय-वसह-मिय-पसु-मारुद-सूरुवहिं मंदरिंदु-मणी।
    खिदि-उरगंबर-सरिसा परम-पय-विमग्गया साहू॥ 

    अर्थ - सिंह के समान पराक्रमी, गज के समान स्वाभिमानी, बैल के समान भद्रप्रकृति, मृग के समान सरल, पशु (गाय) के समान निरीह गोचरी वृत्ति करने वाले, पवन के समान नि:संग या सब जगह बेरोकटोक विचरने वाले, सूर्य के समान तेजस्वी या सकल तत्वों के प्रकाशक, सागर के समान गम्भीर, मेरु के समान अकम्प व अडोल, चन्द्रमा के समान शांतिदायक, मणि के समान प्रभापुंजयुक्त, क्षिति के समान सर्व प्रकार की बाधाओं को सहने वाले, सर्प के समान अनियत वसतिका में रहने वाले, आकाश के समान निरालम्बी, निलेंप और सदाकाल परमपद का अन्वेषण करने वाले साधु होते हैं।

    Edited by admin



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